हम मोनिका का इलाज क्यों किसी सरकारी अस्पताल में नहीं करवाना चाहते? 16 दिसंबर 2014

कल मैंने आपको मोनिका और उसके अपघात की चर्चा करते हुए बताया था कि हम किस तरह उसकी सहायता करने वाले हैं। आज मैं आपको इसका ठीक-ठीक कारण बताऊँगा कि क्यों उसके इलाज के लिए हमने दिल्ली के पास स्थित गुड़गाँव के आर्टेमिस अस्पताल का चुनाव किया है।

इसे ठीक तरह से समझने के लिए आपको यह जानकारी होना आवश्यक है कि भारत में सरकारी अस्पताल होते हैं, जहाँ मरीजों का मुफ्त इलाज किया जाता है। सिर्फ आपको दवाइयों का खर्च उठाना पड़ता है-और वह भी सिर्फ कुछ दवाइयों का। सबसे पहले मोनिका का इलाज दिल्ली के एक ऐसे ही अस्पताल में हुआ था। तो फिर हम उसे उस सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं ले जा रहे हैं, जब कि वहाँ इलाज काफी कम खर्च में हो जाता और वे उसका प्रकरण पहले ही से जानते भी है?

पहली बात तो यह कि सरकारी अस्पतालों में बहुत ज़्यादा मरीज होते हैं। किसी को मना नहीं किया जाता और कुछ लोगों के पास इलाज करवाने का सिर्फ यही विकल्प मौजूद होता है। स्वाभाविक ही, हमारे लिए मोनिका का इलाज वहाँ न करवाने का कारण यह नहीं भी हो सकता था यदि हम जानते कि वहाँ मोनिका को आवश्यक इलाज मिल सकेगा। लेकिन ज़्यादा संभावना इसी बात की है कि उसे समुचित इलाज वहाँ नहीं मिल पाएगा। क्यों? क्योंकि सीधी सी बात है कि पहले जब वह वहाँ इलाज के इरादे से गई थी, तब नहीं मिला था।

4 मई को, अपघात के बाद, वृन्दावन के दो अस्पतालों में मोनिका को भर्ती नहीं किया गया और उसके परिवार को वहाँ से निराश लौटना पड़ा। फिर वे मथुरा भागे, जहाँ वे रात भर रहे। सबके लिए वह भयानक रात थी-डॉक्टरों को समझ नहीं आ रहा था कि मोनिका का वे क्या इलाज करें इसलिए मोनिका को दर्दनिवारक दवाएँ तक नहीं मिल पाईं। दूसरे दिन सबेरे उसका परिवार आगे बढ़ा और आगरा पहुँचा, जोकि कुछ और बड़ा शहर है और हताशा में घंटों इंतज़ार के बाद आखिर डॉक्टर आए और उसका कुछ इलाज हुआ, ज़ख़्मों पर थोड़ी-बहुत मरहम-पट्टी की गई और दर्दनिवारक दवाएँ दी गईं, जिनसे उसे कुछ राहत भी मिली। लेकिन तुरंत ही स्पष्ट हो गया कि यहाँ भी मुकम्मल इलाज संभव नहीं होगा-उन्हें दिल्ली जाना होगा! पर कैसे? अंत में मोनिका की माँ ने कुछ रुपए उधार लिए और एंबुलेंस मँगवाई और तब वे सब दिल्ली जा पाए! एक सरकारी अस्पताल से दूसरे सरकारी अस्पताल की यह बेहद कष्टदायक यात्रा थी और उनकी आशा के विपरीत, अभी इस यात्रा का अंत नहीं हुआ था!

मोनिका का मामा दिल्ली में ही रहता है अतः वहाँ उन्हें कुछ पारिवारिक आसरा था लेकिन जब आपकी बेटी किसी सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में बिस्तर पर पड़ी हो, उसका सिर जलन के मारे सूजा हुआ हो, उसकी ज़ख़्मी त्वचा कई जगहों से खुली, झूल रही हो और उनके बीच से दो दर्दनाक आँखें झाँक रही हों, जिनमें इतनी ही रोशनी बची हो कि अंधेरे और उजाले की पहचान कर सकें तो परिवार को इस आसरे से कोई विशेष राहत नहीं मिल सकती थी। उसका इलाज करने की जगह नर्सें उसकी माँ को ही बुरा-भला कहने लगीं। एक जूनियर डॉक्टर रोज़ आता रहा और एक दूसरा, कोई बड़ा डॉक्टर सप्ताह में एक दिन। डॉक्टर रोज़ नर्सों को फटकार लगाता कि जख्म ठीक से साफ नहीं किए गए है और बदले में नर्सें उसकी हताश माँ को कोसतीं, जबकि जितना बन पड़ता था, वह ज़ख़्मों को साफ करती थी-आखिर क्यों न करती, वह उसी की बेटी थी।

और ज्वलंत प्रश्न यह था कि यह सब कब तक चलता रहेगा! उन्हें घर भेज दिया जाता है, वे अपने मामा के यहाँ रहते हैं, एक हफ्ते बाद फिर अस्पताल आते हैं और उन्हें भर्ती कर लिया जाता है क्योंकि जख्म और खराब हो चुके होते हैं। उन्हें दवाइयाँ मिल जाती हैं-कुछ दवाओं की कीमत अस्पताल चुकाता है और कुछ उन्हें खुद खरीदनी पड़ती हैं। माँ का भाई फिर सहायता के लिए आगे आता है। वह कुछ अधिक कमा लेता है और जानता है कि परिवार का और कोई नहीं है, जिससे वे किसी आर्थिक सहायता की अपेक्षा कर सकें।

मोनिका की क्षतिग्रस्त त्वचा पर प्रतिरोपण शुरू करने के उद्देश्य से एक दिन माँ से बेटी की जांघों के रोमों को साफ करने के लिए कहा जाता है। अचानक वे आशान्वित हो उठते हैं कि उसके लिए कुछ किया जा रहा है। लेकिन उन्हें सर्जरी के लिए लेने कोई नहीं आता। काफी समय तक इंतज़ार करने के बाद नर्स उन्हें बताती है कि आज सर्जरी नहीं हो पाएगी। अंत में हताश माँ बेटी को लेकर घर लौट आती है। उससे चौदह दिनों बाद आने को कहा गया है लेकिन वह इतना खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकती।

यह सब सुनने के बाद हमने यह निर्णय लिया कि मोनिका को उसी अस्पताल में भर्ती कराएँगे जहाँ हमें अच्छा लगेगा। जहाँ की सुविधाओं और सेवाओं के बारे में हमें पता है कि वे बढ़िया हैं, वहाँ के कर्मचारियों का रवैया दोस्ताना और मददगार है और जहाँ मरीज की अच्छी देखभाल की जाती है: आर्टेमिस हॉस्पिटल, जहाँ अपरा का जन्म हुआ और जहाँ मैं पिछले अप्रैल माह में अपने घुटने की सर्जरी के लिए भर्ती हुआ था। हम यहाँ के कई डॉक्टरों को जानते हैं और हमें यहाँ अपेक्षानुसार बढ़िया से बढ़िया उपचार प्राप्त हुआ है। यहाँ का माहौल मित्रतापूर्ण है, साफ-सफाई बेहतरीन है और सबसे बड़ी बात, आप उन पर भरोसा कर सकते हैं।

इसी कारण हम वहाँ के प्लास्टिक सर्जन की इस बात पर भी भरोसा करते हैं कि मोनिका की मदद पहले बेहतर तरीके से हो सकती थी। दुर्घटना के शुरू के हफ्तों में ही उसकी सर्जरी हो जाती तो त्वचा का तनाव कम करने के लिए गरदन के आसपास छोटा सा चीरा ही उसे बड़ी मदद पहुँचा सकता था। यदि उस वक़्त इतना हो जाता तो आज वह इतनी बुरी हालत में नहीं होती।

मोनिका के जीवन के सात सबसे बुरे माह अतीत का हिस्सा बन चुके हैं और अगले कुछ महीनों को हम उसके इलाज और स्वास्थ्य लाभ के समय के रूप में देखना चाहते हैं। ऐसे माहौल में, जहाँ अंधकारयुक्त या भीड़भाड़ वाले वार्ड नहीं होंगे और न ही मरीज के साथ नर्सों की डांट-डपट, तानेबाज़ियाँ, उलाहने या झिड़कियाँ होंगी। अब उन्हें ऊहापोह में घंटों इंतज़ार नहीं करना है कि कब डॉक्टर आएगा, सर्जरी होगी या नहीं आदि आदि। इस अंतराल का कुछ हिस्सा अवश्य दुखदायी होगा लेकिन यह संतोष रहेगा कि उसकी बेहतरी के लिए सब कुछ किया गया!

तो अगर आपको इस बात का आश्चर्य है कि हमने सोच-समझकर वह विकल्प चुना, जिसमें खर्च अधिक था तो हमारा उत्तर होगा कि हाँ, बिल्कुल! लेकिन यही सही विकल्प था-और इसलिए हम उसकी कीमत भी चुकाएँगे, जिससे मोनिका की शारीरिक हलचल निर्बाध रूप से फिर शुरू हो सके और वह प्रसन्न जीवन गुज़ार सके!

आप भी मोनिका की सहायता में सहभागी बन सकते हैं! उसके इलाज से संबंधित सभी विवरण यहाँ दिए जा रहे हैं

हमारे स्कूल के भोजन के विषय में एक संदेह – क्या हमारी बेटी भी वही खाना खाती है? 24 नवंबर 2014

पिछले हफ्ते अपने ब्लॉग में मैंने एक चित्र पोस्ट किया था, जिसमें हमारे स्कूल के बच्चों को दोपहर का भोजन करते हुए दिखाया गया था। फेसबुक पर यह चित्र देखने के बाद एक व्यक्ति ने पूछा कि क्या मेरी बेटी भी इन बच्चों के साथ भोजन करती है। वैसे तो मैंने वहीं उस प्रश्न का उत्तर दे दिया था मगर मुझे लगा कि इस प्रश्न का अधिक विस्तृत जवाब मुझे अपने ब्लॉग के माध्यम से भी देना चाहिए।

इसका सादा सा मूल उत्तर यह है: जी हाँ, बिल्कुल करती है।

दरअसल अपरा तो खाने की छुट्टी का बेसब्री से इंतज़ार करती है कि स्कूल के सारे बच्चे दौड़ते-भागते आएँ और वह उनके साथ बैठकर खाना खा सके। किसके पास बैठे यह वह खुद तय करती है-अक्सर वह आश्रम में ही रहने वाले एक बच्चे के साथ, जो उसके भाई जैसा ही है, खाने बैठती है। दूसरे बच्चों की तरह वह भी अपने लिए एक प्लेट लेती है और वही खाना प्लेट में लेकर खाती है, जो दूसरे बच्चे खाते हैं।

स्वाभाविक ही लोग यह सोचते हैं कि हमारा चैरिटी का काम भी दूसरे कई सामाजिक कार्यों की तरह एक मज़ाक या दिखावा भर है। वे शक करते हैं कि हम इन गरीब बच्चों के लिए तैयार भोजन को इतना अच्छा अवश्य बनाते होंगे कि हमारी बेटी भी उसे खा सके।

शुरू में आपको दुख और आश्चर्य होगा कि कोई ऐसा भी सोच सकता है। लेकिन थोड़ा विचार करने के बाद आपको समझ में आ जाएगा कि ऐसे सोच की जड़ कहाँ है: दुर्भाग्य से बहुत से चैरिटी कार्यों में ठीक यही देखने में आता है! मैं जानता हूँ कि भारत में चैरिटी कार्य एक तरह का संगठित व्यवसाय हो गया है, जहाँ लोग बहुत सा पैसा इकठ्ठा करते हैं और ग़रीबों को खराब, कम गुणवत्ता वाला खाना, कपड़े इत्यादि वितरित करते हैं। फिर अपनी इस तथाकथित चैरिटी का इस्तेमाल अपने विज्ञापनों में करते हैं! वे जानते हैं कि जो खाना वे ग़रीबों को खिला रहे हैं, वह कैसा है और इसलिए उसे न तो वे खुद खाते हैं और न ही अपने बच्चों को खिलाते हैं।

मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ: हम कोई बहुत बड़ा संगठन नहीं हैं। हम एक परिवार हैं, जिसने गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया है और उन बच्चों की मदद करने की कोशिश करते हैं। बच्चों को दिया जाने वाला भोजन हमारी ही रसोई में तैयार किया जाता है। जो रसोइया हमारा खाना पकाता है वही उनका खाना भी पकाता है और उन्हीं सब्ज़ियों, दाल-चावल और आटे का इस्तेमाल करता है; हमारे व्यंजनों में पड़ने वाले मसाले, नमक आदि भी एक ही होते हैं। सिर्फ एक ही अंतर होता है कि 20 के लोगों के मुक़ाबले 200 लोगों का खाना बनाने के लिए काफी बड़े बरतनों का इस्तेमाल किया जाता है।

एक बात और: बच्चों के दोपहर के भोजन के बाद अगर खाना बचा रह जाता है तो रात को हम लोग खुद वही खाना गरम करके खा लेते हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि हम खाना बरबाद नहीं करना चाहते और निश्चय ही इसलिए भी नहीं कि उसे खाने वाला और कोई नहीं मिल सकता। जी नहीं, दरअसल इसलिए भी कि वह खाना बड़ा रुचिकर, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है!