नेपाल के भूकंप पीड़ितों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं? किसके सामने? उसके, जिसने यह हादसा बरपाया है? 27 अप्रैल, 2015

परसों यानी 25 अप्रैल को नेपाल की धरती काँप उठी। नेपाल, जहाँ भूकंप से हजारों लोगों की मौत हो गई, यहाँ से अधिक दूर नहीं है। जबकि वृन्दावन में भूकंप के झटके महसूस ही नहीं किए गए, आसपास के अधिकांश इलाकों में न सिर्फ झटके महसूस किए गए बल्कि मथुरा जैसी जगहों में घरों की दीवारें भी क्षतिग्रस्त हुईं। निश्चित ही, हम सभी इतने बड़े पैमाने पर हुई जान-माल की हानि के चलते सदमे में हैं और पीड़ितों के परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करना चाहते हैं। लेकिन आज मैं लोगों द्वारा व्यक्त की जा रही शुभेच्छाओं का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूँ कि एक बात पीड़ितों को किसी तरह की राहत प्रदान नहीं कर सकती: और वह है, ईश्वर के सामने की जा रही प्रार्थना!

मैं जानता हूँ कि मैं ठीक-ठीक क्या लिख रहा हूँ और यह भी कि मेरे बहुत से पाठक मेरे शब्दों से सहमत नहीं होंगे। बहुत से लोग, कई वे लोग भी जो धार्मिक नहीं हैं, प्रार्थनाओं की शक्ति पर विश्वास रखते हैं। इसीलिए अब वे कह रहे हैं कि वे भी पीड़ितों के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।

मैं ईमानदारी के साथ विश्वास करता हूँ कि इसका कोई अर्थ नहीं है। यहाँ तक कि मैं इसे मूर्खतापूर्ण कहूँगा। आप उन लोगों के लिए सशरीर, अपने हाथों से और अपने पैरों से कुछ कर सकते हैं, वहाँ जाकर और सहायता-सामग्रियाँ इकठ्ठा करके या किसी चैरिटी संस्था को अपना समय देकर और श्रम-दान करके ऐसा कर सकते हैं। आप अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करके ऐसा कर सकते हैं, चैरिटी संस्थाओं को अपनी मेधा और बुद्धि की सेवाएँ मुहैया कराके या उन लोगों को याद करके और उनसे संपर्क करके, जो इस मामले में कुछ मदद कर सकते हैं। या आप मदद कर सकते हैं, खुद अपनी जेब हल्की करके, चैरिटी संस्थाओं को चन्दा या सहयोग राशियाँ देकर। अगर आप इनमें से कुछ भी कर सकते हैं, तो करें और पीड़ितों को उनसे कोई न कोई लाभ प्राप्त होगा। प्रार्थनाओं से कतई नहीं।

क्यों नहीं? क्योंकि आप उस सर्वशक्तिमान, परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं, जो स्वयं यह भूकंप और उसके साथ यह विपत्ति लेकर आया है! अपनी इच्छा के विरुद्ध, वह आपकी प्रार्थना क्यों सुनेगा?

उसकी इच्छा के बगैर तो पेड़ का पत्ता भी नहीं हिलता। इसलिए बिना उसकी इच्छा के धरती कैसे काँप सकती है? जी हाँ, यह उसी की मर्ज़ी थी, जिसने आबाद घरों को उजाड़ दिया जिसने घरों में रहने वाले इन्सानों सहित घर के घर ढहा दिए, उसी की मर्ज़ी से पहाड़ों की बर्फ पिघली और मलबा बहाकर लाई, जिसमें हजारों लोग दबकर मर गए, गाँव के गाँव उजड़ गए, मलबे में समा गए और उसी की इच्छा से हजारों लोग गिरती हुई प्राचीन इमारतों के नीचे आकर, जिन्हें विश्व-घरोहर कहा जाता था, जान गँवा बैठे। उसी की इच्छा से अनगिनत महिलाएँ विधवा हो गईं, पुरुष विधुर हो गए और बच्चे अनाथ!

अगर ये सब बातें उसकी इच्छा से हुईं हैं तो फिर आप क्यों उसी ईश्वर के सामने प्रार्थना कर रहे हैं? ईश्वर, जो किसी दैत्य जैसा नज़र आ रहा है, जो इतना क्रूर है, उसके सामने?

अगर आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं और अब भी उसके सामने प्रार्थना करते हैं, पूजा अर्चना करते हैं तो आपको उन बातों को भी स्वीकार करना चाहिए, जो उसके बारे में धर्मग्रंथों में लिखी हुई हैं: सब कुछ का कर्ता वही है और जो भी वह करता है, अच्छा ही करता है। उसके द्वारा ढाई गई सभी मुसीबतों को स्वीकार कीजिए-उन्हें रोकने या सुधारने के लिए उससे प्रार्थना करना अर्थहीन है!

जब भगवान भी बलात्कार करते हैं – हिन्दू मिथकों का भारतीय समाज पर असर – 3 नवंबर 2014

आज भी एक त्यौहार है और वृन्दावन में धार्मिक लोग परिक्रमा लगाकर इसे मनाते हैं। हिन्दू मिथकों के अनुसार इस दिन भगवान चार महीनों की लम्बी नींद से जागते हैं। यह विष्णु और तुलसी के विवाह का दिन भी है और भारत में आज के दिन से पुनः विवाहों के मौसम की शुरुआत होती है। आज के ब्लॉग में मैं इन धार्मिक कथाओं पर नज़दीकी नज़र डालते हुए भारतीय संस्कृति पर हुए उनके असरात का जायज़ा लेना चाहूँगा।

संक्षेप में पौराणिक कथा से मैं इसकी शुरुआत करता हूँ:

धर्मग्रंथों के अनुसार जलंधर नाम का एक दैत्य था। उसके पास अपना रूप बदलने की शक्ति थी, जिसके चलते वह किसी भी व्यक्ति का शरीर धारण कर सकता था। अपनी इस शक्ति का प्रयोग वह औरतों पर करता और उनके पतियों का रूप धरकर धोखे से उनका शीलभंग करने में सफल हो जाता। पता चलने पर जब पति उससे लड़ने आते तो कोई भी उसे मार न पाता। यह अद्भुत शक्ति उसे उसकी पत्नी के पतिव्रता होने के कारण प्राप्त थी। जी हाँ, पत्नी की स्वामिभक्ति के कारण वह दैत्य बलात्कार पीड़िता स्त्रियों के पतियों के हाथों मारा जाने से बच जाता।

सारे पति मिलकर विष्णु के पास, जिन्हें सबसे बड़ा परमेश्वर माना जाता है, गए और उससे मदद मांगी। विष्णु ने जलंधर को हराने के लिए उसी के तरीके को आजमाने का निश्चय किया: उन्होंने जलंधर का रूप धरा और दैत्य की पत्नी से सम्भोग करने में सफल रहे। वृंदा पतिव्रता नहीं रही और इस तरह उसके दैत्य पति की शक्ति जाती रही। अंततः विष्णु जलंधर को मारने में सफल रहे।

इस तरह धोखा देने के कारण वृंदा विष्णु पर बहुत क्रोधित हुई और उन्हें पत्थर हो जाने का श्राप दिया। फिर वह मृत जलंधर के साथ सती हो गई।

फिर वही वृंदा पुनर्जन्म लेकर पवित्र तुलसी का पौधा बनी और आखिर तुलसी और शालिग्राम, यानी पत्थर के रूप में विष्णु, का विवाह सम्पन्न हुआ।

इस पौराणिक कथा को हर कोई जानता है। अब मैं वर्तमान काल में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं पर इस कथा के परिणामों पर नज़र डालते हुए चार बिन्दुओं में अपनी बात रखना चाहता हूँ। स्वाभाविक ही इन्हें समाज पर धर्म के बड़े दुष्परिणामों के रूप में देखा जा सकता है:

1) अगर कोई किसी महिला पर बलात्कार करता है तो आप उसकी पत्नी के साथ बलात्कार कर सकते हैं क्योंकि आपके भगवान ने भी तो यही किया था।

आज इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ लोग बलात्कारी के परिवार की स्त्रियों पर बलात्कार करके बदला लेते हैं।

2) अपने धोखेबाज़, बलात्कारी पति की रक्षा के लिए स्त्रियों को वफादार और पवित्र होना चाहिए।

आज के भारतीय समाज में यह आम बात है कि स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वह तो पवित्रता की मूर्ति बनी रहे भले ही उसका पति बाहर जाकर कहीं भी मुँह मारता रहे, नजर आने वाली हर लड़की के साथ छेड़छाड़ करता रहे।

3) पति की मृत्यु के बाद पत्नी को आत्महत्या कर लेनी चाहिए।

दो सौ साल पहले तक यह एक सामान्य बात थी। इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता है और इस तरह आत्महत्या करना बड़े गर्व की बात होती थी क्योंकि यह काम उसकी स्वामिभक्ति का सबूत माना जाता था। राजा राममोहन रॉय ने एक कानून बनवाकर इस प्रथा को समाप्त करवाया लेकिन मेरी किशोरावस्था तक भी हम समाचार-पत्रों में ऐसे प्रकरणों के समाचार पढ़ते रहते थे। आज भी राजस्थान में ऐसे मंदिर हैं, जहाँ सती हुई स्त्रियॉं की पूजा की जाती है।

4) बलात्कार पीड़िता को अपने बलात्कारी उत्पीड़क के साथ विवाह रचाना चाहिए।

भारत में गाँवों की पंचायतों में कई बार ऐसे निर्णय आज भी सुनाए जाते हैं। दोनों परिवार अकसर इस बात पर राज़ी होते हैं कि बलात्कार की यही तार्किक परिणति हो सकती है।

इस चर्चा से आप भारतीय संस्कृति में महिलाओं की स्थिति का स्पष्ट अनुमान लगा सकते हैं। उसे बलात्कार के कारण बलात्कार झेलना पड़ता है, अपने पति के दीर्घ जीवन और संरक्षण के लिए प्रयास करने पड़ते हैं, उसे अपने पति के लिए खुद भी जीवन से हाथ धोना पड़ता है और अंत में, उसे खुद पर बलात्कार करने वाले अत्याचारी अपराधी के साथ विवाह करना पड़ता है और जीवन भर पत्नी बनकर उसकी सेवा भी करनी पड़ती है।

और इस देश के इस पाखंडी धर्म में कहा जाता है कि यहाँ स्त्रियॉं का इतना आदर किया जाता है कि उन्हें देवी का दर्जा हासिल है। ऐसे धर्म और ऐसी संस्कृति का आदर करने की आप मुझसे अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

पुनश्च: इन शब्दों के लिए मुझे गाली देने की जिनकी तीव्र इच्छा हो रही हो, वे पहले अपने धर्मग्रंथों को पढ़ें और सबसे पहले उन्हें गाली दें, जिन्होंने इन ग्रन्थों को लिखा है। मैं सिर्फ उनका हवाला देकर उसके दुष्परिणामों की ओर इशारा भर कर रहा हूँ….

क्या करें, जब आपको पता चले कि आपमें नकारात्मकता कूट-कूटकर भर गई है? 20 नवंबर 2013

कल मैंने यह तथ्य आपके सामने रखा था कि कई नकारात्मक लोग स्वयं को पीड़ित मानकर खुश होते हैं। उसके एक दिन पहले मैंने स्पष्ट किया था कि कैसे उनकी नकारात्मकता दूसरों को भी आसानी के साथ अपनी गिरफ्त में ले लेती है। आज मैं उन्हीं नकारात्मक लोगों के लिए कुछ लिखना चाहता हूँ-क्योंकि कई लोग ऐसे हैं, जो अंदर से बहुत खूबसूरत इंसान हैं मगर आसपास की सभी चीजों को नकारात्मक नज़रिये से देखने की आदत के चलते वे अपने जीवन को दुखदाई बना लेते हैं।

चलिए, मान लें कि आप ही ऐसे एक व्यक्ति हैं और आपको अचानक पता चला कि आप बहुत ज़्यादा नकारात्मक हो चुके हैं। बिना इस अनुभूति के आप उसी नकारात्मकता में लिप्त रहे आते और वही करते रहते, जो आज तक करते रहे, मगर अब आपको इसका एहसास हो गया है। सिर्फ इतने भर से आपके विचारों में और आपकी संवेदनशीलता में एक हलचल सी मच जाएगी। अगर अपने में परिवर्तन की नीयत से आप इस वक़्त अपनी इच्छाशक्ति को एकत्रित कर सकें तो पूरी संभावना है कि आप अपने आप में तब्दीली ला पाएंगे, अपनी नकारात्मकता से बाहर निकल आएंगे और सकारात्मक ऊर्जा से भरे हुए, पूरे नए इंसान बनकर सामने आएंगे!

लेकिन इस मरहले तक पहुँचने से पहले निश्चय ही आपको अपने भीतर ही कई कठिन बातों से जूझना होगा! सबसे पहले, जब इस बात का एहसास आपको होगा तो आप सोचेंगे कि अतीत में ऐसी कौन सी परिस्थितियाँ थीं, जब आप आवश्यकता से अधिक नकारात्मक हो गए थे। आप उन चर्चाओं के बारे में विचार करेंगे, जब सामने वाला अचानक अस्तव्यस्त और नाराज़ होकर आपसे दूर हो गया या जिससे आप बात कर रहे थे वह पहले तो बड़े उत्साह से आपसे बात कर रहा था मगर आपका उत्तर सुनकर अचानक बहुत दुखी हो गया। उस वक़्त भी आपने सामने वाले पर पड़ने वाले असर को नोटिस किया था मगर तब आपने सोचा था कि जो आपने कहा उसे कहा जाना अत्यंत आवश्यक था। अब आपको एहसास हो रहा है कि आपके द्वारा कही गई वह बात व्यर्थ और नकारात्मक थी! कितनी बार आप अपने मित्र की योजनाओं पर तुषारापात कर चुके हैं? कितनी बार आप अपने आप पर इतने दयार्द्र हुए हैं कि लोग आप से नाराज़ होकर बिदकने लगे?

आपको पछतावा है। आप बहुत पछतावा करते हैं। बहुत से दृश्य आपकी आँखों के सामने तैरने लगते हैं और आप पहले से भी ज़्यादा बुरा महसूस करते हैं। आप अपने नकारात्मक मूड में भी इतना बुरा महसूस नहीं करते थे क्योंकि तब आपको पता ही नहीं था कि आप इस नकारात्मकता की बीमारी से ग्रस्त हैं। बल्कि आप अपने पीड़ित होने के एहसास का मज़ा लेते थे! लेकिन अब आप उससे बाहर निकलने के लिए कटिबद्ध हैं और उसके असर को भी महसूस कर पा रहे हैं। यह गरल अब आपको पीना होगा। आपको उसे ध्यान से देखना होगा, याद रखना होगा-लेकिन तुरंत ही उससे भी बाहर निकलना होगा! आज नए तरीके से चीजों को ग्रहण करने की आपको शुरुआत करनी है और आपको सकारात्मक रहने के अपने निर्णय पर मजबूती के साथ डटे रहना होगा।

बस, इसी पल सकारात्मक तरीके से सोचना शुरू कर दीजिए: आज दिन भर के लिए और कल की योजनाओं के बारे में भी। उन लोगों के बारे में सकारात्मक सोचिए, जिनसे आप मिल चुके हैं और भविष्य में मिलने वाले हैं। अपनी सामान्य दिनचर्या को जारी रखिए, अपने कामों को त्यागने की ज़रूरत नहीं है, उन पर सिर्फ अपना नज़रिया बदलिये! अपने विचार बदलिये, मुंह से निकलने वाले अपने शब्दों में परिवर्तन लाइये!

इसमें कुछ वक़्त लगेगा क्योंकि यह एक ढीठ और जिद्दी आदत है लेकिन उसके विरुद्ध संघर्ष करके आप उसे बदल सकते हैं! कोई बात कहने से पहले अपने सकारात्मक सोच का दामन न छोड़ें, भले ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने में आपको देर लगे। अपने सारे संदेह तुरत-फुरत व्यक्त करने की जगह समय लें और विचार करें कि हो सकता है, सामने वाले की कही हुए बात में या आपके सामने आए प्रस्ताव में कई सकारात्मक संभावनाएं मौजूद हो हों!

सबसे अधिक महत्वपूर्ण है सकारात्मक रवैया अपनाने के अपने निर्णय से पीछे न हटें। आपकी नकारात्मकता के आगे भी कई अवसर आ सकते हैं लेकिन अब आप, उनका एहसास होते ही, तुरंत क्षमा-याचना करने के काबिल हो गए हैं। इसे जारी रखें और परिवर्तन आपको नज़र आएगा, आपके मित्र भी इसे नोटिस करेंगे! सकारात्मक व्यवहार पर लोगों की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होती है। वे भी सकारात्मक व्यवहार करते हैं। सकारात्मकता का पूरा नया संसार आपके सामने खुल जाता है! उसका स्वागत कीजिए! उसका मज़ा लीजिए!

सारी बुरी बातें मेरे साथ ही होती हैं! नकारात्मक लोग और पीड़ित होने का मज़ा- 19 नवंबर 2013

कल मैंने आपको नकारात्मकता के बारे में बताते हुए आश्रम के सामूहिक आयोजनों में एक नकारात्मक व्यक्ति की उपस्थिति के प्रभाव के अपने अनुभवों का ज़िक्र किया था। मैंने इस बात का भी ज़िक्र किया था कि कैसे वे लोग दूसरों को बेचैन और अस्तव्यस्त कर देते हैं और उन्हें भी नकारात्मकता की ओर ले जाने में सफल हो जाते हैं। इस समस्या से निपटने के कुछ गुर भी मैंने बताए थे। एक मित्र ने इस पर यह टिप्पणी की: वास्तव में ऐसे नकारात्मक लोगों को अपनी नकारात्मकता का एहसास ही नहीं होता! वे सोचते हैं कि दरअसल वे इस क्रूर संसार द्वारा उत्पीड़ित व्यक्ति हैं!

यह सच है। उनकी नकारात्मकता उन्हें अंधा कर देती है और वे यह तथ्य जान नहीं पाते कि यह नकारात्मकता उन्हीं के अन्दर से आ रही हैं। सभी उस मुहावरे को जानते हैं कि आप किसी आधे भरे गिलास को आधा भरा या आधा खाली कह सकते हैं। ये लोग हमेशा गिलास को आधा खाली कहते हैं और यह नहीं देखते कि वह आधा भरा हुआ भी है। वे इसी तरह सोचने के आदी हो चुके होते हैं और समझ नहीं पाते कि ऐसा करते हुए वे खुद कितना नकारात्मक व्यवहार कर रहे हैं।

इसके विपरीत वे दुनिया पर इसका दोष मढ़ते हैं कि वह उनके साथ ज्यादती कर रही है! वे अपने आपको पीड़ित समझने लगते हैं और सोचते हैं कि दूसरे सभी कितना अच्छा जीवन जी रहे हैं और उनके भाग्य मे ऐसा बदनसीब जीवन बदा है। सारे लोग मुझ पर नाराज़ क्यों हैं, क्यों मेरा बुरा चाहते हैं और मुझसे लड़ते-झगड़ते रहते हैं? मैं दूसरों की तरह खुश क्यों नहीं रह सकता?

वे यह समझ ही नहीं पाते कि वे नकारात्मक चश्मे से दुनिया को देख रहे हैं! और इसलिए कोई उनकी मदद को आगे नहीं आता। अपनी नकारात्मकता का मुक़ाबला करने के लिए उन्हे स्वयं अपने रवैये में परिवर्तन करके खुद अपनी मदद करनी होगी।

दुर्भाग्य से वे अपने आपको पीड़ित घोषित करने की आदत का शिकार हो जाते हैं और फिर उस बनावटी पीड़ा का मज़ा लेते रहते हैं। यह अनुभूति उनके लिए इतनी आह्लादकारी होती है कि वे उससे बाहर आना ही नहीं चाहते! सहानुभूति पाने के लिए वे ऊंचे स्वर में शिकायत करते रहते हैं और खुले आम अपनी पीड़ा की घोषणा करते रहते हैं।

दुर्भाग्य से यह भी ज़्यादा समय तक कारगर नहीं होता! कल्पना कीजिए कि आपका ऐसा कोई दोस्त आपके आसपास पूरे समय मंडराता रहे। कुछ समय तो आप सोचेंगे कि वाकई इसके साथ नियति ने बुरा मज़ाक किया है और उस पर दया करेंगे। लेकिन कुछ वक़्त बीतने के बाद आप नोटिस करेंगे कि यह व्यक्ति हर वक़्त शिकायत ही करता रहता है और अपनी हालत को बदलने के लिए कोई खास प्रयास नहीं करता! ऊपर से उसे कोई अच्छी सलाह दो तो वह उसे अनसुना करता है। उसके जीवन के वास्तविक दुखों को दूर करने के उपायों के बारे में चर्चा उसे पसंद ही नहीं है। वे चाहते हैं कि आप भी उनके लिए सिर्फ रोएँ, उनके दुर्भाग्य का इलाज करने की कोशिश भी न करें! वे सिर्फ आपका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना चाहते हैं-बहाना है उनका दुर्भाग्य! अगर वे अपने दुर्भाग्य से बाहर निकलना ही नहीं चाहते तो उनके मित्र धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ते चले जाते हैं और आखिर में वे अकेले पड़ जाते हैं।

तो आप जब भी इस बात का अहसास करें कि आप में नकारात्मकता प्रवेश कर गई है या आप दूसरों से अपने लिए दया की अपेक्षा रखते हैं और अपने आपको पीड़ित बताकर आपको अच्छा महसूस होता है तो समझ लीजिए कि आपको बिना देर किए उठ बैठना चाहिए अन्यथा यह बीमारी और बुरा रूप ले लेगी! आपके मित्र आपके लिए महत्वपूर्ण हैं? अगर हैं तो उनकी बातों पर कान दीजिए और अपने जीवन में आने वाली खुशियों का स्वागत कीजिए, उनका आनंद उठाइए! अपने आप पर दया करना बंद कीजिए! पीड़ित होने का ढोंग बंद कीजिए और इस बात पर ध्यान दीजिए कि आपका गिलास भी आधा भरा हुआ है!

बलात्कार में स्त्री ही ज़ख्मी होती है, स्त्री ही दोषी होती है यौन शुचिता वाले समाज में – 14 जनवरी 13

पिछले हफ़्ते मैंने भारत में स्त्रियों के खिलाफ़ होने वाले यौन-अपराधों के बारे में, उनके कारणों के बारे में जो मुझे धर्म और संस्कृति दोनों में नज़र आते हैं, और भविष्य में बलात्कार और यौन-उत्पीड़न जैसी घटनाओं को रोकने के लिए किस तरह स्त्रियों के प्रति पुरुषों के रवैयों का बदला जाना ज़रूरी है, इस बारे में लिखा है। मेरे विचार से बदलाव की शुरुआत इस बात से होनी चाहिए कि आप सामान्यतः स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और ख़ासकर उनके साथ जिन्होंने ऐसे अपराधों को भुगता है।

ऐसा क्यूं होता है कि एक स्त्री जो बस या मेट्रो में अकेली सफ़र कर रही है, अजीब तरह से छूई और घूरी जाती है, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं देती? ऐसा क्यूं होता है कि हर वर्ष बलात्कार के लाखों मामले पुलिस तक पहुंच भी नहीं पाते? इसका कारण है वो ‘कलंक’ जो हमारी संस्कृति इसके साथ जोड़ देती है। सेक्स और इससे संबद्ध कोई भी चीज़ खुली हवा में बहस का विषय नहीं बन पाती, न इसके बारे में बात हो पाती है, न इसके जड़ को पहचानने की कवायद हो पाती है। लड़कियां अपनी मांओं को भी ये बताने में हिचकिचाती हैं कि बस में एक लड़का उसके बिल्कुल पास आ गया या एक आदमी ने भीड़ में उसके साथ छेड़खानी की, उन्हें लगता है यह बताने वाली चीज़ नहीं, इससे कलंक लगता है।

यह एक सामान्य तरीक़ा है कि ऐसे मामलों को समाज का एक बड़ा तबका किस तरह देखता है: आप असल में ग़लत करने वालों के खिलाफ़ ग़ुस्सा नहीं देखेंगे, उल्टा पीड़ित लड़की को अपराधबोध होता है और वो इस बात के लिए कलंकित भी महसूस करती है कि उसके साथ ऐसा हुआ! बदतर मामलों में जब एक लड़की का बलात्कार होता है, तो माना जाता है उसकी इज़्ज़त लुट गई! मैंने इस पर पहले भी लिखा है और इस बात का ज़िक्र किया है कि बलात्कार का हिन्दी में अर्थ ही है "किसी की मर्यादा को लूट लेना"। यह भारत में नियोजित विवाह की अवधारणा में कई दिक़्क़तें पैदा करता है – कौन अपने बेटे का उस लड़की से विवाह करना चाहेगा जिसकी इज़्ज़त लूट ली गई है? ख़राब माल कौन ख़रीदे? ऐसे में, लड़की के परिजन कुछ ग़लत होने पर उसके खिलाफ़ खड़ा होने की बजाय लीपापोती में लग जाते हैं, छुपाते हैं। क्योंकि अगर आप पुलिस के पास जाएंगे, बातें शहर में फैलेंगी, लोग बात करेंगे और लड़की का भविष्य ख़तरे में पड़ जाएगा। तो क्यूं न चुपचाप इस थूक को किसी की भनक लगे बगैर गटक लें और बस ये उम्मीद करें कि गर्भ न ठहर जाए? और अगर गर्भ ठहरता है तो सबको कह दें कि आप दूर गांव में रहने वाली एक चाची के पास जा रही हैं, फिर छुपाकर अवैध रूप से गर्भपात कराएं जिसमें आपकी जान भी दाव पर रहती है। बलात्कार पीड़ित लड़कियां आत्महत्या तक कर लेती हैं- हमने इस बारे में समाचारों में पढ़ा है। वो यह सोचकर अपनी हत्या करने से नहीं चूकती कि उनकी इज़्ज़त तो जा चुकी है, वो कलंकिनी हैं और उनका भविष्य उजड़ चुका है।

तो पीड़ितों के प्रति हमारे समाज का ये रवैया है। बलात्कार पीड़ितों का नाम और उनकी पहचान गोपनीय रखने का प्रावधान है। यह प्रावधान संभवतः इसलिए है कि पीड़ित सुरक्षित महसूस करें, कि वे अन्याय के खिलाफ़ बेखौफ़ होकर आवाज़ उठा सकें लेकिन लोग इसका मतलब कुछ और ही लेते हैं: यह एक ऐसी चीज़ है जिस पर शर्मिंदा होना चाहिए, जिसे छुपाकर रखना चाहिए।

बजाय इसके कि पीड़ित स्त्री को मनोवैज्ञानिक सहायता दी जाए, आस-पास के लोगों से करुणा और हौसला मिले वैसे ही जैसे किसी बुरी दुर्घटना के शिकार हुए एक व्यक्ति को मिलती है, समाज स्त्रियों को वंचित और बहिष्कृत-सा महसूस कराता है। एक पितृ-सत्तात्मक धर्म और संस्कृति में लड़कियां न सिर्फ़ इस तरह से पाली गई हैं कि वो कमज़ोर हो जाएं बल्कि पुरुषों द्वारा किए गए कृत्य का दोष भी उनके मत्थे चढ़ा देने में कोई हिचक न हो।

हालांकि ये अचरज का विषय है भी नहीं: धर्मों के अनुसार स्त्रियों को अपना सिर और यहां तक की चेहरा भी परदे या बुरक़े में छुपाकर रखना चाहिए क्योंकि पुरुष उनका चेहरा देखकर योनि की कल्पना करके उत्तेजित हो जाते हैं। स्त्रियों को तो अपराधियों से बचने के लिए कहा जाता है परन्तु पुरुषों को अपराध न करने के लिए नहीं कहा जाता।

स्त्रियों को मानवजाति के तौर पर देखना शुरू कीजिए। उन्हें वैसे परदों की ओट से बाहर निकालिए जो उन्हें कमज़ोर बनाता है। उन्हें ये सिखाना बंद कीजिए कि वे अबला हैं और उनकी इज्जत उनकी जंघाओं के बीच है! हमें बहुत कुछ बदलना है! ये सिद्धांत की स्त्रियां पुरुषों के अधीन हैं! ये सोच कि स्त्रियां आसान शिकार हैं, कि कौमार्य केवल स्त्रियों का भंग होता है! शर्म और हौसला बढ़ाने वाले हाथों की कमी के कारण अपराधों को छुपाना! अख़बार का पहला पन्ना देखते ही शर्मसार होने से अगर हम बचना चाहते हैं तो हमारे समाज में इन सारे बदलावों का होना ज़रूरी है।

बलात्कार के लिए स्त्री के वस्त्र और व्यवहार को दोष देना बलात्कारिक मानसिकता का नमूना है – 8 जनवरी 13

कल मैंने आपसे दिल्ली में पिछले दिनों हुए सामूहिक बलात्कार की घटना पर बात की थी और सरकारी राजनेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। ऐसे बयानों की बाढ़ सी आ गई है कि ऐसा क्यूं हुआ और क्या किया जाना चाहिए ताकि ये दुबारा न हो। मैंने एक राजनेता को सुना जिनके अनुसार स्त्रियों को शाम में घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। कई और राजनेताओं ने कहा कि स्त्रियों को भड़काऊ वस्त्र नहीं पहनना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अकेली बाहर न जाएं। एक ने तो यह तक कहा कि देश भर की सभी स्त्रियों के लिए एक ड्रेस-कोड बनाया जाना चाहिए।

ये बातें मूर्खतापूर्ण तो हैं हीं साथ ही निराश भी करती हैं कि हमारे राजनेता बलात्कारी पर ऊंगली उठाने की बजाए पीड़ित को ज़िम्मेदार ठहराने लगते हैं। स्त्रियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे क्या पहनती हैं, कहां जाती हैं, अकेली जाती हैं, ये सब कहने का तो मतलब यह हुआ न कि लड़की के अपने दोष की वजह से उसका बलात्कार हुआ न कि बलात्कारियों की वजह से? उसने उन्हें बलात्कार के लिए उकसाया। मैंने पहले भी इन मुद्दों पर बहुत लिखा है और यह मानता हूं कि जो पुरुष ऐसी सोच रखते हैं उन्हें ख़ुद पर शर्म आनी चाहिए। आप पुरुष हैं, यही है आपका पुरुषार्थ? एक सुन्दर स्त्री को देखते ही आप अपना नियंत्रण खो बैठते हैं लेकिन लेक्चर ये देते हैं कि स्त्रियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं! अपनी पतलून पर ताला क्यूं नहीं डाल लेते या, अगर आपके शरीर का कोई अंग आपके नियंत्रण में नहीं तो उसे काटकर फेंक क्यूं नहीं देते! कमज़ोर कौन है, दूसरे की त्वचा देख लेने भर से कौन अपना नियंत्रण खो बैठता है? ऐसी बयानबाज़ी का मतलब है कि आप यह मानते हैं कि एक स्त्री अगर आपके पैमाने के हिसाब से ग़लत वस्त्र पहनती है तो उसका बलात्कार एक सहज घटना है। यह ठीक बलात्कारियों वाली मानसिकता है, जो अपने किए-धरे के लिए उल्टा दूसरे को दोष देता है।

ठीक यही सोच एक अन्य लोकप्रिय व्यक्ति की है: आसाराम बापू, एक प्रसिद्ध भारतीय गुरू जो अतीत में भी समाचारों में कई विवादों की वजह से आते रहे हैं, ने एक बयान दिया जिसे हजम कर पाना लोगों के लिए टेढ़ी खीर थी! उन्होंने स्पष्ट लहजे में कहा: “पीड़िता बेटी इस घटना के लिए बराबर की ज़िम्मेदार है…अगर उसने दोषियों को भाई कहकर पुकारा होता और उन्हें मना करने के लिए गिड़गिड़ाती…तो उसकी इज़्ज़त और ज़िंदगी दोनों बच जाती” यह एक ऐसा शर्मनाक बयान है जो अपने आप में इस व्यक्ति की बीमार मानसिकता को बताने के लिए काफ़ी है।

अख़बार की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में होने वाले 93% बलात्कार उन लोगों के द्वारा किया जाता है जिन्हें पीड़ित जानती हैं। परिजन, रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी या सहकर्मी। वैसे लोग जिन्हें लड़की पहले से जानती थी और जो लड़की को पहले से जानते थे। अब बताइए कि ऐसे में कौन-सा वस्त्र या कैसी हरकतें इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? सब कुछ घर पर होता है, वो किसी ख़तरनाक परिवेश में नहीं गई, उसने कुछ ऐसा नहीं पहना जो मां-बाप को नागवार गुज़रे। उसे बस इस बात की क़ीमत चुकानी पड़ रही है कि वह एक स्त्री है और कुछ पुरुषों को साबित करना है कि स्त्रियों पर उनका स्वामित्व है।

अख़बारों की रिपोर्ट बताती हैं कि कैसे पिता, ससुर, जेठ, भाई और चाचा न सिर्फ़ व्यस्क स्त्रियों का बल्कि छोटी बच्चियों तक का बलात्कार करते हैं! अगर आपको लगता है कि बलात्कार के लिए वस्त्र ज़िम्मेदार है तो बताइए कि दो साल की इन बच्चियों ने ऐसा क्या पहना था जिससे वे इतने उत्तेजित हो गए कि उनका बलात्कार करने के अलावा उन्हें कुछ और सूझा ही नहीं? वे कहां गए थे, किस बार में, कौन-से डिस्को में?

इस चलन को रोकना होगा जिसमें लोग स्त्रियों और लड़कियों को ही उन अपराधों के लिए ज़िम्मेदार ठहरा देते हैं जिनकी यातना भी उन्हें स्वयं ही भुगतनी पड़ती है। बलात्कार को सह पाना ही बहुत है, अब उन्हें इस बात के लिए ज़िम्मेदार मत ठहराइए कि इसकी वजह भी वे खुद ही थीं, कि उन्होंने बलात्कारियों को उकसाया। मेरे विचार में धर्म और संस्कृति में निस्संदेह ऐसी कई चीज़ें हैं जिन्हें दोष दिया जाना चाहिए! मैं आगे इस पर भी लिखूंगा।