अंधविश्वास के प्रति सहिष्णुता बरक्स बच्चों को अंधविश्वास से दूर रखना- 9 अक्टूबर 2013

कल मैंने बताया था कि हमारे कुछ कर्मचारी काम छोड़ कर चले गए क्योंकि वे चेचक से पीड़ित हो गए थे। जब मैंने इस बारे में सोशल मीडिया में लिखा तो प्रत्युत्तर में मुझे बहुत सा फीडबैक मिला। कल मैंने यह भी बताया था कि कुछ लोगों ने मुझसे पूछा कि मैंने उन्हें डॉक्टर के यहाँ क्यों भेजा, जबकि कुछ लोगों ने एक अन्य प्रश्न पर अपनी उलझन व्यक्त की: जब उन्होंने बिना दवा खाए स्वस्थ होकर वापस आने की अनुमति चाही तो हमने उन्हें इंकार कर दिया। क्यों?

अपने इस निर्णय के कारण मुझ पर आरोप लगाए गए कि मैंने सिर्फ इसलिए किसी का रोजगार छीन लिया कि वे उस बात पर विश्वास नहीं करते थे, जिस पर मैं करता हूँ। सबसे पहले मैं इस आरोप का जवाब देना चाहता हूँ। वास्तव में, साधारणतया मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे कर्मचारी किन बातों पर विश्वास करते हैं। वे हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान या नास्तिक हों-यह उनकी अपनी मर्ज़ी है और न तो मैं इस बारे में कभी पूछता हूँ और न ही इस मामले में कोई हस्तक्षेप करता हूँ। दुनिया को देखने की उनकी समझ का उनके काम की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं इस मामले में बहुत पेशेवर रवैया अपनाता हूँ और उनसे भी यही अपेक्षा रखता हूँ।

हमारे आश्रम के, सब नहीं तो अधिकतर कर्मचारी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि हम लोग धार्मिक बिलकुल नहीं हैं। वे यह भी जानते हैं कि हमारे परिवार में सिर्फ एक पूजा करने वाला व्यक्ति है और वह है हमारी नानी। उनका एक पूजाघर भी है, जिसे सिर्फ वही इस्तेमाल करती हैं। वे यह भी जानते हैं कि बड़े से बड़े धार्मिक त्योहारों में भी हम कोई धार्मिक आयोजन नहीं करते और उपवास के दिन भी हम सामान्य रूप से भोजन करते हैं। इसके अलावा आप किसी प्रकार के धार्मिक या जातिगत लक्षण हमारे यहाँ नहीं पाएंगे। लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक पूजा-अर्चना करने से हम नहीं रोकते।

यह आपसी समझ दैनंदिन के कार्य-व्यवहार को सुचारु रूप से चलाने में बड़ी सहायक है और कभी कोई समस्या पेश नहीं आती। लेकिन अब हमने बहुत सोच-समझकर एक निर्णय लिया है: यह सही है कि किसी कर्मचारी के विश्वास पर हम कोई असर नहीं डालना चाहते और न ही उनके विश्वास पर कोई निर्णय सुनाना चाहते हैं लेकिन हमारे आश्रम में बहुत से छोटे-छोटे बच्चे रहते हैं, जिनके प्रति हमारी कुछ ज़िम्मेदारियाँ है। इन बच्चों को हमारे यहाँ सिर्फ इसलिए नहीं भेजा गया है कि हम उनके खाने, कपड़े और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करें बल्कि इसलिए भी कि हम उन्हें शिक्षित करें-स्कूल में और घर में भी। आचार-व्यवहार और नैतिक शिक्षा ऐसे विषय हैं, जिन्हें बच्चे अपने घर में व्यवहृत संस्कृति से सीखते हैं और आश्रम इन बच्चों का घर ही है।

हम खुले विचारों वाले लोग हैं और लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील और सहिष्णु हैं। ये बच्चे आसपास मौजूद सांस्कृतिक माहौल से हिन्दू धर्म के बारे में जानेंगे। लेकिन जब यह धर्म खतरनाक अंधविश्वास की ओर बढ़ने लगे तो उसकी एक सीमा तय करना आवश्यक है। हम समझते हैं कि इसी बिन्दु पर हमें दखल देना चाहिए और अपने वचनों और कार्यों से उन्हें बताना चाहिए कि वे चीजों को वैज्ञानिक दृष्टि से देखना सीखें, और यह भी कि दवा और आपके भीतर मौजूद नैसर्गिक शक्ति के कारण बीमारी ठीक होती है न कि पूजा-पाठ और कर्मकांडों से!

हम समझते हैं कि अगर हमारे दो कर्मचारी दवा न लेने का निर्णय लेकर हमें छोड़ कर चले जाएँ और फिर हमारी सम्मति के साथ वापस भी आ जाएँ तो यह बात बच्चों पर गलत असर डालेगी। वही दवा उन बच्चों को भी खानी पड़ी थी। वे कर्मचारी आएंगे और उन्हें अपने अंधविश्वासों की शिक्षा देंगे और जब बच्चे कहेंगे कि उन्होंने भी वे दवाएँ खाई हैं तो यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि उन्होंने दवाइयाँ खाकर गलत काम किया है। जिन्होंने दवाइयों का अच्छा असर अपनी आँखों से देखने के बाद भी दवाइयाँ नहीं खाईं और अपने विश्वास की खातिर नौकरी तक छोड़ दी, वे लोग अब और भी ज़्यादा ढीठ और अड़ियल हो चुके होंगे और पूरी शक्ति के साथ दवाओं के विरुद्ध बातें करेंगे और बच्चों पर यह असर डालेंगे कि हमेशा डॉक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती और दूसरी ऊलजलूल बातें भी उनके कोमल मस्तिष्क में ठूँसने की कोशिश करेंगे।

अगर अंधविश्वास अज्ञान के चलते हुआ है तो फिर भी एक बात है मगर जब उस पर अर्थहीन ज़िद्द और अन्धी रूढ़ियों का मुलम्मा भी चढ़ जाए तो यह बहुत ही बुरा होता है। और हम बच्चों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को बहुत गंभीरता से लेते हैं-इसलिए हम उन्हें अंधे, रूढ़िवादी विश्वासों से दूर ही रखना चाहते हैं!

क्या अन्धविश्वास ही चेचक का एकमात्र इलाज है? 8 अक्तूबर 2013

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे हमें चेचक के चलते अपने दो कर्मचारियों से हाथ धोना पड़ा था। नहीं, वे मरे नहीं, सिर्फ हमें छोड़ कर चले गए क्योंकि वे अपनी दवाइयाँ नहीं खाना चाहते थे-और हम उनके कारण दूसरों को खतरे में नहीं डाल सकते थे। और हाँ, हमने उन्हें बता दिया कि अगर माह भर बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर वे आते भी हैं तो हम उन्हें वापस काम पर नहीं रखेंगे।

जब मैंने यह कथा सोशल मीडिया पर साझा की तो मुझे कई तरह की प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, अधिकतर प्रतिक्रियाओं की मुझे आशा भी थी और उनमें से कुछ अज्ञान के चलते की गई थीं और कुछ नितांत अपमानजनक थीं। कुछ प्रतिक्रियाएँ हमारे कार्य के समर्थन में भी आई थीं।

दो बातें मुख्य रूप से सामने आईं, जिन पर लोग हमसे और हमारी कार्रवाई से सहमत नहीं थे। पहली बात तो यह थी कि क्यों हम बच्चों और अपने कर्मचारियों को डॉक्टर के पास ले गए। यह सामान्य बात है-भारत में धार्मिक और अंधविश्वासी लोग विश्वास करते हैं कि चेचक की बीमारी देवी के गुस्से की अभिव्यक्ति है और उसके दंड को आपको भुगतना ही होता है और उसे मनाने के लिए कर्मकांड और पूजा-अर्चना भी की ही जाती है। लोग मुझे सिखाने (पढ़ाने) की कोशिश कर रहे थे कि यह एक ऐसी बीमारी है जो बिना किसी डॉक्टर की मदद के ही ठीक हो जाती है और इस बीमारी की कोई दवा नहीं है। उनका तर्क था कि हमारा डॉक्टर एक अंधविश्वासी व्यक्ति था, जो ऐसी दवाओं पर विश्वास कर रहा था, जिसका बीमारी पर कोई असर होने वाला नहीं था, इस तरह वह दरअसल हमें ठग रहा था।

जिन्होंने इस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त की, वे लोग शायद यह सोच रहे हैं कि मैं और मेरा परिवार और हमारे साथ पश्चिम में रहने वाले वे सब लोग, जो ऐसी बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, बेवकूफ है। जी हाँ, डॉक्टर हमें मूर्ख बना रहा है और हम बेवकूफ़ों की तरह विश्वास कर रहे हैं कि वह हमारी सहायता कर सकता है। वे यहाँ तक कहते हैं कि आज के दिन इस बीमारी की कोई दवा नहीं है। मेरा जवाब है: क्या आपने इस विषय को गहराई से जानने की कोशिश की है!

इसमें कोई शक नहीं कि शरीर को वेरिसेल जोस्टर (varicella-zoster) वाइरस, जिसे चेचक का वाइरस भी कहा जाता है, के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने भीतर रोग-प्रतिरोधकों (antibodies) का निर्माण करना पड़ता है। मैं भी जानता हूँ कि तीन दिन में सीधे चेचक ठीक करने की गोली या इंजेक्शन जैसी कोई चीज़ उपलब्ध नहीं है! लेकिन आप दवाइयों की सहायता से अपनी रोग-प्रतिरोधक शक्तियों (immune system) को मजबूत कर सकते हैं और बीमारी से होने वाली तकलीफ़ों पर राहत पहुंचा सकते हैं! वयस्क विषाणु रोधी (antiviral) दवाइयाँ ले सकते हैं और कई तरह के मरहम और ज़िंक युक्त पाउडर भी उपलब्ध हैं। तेज़ बुखार होने पर आप बुखार उतारने की दवा ले सकते हैं और दवाओं से बीमारी को फैलने से रोक भी सकते हैं। आप इस बारे में बहुत कुछ कर सकते हैं और इन्हीं दवाइयों के चलते हमारे बच्चे सात दिन में पूरी तरह ठीक हो गए जब कि बिना किसी इलाज के मरीज को ठीक होने में कई सप्ताह लग जाते हैं। इसके अलावा, बीमारी के कारण कमजोर हुए शरीर में दूसरी बीमारियों का आक्रमण भी हो सकता है, और आँखों और मस्तिष्क से संबन्धित कई दूसरी पेचीदगियाँ भी हो सकती हैं, जिन्हें रोकने के लिए डॉक्टर से इलाज करवाना ज़रूरी है। क्या आप डॉक्टर के पास न जाकर ऐसे खतरे उठाना पसंद करेंगे?

पर हाँ, लोग ऐसे खतरे उठाना पसंद करते हैं! हमारे दो भूतपूर्व कर्मचारियों का उदाहरण आपके सामने है, वे धोखे से भी दवाइयों पर विश्वास नहीं कर सकते मगर अंधविश्वास पर विश्वास कर सकते हैं। इसके बावजूद कि दवाइयों का सकारात्मक परिणाम उनके सामने है। अगर वे ठीक हो जाते हैं तो यह देवी की मेहरबानी होगी, घुसपैठिए वाइरस पर उनकी रोग-प्रतिरोधी शक्तियों की विजय नहीं! वे पूजा पाठ करेंगे, देवी को प्रसाद समर्पित करेंगे और हफ्तों तकलीफ सहन करेंगे लेकिन अपनी सोच में कोई परिवर्तन नहीं लाएँगे। (अपने मस्तिष्क के कपाट खोलकर उसकी सफाई नहीं करेंगे।) आशा ही की जा सकती है कि किसी दिन, संभव है, अगली पीढ़ी में ही, लोग ऐसा करेंगे।

लोगों के लिए दूसरा आपत्त्तिजनक बिन्दु यह था कि हमने अपने भूतपूर्व कर्मचारियों से कहा कि स्वस्थ हो जाने के बाद भी वे वापस नौकरी पर न आएँ। इस आपत्ति और इस मामले के साथ जुड़े दूसरे प्रश्नों के विषय में मैं कल लिखूंगा।

अंधविश्वासी लोग अपनी नौकरी छोड़ देंगे मगर अपना अंधविश्वास नहीं छोड़ सकते- 7 अक्तूबर 2013

पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था कि अपरा को चेचक निकल आई है-अब वह लगभग पूरी तरह सामान्य हो गई है, थोड़े से लाल निशान रह गए हैं, जो कुछ खुजलाते हैं। अधिकतर छाले पूरी तरह ठीक हो गए हैं। बच्चों की प्रतिरोध क्षमता क्या कमाल दिखाती है, आश्चर्य होता है! मैं आपको आश्रम के कुछ दूसरे लोगों के विषय में बताना चाहता था, जिन्हें चेचक हो गई थी और इस बीमारी के कारण जो दिलचस्प वाकए यहाँ पेश आए, उनके बारे में भी।

एक छोटी बच्ची को चेचक हो जाए यह उसके परिवार के लिए जीवन भर में घटने वाली एक सामान्य सी बात है। किसी किंडरगार्टेन या स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए यह लगभग असंभव सी बात है कि उसे कभी न कभी चेचक न निकल आए। स्कूल इस बीमारी के विषाणुओं के प्रजनन केंद्र होते हैं, जहां वे एक साथ इतने सारे कोमल शरीरों के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। वे एक के बाद दूसरे पर इतने बेआवाज कूदते-फाँदते रहते हैं कि पता ही नहीं चलता कब, किसको यह बीमारी हो गई। ऐसा ही, जब प्रांशु का इलाज चल रहा था तो पवन और जय सिंह के साथ हुआ और वे अपने-अपने बिस्तरों पर बुखार और सारे शरीर पर उठे दानों और छालों के साथ पड़े थे। हमने बहुत कोशिश की कि अपरा को उनसे दूर रखा जाए और यहाँ तक कि उन बच्चों को हर संभव अलग-थलग कर दिया, जिससे आश्रम परिवार के असंख्य लोग संक्रमित होने से बचे रह सकें।

लेकिन, जैसा कि आप जानते हैं, अपने प्रयास में हम सफल नहीं हुए और मुझे लगता है कि यह विषाणु बेहद अदृश्य और शातिर है, जो किसी दूसरे पर तभी अपना कोई निशान छोड़ता है जब पहले वाला लगभग पूरी तरह संक्रामण मुक्त हो जाता है। वह कैसे काम करता है, मैं नहीं जानता मगर उसने सिर्फ हमारे बच्चे को ही संक्रमित नहीं किया बल्कि 25 और 35 साल के हमारे दो कर्मचारी भी इस बीमारी से ग्रसित हो गए।

किसी के शरीर पर लाल छालों जैसा कुछ देखने पर और उसे बुखार में कंपकंपाते देखकर जैसा तर्कसंगत व्यवहार कोई भी आम व्यक्ति करेगा वैसा ही हमने किया: हमने उन्हें डॉक्टर के पास भेज दिया। हमने डॉक्टर के इलाज की फीस अदा की और उनके लिए दवाइयाँ खरीदीं-आखिर हम चाहते थे कि वे जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ और आश्रम के उनके दूसरे सहकर्मी भी स्वस्थ रहे आएँ।

आश्रम के अधिकांश कर्मचारियों की तरह वे लोग भी हमारे आश्रम में ही रह रहे थे और उन्होंने फोन करके अपनी बीमारी के विषय में अपने परिवार वालों को बताया। दूसरे दिन उनके परिवार के कुछ लोग आश्रम आ गए और हमसे बात करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने हमसे कहा कि हमारी (अंग्रेज़ी) दवाइयाँ वे लोग नहीं लेंगे और उसकी जगह कुछ कर्मकांड किए जाएंगे। उनकी नज़र में, यह देवी का गुस्सा था जो छालों की शक्ल में उन बीमारों के शरीर पर उभर आया था। इसका सिर्फ एक ही इलाज था: देवी को प्रसन्न करना और वह पूर्ण श्रद्धा, पूजा-पाठ और प्रसाद-समर्पण से ही संभव था!

यहाँ, भारत में यह एक सामान्य मगर मूर्खतापूर्ण अंधविश्वास है कि चेचक का कोई इलाज नहीं है। मैंने इसके बारे में, 2010 में, लिखा था और दुर्भाग्य से उसमें अभी भी उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। लोग सोचते हैं कि कोई इलाज नहीं है, बीमारी अपने आप गायब हो जाएगी और कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए। इसके विपरीत-अगर आप दवाइयों लेते हैं या चेचक के छालों पर मरहम लगाते हैं तो आप देवी के और भी भीषण प्रकोप के भागी बनते हैं क्योंकि आपने उसकी सज़ा को श्रद्धा के साथ स्वीकार नहीं किया है!

हमने उन कर्मचारियों को उन बच्चों के उदाहरण देकर समझाने की कोशिश की जो डॉक्टर के इलाज से हफ्ते भर में ठीक हो गए थे-लेकिन वे कोई तर्क सुनना ही नहीं चाहते थे। कीमती दवाइयाँ फेंकनी पड़ीं और वे अपने परिवार वालों के साथ आश्रम छोड़कर चले गए। वापस जाते हुए गेट के पास पहुँचकर उन्होंने पूछा कि क्या वे ठीक होकर काम पर आ सकते हैं तो हमने उन्हें मना कर दिया। वे अपना काम छोड़ने के लिए तैयार थे मगर दवाइयाँ खाने के लिए नहीं।

जब यह सब चल ही रहा था मैंने इसका हाल सोशल नेटवर्क पर साझा किया था और कई मज़ेदार और कुछ विचलित कर देने वाले फीडबैक मुझे मिले, जिन्हें कल मैं आपके साथ साझा करूंगा।

अपरा को चेचक निकल आई है – फिर भी वह हंस-खेल रही है- 3 अक्तूबर 2013

पिछले कुछ समय से आश्रम में जो कुछ चल रहा है, उसके बारे में मैं आज आपको बताना चाहता हूँ। पिछले कुछ सप्ताह से आश्रम में बहुत रोचक बातें हो रही हैं-तब से, जब एक शाम हमारे साथ रहने वाला प्रांशु, जो उम्र में सबसे छोटे बच्चों में गिना जाता है, हमारे पास अपनी छाती पर उभरे कुछ अजीबोगरीब निशान दिखने आया, जो फुंसियों की तरह दिखाई दे रहे थे। हम उसे डॉक्टर के पास ले गए और हमारा शक सही निकला: उसे चेचक निकल आई थी।

हमने भरसक कोशिश की कि अपरा को भी यह छूत की बीमारी न लगे लेकिन तीन दिन पहले उसके हाथ पर दो छोटे-छोटे छाले दिखाई दिये तो हमें लगा कि उसे भी डॉक्टर के पास ले जाना पड़ेगा। उसने तुरंत पुष्टि कर दी कि उसे भी चेचक हो गई है।

जब प्रांशु स्वस्थ हो रहा था, हम खुश थे कि अब अपरा को यह बीमारी नहीं होगी। जब बीमारी की पुष्टि हो गई तब भी हम आश्वस्त थे कि बीमारी ज़्यादा तीव्र नहीं होगी। अब चौथे दिन हमें खुशी है कि खुजली से बेचैन कर देने वाले छालों के बावजूद उसे बुखार नहीं आया है और वह हंस रही है, खेल-कूद रही है और हमेशा की तरह खुश है।

इसके बावजूद कि उसके आधे चेहरे पर लाल दाने निकल आए हैं, उसे हँसते और अपनी कहानियाँ सुनाते हुए देखना, जैसे कुछ हुआ ही न हो, आश्चर्यचकित कर देता है। सिर्फ दवाएं खाते वक़्त वह रोती है। दवा खाना उसे बिल्कुल नहीं सुहाता। इसलिए नहीं कि वह कडुवी होती है, या उसकी गंध उसे पसंद नहीं है बल्कि इसलिए कि उसे पीना पड़ता है-दवाइयाँ तो, वैसे भी, बच्चों को दिए जाने वाले मीठे सिरप हैं, जिनमें से संतरे की भीनी खुशबू आती है। हमने अपनी बेटी को हर तरह से मनाकर देख लिया और उसे बहलाने-फुसलाने की कोशिश भी की कि किसी तरह वह फलों का रस समझकर दवा पी ले लेकिन वह इतनी होशियार हो गई है कि उसे बुद्धू बनाना बहुत मुश्किल है। लेकिन यह समस्या मिनट भर की है और एक बार दवा पेट में उतर गई कि फिर वह मुस्करा देती है और हमें समझाते हुए कहती है: बीमार पड़ने पर दवा लेना ज़रूरी होता है! फिर वह हमें आश्वस्त भी कर देती है कि अगली बार दवा लेते वक़्त वह नहीं रोएगी। दरअसल, वह मानने के लिए तैयार ही नहीं होती कि इस बार भी वह रोई थी।

हम उसके छालों पर दवा लगाने का काम नियमित रूप से कर रहे हैं और इस समय हमारा पसंदीदा खेल हो गया है, डॉक्टर डॉक्टर, जिसमें हम उसके सारे खिलौना जानवरों की स्टेथस्कोप लगाकर जांच करते हैं, जैसा कि डॉक्टर ने उसके साथ किया था। हम यह सोचकर भी खुश हैं कि अच्छा हुआ हम सभी को, जीवन में एक बार होने वाली यह बीमारी हो चुकी है इसलिए हम अपरा के साथ निर्द्वंद् खेल सकते हैं। एक बात पर हमें बार-बार आश्चर्य होता है कि सर्दी जैसी छोटी-मोटी बीमारी होने पर भी हम वयस्क-औरत और मर्द, दोनों इतने परेशान हो जाते हैं जैसे मर ही जाएंगे। हम चुपचाप बैठ जाते हैं और कुड़कुड़ाते हुए तकलीफ सहते रहते हैं। और यहाँ यह छोटी सी बच्ची है, जिसके शरीर में वाइरस और एण्टीबायोटिक्स के बीच- घुसपैठियों और उसके प्रतिरक्षा तंत्र के बीच-युद्ध छिड़ा हुआ है और वह हमें अपने हाथों से पकवान खिला रही है, कमरे में संगीत चलवाकर नाच-गा रही है, हमसे कह रही है कि गाय देखने चलो और हमें योगासन करके दिखा रही है। नीचे आप एक वीडियो देख सकते हैं, जिसमें वह डॉक्टर के पास हुए अपने अनुभव और थोड़ी सी गिनती, एक कहानी और भारत का राष्ट्रगीत सुना रही है।

यह नैसर्गिक बात है। यह एक बच्चे का प्रतिरक्षा तंत्र है जो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र से बहुत अधिक मजबूत होता है और इसके अलावा, यह एक बच्चे का, जिसे अपनी बेटी कहते हुए मैं फूला नहीं समाता हूँ, प्रसन्नचित्त स्वभाव है। हम आशा करते है और हमें विश्वास भी है कि खुजलाहट का आज आखिरी दिन होगा और कल से छाले सूखने शुरू हो जाएंगे और उसे आगे से अपने शरीर को खरोंचना नहीं पड़ेगा।