स्वयं को अपने से छोटा न करें और अपनी ईमानदार तारीफ़ को सहजता के साथ स्वीकार करें – 26 नवंबर 2015

जर्मनी में रहते हुए मुझे अब लगभग दो हफ्ते हो चुके हैं और इस बीच हम बहुत से मित्रों से मिल चुके हैं और वापस भारत लौटने से पहले अभी और भी कुछ मित्रों से मिलने वाले हैं। हाल ही में हम एक मित्र से मिले जिसके विषय में हमने एक ऐसी बात नोटिस की जिसे लेकर, मेरा विश्वास है कि मेरे बहुत से पाठकों को भी समस्या होगी: आत्मविश्वास की असाधारण कमी, जिसमें आप अपनी साधारण प्रशंसा को भी शक की निगाह से देखते हैं।

मैं इस मित्र से दो साल बाद मिल रहा था इसलिए इस बीच हमने एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। अभिवादनों के शुरूआती लेनदेन, गले मिलने और एक-दूसरे का हालचाल पूछने के बाद हमारी बातचीत इस ओर मुड़ गई कि हम लोग इस बीच क्या करते रहे। उसने जो बताया उससे तुरंत मैंने नोटिस किया कि इस बार वह अपनी उपलब्धियों को बहुत कमतर आँक रही है। कुछ देर बाद रमोना भी, जो मेरी मित्र को पहले से जानती थी, बातचीत में शामिल हो गई। उन दोनों ने भी एक-दूसरे का अभिवादन किया और फिर रमोना ने उससे कहा कि वह बहुत शानदार, खुश और स्वस्थ लग रही है।

इस प्रशंसा की प्रतिक्रिया में उस मित्र ने जो कहा, वही आज के ब्लॉग को लिखने का कारण बना है। उसने कहा, 'ओह! शुक्रिया, अच्छा किया जो आपने यह कहा!'

जैसे ही मैंने यह वाक्य सुना, मुझे पता चल गया कि ये शब्द शुक्रिया कहने के लिए कहे गए हैं-लेकिन जो यह कह रहा है, वह दरअसल विश्वास नहीं कर रहा है कि रमोना द्वारा कहे गए शब्द वास्तव में सही हैं! वे सिर्फ सौजन्यतावश कहे गए हैं- भले ही उसके मस्तिष्क में वे शब्द सही नहीं थे!

इतना साधारण सा वाक्य ही बता देता है कि कोई व्यक्ति खुद अपने बारे में क्या सोचता है। हमारी वह दोस्त कह सकती थी, ' शुक्रिया, हाँ, मेरा पिछला समय बड़ा अच्छा रहा' और उसके बाद बता सकती थी कि कैसे उसने अपने खान-पान में परिवर्तन किया और कैसे छुट्टियाँ बिताई। उसकी जगह उसने तुरंत रमोना की बात का यह आशय लिया कि वह कुछ अच्छा कहने के लिए ऐसा कह रही है। और इस बात को उसने अपने उत्तर से स्पष्ट भी किया। उसे खुश करने के लिए झूठ बोलने की मेहरबानी कर रही है!

वह इस प्रशंसा को अपनी सच्ची प्रशंसा मान ही नहीं सकती थी! वह यह नहीं समझ पाई कि पिछली बार जब हम मिले थे, उसके मुकाबले इस बार उसके चेहरे पर जो चमक है और जैसी शांत और संयत वह लग रही है, उसे रमोना ने महसूस कर लिया था!

इस कथा से हम सभी को, पुरुष हों या महिलाएँ, एक छोटी सी शिक्षा मिलती है: अगर कोई आपकी प्रशंसा करता है तो उसे झूठ मानकर सीधे-सीधे खारिज मत कर दीजिए। प्रशंसा झूठी भी हो सकती है मगर यह भी उतना ही संभव है कि किसी व्यक्ति को आप सुंदर, आकर्षक, अच्छे या सुखी, बुद्धिमान, मिलनसार, मित्रवत या आगे बढ़कर मदद करने वाले लगते हों!

अपने आपको कमतर न समझें, अपनी क्षमताओं को कम न आँकें। उन्हें जानें और उचित सम्मान दें-दूसरों को भी आपकी क्षमता का या आपकी अच्छाइयों का एहसास है और वे उसका सम्मान करते हैं। उनकी प्रशंसा को सहजता के साथ स्वीकार करें!

सही या गलत का निर्धारण दृष्टिकोण है या तथ्य! 5 नवंबर 2014

दूसरों के साथ बातचीत का रोचक पहलू यह है कि आप अक्सर ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके अनुभव, विचार और जानकारियाँ आपसे भिन्न होते हैं। जब आवश्यकता हो, आप उनसे लाभ उठा सकते हैं और प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। आपको उपयोगी जानकारियाँ प्राप्त हो सकती हैं, जिन्हें आप दूसरों तक भी पहुँचा सकते हैं। लेकिन एक अप्रिय बात भी हो सकती है: आप संदेह में पड़ सकते हैं कि आप जो कर या सोच रहे हैं, वह ठीक है या नहीं।

यह असामान्य बात नहीं है: कामकाज के दौरान हाल ही में हुई कोई घटना आप अपने दोस्तों को बताते हैं और वे आपकी प्रतिक्रिया पर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि आपने ऐसा क्यों सोचा! क्या ऐसी स्थिति में शांत रहना उचित नहीं होता? या इसके विपरीत, क्या आखिरकार इस मामले में सख्त रवैया अपनाना ज़्यादा ठीक नहीं होता? यह भी हो सकता है कि दोनों में से एक आपकी प्रतिक्रिया का ज़ोरदार समर्थन करे और दूसरा अविश्वास में महज सिर हिलाकर रह जाए कि ये आप क्या कर बैठे।

क्या जीवन जीने का कोई सही तरीका हो सकता है? या कोई गलत तरीका?

स्वाभाविक ही कुछ बातें स्पष्ट रूप से, हर लिहाज से और हर जगह गलत होती हैं: किसी का क़त्ल करना गलत है और चोरी, डकैती और इस तरह की दूसरी सभी गतिविधियाँ भी सामान्यतः सर्वत्र गलत मानी जाती हैं। लेकिन ऐसी स्थितियाँ भी पेश आती हैं, जहाँ सही और गलत में इस तरह दिन और रात की तरह स्पष्ट अंतर करना संभव नहीं होता!

आप यह भी कह सकते हैं कि अपने माता-पिता का अपमान करना गलत है- लेकिन यह अपमान वाली बात कहाँ लागू होती है? क्या आपके लिए उनके द्वारा लिए गए निर्णयों पर न चलना उनका अपमान करना माना जाएगा? क्या उनके नैतिक मानदंडों और मूल्यों का अनुपालन न करना गलत होगा? यह निश्चित रूप से हो सकता है कि वे इसे गलत मानें जबकि आप पूरी तरह अलग विचार रखते हों!

क्या मैं ठीक कर रहा हूँ?

यह सामान्य प्रश्न जीवन के किसी भी मुकाम पर सामने आ सकता है! व्यवसाय, आपसी सम्बन्ध, बच्चों की शिक्षा, मित्रता- आप कभी भी ऐसी स्थिति में आ सकते हैं, जहाँ आपको लगेगा कि अब क्या किया जाए। भले ही अक्सर आप अपने निर्णय आत्मविश्वास के साथ लेते हों, अक्सर होने वाली आलोचनाओं को आसानी के साथ दरकिनार कर देते हों मगर एक ऐसा बिंदु होता है, जहाँ आप खुद अपनी ओर और उस परिस्थिति की ओर देखते हैं और सोच में पड़ जाते हैं:

मुझे क्या करना चाहिए?

मैं आपको एक बात बताता हूँ: कोई दूसरा कभी नहीं बता सकता कि आपको क्या करना चाहिए और न ही कोई दैवी हस्तक्षेप या प्रेरणा होती है, जो अचानक हर चीज़ ठीक कर दे। फिर भी, कहा जाना चाहिए कि न तो कुछ गलत होता है और न सही और सभी कभी-कभार ऐसी परिस्थितियों से गुज़रते ही रहते है।

मन ही मन उन बातों का जायजा लीजिए, जो आप वास्तव में जानते हैं, उन निर्णयों, विचारों को याद कीजिए, जिनके बारे में आप सुनिश्चित हैं कि वे ठीक हैं और उन्हें बदलने की ज़रूरत नहीं है। भले ही लोग कहते रहें कि आप गलत हैं। फिर उस बिन्दु से धीरे-धीरे आगे बढ़िए और अपनी भावनाओं और विचारों के सहारे आगे बढ़िए। सलाह लीजिए, जब आपको लगे कि यह उचित है-और पता कीजिए कि आप किस बात को वास्तव में अनुचित समझते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एहसास अक्सर अस्थाई होता है। कभी-कभी उस परिस्थिति से कुछ देर के लिए या रात भर के लिए दूर हो जाना भी मदद करता है। उसके बाद फिर नए उत्साह और साहस के साथ शुरू हो जाइए और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़िए!

हर मुश्किल में भी अपना आत्मसम्मान बनाए रखें! 4 सितंबर 2014

कल मैंने ज़िक्र किया था कि एक सफल व्यवसाय चलाने के लिए आपको आत्माभिमान, आत्मगौरव (खुद अपने आपसे प्रेम करने की) और आत्मसम्मान की ज़रूरत होती है। तभी आप अपने दिल का कहा मानते हुए अपना काम भी करेंगे और आपको कोई अपराधबोध भी नहीं होगा कि आपने अपने दैनिक काम का मेहनताना क्यों लिया। बहुत से लोगों के लिए एक कठिन विषय मगर साथ ही बहुत महत्वपूर्ण भी! लेकिन इसे गंभीरता से लें- वरना हर कोई आपकी भलमनसाहत का फायदा उठाने की कोशिश करेगा!

हम इस बात की चर्चा कर चुके हैं कि व्यापार-व्यवसाय में यह किस तरह सामने आता है। लोग आपसे कोई चीज़ मुफ्त प्राप्त करना चाहते हैं और अगर आप पर्याप्त भले या भोले हैं तो वे अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। एक बार दे देने के बाद आप वापस नहीं लौट सकते और देते चले जाते हैं, बहुत ज़्यादा मुफ्त दे बैठते हैं और फिर दुखी और गुस्सा होते रहते हैं मगर कुछ नहीं कर पाते-जो चीज़ आप बेच रहे हैं उसकी कीमत के बारे में अनिश्चित, उसके महत्व के बारे में संदेहग्रस्त।

परिवार और मित्रों के बीच मामला पैसे का नहीं होता। कम से कम अक्सर नहीं होता। अक्सर मुद्दा यह होता है कि आपने दूसरों के लिए क्या किया और खुद अपने लिए कितना करते हैं। अपने व्यक्तिगत सत्रों में अक्सर मैं ऐसे लोगों से मिलता हूँ, जिन्हें आत्माभिमान या अपने आपसे प्रेम नहीं होता और अपनी नज़र में खुद की कोई कीमत ही नहीं होती क्योंकि उनके मन में दबा हुआ तीखा गुस्सा और अक्सर परिवार के सदस्यों या कुछ मित्रों के साथ अनबन होती है। वे देते हैं, देते हैं, देते चले जाते हैं, जैसे देते रहना ही उनका काम हो- लोग भी उन्हें इसी लायक समझने लगते हैं! लेकिन उनके मन में यह एहसास मौजूद होता है कि उनका शोषण हो रहा है, आसपास के लोग आखिरी बूँद तक चूस लेना चाहते हैं और बदले में उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

पहली सीढ़ी है आत्माभिमान और आत्मगौरव (खुद से प्यार करना)। यह तब होगा जब आप अपने आपकी कद्र करेंगे, अपने समय और अपने श्रम की कीमत आँकेंगे, आप जो कुछ कर रहे हैं, उसका आदर करेंगे। आप अपने शरीर, मन-मस्तिष्क और अपने काम से उनकी अच्छाइयों और उनकी बुराइयों सहित प्यार करते हैं। लेकिन आपको एक और चीज़ की दरकार होगी: लोगों के सामने उस आत्मगौरव को प्रकट करने की क्षमता और साहस की! और यह क्षमता और साहस ही आपका आत्मसम्मान या स्वाभिमान है जिसे आपको दूसरों के सामने व्यक्त करते रहना है।

जब आप पूरे आत्मविश्वास के साथ बता सकेंगे कि दूसरों के लिए कुछ करने की आपकी सीमा क्या है। जब आप जानेंगे और उन्हें बताएँगे कि इस बिंदु के बाद आपको अपने लिए समय चाहिए या आपको लगे कि इसके आगे वे आपके काम की या आपके श्रम की बेईज्ज़ती कर रहे हैं, उसकी उचित कीमत नहीं लगा रहे हैं और आपके साथ नाइंसाफी कर रहे हैं।

अगर आपको इस विषय में कोई दिक्कत रही है तो यहाँ तक पहुँचना काफी मुश्किल होगा लेकिन यह संभव है। आपको अपने आप से अपने प्रेम को मजबूती प्रदान करनी होगी यानी कि आपको अपने आत्माभिमान और आत्मगौरव को ऊँचा उठाना होगा। जब भी आपको लगे कि कोई दूसरा आपका अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है, जब आपको लगे कि आप पर किसी काम को करने का दबाव बनाया जा रहा है या किसी काम को कम कीमत पर करने का दबाव बनाया जा रहा है तो सोचने के लिए अपना समय लीजिए। जो आप कर रहे हैं उससे एक कदम पीछे हट जाइए, कुछ समय के लिए अपने आप से माफ़ी माँगिए कि आप पूर्वनिर्धारित तरीके से काम नहीं कर रहे हैं और शांत हो जाइए, सुकून अनुभव करने का प्रयास कीजिए। अगर आपकी भावनाएँ तीव्र होंगीं तो आप ठीक ढंग से सोच नहीं पाएँगे, और आपके विचारों में स्पष्टता नहीं होगी और आप उचित निर्णय नहीं ले पाएँगे।

एक बार शांत होने के बाद आपको विश्लेषण करना होगा कि क्या दूसरों के दबाव के चलते आपके भीतर वैसी भावनाएँ पैदा हो गई हैं, कुछ ऐसा करने का दबाव जो आपकी इच्छा या सहूलियत में हस्तक्षेप करता है। अगर ऐसी बात है तो उस सीमा को टटोलिए जहाँ आप सहूलियत महसूस करते हैं, जहाँ तक आप ख़ुशी-ख़ुशी वह काम कर सकते हैं। अपने आपको याद दिलाते रहिए कि आपकी इतनी कीमत तो है कि आप खुद अपने आपके लिए, अपने आत्मसम्मान के लिए खड़े हों। और उसके बाद उस स्थिति पर वापस लौटिए।

शांत रहें मगर उसी जगह, जहाँ आपको ठीक लगता है, जहाँ आपकी इच्छा है। आप देखेंगे कि एक बार आप सफलता पूर्वक इस प्रक्रिया से गुज़र जाएँगे तो आपको बड़ा अच्छा लगेगा! भले ही वह अपनी सास से एक छोटी सी बात कहना हो कि पारिवारिक मीटिंग के लिए आप एक और मिठाई तैयार नहीं कर सकते क्योंकि आप अपने बच्चे के साथ खेल रहे हैं, अपने काम में व्यस्त हैं और दो दूसरे व्यंजन पहले ही आप बना चुके हैं! आपके लिए और आपके आत्माभिमान, आत्मसम्मान के लिए यह एक छोटी सी जीत होगी!

तो, शुरू कीजिए-मजबूत बनिए, अपना महत्व पहचानिए और अपने आपसे प्रेम कीजिए!

स्वास्थ्य के मुकाबले अपनी बीमारी से ज्यादा प्यार मत कीजिए! 5 मई 2014

आज मुझे अपने ज़ख्म (घुटने) के टाँके निकलवाने अस्पताल जाना है। मैं अब काफी स्वस्थ हो चुका हूँ मगर मुझे इस बात की विशेष ख़ुशी है कि जर्मनी के लिए उड़ान भरने से पहले मुझे अपने आप को तैयार करने के लिए दस दिन का अवकाश और मिल जाएगा। आज मैं जिस स्थिति में हूँ, उसमें अनायास ही मुझे यह विचार करने का मौका मिला है कि जब आप घायल या बीमार होते हैं तो आपकी दिमागी हालत का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ता है: आप चाहें तो उस बीमारी या तकलीफ का मज़ा लेते रह सकते हैं या जितना चाहें स्वस्थ महसूस कर सकते हैं।

अपने सलाह-सत्रों की वजह से मुझे कई ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिलता रहता है, जिन्हें बीमार पड़ना अच्छा लगता है। अपने सलाह सत्र की शुरुआत ही वे अपने बीमार पड़ने की कहानी से करते हैं। कोई बड़ी बीमारी नहीं होती मगर जब वे दूसरों से बार-बार उसका ज़िक्र करते हैं तो वे सहानुभूति व्यक्त करने लगते हैं-जो स्वाभाविक ही, उन्हें बहुत अच्छी लगती है। धीरे-धीरे, अगली बार बीमार पड़ने तक या उनकी तकलीफ कुछ ज़्यादा समय तक बनी रहे तो वे समझ जाते हैं कि बहुत सी चीज़ों के लिए यह बहाना बहुत कारगर सिद्ध होता है। और बिना अशिष्ट दिखाई दिए ‘नहीं’ कहने के मामले में यह सबसे अधिक उपयोगी होता है।

उनमें आत्मविश्वास की कमी होती हैं और साफ मना करने की जगह कि वे उनसे कहा गया काम नहीं करना चाहते, वे कहते हैं कि बीमार हैं इसलिए वे यह काम नहीं कर पाएंगे। यह पूरी तरह सही न भी हो कि उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है तो भी काम टालने का यह आसान तरीका होता है और दूसरों को उनकी बात पर भरोसा करना ही पड़ता है। वह काम वे नहीं करना चाहते, यह सच कहने के लिए उन्हें अपने आत्मविश्वास और शक्ति का प्रदर्शन नहीं करना पड़ता।

तो वे बीमार बने रहते हैं। भले ही वे पूरी तरह स्वस्थ और ठीक-ठाक हों या उन्हें कोई छोटी मोटी, मामूली तकलीफ हो मगर वे जिद पकड़ लेंगे कि वे बीमार हैं। जितनी तकलीफ है, उससे कहीं ज़्यादा गंभीर रूप से बीमार! यह आवश्यक नहीं कि वे जानते हों कि वे क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं। उनका अवचेतन इतना शक्तिशाली होता है कि वे सचाई को अपने आपसे छिपा लेते हैं और इस तरह छिपाते हैं कि वह झूठ उन्हें अच्छा लगने लगता है। वे हर तरह से अपने आपको विश्वास दिला देते हैं कि वाकई वे बीमार हैं और परिणाम यह होता है कि वे उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं।

एक बार उस राह पर चल पड़े तो फिर वे अपनी बीमारी से इतना प्यार करने लगते हैं कि उनके लिए उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। उन्हें इस बात का ज़रा सा भी गुमान नहीं होता कि लोग उनका नाटक समझ रहे हैं, दूसरे यह जान रहे हैं कि वे ज़रुरत से ज़्यादा बन रहे हैं मगर वे भी इसका मज़ा लेने लगते हैं। मित्र उन्हें दिलासा देने लगते हैं कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन इससे बहुत नुकसान होता है और इसी बिंदु पर लोग मेरे पास सलाह लेने आते हैं।

अधिकतर मैं उन्हें स्वस्थ जीवन के आनंद को अनुभव करने की सलाह देता हूँ। मैं उनसे यह नहीं कहता कि वे बिल्कुल बीमार नहीं हैं-सत्र कुछ देर का होता है और इतने कम समय में मैं कैसे जान सकता हूँ उन्हें क्या हुआ है? लेकिन मेरा कहना है कि आप वाकई बीमार हों तब भी जितना संभव ही, भले-चंगे होने का नाटक कीजिए। नियमित जीवन बिताइए, बीमारी से पैदा असुविधाओं के साथ जीने के नए तरीके ढूँढ़िए और सामान्य जीवन जीने की कोशिश कीजिए। अपनी बीमारी के पीछे छिपने और उसकी आड़ में ‘न’ कहने की अपेक्षा सीधे ‘नहीं’ कहने की आदत डालिए। जो हैं, वही बने रहिए और जीवन का आनंद लीजिए!

इन दिनों भी मैं सिर्फ बिस्तर पर लेटा नहीं रहता: मैं अपनी फिजियोथेरपी के व्यायाम करता रहा हूँ, अपरा के साथ खेलता रहा हूँ, फोन पर बात करता रहा हूँ और कम्प्यूटर पर काम करता रहा हूँ। मेरे ये दिन भी सामान्य दिनों की तरह ही गुज़र रहे हैं, बस थोड़ी गतिशीलता और गतिविधियाँ कम हो गई है। सामान्य रूप से जो कुछ मैं करता रहा हूँ वह सब बिस्तर पर बैठे-बैठे, अब भी कर रहा हूँ। बिस्तर पर बीमार पड़े रहना मुझे बिल्कुल नहीं सुहाता इसलिए मैं इस बात को बिल्कुल महत्व नहीं देता। जितना काम कर सकता हूँ, करता रहता हूँ- और मुझे लगता है कि इस बात ने भी मुझे तेज़ी के साथ स्वस्थ होने में मदद की है।

अब देखना यह है कि आज डॉक्टर क्या कहते हैं-लेकिन मुझे लगता है कि मैं दस दिन में इतना स्वस्थ हो जाऊंगा कि आराम से जर्मनी के लिए रवाना हो सकता हूँ!

भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं के काल्पनिक डर से कैसे निपटें! 17 फरवरी 2014

पिछले सप्ताह कार्पोरेट दुनिया से जुड़े लोगों में पाए जाने वाले तनावों और परेशानियों का ज़िक्र करते हुए मुझे हाल ही में आश्रम आए एक मेहमान से हुई चर्चा का स्मरण हो आया। उसने मुझे बताया कि वह न सिर्फ अपने काम को लेकर बहुत तनाव और परेशानी महसूस करने लगा था बल्कि यह सोचकर भी कि उसका यह काम कभी भी छूट सकता है। दरअसल उसकी सबसे बड़ी परेशानी तो यह आशंका ही थी कि कल को अगर उसे नौकरी से निकाल दिया जाए तो क्या होगा? अगर मेरा काम छूट जाए तो मैं क्या करूंगा?

इस व्यक्ति के पास एक बहुत अच्छी नौकरी है, अच्छा वेतन है, उस नौकरी के साथ उपलब्ध हर तरह की सुविधाएं भी हैं और सब कुछ बढ़िया चल रहा है। कोई स्पष्ट कारण नहीं है कि उसे किसी तरह की आशंका हो, उसके बॉस की तरफ से कोई इशारा नहीं है, सहकर्मियों की ओर से कोई खबर या अफवाह नहीं है। हर चीज़ सुचारु रूप से चलती दिखाई दे रही है लेकिन फिर भी एक विचार है, एक आशंका और डर है कि कुछ भी हो सकता है, कि अचानक वह अपने रोजगार से हाथ धो सकता है!

उन्हें मेरा जवाब यह था कि यह बात ठीक है कि कभी भी, कुछ भी हो सकता है। आप भविष्य के बारे में कुछ भी नहीं जान सकते और इस तरह जिन घटनाओं के होने का आप अनुमान लगाते हैं वह आपके मन का फितूर होता है, महज एक काल्पनिक कहानी! वह हो नहीं रहा है, होने नहीं जा रहा है लेकिन आप कुछ भी बुरा होने की छोटी से छोटी संभावना के विषय में सोचते भर रहते हैं।

यह एक पुरानी सलाह है, जो मैं आपको देना चाहता हूँ लेकिन यह बहुत कारगर है: भविष्य के बारे में सोच-सोचकर परेशान होने के स्थान पर वर्तमान में रहिए। भविष्य अभी आपके सामने उपस्थित नहीं हुआ है!

भविष्य के बारे में परेशान होते रहने के कारण वर्तमान जीवन आपसे छूटा जा रहा है। नौकरी में अपना सर्वोत्तम देने की जगह आप उसमें गलतियाँ भी कर सकते हैं क्योंकि भविष्य को लेकर आप इतने बेचैन और चिंतित हैं! आप अपने काम में सम्पूर्ण एकाग्र नहीं हो पाते और इस तरह जितना काम आप कर सकते हैं, जितना काम आपको करना चाहिए उतना आप कर ही नहीं पा रहे हैं।

मान लीजिए ऐसा कुछ हो ही जाता है और आप अपनी नौकरी खो बैठते हैं तो भी आप यह क्यों नहीं सोचते कि शायद इसमें भी कुछ अच्छा ही छिपा हो? आप यह क्यों नहीं सोचते कि ऐसा होने पर हो सकता है, आपको कुछ बड़ा और इससे बेहतर करने का मौका मिल जाए? आप भविष्य के विषय में ही क्यों सोचते हैं और जब सोचते हैं तो सिर्फ नकारात्मक ही क्यों सोचते हैं? इस बात को समझिए कि वह परिदृश्य सिर्फ आपकी कल्पना मात्र है, एक कहानी, जो आपने अपने लिए गढ़ ली है!

मैं इससे मिलता-जुलता और ‘भावी काल्पनिक डर’ से सम्बद्ध एक और प्रकरण आपके सामने रखता हूँ: एक आदमी कहता है कि उसके पास कई साल से एक मोटर साइकल है और उसे चलाने में उसे हमेशा बड़ा आनंद आता रहा है मगर पिछले कुछ सप्ताह से अचानक उसके मन में यह डर बैठ गया है कि इस मोटर साइकल की सवारी करने पर उसके साथ कोई दुर्घटना हो सकती है! अतीत में मोटर साइकल से कोई दुर्घटना नहीं हुई है, आज तक वह उस पर से फिसला तक नहीं है लेकिन अब वह उस पर सवारी करते हुए यह सोच-सोचकर बेचैनी से भर उठता है कि कुछ न कुछ बुरा हो सकता है।

यह सब काल्पनिक बातें हैं लेकिन फिर भी मैं आपको यह सलाह नहीं दूंगा कि मोटर साइकल की सवारी के डर के बावजूद आप उसकी सवारी करें ही लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि अपने भीतरी के संतुलन पर तवज्जो दें, उसे बेहतर बनाएँ और आत्मविश्वास प्राप्त करें और उसके बाद पुनः सामान्य हो जाएँ।

वर्तमान में जियें, इस क्षण का पूरा आनंद उठाएँ और प्रसन्न रहें। शारीरिक व्यायाम करें, स्वास्थ्यवर्धक भोजन करें और अपने मस्तिष्क को शांति और खुशी प्राप्त करने का मौका दें। एक बार आप मानसिक शांति की उस अवस्था को पा लेंगे तो फिर ये काल्पनिक डर अपनी दहशत खो देंगे। आप ऐसी कल्पनाओं को हंसी में उड़ा सकेंगे क्योंकि आप जान चुके होंगे कि इस वक़्त आप पूरी तरह सुरक्षित हैं।

आशंकाओं को अपने ऊपर हावी न होने दें बल्कि जितना इस क्षण आप स्थिर, शांत और प्रसन्न हैं उससे अधिक मानसिक स्थिरता, शांति और प्रसन्नता प्राप्त करने में उन आशंकाओं का उपयोग करें!

अकेले भारत भ्रमण पर आई पश्चिमी महिलाओं के लिए कुछ सुझाव: भाग 2 – 30 जनवरी 2014

कल मैंने अकेले भारत-भ्रमण पर निकली पश्चिमी महिलाओं के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत किए थे। क्योंकि इस विषय में मेरे पास बहुत कुछ कहने को है इसलिए इस दूसरे हिस्से में कुछ और सुझाव प्रस्तुत हैं:

5- अपनी सीमाएं स्पष्ट कर दें, इससे आप दर्शा सकेंगी कि आप आसान लक्ष्य नहीं हैं।

दुर्भाग्य से अगर आप किसी मुश्किल परिस्थिति में पड़ जाएँ, जैसे कोई पुरुष आपसे कुछ ज़्यादा ही नजदीकी बनाना चाहे, तो साफ-साफ शब्दों में अपनी सीमाओं को उसके सामने ज़ाहिर करने में देर न करें। अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करने से डरें नहीं और जैसे, अगर आप किसी बस में उसके साथ वाली सीट पर बैठी हैं तो उसे बता दें कि उसका पैर आपके पैरों को छूए, यह आपको गवारा नहीं है। ऊंचे स्वर में कहें, जिससे आसपास बैठे हुए सहयात्री भी सुनें। अगर आप किसी कतार में खड़ी हैं और आपके पीछे खड़ा व्यक्ति आपको गलत तरीके से छूने की कोशिश कर रहा है तो पीछे मुड़कर ऊंचे स्वर में उससे यह कहने में संकोच न करे कि ज़्यादा हाथ न चलाए, उन्हें वहीं रखें, जहां उन्हें होना चाहिए।

आसपास के माहौल के गहरे संपर्क में रहें, आवश्यक लगे तो चिल्लाएँ, अपना गुस्सा ज़ाहिर करें और इस तरह सबके सामने यह अच्छी तरह स्पष्ट कर दें कि वह कोई और हरकत करने की हिम्मत न करे। उस क्षण अपना सारा आत्मविश्वास बटोरकर उस पर अपना गुस्सा ज़ाहिर करें। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि न सिर्फ वह व्यक्ति आपके साथ आगे और कुछ गड़बड़ी करने से डरेगा बल्कि आसपास के अधिकांश लोग भी आपके समर्थन में खड़े होंगे।

6- यहाँ आने से पहले पूरा कार्यक्रम तय कर लें, और जहां-जहां आप भ्रमण करने वाली हैं, वहाँ की पूरी जानकारी ले लें और संभव हो तो कोई गाइड ले लें।

यह सुझाव कल दिये गए सुझाव नंबर 2 से जुड़ा हुआ है। भारत में कहीं भी यूंही खड़े होना उचित नहीं है, जबकि आपको पता न हो कि आपको जाना कहाँ है। एयरपोर्ट में कदम रखते ही इस बात का ध्यान रखें और फिर देश में भ्रमण करते वक़्त भी। पहले से अपना पक्का कार्यक्रम अच्छी तरह तय कर लें और इस बात की पूरी जानकारी रखें कि जहां आपको जाना है, वहाँ कैसे पहुंचना है। फिर आपको ऐसी जगहों पर पूछना नहीं पड़ेगा, जिनके बारे में आप अनभिज्ञ हैं। इसके अलावा किसी अजनबी से यूंही जानकारी लेने की कोशिश करना और जैसे, अगर वह कहे कि "चलिए, आपको अपने एक दोस्त के होटल लिए चलता हूँ" तो उस पर भरोसा करना बिल्कुल उचित नहीं है।

अगर आप भारत के बारे में हर जगह उपलब्ध सूचनाओं, खबरों और जानकारियों की अति से परेशान हो गई हैं, अगर आपको लग रहा है कि कितना भी पढ़ लें, कितना भी जान लें, भारत में अकेले घूमना आपके लिए मुश्किल होगा तो किसी पर्यटन-एजेंसी से संपर्क करें, किसी समूह में ही यात्रा करें या व्यक्तिगत गाइड कर लें। यह सेवा हमारे यहाँ आश्रम में भी उपलब्ध है। अगर आप अकेले या समूह के साथ, कोई यात्रा पैकेज या विश्रांति सत्र (कार्यशाला) हमारे यहाँ बुक करते हैं तो आपको बहुत सी चीजों की चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। यह यात्रा आपके होटल से, जिसे हम खुद किसी सुरक्षित जगह पर बुक करते हैं, शुरू होती है। उसके पहले विमानतल से हमारा विश्वासपात्र ड्राइवर आपको लेकर आएगा। फिर जब पूरी यात्रा के दौरान आप मेरे भाइयों में से किसी एक के साथ, उसके मार्गदर्शन में घूमेंगी-फिरेंगी तो आपको एक तरह की सुरक्षा का एहसास होगा।

जी हाँ, यह आत्म-विज्ञापन है (भाइयों, यह मेरा ब्लॉग है, यहाँ नहीं करूंगा तो कहाँ करूंगा? 🙂 )-लेकिन मैं सचमुच मानता हूँ कि उन महिलाओं के लिए, जो सुरक्षा के एहसास के साथ इस महान देश का और उसकी संस्कृति का आनंद उठाना चाहती हैं, यह बहुत व्यावहारिक सलाह है। भारत के विषय में जहां एक तरफ हर तरफ से बुरे समाचार मिल रहे हैं-और इससे इंकार नहीं कि वे बुरे हैं भी, तो दूसरी तरफ यहाँ अनेकानेक ऐसी महत्वपूर्ण और असाधारण चीज़ें देखने के लिए मौजूद हैं और शानदार लोग हैं, जिनसे मिलकर उन्हें सदा-सदा के लिए दोस्त बना लेने का मन करता है। तो अगर यहाँ आने का आपका मन है तो अवश्य आएँ।

मुझे लगता है कि यह विषय कुछ पंक्तियों से अधिक की चर्चा की मांग करता है। इसकी विस्तृत विवेचना आवश्यक है और जब कि आज और कल मैंने भारत-भ्रमण पर आई पश्चिमी महिलाओं को संबोधित करते हुए अपने कुछ विचार रखे, मेरे पास आपके लिए एक और सूची है, जिस पर मैं अगले सप्ताह चर्चा करूंगा: अगर आप एक गैर-भारतीय महिला हैं और अपनी ज़िम्मेदारी पर भारत-भ्रमण पर आई हैं तो आपको क्या नहीं करना चाहिए।

आत्मविश्वास बढ़ाने वाला एक पांच-सूत्री कार्यक्रम- 29 अगस्त 2013

मैंने कई दिन और कई ब्लॉग यह समझाने में खर्च किए हैं कि कैसे लोग अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और इस तरह अपना आत्मविश्वास और उसके साथ ही अपना स्वाभिमान भी खो देते हैं। वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं, अपने शरीर के साथ उन्हें समस्या हो जाती है और वे सोचने लगते हैं कि उनके कार्य और भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। अगर आपकी यह बीमारी यहाँ तक पहुँच गई है या अगर आप चाहते हैं कि वह बिगड़कर यहाँ तक न पहुँचे तो मैं आपको अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए कुछ करने की सलाह दूँगा। नीचे पाँच बिन्दुओं वाला एक कार्यक्रम मैं आपको बता रहा हूँ। उसे पढ़ें और शुरू हो जाएँ:

  1. जब भी आपके पास कुछ मिनट का अवकाश हो, एक कोरा कागज और कलम लेकर आराम से बैठ जाएँ। अब उस पर अपने बारे में उन बातों को लिखना शुरू करें जिन्हें आप समझते हैं कि वे आपके लिए बहुमूल्य हैं। वह सब कुछ, जिस पर आप गर्व कर सकते हैं, वह सब कुछ, जिन्हें आप अच्छा समझते हैं। यह "मैं फुटबाल अच्छा खेलता हूँ", या "जींस में मेरे कूल्हे शानदार लगते हैं" से लेकर "मैं लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील हूँ" या "मेरे अंदर बहुत ज़्यादा संयम है" तक कुछ भी हो सकता है। आपके पास इस सूची में ऐसी कम से कम पाँच बातें अवश्य होनी चाहिए-और इस बात की कोई सीमा नहीं है कि आप कितने बिंदु और जोड़ना चाहते हैं।
  2. अगर आपको अपने बारे में इस सूची के लिए विश्वसनीय बातें नहीं मिल रही हैं तो अपने करीबी मित्रों, या परिवार के किसी सदस्य से पूछिए कि वे आपमें कौन सी बहुमूल्य बातें देखते हैं। आप गौर करेंगे कि सिर्फ इतना करना ही आपमें सकारात्मक भावनाओं और स्वाभिमान का संचार कर देगा! अगर आप किसी और से पूछने में संकोच कर रहे हैं तो याद रखें कि आप भी चाहेंगे कि वे भी आपसे, आवश्यकता पड़ने पर, अपने बारे में पूछें!
  3. इस सूची को कम से कम एक बार रोज़ पढ़ें। इसमें आपका ज़्यादा समय ज़ाया नहीं होगा-सोने से पहले या सबेरे उठने के बाद या हो सके तो दोनों बार, बैठ जाएँ और सचेत होकर पढ़ें कि आपने अपने बारे में क्या लिखा है। आप अपने बारे में अच्छे विचारों को जज़्ब करते चले जाएंगे और कुछ समय बाद, आपको लिखे हुए शब्दों की ज़रूरत तक नहीं पड़ेगी, आप सिर्फ उस सूची के बारे में सोचेंगे और अच्छा महसूस करेंगे।
  4. अगर आप ध्यान करते हैं या श्वसन-क्रिया का अभ्यास करते हैं तो इस सूची को ध्यान-साधना के लिए एक उद्घोषक की तरह इस्तेमाल करें। अपने भीतर संचरित हो रही सकारात्मक ऊर्जा पर ध्यान केन्द्रित करें।
  5. अंत में, जब भी आप ऐसी किसी परिस्थिति में हों, जो आपको वापस अपने लिए आने वाले बुरे ख़यालों के गर्त में धकेल रही है तो मानसिक रूप से आप भी अपने बारे में बहुमूल्य लगने वाले बिन्दुओं पर आ जाएँ जिन्हें दूसरे भी आपके बारे में बहुमूल्य मानते हैं। याद रखें, कोई भी महामानव नहीं है, कोई भी जीवन के हर क्षेत्र में पूरी तरह निपुण नहीं है। अपने गुणों को जानिए और इस बात को स्वीकार कीजिए कि आपमें कुछ कम प्रभावशाली विशेषताए भी हैं।

अपने आप पर एकाग्र हों, किसी और से अपनी तुलना न करें और अपने गुणों को खोजें और उन पर ध्यान दें-आप नोटिस करेंगे कि ऐसा करने से आपके दैनिक जीवन में कितना बदलाव आ गया है। कोशिश करें-इसमें क्या लगना है? एक कोरा कागज़, कुछ स्याही और रोज़ के कुछ मिनट! लेकिन इस प्रयास का आप पर अच्छा असर होगा और आप प्रसन्न रह सकेंगे!

आप खास हैं क्योंकि आप, आप हैं- इसलिए नहीं कि आप क्या करते हैं!-14 अगस्त 2013

उन अल्पसंख्यकों के लिए, जिन पर समाज द्वारा दबाव डाला जाता है, अपने कल के ब्लॉग के बाद आज मैं उन बहुसंख्यकों के बारे में कुछ शब्द कहूँगा, जो अल्पसंख्यकों जैसा बिल्कुल अनुभव नहीं करते बल्कि सोचते हैं कि वे वैसा ही महसूस करते हैं, जैसा समाज के दूसरे लोग महसूस करते हैं, वे जो वास्तव में ‘बहुसंख्यक समाज’ का ही हिस्सा हैं। क्यों? क्योंकि ‘बहुसंख्यक-ताड़ना’ जारी है, खासकर आध्यात्मिक क्षेत्र में, लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो ईमानदारी के साथ वही चाहते हैं, जो वे कर रहे होते हैं और इस आचरण का उन्हें अधिकार भी प्राप्त है-भले ही इसका अर्थ यह निकाला जाए कि वे ‘बहुसंख्यक’ हैं, यानी उनका आचरण समाज के आम, सामान्य लोगों जैसा ही है। अगर आप उनमें से एक हैं तो आपको इस बात के लिए आत्मग्लानि नहीं होनी चाहिए!

आपको यह मज़ाक लगेगा कि मैं सोचता हूँ कि यह कहना ज़रूरी है लेकिन मुझे समझाने दीजिए कि क्यों मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग ऐसे हैं, जो ऐसी धारणा रखते हैं। बहुत साल से लोग इस बारे में ‘जागृत’ हो रहे हैं और समझ रहे हैं कि वे समाज की परम्पराओं के अनुसार नहीं चलना चाहते और वही करना चाहते हैं जो उनका दिल कहता है। ऐसे कई आंदोलन भी चले हैं, जिन्हें आप ‘आध्यात्मिक आंदोलन’ कह सकते हैं, अगर आप एक शब्द में इसका आशय जानना चाहते हैं। वे सभी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वही कार्य करें जो आपको प्रसन्न करता है और मैं इस विचार की मूल भावना का पूरी तरह समर्थन करता हूँ। उनके अलग-अलग आग्रह (रास्ते) हो सकते हैं मगर ज़्यादातर लोग अपने अनुयायियों से यही एक बात कहते हैं कि आप विशिष्ट हैं!

जब कि मैं इस विचार की मूल भावना से सहमत हूँ कि हम सभी खास हैं, इस संदेश का एक और निहितार्थ है जिससे मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ: वह यह कि आप खास हैं क्योंकि आप कुछ अलग कर रहे हैं। आप खास हैं क्योंकि आपके आसपास के वे सब लोग, वे ‘बहुसंख्यक’, वह ‘विशाल जनसमूह’ उतने जागृत (सचेतन) नहीं हैं, जितना कि आप हैं। आप खास हैं क्योंकि वे उन्हीं पुरानी बातों से चिपके हुए हैं, समाज की मान्यताओं के अनुसार काम कर रहे हैं, जिन्हें अब आप पसंद नहीं करते। आप खास हैं क्योंकि आप वह सब पसंद नहीं करते, जो वे पसंद करते हैं। आपको ऐसे लोग भी मिलेंगे, जो लगभग वही बातें पसंद करते हैं, जो आप पसंद करते हैं लेकिन अंत में आप अकेले ही अपने ज्ञान (जागृति) के रास्ते पर चलेंगे क्योंकि आप इतने खास हैं।

खैर, मैं इस विचार का समर्थन नहीं करता कि वे सारे लोग ‘चुनिन्दा लोग’ हैं। मैं नहीं समझता कि यह कोई ठीक विचार है कि लोगों को बताया जाए कि आपको दूसरों से इतना अलग होना चाहिए कि आप उनके जैसे न लगें, उनके साथ आपकी संगति बिल्कुल न बैठे। हाँ, मैं स्वयं लोगों से यह कहता हूँ कि यह ज़रूरी नहीं है कि आपकी संगति उनके साथ बैठे ही, लेकिन यह उस बात से बिल्कुल भिन्न बात है कि आप उनसे कहें कि उन्हें संगति बिठानी ही नहीं चाहिए। वे खास नहीं माने जाएंगे अगर वे सामान्य लोगों के साथ सहज महसूस करते हैं। कि उन्हें अपने सामान्य परिवेश में अजनबी महसूस करना चाहिए, या उसमें उन्हें बुरा लगना चाहिए। कि उन्हें नए दोस्त या अल्पसंख्यक लोगों के समूह को खोजना चाहिए और उसमें शामिल हो जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्हें भेड़िये की तरह समाज के बाहर भटकते रहना चाहिए।

जब आप अपने शरीर, खान-पान, मस्तिष्क और अपने तनाव या विश्रांति की तीव्रता और कुल मिलाकर अपनी कार्यपद्धति और व्यवहार के बारे में ज़्यादा सोचने लगते हैं या उसके बारे में अधिक चेतन होते हैं, आप महसूस कर सकते हैं कि आप कुछ अलग हैं। आप महसूस करेंगे कि आप कुछ गतिविधियों को पसंद नहीं करते हैं, जैसे शाम को किसी शराबखाने में धुत्त पड़े रहना या कहीं सामिष भोजन करना क्योंकि अब आपने शराब पीना छोड़ दिया है या शाकाहार अपना लिया है। हो सकता है कि अब आप कई ऐसे मामलों पर कोई राय देना पसंद नहीं करते, जिन पर पहले आप खुलकर बातचीत किया करते थे। लेकिन भले ही आप फिल्म देखना पसंद करते हैं, डिस्को में जाकर नृत्य करना पसंद करते हैं, या दोस्तों के साथ फुटबाल मैच देखना पसंद करते हैं तो आप अब भी खास और अनूठे हैं! आप अब भी एक अलग अस्तित्व के मालिक हैं और कोई भी आप जैसा नहीं है!

इसका संदेश यह है: जैसे आप हैं उसी रूप में आप अनूठे हैं। इसलिए कि आप, आप हैं, इसलिए नहीं कि आप ऐसा या वैसा करते हैं या नहीं करते। भले ही आप बहुसंख्यक समाज का हिस्सा हों, हैं आप विशिष्ट ही!

यह आपका जीवन है – ध्यान रहे, समाज आप पर कोई दबाव न बना पाए- 13 अगस्त 2013

लोगों द्वारा बनाई जाने वाली जीवन की योजनाओं के बारे में कल जब मैंने लिखा था तो मेरे मन में एक और बात भी थी, जिसे मैं इन शब्दों में आपके सामने रखना चाहता हूँ: यह कार्ययोजना अक्सर सबके लिए ठीक नहीं होती-भले ही समाज आप पर इस बात पर विश्वास करने का दबाव डाले!

यह ब्लॉग उन महिलाओं के बारे में नहीं है, जो उस आयु में प्रवेश कर चुकी हैं जब वे माँ नहीं बन सकतीं और जो इस बात पर दुखी होती हैं कि अब उन्हें माँ बनने का अनुभव नहीं हो पाएगा। मैं उनका दर्द समझ सकता हूँ, मैं ऐसी बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ और उनमें से कई मेरी व्यक्तिगत मित्र भी हैं। नहीं, यह ब्लॉग उन लोगों के बारे में है जो अपने ‘जीवन के लक्ष्य’ प्राप्त करते वक़्त बाहरी दबावों को तरजीह देते हैं, जबकि वे स्वयं अन्तर्मन से ‘जीवन के उन लक्ष्यों’ को उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते!

यह ब्लॉग वृहत जनसमुदाय के लिए नहीं है और इसमें मैं बहुसंख्यक लोगों से मुखातिब भी नहीं हूँ बल्कि मैं कुछ थोड़े से लोगों से, अल्पसंख्यकों से, यह बात कह रहा हूँ। लेकिन, जो लोग इन थोड़े से लोगों में शामिल नहीं भी हैं, वे भी एक अलग नज़रिये को जान-समझ सकेंगे और हो सकता है कि ऐसे लोगों के प्रसंग में अपने रुख में परिवर्तन कर सकेंगे जिससे अंततः उन्हें भी आसानी होगी।

सामान्यीकरण करने की आज़ादी दें तो मैं कहना चाहता हूँ कि समाज यह समझता है कि जीवन में हर व्यक्ति को कुछ बातें हर हालत में करनी ही चाहिए या उन सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करना ही चाहिए, जिससे लगे कि आपका जन्म सफल हुआ, या आप देश के एक महत्वपूर्ण और कर्तव्यपरायण नागरिक हैं या सिर्फ इसलिए कि समाज की अपेक्षाओं पर आप खरे उतरे। को आपसे अपेक्षा थी उसमें आप सफल हुए। पढ़ाई पूरी करें या कोई प्रशिक्षण प्राप्त करें, नौकरी करें, विवाह करें, बच्चे पैदा करें, अपना मकान बनवा लें। आप यह नोटिस करेंगे कि ये वही लक्ष्य हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए लोग स्वयं अपने आप पर दबाव बनाते हैं। कुछ लोगों के लिए यही दबाव समाज बनाता है।

कुछ बातें बहुत से लोगों की नज़रों में बिल्कुल उचित नहीं होतीं। अलग-अलग देशों के लिए यह अनुचित लगने वाली बात अलग-अलग होती है। पश्चिमी महिलाओं के लिए यह पढ़ाई पूरी होने से पहले या कोई प्रशिक्षण लेने से पहले बच्चे पैदा करना या कोई प्रशिक्षण न लेने का निर्णय लेकर घरेलू महिला का जीवन गुजारना या, और इस पर आश्चर्य है, विवाह न करने का और बच्चे पैदा न करने का निर्णय लेते हुए सारा जीवन अपने पेशे और तरक्की के लिए न्योछावर कर देना हो सकता है। वहीं, भारतीय महिलाओं के लिए विवाह न करना, बच्चे पैदा करने से पहले कोई नौकरी कर लेना और नौकरी में तरक्की के पीछे भागने को अपना लक्ष्य बनाना या बच्चे पैदा न करने का निर्णय लेना ऐसी अनुचित बातें हो सकती हैं। जीवन के कई दूसरे क्षेत्रों के संदर्भ में भी इसके कई उदाहरण दिये जा सकते हैं-मुझे लगता है कि जो इस स्थिति से गुज़र रहे हैं, वे समझ रहे होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।

अगर आप अपने लिए कोई ऐसा लक्ष्य निर्धारित करना चाहते हैं या कोई ऐसा काम करना चाहते हैं जो उस देश का आम रवैया या परंपरा नहीं है तो आपको अपने परिवेश से बहुत सी नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ सुनने को मिल सकती हैं। इतना ही नहीं, इस अपारंपरिक लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए बार-बार आपको अपनी सोच और अपने निर्णय पर ही शक पैदा होता रहेगा। लेकिन अगर आपको लगता है कि आप सामान्य परम्पराओं के अनुसार नहीं चल सकते और आपको अपना अलग रास्ता मिल गया है और आप उस रास्ते पर चलते हुए प्रसन्न हैं-हालांकि यह इतना आसान नहीं होगा-अपने निर्णय पर अटल रहिए! ‘बहुमत’ को आपका तिरस्कार करने की इजाज़त मत दीजिए।

वही करें जो आप ठीक समझते हैं। जी हाँ, हो सकता है कि लोगों के तीखे ताने और आलोचनाएँ सुनने और सहने के लिए आपको कुछ अधिक साहस का परिचय देना पड़े। यह कभी-कभी आपको बहुत बेचैन भी कर सकता है लेकिन अपने इरादे और अपनी इच्छा के विपरीत आचरण करना आपके लिए उससे ज़्यादा बेचैन करने वाला हो सकता है।

आपका निर्णय कितना भी मूर्खतापूर्ण और अप्रिय क्यों न दिखाई दे, अपने दिल का कहा मानें। यही एकमात्र सही तरीका है जो आपको सुख और शांति प्रदान कर सकता है!

असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी लोगों को गुरु की खोज में लगा देते हैं – 2 जून 2013

पिछले हफ्ते मैंने आपको एक आयरिश महिला के बारे में बताया था जिससे मैं 2005 में मिला था और जिसके जीवन में व्याप्त असुरक्षा के चलते वह आत्मिक शांति की खोज में विभिन्न गुरुओं के चक्कर लगाती रहती थी कि कभी न कभी कोई उपयुक्त व्यक्ति उसे मिल जाएगा। कुछ मुलाकातों के बाद मैंने नोटिस किया कि जो वह चाहती थी वह था: एक गुरु जो उसकी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठा ले।

उसके भीतर आत्मविश्वास की बहुत कमी थी। ऐसे लोग बहुतायत से मिलते हैं, विशेषकर पश्चिम में जहां लोगों को यह समझने में काफी दिक्कत आती है कि आखिर जीवन में वे ठीक-ठीक चाहते क्या हैं। इसलिए वे किसी बात पर पक्का निर्णय नहीं कर पाते और क्या उचित निर्णय लिया जाए, दूसरों से पूछते हैं। इस महिला को भी यह ठीक-ठीक पता नहीं था कि वह क्या चाहती है और आत्मविश्वास भी नहीं था।

ऐसे असुरक्षित व्यक्तियों के पास जो होता है वह है दूसरों पर सहज विश्वास करने का माद्दा और यह उस महिला में भी कूट-कूटकर भरा था। जब ऐसे किसी व्यक्ति को वह पा जाती थी तो उस पर आँख मूंदकर भरोसा करती थी। वह इसी तरह मुझ पर भी भरोसा करने लगी और उसे विश्वास हो गया कि मैं किसी जादुई तरीके से उसके भविष्य के बारे में कोई इशारा कर सकता हूँ या अपने आत्मज्ञान से उसे ऐसी सलाह दे सकता हूँ जिस पर अमल करना उसके लिए उचित होगा। उसके इस विचार को मैं इतना समय गुज़र जाने के बाद उसका अंधविश्वास ही कह सकता हूँ लेकिन उस समय मुझे सिर्फ यह महसूस हुआ कि यह महिला मुझमें किसी गुरु की खोज कर रही है। मगर बहुत पहले, गुफा के एकांत में पर्याप्त वक़्त गुजारने के बाद, यह काम मैं छोड़ चुका था।

यह समझते ही मैंने तुरंत अपनी अगली मुलाक़ात में उससे स्पष्ट कहा कि मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ और मेरा उसे अपना शिष्य बनाने का कोई इरादा नहीं है। मैंने इसके बारे में बहुत गंभीरतापूर्वक उससे बात की और उसे उसकी जिम्मेदारियों के बारे में समझाया। मैंने उससे कहा कि एक व्यक्ति के रूप में कभी भी वह मुझसे सलाह ले सकती है। उसकी बात तल्लीनता के साथ सुनने के लिए और उस पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए भी मैं प्रस्तुत हूँ। मगर मैं उसे यह नहीं बता सकता कि उसे ठीक-ठीक क्या करना चाहिए। उसे खुद सोच-समझकर, पूरे एहसास के साथ अपना निर्णय लेना होगा!

हमारी कुछ देर बहुत गंभीर और साफ-साफ बात हुई। उसके बाद मेरे साथ उसका संपर्क धीरे-धीरे कम होता गया, मगर बना रहा। फिर कई वर्षों के अंतराल के बाद उसने मुझे बताया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को पा लिया है जिसे वह प्रेम करती है और जिसके साथ सारा जीवन व्यतीत करना चाहती है। वह उस व्यक्ति को साथ लेकर मुझसे मिलने जर्मनी भी आई। वे बड़े प्यारे लग रहे थे और दोनों का स्वभाव एक जैसा था। जो भी उनसे मिला, यही कहता था कि अपने हंसमुख स्वभाव के कारण ऐसा लगता है जैसे दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों!

वे हमारे एक ध्यान-सत्र में शामिल हुए और हमें पुनः यह अनुभूति हुई कि वाकई वे एक दूसरे के लिए ही बने हैं। मेरा बोलना अभी जारी ही था कि तभी कमरे के पिछले हिस्से से दोनों की खर्राटे भरने की आवाज़ आने लगी; दोनों अपने आसन पर गहरी निद्रा में लीन हो गए थे और पूरे सत्र में सोते ही रहे! उन्हें एक दूसरे के करीब सोते हुए देखना बहुत मासूम सा, प्यारा दृश्य था। अंत में दोनों मेरे पास आए और गले लग गए। फिर कहा, “यह बहुत शानदार ध्यान-सत्र था!”