जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

कल जब मैं उस स्कूली किताब के बारे में लिख रहा था जिसमें बताया गया था कि आपको परिवार के कम से कम एक सदस्य से डरना चाहिए-जो ज़ाहिर है, अधिकतर पिता ही होंगे-तब मुझे लगा कि लैंगिक भूमिकाओं पर मुझे थोड़ा और विचार करना चाहिए। बहुत सोचने पर मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि आधुनिक देशों में भी आज भी सिर्फ इसलिए कि वे पुरुष हैं या महिला, लोग इस उधेड़बुन में रहते हैं कि किन कामों को करने की उनसे अपेक्षा की जाती है।

स्वाभाविक ही, भारत में लिंग के आधार पर कामों का परंपरागत विभाजन पूरी तरह लागू होता है। पुरुष परिवार का अन्नदाता है। बहुत से परिवारों में महिलाएँ काम के लिए तभी घर से निकलती हैं जब बिल्कुल खाने-पीने के लाले पड़ जाते हैं और पैसे कमाने के लिए बाहर निकलना अवश्यंभावी हो जाता है। हमारे स्कूल के गरीब परिवारों में भी कुछ पिता शर्म से डूब मरेंगे अगर उनकी पत्नी को भी बाहर काम करके परिवार की आमदनी में योगदान देना पड़े! अर्थात वे भूखे पेट सो जाना पसंद करेंगे लेकिन अपनी पत्नियों को बाहर काम करने की इजाज़त नहीं देंगे। तब भी जब खुद पत्नी शिद्दत से चाहती है कि बाहर निकलकर खुद भी परिवार के लिए पैसे कमाए!

निश्चित ही भारत में आज भी विवाह के बाद और बच्चे हो जाने के बाद ज़्यादातर महिलाएँ घर में ही रहती हैं भले ही वे विश्वविद्यालय में पढ़कर डिग्रियाँ हासिल कर चुकी हों उनके पास स्नातकोत्तर डिग्रियाँ हैं लेकिन क्योंकि वे स्त्री हैं, उनका काम सिर्फ घर पर रहकर वहाँ की व्यवस्था बनाए रखना और बच्चों की देखभाल करना भर है।

लेकिन पश्चिम में भी मैंने देखा है कि आज भी पुरुष और महिलाओं में अपनी-अपनी परंपरागत भूमिकाओं को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है और वे उन्हें पूरी तरह छोड़ने में हिचकते हैं। आज भी यह पूरी तरह स्वीकार्य है कि पत्नी बच्चे हो जाने के बाद घर में बैठकर घर के काम-काज देखे और बच्चों की परवरिश करे। अगर यह आर्थिक रूप से संभव है और पत्नी को घर पर रहना पसंद है तो मैं भी उसकी सिफ़ारिश करूँगा उसे प्रोत्साहित करूँगा कि वही करे! लेकिन साथ ही अगर पति यही करना चाहे तो वह भी सबको स्वीकार्य होना चाहिए! पत्नी काम पर जाए और घर के खर्चे उठाए जबकि पति घर के कपड़े धोने से लेकर बच्चों की चड्ढियाँ साफ करे!

दुर्भाग्य से जो पुरुष इसकी पहल करते हैं, उनकी हँसी उड़ाई जाती है। इस दिशा में उनके प्रयासों का अनादर किया जाता है-और यह यही दर्शाता है कि आप वास्तव में उन महिलाओं को कितना कमतर आँकते हैं जो पहले ही इन कामों में लगी हुई हैं! अभी भी आप समझते हैं कि घर के काम कम महत्वपूर्ण हैं, कम मुश्किल हैं और उन्हें कोई भी ऐसा व्यक्ति कर सकता है जो अपनी अल्प योग्यता के चलते पैसे कमाने वाले ‘बड़े काम’ नहीं कर सकता! यह हास्यास्पद है! इसका सबसे अच्छा इलाज यह होगा कि ऐसा समझने वाले को खुद ये काम करके देखना चाहिए! चुनौती स्वीकार करें और मुझे दिखाएँ कि आप किस तरह सारे घर की साफ-सफाई करते हैं, बाज़ार जाकर राशन लाते हैं, सारे परिवार के लिए खाना पकाते हैं और सबके मैले कपड़े धोते हैं, जबकि आपके दो छोटे-छोटे बच्चे सारे घर में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं!

क्या यह अविश्वसनीय नहीं है कि आज, 21 वीं सदी के 15 साल गुज़र जाने के बाद भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि अपने कपड़े साफ करना, अपने लिए खाना पकाना पुरुषों के करने योग्य काम नहीं हैं-अपनी संतान को खाना खिलाने जैसे कामों की बात तो छोड़ ही दीजिए जबकि ये काम एक दिन आपकी संतान भी आपके लिए करेगी?

और जब लोग यह सोचते हैं कि पुरुषों को रोना नहीं चाहिए, तो इसका कारण भी यही होता है। और, क्योंकि स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के खाते में आता है इसलिए पश्चिम में आप महिलाओं को तो आपस में हाथों में हाथ डाले घूमता हुआ देख सकते हैं लेकिन पुरुषों को नहीं। ऐसा क्यों? क्यों स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के लिए आरक्षित है जबकि पुरुषों के लिए अपनी कोमल भावनाओं को दूसरों से साझा करने की जगह शराब को ही समस्या का समाधान मान लिया जाता है!

एक तरफ लोग महिलाओं की क्षमता का सम्मान नहीं करते, उनकी नज़रों में उसकी कोई कीमत नहीं और दूसरी तरफ पुरुषों के कंधों पर बहुत ज़्यादा भार डाल देते हैं! कृपया ऐसा न करें। महिलाओं के पास उनके अपने बोझ लदे हैं- लेकिन उनके संबंध में कल चर्चा करेंगे।

भारतीय पुरुष को कभी-कभी अपनी पश्चिमी जीवन साथी की स्वतंत्रता क्यों भयभीत करती है – 24 जून 2015

कल मैंने लिखा था कि पश्चिमी महिलाओं और भारतीय पुरुषों के मध्य होने वाले वैवाहिक संबंधों में दोनों को ही विवाह पश्चात् महिला की स्थिति पर गंभीर विचार करने की ज़रूरत होती है– क्या वह घर में रहेगी या नौकरी या अपना कोई काम करेगी? ऐसे या इसी तरह के और भी कई प्रश्न इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप दुनिया के किस कोने में स्थाई रूप से बसना चाहते हैं लेकिन सामान्य रूप से ही भारतीय महिला और पश्चिमी महिला के बीच और भारतीय पुरुष और पश्चिमी पुरुष के बीच काफी अंतर होता है और जब आप एक साथ रहने लगेंगे तब निश्चित ही वे आपके सामने उजागर होंगे, फिर चाहे आप कहीं भी, किसी भी देश में रहें। मुझे लगता है कि पश्चिमी महिलाओं की आज़ादी पर अपने विचार व्यक्त करूँ और बताऊँ कि क्यों बहुत से भारतीय पुरुष उससे आश्चर्यचकित रह जाएँगे!

पश्चिमी महिलाओं के साथ संबद्ध मेरे मित्रों: आश्चर्य आपका इंतज़ार कर रहा है! पश्चिम में चीजें जिस तरह काम करती हैं, सिर्फ उसी कारण आपकी पश्चिमी महिला बहुत से ऐसे हुनर अपने साथ लेकर आएगी, जिनके बारे में आप शायद जानते भी न होंगे! क्योंकि वहाँ भारत के मुकाबले लड़कियों का लालन-पालन काफी हद तक लड़कों जैसा ही होता है, लड़कियाँ भी वह सब कर पाती हैं जो लड़के करते हैं। वहाँ का समाज महिलाओं पर उस तरह पाबंदी नहीं लगाता जिस तरह भारतीय समाज लगाता है। लगभग हर जगह, जहाँ पुरुष आ-जा सकते हैं, महिलाओं का आना-जाना भी सुरक्षित होता है, वह भी किसी भी समय और अकेले। और क्योंकि अधिकतर पश्चिमी देशों में श्रमिकों की कमी हैं और मजदूरी की दर बहुत ज़्यादा, अधिकतर लोग बहुत से काम, किसी मजदूर को बड़ी रकम देकर कराने की जगह, खुद करते हैं। इसलिए लोग बहुत से काम अपने हाथों से करना सीख लेते हैं।

नतीजा यह होता है कि आपको इस तथ्य के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है और फिर उसकी आदत डालनी पड़ती है कि पश्चिमी महिला यानी आपकी होने वाली जीवन साथी एक सामान्य भारतीय महिला की तुलना में बहुत अधिक स्वतंत्र और खुदमुख्तार होती है। उसे सूटकेस उठाने में, घर की पुताई करने में और झाड़ पर चढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी। वह बिजली का बिल जमा कर आएगी, कार चला लेगी और दुनिया भर में अकेली घूम-फिर आएगी।

उस पर पाबंदियाँ लगाने की बजाए उसका आदर करें और उसके हुनर की, उसके काम की प्रशंसा करें! उससे सीखें कि किस तरह लिंग आधारित भूमिकाएँ परस्पर बदली जा सकती हैं और लिंग भेद की बेड़ियाँ शिथिल की जा सकती हैं। कुछ नया करने की कोशिश करें, कुछ ऐसा, जिसे अब तक आप 'जनाना काम' समझते आए थे! और तब आप महसूस करेंगे कि इससे आपको कितना लाभ होता है क्योंकि तब आप ज़िम्मेदारियों को बाँट लेते हैं और उन्हें अकेले-अकेले ढोने की ज़हमत से बच जाते हैं!

और आप, मेरी महिला मित्रों: आपको संयम रखना होगा और समझना होगा कि जब आप कोई साहसिक काम अंजाम देती हैं और आपका साथी उससे असुविधा महसूस करता है तब इसके पीछे क्या कारण होता है, उन कारणों की जड़ कहाँ होती है। एक छोटा सा काम- सीढ़ी पर चढ़कर बल्ब बदलना- भारतीय पुरुष इतना सा काम भी महिलाओं को करता देखने के आदी नहीं होते! भारतीय महिलाएँ पालन-पोषण करने वाली बच्चों की माँ और पति की देखभाल करने वाली कोमलांगी पत्नी बनकर रहने को ही प्राथमिकता देती हैं, जो पति के बगैर एक कदम आगे नहीं रख सकती!

अपने पुरुष साथी को दिखाइए कि कैसे आप अपने हाथों और पैरों का इस्तेमाल करना जानती हैं। जहाँ आपको ज़रूरत महसूस होती हो, अपनी स्वतंत्रता न छोड़ने पर अड़े रहिए लेकिन कभी-कभार अपना सूटकेस उसे उठा लेने दीजिए! इस बात का मज़ा लीजिए कि आपका भारतीय पति इस मामले में किसी पश्चिमी पति के मुकाबले ज़्यादा मददगार है और आपके लिए अधिक सुविधाजनक साबित हो रहा है! मुझे विश्वास है कि कभी-कभी मामूली अदाओं से पुरुषोचित कार्य करने वाले बलवान पुरुष होने के उसके एहसास को आप तुष्ट कर पाएँगी। कभी-कभी भारतीय पुरुषों को इसकी ज़रूरत महसूस होती है!

अंत में, अगर आप भारत में रह रही हैं तो कुछ मामलों में, जैसे यदि वह शहर के कुछ ख़ास इलाकों में जाने से मना करता है तो उसकी बात मानें। लेकिन कुछ समय बाद, अगर आपको लगता है कि यह कुछ ज़्यादा हो रहा है, आपको पाबंदी या वर्जना जैसा लग महसूस हो रहा है और उससे आपको दिक्कत हो रही है तो बात कीजिए-ऐसा न हो कि सुरक्षा के बहाने आप पर आवश्यकता से अधिक पाबंदियाँ आयद करके वह अपना वर्चस्व प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहा हो!

ये बातें सिर्फ चर्चा करने के लिए नहीं हैं बल्कि उन पर अमल करने के लिए भी हैं और अमल तभी हो सकता है जब आप साथ रहें। लेकिन कम से कम आपको इन बातों की जानकारी हो गई और सामने आ सकने वाली दिक्कतों का आपको अनुमान हो गया। आगे उन पर चर्चा करने के काफी अवसर प्राप्त होंगे!

अभी भी बहुत से विषय हैं जिन पर चर्चा की जानी चाहिए- और अगले कुछ दिन मैं उन बातों पर विस्तार से लिखूँगा!

अगर आप अपनी पत्नी के साथ बलात्कार नहीं करते तो आप भारत के सिर्फ 25% लोगों में से एक हैं – 10 जून 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कपड़ों को लेकर हुई चर्चा के कारण कैसे मुझे मित्रता में दूरी महसूस होने लगी। इस विषय पर हमारे बीच गहरी मतभिन्नता थी क्योंकि उसकी नज़र में महिलाओं के वस्त्रों की वजह से बलात्कार होते हैं। चर्चा आगे भी चलती रही थी और आज मैं उसके शेष हिस्से के बारे में आपको बताना चाहता हूँ।

मैं जानता हूँ कि वास्तव में बहुत से लोग हैं, जो मानते हैं कि किसी स्त्री के साथ कोई भी यौन दुराचार वास्तव में उसी की वजह से होता है, कम से कम एक विशेष सीमा तक। और इन लोगों के लिए गलत कपड़े पहनना उसकी मुख्य गलती होती है। लेकिन क्या आप तब भी यही समझते हैं कि जब दो साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो इसलिए कि वह अपने चाचा के सामने नंग-धड़ंग घूमती रहती थी? क्या आपकी नज़र में वाक़ई यह उसका दोष है?

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आँकड़े दर्शाते हैं कि 93% बलात्कार पीड़िता के परिचित व्यक्तियों द्वारा ही किए जाते हैं। यह एक तथ्य है। और ऐसे लोग भी हैं, जो इस पर विश्वास नहीं करते।

अधिकतर ये लोग पीड़िता के चाचा, पिता, भाई या परिवार के परिचित मित्र होते हैं! यह कहना आवश्यक है कि उनकी जगह चाचियाँ, बहनें और परिवार की दूसरी महिलाएँ भी हो सकती हैं क्योंकि यौन दुर्व्यवहार सिर्फ पुरुषों तक ही महदूद नहीं है। बच्चों से वयस्क कहते हैं कि यह बात किसी को न बताएँ अन्यथा कोई भी उनसे प्यार नहीं करेगा। बड़ी उम्र की महिलाएँ भी बलात्कार का शिकार होती हैं और शर्मिंदगी के एहसास में डूब जाती हैं, स्वयं को अपराधी समझती हैं, किसी के सामने स्वीकार नहीं करतीं, शायद डरती हैं कि उल्टे उसी पर दोष मढ़ दिया जाएगा!

लेकिन ऐसे लोग भी समाज में हैं जो कहते हैं कि ये आँकड़े झूठे हैं-हालाँकि दुनिया भर में ऐसे आँकड़े बहुतायत से पाए जाते हैं! मेरा मित्र इन्हीं लोगों में से एक है! दरअसल उसने कहा भी- 'मैं इतने परिवारों को जानता हूँ और उनमें से किसी भी परिवार में बलात्कार नहीं हुआ है!'

वे आपको क्यों बताएँगे? और शायद वे खुद भी न जानते हों क्योंकि आप जैसे लोगों के चलते पीड़िता अपने आप से इस कदर शर्मिंदा होती है कि अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को अपनी ही गलती समझती है!

एक और आँकड़ा है-इस बार संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से-जिसे भारत सरकार तक झूठा मानती है: भारत में 75% शादीशुदा महिलाएँ अपने पतियों द्वारा बलात्कार का शिकार होती हैं।

इस पर मेरे मित्र का जवाब था कि यह आँकड़ा सरासर गलत है। तर्क: 'मैंने अपनी पत्नी के साथ कभी बलात्कार नहीं किया!'

मैं एक मिनट के लिए स्तब्ध रह गया और मेरी ज़बान से बोल नहीं फूटे! मैं तो इस तरह से सोच भी नहीं था! आप इस तरह का उत्तर क्योंकर देंगे? स्वाभाविक ही आप अपनी पत्नी के साथ बलात्कार नहीं करते, मैंने भी यह नहीं सोचा था- लेकिन इससे आप सिर्फ उन 25% लोगों में शुमार होते हैं, जो ऐसा नहीं करते! और इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसा करने वाला और कोई हो ही नहीं सकता!

लेकिन समस्या यह है कि परंपरागत और धार्मिक लोग, जिन्हें विश्वास है कि हमारी पुरातनकाल से चली आ रही भारतीय संस्कृति में हर बात अच्छी ही अच्छी है, वह इतनी महान है कि उसे जस का तस, जैसी वह शुरू से थी, बचाकर और संभालकर रखना ज़रूरी है, भले ही यथार्थ की रोशनी में आपको अपनी आँखों पर पट्टी ही क्यों न बांधनी पड़े! वे अपने आप से झूठ बोलते हैं और कहते हैं कि यह तो उनके धर्म और संस्कृति में हो ही नहीं सकता और इसलिए यह होता ही नहीं है, उनका अस्तित्व ही नहीं है!

यह मेरे लिए अत्यंत आश्चर्यजनक था कि मेरा मित्र भी इन आँकड़ों पर विश्वास नहीं करता- लेकिन फिर मैं जानता हूँ कि बहुत से दूसरे लोग भी इसी तरह सोचते हैं। मस्तिष्क के साथ होने वाले इस छल-कपट के बारे में कल मैं कुछ और विस्तार से लिखूंगा।

आप बिकनी पहनना ठीक नहीं समझते? मेरी पत्नी उन्हें बीच पर पहनती हैं! क्या हम अब भी दोस्त बने रह सकते हैं? 9 जून 2015

कल मैंने अपने एक मित्र के बारे में आपको बताया था, जिसके साथ, दुर्भाग्य से, मैं अब ज़्यादा नजदीकी महसूस नहीं करता। मैं एक उदाहरण से इस स्थिति का विश्लेषण करूँगा, जिसके अनुसार हमारे विश्वासों, नजरियों और विचारों ने हम दोनों के बीच दूरी पैदा कर दी है। यह इस बात से संबंधित है कि महिलाओं और लड़कियों को क्या पहनना चाहिए-और क्या ऐसे वस्त्र, बदन को पर्याप्त न ढँक पाने की वजह से बलात्कार और यौन दुराचार को आमंत्रित करते हैं।

मेरा यह मित्र पूजापाठी हिन्दू है, वह हिन्दू संस्कृति और परम्पराओं का समर्थक और उसका वाहक है और शायद आप पहले ही इन विषयों पर मेरे विचारों को जानते होंगे। हमारे बीच किसी अखबार में प्रकाशित एक चित्र पर चर्चा हुई थी, जिसने मुझे एक ब्लॉग- जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं- लिखने के लिए भी प्रेरित किया था। इस चित्र का संदेश यह था कि पुरुषों को चाहिए कि वे अपनी लड़कियों को ‘पूरे कपड़ों में ढँककर’ रखें।

मैंने पूरी शक्ति से इस विचार का विरोध किया और अपनी बात के पक्ष में हर तरह के तर्क दिए लेकिन स्वाभाविक ही, उसे सहमत नहीं कर पाया क्योंकि जीवन के बारे में उसके विचार दक़ियानूसी, परंपरावादी और धर्म से संचालित भारतीय संस्कृति से प्रभावित थे।

इस चर्चा के बाद मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे याद आया, कुछ ही दिन पहले मैंने अपने मित्र को उस समय के फोटो दिखाए थे, जब हम यूरोप में थे। उसमें एक बीच पर खींचे गए मेरे, मेरी पत्नी, बेटी और दूसरे मित्रों के फोटो थे। हम तैरने की पोशाकों में थे, जिनमें मेरी महिला मित्रों और स्वाभाविक ही मेरी पत्नी ने बिकनी पहनी हुई थी और मेरी बेटी ने तैरते समय पहनने वाले बच्चों के वस्त्र पहने हुए थे-जो महज रंगीन अंडरवीयर लग रहे थे।

अगर आप या कोई भी यह मानता है कि जो कपड़े पूरा शरीर नहीं ढँकते, बलात्कार को आमंत्रित करते हैं, अगर आप सोचते हैं कि महिलाओं को बिकनी नहीं पहनना चाहिए बल्कि बीच पर भी पूरे कपड़े पहनकर नहाना चाहिए तो उनके मन में ये सैर-सपाटे वाले चित्र गलत विचार पैदा करेंगे! मैं एक सैर-सपाटे वाला चित्र साझा कर रहा हूँ और आप एक चित्र साझा करके कह रहे हैं कि महिलाओं को अपना बदन ढँककर रखना चाहिए?

आप मेरे परिवार के बारे में, मेरी पत्नी के बारे में क्या सोच रहे हैं?

मुझे लगता है कि यह बिल्कुल स्पष्ट है और मैं ऐसे व्यक्ति से, जो मेरी पत्नी के बारे में ऐसा सोचता है, वही घनिष्ठता नहीं रख सकता!

आप सभी पहले से जानते हैं कि मैं अपने विचार दबाकर नहीं रखता और इसलिए मैंने ठीक यही बात अपने मित्र से साफ-साफ शब्दों में कह दी। उसकी प्रतिक्रिया थी, ‘तुम बहुत ज़्यादा सोचते हो’!

जी नहीं, दरअसल आप पर्याप्त नहीं सोच रहे हो! आपका धर्म आपको सोचने की इजाज़त ही नहीं देता और इसलिए आप सिर्फ धर्मग्रंथों में लिखी गई या आपके पुरोहितों द्वारा बताई गई बातें ही सोच पाते हो! और ईश्वर ही तो यह सब कर रहा है तो फिर आप क्यों परेशान होंगे?

लेकिन जब आप कोई वक्तव्य देते हैं, किसी भी तरह का वक्तव्य, जो बहुत सामान्य किस्म का होता है और कहता है कि ‘कपड़े शरीर ढँकने के लिए होते हैं, उसे उघाड़ने के लिए नहीं’ तो आप सबके लिए कह रहे होते हैं, हर देश के लिए, हर जगह के संदर्भ में कह रहे होते हैं। आपका वक्तव्य मुझ पर भी लागू होता है, मेरी पत्नी पर लागू होता है और मेरी बेटी पर भी लागू होता है! अगर आप कहते हैं कि नहीं करता तो आप झूठ बोल रहे हैं। आप सच देखना सुनना नहीं चाहेंगे लेकिन यही आपके मन में होता है और भले ही आप ढँके-छिपे रूप से मेरे परिवार को और दोस्तों को मिली स्वतन्त्रता की प्रशंसा करेंगे लेकिन आपके मन में यही बात होती है कि- ‘यह गलत है, यह पापकर्म है!’

नहीं, इन घटनाओं या चर्चाओं के परिप्रेक्ष्य में मैं आपके प्रति एक वास्तविक अच्छे दोस्त जैसी घनिष्ठता महसूस नहीं कर सकता। मुझे इस एहसास से महरूम होने का दुख होगा- लेकिन जब मैं इसके कारणों पर सोचता हूँ तो मुझे कोई दुख नहीं होता!

महिलाओं की यौन इच्छाओं से पुरुषों की सुरक्षा करना – लैंगिक समानता की दिशा में एक और तर्क – 7 मई 2015

कल वैवाहिक बलात्कारों के संबंध में लिखते हुए मैंने नोटिस किया कि सेक्स पर विचार करते हुए हमेशा महिलाओं की सहमति का सवाल उठता रहा है। मैंने आज तक यह कभी नही पढ़ा कि सेक्स के लिए पुरुषों की सहमति होनी चाहिए या नहीं! मैंने इन चर्चाओं में यह भी कभी नहीं पढ़ा कि महिलाओं को भी सेक्स की आवश्यकता होती है! यह कैसे?

जैसा कि कल मैंने स्पष्ट किया था, हिन्दू धर्म महिलाओं से यह अपेक्षा करता है कि वे हर हाल में अपने पति की आज्ञा का पालन करेंगी। अर्थात, अगर पति सेक्स करना चाहता है तो उसे तुरंत अपने आपको पति के सामने प्रस्तुत कर देना चाहिए। इस्लाम भी, जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, महिलाओं के प्रति इतना ही असभ्य व्यवहार करता है। असल में, मैंने हाल ही में कहीं पढ़ा कि मुहम्मद ने इस बारे में ब्योरेवार विस्तृत नियम बता रखे हैं कि पत्नी को अपने आपको किस तरह हर वक़्त तैयार रखना चाहिए: चाहे महिला ‘ऊँट पर बैठी’ हुई ही क्यों न हो, उसे पति के साथ संभोग के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए!

वाह! पैगंबर की स्वैर कल्पनाएँ बेहद विषद, गजब और सजीव हैं! क्या नहीं?

तो सारी चर्चा महिला की सहमति के इर्द-गिर्द घूम रही है। उसे पति के साथ सेक्स के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए। लेकिन क्या हो अगर उसका पति सेक्स के लिए उद्यत ही न हो, खुद होकर कभी उससे कहे ही नहीं-या कभी-कभार, क्वचित ही कहे? तब पत्नी की यौनेच्छा का क्या होगा, सेक्स की उसकी आवश्यकता का क्या हो?

पूरी चर्चा इस बात की है कि सिर्फ पुरुष ही हमेशा सेक्स की मांग करे, चाहे जब, दिन में कभी भी! न सिर्फ दिन में कभी भी, बल्कि इस बात की चिंता किए बगैर कि उसकी पत्नी किस अवस्था में है-सिर्फ मासिक धर्म के समय को छोड़कर, क्योंकि तब वह अपवित्र और अस्पृश्य होती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वास्तव में पुरुष की सेक्स करने की इच्छा न हो?

जी हाँ, इसके विपरीत अगर महिला की सेक्स की इच्छा अधिक प्रबल हो? महिलाओं की यौनेच्छा को कम करके न आँकें! जब उनकी इच्छा होती है, बल्कि कहा जाए कि जब उन्हें सेक्स की अत्यंत आवश्यकता होती है तब कई महिलाएँ किसी पुरुष के साथ सोने की इच्छा में बड़ी दूर तक जा सकती हैं, कई खतरे मोल ले सकती हैं! कमजोर सेक्स कई बार असाधारण शक्ति प्राप्त कर लेता है और उसके तरकश में पुरुषों से कहीं ज़्यादा प्रकार के तीर होते हैं, क्योंकि पुरुषों में, जैसा कि हम जानते हैं, रक्तसंचार जब दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होने लगता है, उनका मस्तिष्क ठीक तरह से काम नहीं करता! और ऐसी स्थिति में मस्तिष्क का बेहतर उपयोग करते हुए यह सीधी-सादी लगने वाली औरत अपना कम अबोध रूप भी दिखा सकती है!

इसलिए मैं पुरुषों की ओर से यह याचना करता हूँ कि बिना सहमति के किए जाने वाले सेक्स के बारे में चर्चा करते समय उनकी सहमति या असहमति पर भी चर्चा की जानी चाहिए! पुरुषों की अकामुकता के साथ हो रहे भेदभाव के विरोध में एक अपील और लैंगिक समानता की मांग!

आश्रम में होली – उन्मादी मगर हर तरह से सुरक्षित मौज-मस्ती – 8 मार्च 2015

होली-समारोह का समापन हो गया है! हमने रंगों के इस त्योहार पर एक बार फिर एक खास, शानदार और अविश्वासनीय रूप से बेहद रंगीन समारोह का आयोजन किया था!

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि इस पूरे समय अपरा पर होली का बुखार चढ़ा हुआ था। वह रोज़ होली खेलती और सबसे कहती कि मुझे रंग चाहिए और हमारे कर्मचारियों को भी अपने साथ मिला लेती और उनके साथ बाज़ार जाकर खुद रंग खरीद लाती! उस पर जैसे होली के उन्माद का विस्फोट हुआ था!

होली के अंतिम दिन यानी 6 मार्च को हमारे यहाँ सबसे बड़ा समारोह आयोजित किया गया था, जिसमें न सिर्फ गुलाल से बल्कि रंगीन पानी से होली खेली गई और कई रंगों के रंगीन पानी की पिचकारियों से आपस में रंगों की बौछार की गई! यशेंदु और आश्रम के कर्मचारियों ने पिछली रात फूलों को उबालकर रंगीन पानी तैयार किया था और इसलिए पानी भी पर्याप्त गरम था। लेकिन अपरा का निर्णय था कि वह सूखे रंगों से ही होली खेलेगी और वह ज़रा अलग हटकर, गीला होने से बचते हुए होली खेलती रही!

लेकिन हमारे मेहमान बेहिचक हमारे साथ रंग खेलने बाहर निकल आए! हमारी तरह उन्होंने भी होली खेलने का भरपूर मज़ा लिया और पिछले साल की तरह उनके शरीर, सारे अंग-प्रत्यंगों सहित, रंगों में पूरी तरह सराबोर होते रहे। मुख्य समारोह के समापन तक हम सब थककर चूर हो चुके थे-फिर भी कल हर व्यक्ति बाहर निकल आया था और अलसाया सा त्यौहार के माहौल का और स्वाभाविक ही, स्वादिष्ट मिठाइयों और नमकीन नाश्तों का लुत्फ़ उठा रहा था!

कल एक जर्मन महिला आश्रम आई थी और अगले महीनों के विश्रांति सत्रों के बारे में पूछ रही थी। होली के दर्मियान वह वृन्दावन में ही थी-लेकिन होली का सबसे मुख्य दिन यानी छह मार्च उसने होटल के कमरे में बंद रहकर गुज़ारा क्योंकि उसके एक दिन पहले यानी पाँच मार्च को उसके साथ एक अप्रिय घटना हो गई। दरअसल, उस दिन वह होटल से बाहर निकली थी और बाहर भीड़ ने न सिर्फ उसे अच्छी तरह रंग दिया बल्कि मौके का फायदा उठाकर उसके शरीर के साथ छेड़खानी की और उसके साथ कई तरह से अभद्र व्यवहार भी किया। ऐसी भीड़भाड़ में, जब लोग होली के हुड़दंग में उन्मत्त हो चुके हों, ऐसी बातें होती ही रहती हैं-और महिलाएँ, कमरे में बंद रहने के अतिरिक्त, इस मामले में विशेष कुछ नहीं कर सकती। यह बड़े दुर्भाग्य और शर्म की बात है!

इसी कारण ट्रेवल एजेंसियों और ऑनलाइन ट्रेवल फोरम्स ने महिलाओं को आगाह करना शुरू कर दिया है कि मुख्य होली के दिन वे बाहर न निकलें अंदर ही रहें या फिर अपने जान-पहचान वाले समूह के साथ, गेस्ट हॉउस में ठहरे परिवारों के साथ या अन्य आपसी लोगों के साथ ही होली खेलें, सड़क पर निकलकर बाहर नहीं।

हमें ख़ुशी और सन्तोष है कि हमारे आश्रम में हम विदेश से आने वाले मेहमानों को सुरक्षित वातावरण में होली के संपूर्ण हुड़दंग का मज़ा लेने का मौका प्रदान करते हैं और वह भी यहाँ, वृन्दावन जैसी होली के लिए मशहूर जगह में। जी हाँ, हम सब पागलों की तरह होली खेलते हैं, सब एक-दूसरे की ओर दौड़ते-भागते फिरते हैं, बच्चे बनकर एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं-मगर हम कितना भी बहक जाएँ, हम जानते हैं कि किस तरह हर हाल में सामने वाले का सम्मान अक्षुण रखा जाना चाहिए। हमारे साथ हमारे कर्मचारी, हमारे मित्र गण, हमारे मेहमान, हमारे बच्चे और हमारे परिवार होते हैं। यह काफी बड़ी भीड़ होती है लेकिन किसी की गरदन पर भी रंग मलना है तो हम सब इतना भर जानते हैं कि हर हाल में सिर्फ और सिर्फ होली का आनंद लेना है, इसके इतर कुछ भी नहीं!

और इस समारोह में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के लिए वह सिर्फ मौज-मस्ती और आमोद-प्रमोद ही बना रहता है! और अब, होली-समारोह की समाप्ति के बाद हमारे मन में उस सुखद समय की यादें हैं कि कैसे हम एक बार फिर बच्चे बन गए थे और रंगों की परवाह किए बगैर होली खेलते रहे! साल का यह सबसे बढ़िया समय होता है-और हम इस समय को दुनिया भर के अपने मित्रों के साथ गुज़ारकर और इस अनुभव में सबको सहभागी बनाते हुए, उसे सबके साथ साझा करते हुए बहुत खुश होते हैं!

अगले साल भी इसी तरह की शानदार होली खेलने का इंतज़ार हम अभी से करने लगे हैं!

इस वर्ष के होली समारोह के चित्र यहाँ देख सकते हैं

पढ़े-लिखे उच्च वर्ग में भी लड़की के जन्म पर निराशा व्यक्त की जाती है! 14 जनवरी 2015

कल मोनिका के बारे में लिखते हुए मैं उसकी पारिवारिक स्थिति पर पुनः विचार करने को मजबूर हो गया। मुझे उसकी माँ के अतीत का खयाल आया, जिसकी दो लड़कियों को दत्तक दे दिया गया क्योंकि वे लड़के नहीं, लडकियाँ थीं। रमोना ने कुछ समय पहले अपनी स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) से बात की-और जो उसने बताया उससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि बहुत से उच्च वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का यह आज भी एक कटु सत्य बना हुआ है!

जिस अस्पताल में रमोना की स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) काम करती है, वहीं अपरा का जन्म हुआ था और वहीं इस वक़्त मोनिका का इलाज चल रहा है। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूँ, वह एक बहुत अच्छा अस्पताल है। अर्थात, यहाँ डॉक्टर जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, यहाँ के कर्मचारी बहुत दोस्ताना और निपुण हैं और स्वाभाविक ही आप इन सेवाओं की अच्छी-ख़ासी कीमत भी अदा करते हैं। जब कोई डॉक्टर वहाँ भर्ती (बच्चे को जन्म देने वाली) किसी महिला के बारे में बताता है तो स्वाभाविक ही वह किसी अच्छे खाते-पीते, पढ़े-लिखे, उच्च वर्गीय खानदान की सदस्य होती है। वे अच्छी ख़ासी पढ़ी-लिखी होती हैं और अक्सर कोई न कोई काम करती हैं और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से उनका संपर्क होता है, आधुनिक जीवन और आचार-व्यवहार को वे अच्छी तरह जानती हैं। इसके अलावा वे पुराने दक़ियानूसी मूल्यों की सच्चाई के बारे में भी अच्छी तरह वाकिफ होती हैं।

लेकिन दुर्भाग्य से, जो डॉक्टर ने बताया वह बड़ा निराशाजनक था। उसने बताया कि अक्सर ये महिलाएँ भी बड़ी अंधविश्वासु होती हैं और पुराने, भद्दे, दक़ियानूसी मूल्यों की गुलाम और विचारों से बहुत गँवार होती हैं। उसे अकसर ऐसे अनुरोध प्राप्त होते रहते हैं, जिनमें महिलाएँ विनती करती हैं कि उनका सी-सेक्शन ठीक उनके द्वारा बताए गए ‘मुहूरत’ पर हो, जिसे ग्रहों और नक्षत्रों की अवस्थिति के अनुसार किसी पंडित ने निश्चित किया होता है, जिससे होने वाले बच्चे की बढ़िया से बढ़िया कुंडली तैयार हो सके।

इतना ही नहीं, स्वाभाविक ही ऐसी हालत में, लड़की पैदा करने वाली महिलाओं को सांत्वना देना भी उसका फर्ज़ बन जाता है। बहुत सी उच्च शिक्षा प्राप्त डिग्री धारी महिलाएँ, लड़के की अभिलाषा में लंबी प्रसव-पीड़ा सहन करती हैं और लड़की पैदा होने पर आँसुओं में डूब जाती हैं। ये आँसू पीड़ा-मुक्ति की खुशी के आँसू नहीं होते और न ही थकान के कारण बह रहे होते हैं बल्कि निराशा और अवसाद के कारण पैदा होते हैं। ‘लड़की पैदा हुई है’ वाक्य उनके अंदर किसी तरह की खुशी या उत्साह पैदा नहीं कर पाता!

अब आप ही देखिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महिला पढ़ी-लिखी है या नहीं, पहले उसका कोई लड़का है या नहीं, उसकी धारणा भी यही होती है कि लड़की के मुक़ाबले लड़का अधिक मूल्यवान है। उसकी परवरिश इसी माहौल में हुई है, वह यही सुनते हुए बड़ी हुई है और वह जानती है कि उसका परिवार उससे एक लड़का पैदा करने की अपेक्षा कर रहा होगा।

जब हम बच्चों से उनके परिवार के विषय में कुछ पूछते हैं, जैसे यह कि क्या उनके चाचा या मौसी के बच्चे हैं तो वे इस तरह जवाब देते हैं: ‘उनकी तीन लड़कियाँ हैं, लड़का एक भी नहीं है’। लड़कियाँ अक्सर आपस में कहती रहती हैं कि हमारे घर की हालत बहुत खराब है क्योंकि ‘हम इतनी सारी बहनें हैं’। जब रमोना गर्भवती थी तब कम से कम दस लोगों ने कहा था: ईश्वर करे, लड़का ही हो’!

भारत विकास और प्रगति कर रहा है लेकिन ऐसे भयावह विचारों, रवैयों और मूल्यों से मुक्ति पाने की दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है!

प्रबंधन के क्षेत्र में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएँ होनी चाहिए! 8 मई 2014

कल का ब्लॉग पढ़ने के बाद किसी ने कहा कि मुझे उस महिला मेहमान की प्रतिक्रिया पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर वह महिला थीं और स्पष्ट ही अपने पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले बेहतर काम अंजाम दे रही थीं। ऐसे पदों पर आसीन महिलाओं को अक्सर वह सराहना, मान्यता और सम्मान नहीं मिल पाते, जिसकी वे हकदार होती हैं। यह जानकारी मेरे लिए रोचक तो थी मगर साथ ही कष्टकर भी थी और इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस विषय पर कुछ और विचार किया जाए।

सर्वप्रथम यह कि प्रबंधन के मामले में पुरुषों का दबदबा अभी भी कायम है। प्रबंधन में महिलाएं मौजूद अवश्य हैं और बहुत से देशों में ऊंचे पदों पर भी मौजूद हैं मगर उनका प्रतिशत यह ज़ाहिर करता है कि पुरुष ही अधिकतर प्रबंधन के ऊंचे ओहदों तक पहुँचते हैं। आइए इसके कारणों पर, जैसे बाद में महिलाओं की गर्भावस्था और मातृत्व का समय आदि पर चर्चा करें और इसके परिणामों पर ध्यान केन्द्रित करें।

तो माना कि दस लोगों के एक समूह में सिर्फ एक महिला है। परिणामों के आंकड़े बताते हैं कि महिला का प्रदर्शन सभी पुरुषों से बेहतर है जबकि पुरुषो के मन में अभी भी यही विचार बना हुआ है: 'आखिर एक महिला मेरा काम कैसे कर सकती है?' जी हाँ! दुर्भाग्य से यही विचार, महिलाओं को कमतर समझने का यह रवैया अभी भी जड़ जमाए हुए है। लैंगिक-समानता में काफी प्रगति होने के बाद भी समाज सामान्य रूप से यही सोचता है कि कुछ कार्यक्षेत्र सिर्फ पुरुषों के लिए और कुछ दूसरे सिर्फ महिलाओं के लिए उपयुक्त हैं।

अब पुनः प्रबंधन पर लौटें। पुरुष सोचते हैं कि महिलाएँ कभी भी उतनी कठोर और निष्ठुर नहीं हो सकतीं जितने वे होते हैं। यह उनके स्वाभाव में ही नहीं होता। वे अपने कर्मचारियों पर चीखने-चिल्लाने में संकोच करती हैं। अगर यही बात है कि दृढ़ता तभी व्यक्त होगी जब आप अपने मातहतों पर चीखेंगे-चिल्लाएँगे, शोर मचाएंगे और उन्हें अपने से तुच्छ समझेंगे तो मुझे लगता है कि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को प्रबंधन के उच्च पदों तुरंत पदोन्नत कर दिया जाना चाहिए। अगर पुरुष स्वभावतः अपना गुस्सा काबू में नहीं रख सकते तो फिर महिलाओं को ऊंचे पदों पर आकर यह ज़ाहिर करना और पुरुषों को सिखाना चाहिए कि किस तरह दूसरों का अपमान किए बगैर और उन्हें अपना साथी समझकर और उन्हें अपने से नीचा समझे बगैर भी सख्त हुआ जा सकता है! कि आप बिना कर्कश हुए भी सख्त हो सकते हैं। कि आप विनम्र और सौम्य बने रहते हुए भी अपनी टीम को सफलता की ओर ले जा सकते हैं।

ऊंचे पदों पर ज़्यादा महिलाओं की नियुक्ति होने पर दूसरी सभी समस्याएँ खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएंगी। कोई यह नहीं समझेगा कि ये काम पुरुषों के लिए आरक्षित हैं। अगर कोई महिला किसी पुरुष से बेहतर परिणाम प्राप्त करने में सफल रहती है तो पुरुष को तकलीफ नहीं होनी होगी! और तब किसी पुरुष की यह हिम्मत नहीं होगी कि वह किसी भी महिला को किसी काम को करने का बेहतर तरीका बताए!

मैं जानता हूँ कि पश्चिम में बहुत सी महिलाओं को ऊँचे पदों पर काम करते हुए इस तरह की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता या पुरुष सहकर्मियों की तुलना में पर्याप्त सम्मान न पाने का बहुत हल्का सा एहसास भर उनके मन में रहता है। लेकिन यह होता है और यह बात, मैं क्या कह रहा हूँ यह वही समझ सकता है, जिसने इन अनुभवों को झेला है, जब कोई सहकर्मी आपको यह बताने की चेष्टा करता है कि आप किसी काम को करने में उतने सक्षम नहीं हैं, जितना कि वह है।

पश्चिमी देशों में, जहाँ महिला सशक्तिकरण के आन्दोलन काफी सफलता प्राप्त कर चुके हैं, स्थिति काफी अच्छी है मगर भारत में माहौल बिल्कुल अलग बल्कि निराशाजनक है। बड़ी कंपनियों के निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण पदों पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है और वैसे भी कुल मिलाकर नौकरियाँ या अपना खुद का काम-धंधा करने वाली महिलाओं की संख्या ही नगण्य है।

तो आप उनकी परिस्थिति की कल्पना कर पा रहे होंगे- निचले पदों पर, पुरुष कर्मचारियों से कम पैसों में तो महिलाएं काम कर सकती हैं मगर कठिन कामों के लिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

दुनिया भर में इस बारे में अब भी बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है। पूर्वी देशों में और पश्चिमी देशों में भी। बराबरी का स्वप्न पूरा हो सके इसलिए, सबके सम्मान के लिए और काम के बेहतर माहौल की स्थापना के लिए। ज़्यादा से ज़्यादा लोग सुखी हों, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए।

जब हमने एक नाबालिग लड़की का विवाह रोकने में सफलता पाई – 10 अप्रैल 2014

पिछले दिनों हमारे स्कूली बच्चों के घरों में हुए अपने सामान्य अनुभवों की जानकारी देने और उसके बाद भारत में लड़कियों और महिलाओं की हालत का ज़िक्र करने के बाद आज मैं एक और समस्या पर चर्चा करना चाहता हूँ: लड़कियों का बाल-विवाह। अपने स्कूल की एक लड़की के उदहारण से मैं अपनी बात स्पष्ट करूंगा: लड़की का नाम है पूजा।

पिछले हफ्ते हमारी एक शिक्षिका के पास तीसरी कक्षा में पढने वाली एक लड़की आई। पंद्रह साल की उस लड़की ने अपनी शिक्षिका से कहा कि स्कूल में यह उसका आखिरी साल है और अगले साल नया सत्र शुरू होने पर वह स्कूल नहीं आएगी। कारण पूछने पर लड़की ने बताया कि कुछ महीनों के भीतर ही उसके माता-पिता उसका विवाह कर देना चाहते हैं।

तीन दिन बाद रमोना और पूर्णेंदु उसके घर के सामने खड़े थे। वैसे भी वे दोनों पूजा के घर कई बार हो आए थे मगर सारे बच्चे उन्हें कभी घर पर नहीं मिले कि वे उनका वीडिओ बना पाते। इत्तफाकन इस बार सारा परिवार घर पर मौजूद था। पूजा उनकी तीसरे नंबर की बेटी है और उससे छोटा एक भाई और दो छोटी बहनें और हैं। उसकी दो बड़ी बहनों का विवाह पहले ही हो चुका है और दोनों के दो-दो बच्चे हैं।

इस प्रश्न पर कि क्या वे इस साल पूजा का विवाह करने की योजना बना रहे हैं, उसके अभिभावकों ने स्पष्ट, दोटूक स्वर में कहा कि 'हाँ'। उसके बाद पूर्णेंदु ने पूजा से पूछा कि क्या वह भी विवाह करना चाहती है और उसका उत्तर था: 'मैं वही करूंगी, जो मेरे माँ-बाप मुझसे करने के लिए कहेंगे'। उसके बाद जो हुआ वह बहुत लम्बा वाद-विवाद था, जिसमें पूर्णेंदु ने उन्हें विस्तार के साथ बताया कि क्यों इस साल पूजा का विवाह करना उचित नहीं है।

सबसे पहले उसने कानूनी कारण बताए: अठारह साल की उम्र से पहले किसी के साथ भी लड़की का विवाह करना गैरकानूनी है। इस तर्क का उन पर कोई असर दिखाई नहीं दिया-हालाँकि वे थोड़ा बेचैन जरुर हो गए। तब उसने पूछा कि क्या पूजा को पढ़ाने में उनका कोई खर्च होता है, जिसे वे उसकी शादी करके बचाना चाहते हैं। उनका जवाब था: नहीं, क्योंकि वह हमारे स्कूल में पढ़ती है, जहाँ उनसे एक रुपया भी वसूल नहीं किया जाता। अंत में उसने कहा कि पूजा अगर पढ़ लेती है तो भविष्य में उसे इस पढ़ाई का लाभ मिल सकता है। यह भी कि उनके जैसे कमज़ोर तबके की लड़कियां भी आजकल सफल व्यापारी बन रही हैं और सिर्फ अपनी ही नहीं बल्कि सारे परिवार की मदद कर रही हैं। इसके अलावा पढ़ाई-लिखाई इस बात की भी ज़मानत है कि वह चाहे तो पैसा कमाने के लिए कोई रोज़गार कर सकती है, नौकरी कर सकती है-क्योंकि कोई कुछ नहीं कह सकता कि भविष्य के गर्त में क्या छिपा है।

अंततः वे पूजा की पढ़ाई जारी रखने के लिए राजी हो गए। अभिभावकों के इस निर्णय के बाद पूजा के चेहरे पर आई संतोषपूर्ण मुस्कान देखते ही बनती थी। दरअसल विवाह के लिए यह बहुत कम उम्र है-मगर गरीब परिवारों में यह कभी-कभार होने वाला बिरल बात नहीं है। हम अक्सर किशोरवय लड़कियों को गोद में बच्चा लिए देखते हैं: बच्चा, जो उनके छोटे सहोदर जैसा लगता है मगर उनका खुद का बच्चा होता है!

वयस्क होने से पहले ही इन लड़कियों को जिन अनुभवों से गुज़रना पड़ता है, जिन उत्तरदायित्वों का बोझ उन्हें ढोना पड़ता है और जिन भावनात्मक और मानसिक उत्पीड़न से वे गुजरती हैं, उनके बारे में सोचना भी बेहद कष्टकारी है।

हमें खुशी है कि कभी-कभी अपना विवाह रुकवाने में हम उन अल्पवयस्क लड़कियों की मदद कर पाते हैं, जैसा कि पूजा के प्रकरण में हम कर पाए।

हमें पता है कि यही उद्देश्य लेकर अगले साल हमें पुनः इस परिवार के पास जाना पड़ सकता है। लेकिन इस समय हम खुश हैं कि हम पूजा को पढ़ाई का एक और साल मुहैया करा सके।

तब तक लड़कियां पैदा करते रहना जब तक एक लड़का नहीं हो जाता – 9 अप्रैल 2014

कुछ दिनों से मैंने अपने स्कूल के बच्चों के घरों में होने वाले अनुभवों के बारे में बताना शुरू किया है। सोमवार को मैंने आपको बताया था कि कितने ही लोग मंदिरों और आश्रमों में भजन-कीर्तन और दूसरे कर्मकांड करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं। कल मैंने बताया था कि कैसे टीवी आजकल ग़रीबों के घरों में भी एक आवश्यकता बन गया है। आज मैं एक ऐसी बात लिखना चाहता हूँ, जिसे हमारे साथ बच्चों के घर गई एक विदेशी महिला ने भी नोटिस किया था: हमारे बच्चों के घरों में लड़कियों की संख्या बहुत अधिक है!

जब आप उन इलाकों में जाते हैं, जहाँ हमारे स्कूल के गरीब बच्चे रहते हैं तो वहां आपको बड़ी संख्या में महिलाएं देखने को मिलेंगी: बाहरी दरवाज़ों पर बैठीं, गलियों में इधर-उधर आती-जातीं और छतों से आपको एक नज़र देखती हुईं। अधेड़ महिलाएं, गोद में बच्चे को लिए माँएं, अपने हाथों में कढ़ाई-बुनाई का सामान लिए स्वेटर वगैरह बुनतीं किशोरवय लड़कियां, और छोटी-छोटी बच्चियां इधर-उधर दौड़ती-भागतीं। और इस भीड़-भाड़ में एकाध लड़का। निश्चित ही अल्पसंख्यक! क्यों और कैसे?

इसके कई कारण हैं। सबसे पहला और स्वतःस्पष्ट कारण यह कि पुरुष काम पर बाहर गए होते हैं और महिलाएं साफ़-सफाई, बरतन और कपड़े धोना और बच्चों की देखभाल जैसे घर के काम निपटाती हैं। लेकिन दूसरा कारण इतना सहज और स्पष्ट नहीं है।

लड़कों की तुलना में लड़कियां बहुत कम संख्या में स्कूल जाती हैं। यह एक सचाई है। बहुत से गरीब परिवार लड़कियों की पढ़ाई को उतना ज़रूरी नहीं समझते। वास्तव में, उनके लिए जो काम सीखना ज़रूरी माना जाता है वह है घर चलाना और बच्चे पालना। और ये दोनों काम वे स्कूल में नहीं सीख सकतीं। यह सब सीखने के लिए उनका घर पर रहना ज़रूरी है। ये काम वे खुद करते-करते सीखती हैं। इस तरह जब ज़्यादातर लड़के स्कूलों में पढ़ रहे होते हैं, उनकी बड़ी या छोटी बहनें घर के कामों में अपनी माँओं की मदद कर रही होती हैं। माँ को एक सहयोगी मिल जाता है और खेल-खेल में लड़कियां काम सीखती रहती हैं। माँ-बाप, दोनों, इसे लड़कियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक मानते हैं।

लेकिन फिर भी, जब आप किसी घर में जाकर पूछते हैं कि उनके परिवार में कितने लड़के और लड़कियां हैं तो अक्सर वे आपको बताएँगे कि उनके यहाँ चार लड़कियां और दो लड़के या तीन लड़कियां और एक लड़का है। यहाँ तक कि पाँच तो लड़कियां हैं और लड़का एक भी नहीं।

परिवार आज भी एक लड़के की आशा में एक के बाद एक लड़कियां पैदा करते चले जाते हैं। लड़का इसलिए कि पारिवारिक व्यवसाय को कोई वारिस मिल सके, परिवार के नाम को आगे बढ़ाने वाला कोई मौजूद हो। कम से कम एक बेटा, जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करे। कम से कम एक लड़का, जो अपनी बहनों की तरह शादी के बाद दूसरों का घर बसाने के लिए अपना घर छोड़कर न चला जाए।

वे इतने पढे-लिखे नहीं हैं कि समझ सकें कि छः या आठ बच्चे होने पर उनकी आर्थिक मुसीबतें और बढ़ जाएंगी। कि पहले ही उनके पास अपनी चार लड़कियों का लालन-पालन करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं। कि अपनी चार लड़कियों के विवाह का खर्च उठाना भी उनके लिए बहुत मुश्किल होगा और हो सकता है कि सिर्फ थोडा-बहुत दहेज़ देने और शादियों पर होने वाले दूसरे खर्चों के लिए उन्हें अपना सब कुछ बेचना पड़े।

अगर पहले दो बच्चे लड़के हैं तो इस बात की संभावना हो सकती है कि वे इतने बच्चों से संतुष्ट हो जाएं। उनका सारा ध्यान एक लड़का पैदा करने पर केन्द्रित रहता है।

यह ऐसा रवैया है, जो उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए गरीबी के चंगुल में जकड़े रखेगा। उन्हें भी और उनके बच्चों को भी।

इस स्थिति को बदलने की दिशा में हम उनकी मदद करना चाहते हैं। उनके लड़कों और लड़कियों को शिक्षा प्रदान करके हम उनकी सहायता करने की कोशिश करते हैं। शायद अगली पीढ़ी इस बात को समझ सके।