2005 में डबलिन में आयोजित कार्यक्रम के सिलसिले में संगीतज्ञों के इंतज़ाम में आई परेशानियों के बारे में मैंने पहले आपको बताया था। आखिरकार समय पर उन्हें जुटाने में मैं सफल रहा था और एक भव्य कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए सन्नद्ध हो गया था।
संगीतकारों का इंतज़ाम ही मेरी ज़िम्मेदारी नहीं थी, मैं कुछ और योग शिक्षकों को भी शामिल करना चाहता था जो मुझे अपनी योग-कार्यशाला के आयोजन में मदद करते। मैं जर्मनी में अपने एक मित्र से, जो स्वयं योग शिक्षक थी और दूसरे कई योग-शिक्षकों को जानते भी थी, पहले ही बात कर चुका था। हमारे बीच करार हुआ कि अगर वे हमारे कार्यक्रम में शामिल होते हैं तो हम उनके आने-जाने का, रहने का और खाने-पीने का खर्च उठाएंगे। वे आए और इस तरह उस कार्यक्रम के लिए मेरी मदद हेतु आयोजकों का, संगीतकारों का, और योग शिक्षकों का एक अंतर्राष्ट्रीय समूह मेरे चारों ओर इकट्ठा हो गया था। सभी उस विशाल आयोजन का इंतज़ार कर रहे थे कि कब हम अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। आयोजन डबलिन में स्थित राष्ट्रीय बास्केटबाल एरेना में सम्पन्न हुआ। एक बहुत बड़ा स्टेज बनाया गया था और सजावट करने वालों ने बहुत शानदार बॅकग्राउंड (पार्श्वभाग) तैयार किया था जहां एक स्लोगन (प्रचार-वाक्य) लिखा था, 'लव कम्स टू टाउन', जिसे मैंने अपने कार्यक्रम के लिए सुझाया था और जिसे मैं बाद में भी बहुत समय तक उपयोग में लाता रहा था।
कार्यक्रम दो सप्ताहांतों में सम्पन्न हुआ और लोग पूरे सप्ताहांत की कार्यशालाओं की बुकिंग करा सकते थे। हमने शुक्रवार की शाम से अपना कार्यक्रम शुरू किया। पहले स्वागत-सम्मिलन रखा गया था, जिसमें हमने अपने और अपने कार्यक्रम के बारे में लोगों को सामान्य जानकारी दी। शनिवार को व्याख्यानों, कसरतों, संगीत और ध्यान-योग का दौर शुरू हुआ और सिर्फ खाने-पीने के लिए कुछ देर के लिए बाधित हुआ। क्योंकि हम एरेना में पेशेवर लोगों के साथ थे, खाना वहीं तैयार किया गया था और किसी को खाने-पीने की खोज में बाहर जाने की आवश्यकता नहीं थी। पूरा रविवार भी हमारे कार्यक्रम के लिए व्यवस्थित रूप से क्रमबद्ध किया गया था और लोगों के पास इतना वक्त होता था कि वे मुझसे प्रश्न पूछ सकें। राष्ट्रीय टीवी चैनल आए और कार्यक्रम को फिल्माया और हमारे कार्यक्रम की सूचना देते हुए उसका प्रसारण किया।
ऐसे आयोजनों में आप अपने आसपास के लोगों को, चाहे वे नए हों या पहले से परिचित हों, बेहतर ढंग से जान पाते हैं। एक योग शिक्षक ने उन लोगों के लिए जो दूर होने के कारण मुझे ठीक से देख नहीं पाए थे या जो ठीक से उन्हें समझ नहीं पाए थे, मेरे द्वारा प्रदर्शित योग मुद्राओं को दोबारा करके दिखाया। उनकी एक ग्रुप लीडर थी, जैसा कि बड़े समूहों के साथ होता ही है, जो उन्हें सलाह देती जा रही थी। बाद में मैंने देखा कि उसका लहजा बदलता जा रहा है और वह क्रमशः डपटने और फटकारने भी लगी है, लगभग बहुत बदतमीजी के साथ और उससे भी आगे जाकर, जैसे कोई स्कूल-टीचर अपने बच्चों के साथ धौंस-डपट कर रही हो! वह दूसरों के साथ भी ऐसा ही करने लगी लेकिन फिर तुरंत समझ गई कि उसकी बात कोई सुन नहीं रहा है न ही कोई उसके नेतृत्व को बर्दाश्त किया जा रहा है! यह एक मज़ेदार हंसी-ठट्टे वाली बात हुई जिससे लोगों का मनोरंजन ही हुआ। बाद में जब भी हम इस घटना के बारे में सोचते हैं तो हंसी के साथ-साथ मानव स्वभाव के इस पक्ष के बारे में सबक भी प्राप्त होता है!!
मैं अंग्रेज़ गायिका को कुछ बेहतर ढंग से जान सका और वह दूसरे गायक, जिसे मैंने जर्मनी से बुलवाया था, की भी मित्र बन गई। इसी तरह कई नई आपसी मित्रताएँ स्थापित हुईं और मैं इस बात से बहुत खुश था कि इस आयोजन के चलते लोग एक दूसरे से घुल-मिल पा रहे हैं।
वह एक सुखद आयोजन था, मैं व्याख्यानों का भरपूर आनंद ले सका और संगीत तो अद्भुत था। मैं बहुत सारे महत्वपूर्ण अनुभव साथ लेकर लौटा और हाँ, मैं कई ऐसे लोगों से भी मिल सका जो भविष्य में भी कई वर्ष मेरा साथ देते रहेंगे।
लेकिन उसके बारे में फिर कभी..।
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