आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

अपरा के जन्मदिन के सिलसिले में बहुत से मित्र आश्रम आए थे और उन समान सोच-विचार वाले मित्रों के साथ एक बार फिर खुलकर बातचीत करना अत्यंत सुखद रहा! जब हम एक साथ बैठे हुए थे तो एक महिला मित्र ने, जिसका विवाह अभी एक साल पहले ही हुआ था, बताया कि उस पर न सिर्फ उसके परिवार और उसके सास-ससुर का बल्कि सामान्य रूप से सारे समाज का ही बड़ा ज़बरदस्त दबाव है। किस बात का? जल्द से जल्द गर्भवती होने का!

जी हाँ। भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है कि शादी के कुछ ही माह बाद- शादी, जो अक्सर परिवार द्वारा तय की हुई शादी होती है-हर व्यक्ति यह खुशखबर सुन लेता है: बच्चा होने वाला है! यहाँ यही चलन है, यही होना चाहिए और आपकी शादी का यही एकमात्र मुख्य उद्देश्य है! आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बच्चे, और जहाँ तक हो सके, लड़का, पैदा करें और परिवार की वंश वृद्धि सुनिश्चित करें और उसके कारोबार के लिए वारिस तैयार हो! आपके जीवन का यही मुख्य उद्देश्य है: जितना जल्दी हो सके, बच्चा पैदा करो!

उस मित्र ने बताया कि वह और उसका पति फिलहाल बच्चा न पैदा करके पर्याप्त खुश और संतुष्ट हैं और उसके स्थान पर एक दूसरे को जानते-समझते हुए और अपने संबंध को कुछ और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करते हुए कुछ वक़्त गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन भारत में यह विचार ही अत्यंत असामान्य विचार है। यहाँ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि बच्चे तो वह गोंद है या वह चुंबक है जो माता-पिता को एक-दूसरे से मज़बूती के साथ जोड़े रखता है! लेकिन जबकि वे इस तरह रहते हुए खुश हैं, उनका परिवार दुखी है! और वह महिला मित्र परिवार और दूसरे सब लोगों के इस दबाव से बहुत अप्रसन्न है!

एक और मित्र, जिसकी तीन साल की बच्ची उस वक़्त अपरा के साथ खेल रही थी, अपने साथ पेश आए इसी तरह के व्यवहार को याद करने लगी। उसकी सास हर माह उससे पूछती कि उसकी माहवारी रुकी या नहीं! यहाँ तककि बाद में उसने कैलेंडर पर उसकी माहवारी के दिनों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया और ठीक उन्हीं दिनों में उससे खबर दरियाफ्त करने लगी। जब उसे पता चलता कि माहवारी हो गई है और कम से कम इस माह वह गर्भवती नहीं होगी तो वह बहुत दुखी हो जाती!

क्या आपने कभी कल्पना की है कि किसी महिला को अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार पर कैसा महसूस होता होगा? उसे लगता होगा कि उस घर में वह सिर्फ प्रजनन की मशीन भर है, और कुछ भी नहीं! किसी को इससे कोई मतलब नहीं है कि वह खुद क्या चाहती है-आपके आसपास का सारा वातावरण यह सोचता है कि आपको भी बच्चे की चाहत होनी चाहिए। और सब के सब पूरी शिद्दत के साथ वह खुशखबर सुनने का इंतज़ार करते रहते हैं।

अगर कुछ माह या साल भर तक उस खबर की घोषणा नहीं होती तो अफवाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है: उन्हें बच्चा पैदा नहीं हो पा रहा है, कुछ न कुछ गड़बड़ है! कौन दोषी है? ज़रूर लड़की ही बाँझ होगी! अभी इलाज शुरू किया या नहीं? ऐसा तो नहीं कि लड़का सम्भोग में रुचि ही न लेता हो? कहीं वह समलैंगिक तो नहीं! इत्यादि, इत्यादि!

अफवाह फरोश पड़ोसी ऐसी बातों के इंतज़ार में ही होते हैं और रस ले-लेकर मुहल्ले भर में इस सामान्य बात को बहुत बड़े कलंक की तरह पेश करते हैं, जबकि वहाँ सिर्फ प्रकृति अपना खेल खेल रही होती है।

यह बेहद हास्यास्पद है कि हम महिलाओं से, और पुरुषों से भी, कहें कि उनका जीवन कैसा होना चाहिए और जीवन के किस बिंदु पर उन्हें क्या सोचना चाहिए, क्या इच्छा करनी चाहिए! समाज के लिए यह कतई स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता और न ही उस महिला के लिए या उस दंपति के लिए। क्योंकि क्या होगा यदि वे वास्तव में बच्चा पैदा न कर पाएँ? इस परिस्थिति पर दृष्टिपात करेंगे, कल…!

जब महिलाएँ अपने पति के विवाहेतर संबंधों को स्वीकार कर लेती है – 7 दिसंबर 2015

जब मैं जर्मनी में था, कुछ मित्र अपने मित्रों की कहानियाँ सुना रहे थे। उनमें से एक कहानी ने मुझे वैसी ही स्थितियों का सामना करने को मजबूर बहुत सी भारतीय महिलाओं के विषय में सोचने को विवश कर दिया। मैंने सोचा, आखिर दोनों में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है: वैवाहिक संबंधों में कुछ महिलाएँ अपने पतियों के विवाहेतर संबंधों को बड़ी सहजता के साथ स्वीकार कर लेती हैं-सुविधाजनक होने के कारण या फिर डर के मारे!

एक दोस्त ने मुझे बताया, एक महिला, जिसे वह बीस साल से भी ज़्यादा समय से जानता है, अपने पति के साथ काफी समय से अत्यंत असामान्य परिस्थितियों में रह रही है: उसका पति हफ्ते में लगभग एक बार उससे मिलने घर आता है। बाकी समय वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहता है। जब वह घर आता है तो सब कुछ ऐसा होता है जैसे वे दोनों सामान्य विवाहित पति-पत्नी हों: वह अपने गंदे कपड़े लेकर आता है और वह उन्हें धोती है, उस रोज़ वह एक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए खाना बनाती है और इस तरह वह एक सामान्य काम पर से घर लौटा हुआ पति होता है!

लेकिन वे एक साथ नहीं सोते-और कहानी के इसी बिंदु पर मुझे पूछना ही पड़ा: क्या पहले शुरू हुआ, अलग-अलग बिस्तरों पर सोना या गर्लफ्रेंड के साथ रहना? अलग-अलग बिस्तरों सोना पहले शुरू हुआ था! एक बार महिला ने अपने पति से कहा था कि वह भविष्य में उसके साथ यौन संबंध नहीं रखना चाहती। वह उसके साथ सोना नहीं चाहती थी और उसने पति के सामने यह विकल्प भी रखा कि यदि वह चाहे तो कहीं और जाकर अपनी यौन ज़रूरतें पूरी कर सकता है।

बहुत से कारण थे कि वे अलग नहीं हुए और मुख्य रूप से सिर्फ इसलिए कि यह बहुत आसान और सुविधाजनक था: वे अपने टैक्स और बैंक खाते एक रखे हुए थे, जिस तरह वह हमेशा से रहती आई थी, अब भी रह सकती थी और पति को उसकी स्वतंत्रता भी उपलब्ध हो गई। उनके संबंध अच्छे हैं, यानी बाकी सब कुछ ठीक है।

मेरे मन में तुरंत उन परिवारों का खयाल आया, जिनसे मिलने रमोना अक्सर उनके घर जाती रहती है-हमारे स्कूली बच्चों के घर, जहाँ अक्सर महिलाएँ ढोंग करती हैं, जैसे वे एक सामान्य, सुखी दाम्पत्य संबंध में बंधी हुई हैं जबकि वास्तव में उनके पति ज़ोर-शोर से विवाहेतर संबधों में मुब्तिला होते हैं। एक नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पति और पत्नी के बीच बेगानापन व्याप्त है और उनके बीच आन्तरिक संबंधो का लोप हो चुका है-लेकिन वे विवाह का भ्रम बनाए रखती हैं। दंपति के रूप में साथ जीवन बिताने का ढोंग, क्योंकि संबंध विच्छेद की तुलना में यह आसान और सुविधाजनक है और एक ऐसे समाज में जहाँ एकाकी महिला पर लोगों का कहर टूट पड़ता हो, निश्चित ही तलाकशुदा कहलाने से बहुत बेहतर!

मुझे समानताएँ नज़र आती हैं। मुझे लगता है, कुल मिलाकर दोनों स्थानों पर स्थिति एक जैसी है। इसी तरह चलाना अधिक सुविधाजनक है। साथ ही मैं यह फैसला नहीं दे रहा हूँ कि यह ठीक है या गलत है या कि यह एक देश के संदर्भ में सही और दूसरे की परिस्थितियों में गलत है! मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि मैंने दोनों में ये समानताएँ पाईं और उन्हें आपके सामने रख रहा हूँ।

मैं पथभ्रष्ट और अनैतिक हूँ क्योंकि मैं शादीशुदा हूँ, स्वामी कहलाता हूँ और सेक्स की बातें करता हूँ – 10 मई 2015

अपने एक ब्लॉग पर हाल ही में मुझे एक टिप्पणी प्राप्त हुई है, जिसका उस ब्लॉग से कोई संबंध नहीं था कि वह क्या लिखा है बल्कि इस बात से था कि मैं कौन हूँ: यानी वह व्यक्ति मेरे बारे में क्या सोचता है। और यह उसकी बातों से पूरी तरह स्पष्ट होता है। उसकी वह प्रबुद्ध टिप्पणी जस की तस नीचे दे रहा हूँ:

“आप पथभ्रष्ट व्यक्ति हैं; शादीशुदा व्यक्ति को खुद को स्वामी कहने का कोई हक़ नहीं है; आप अपनी वेबसाइट के नाम में ‘सियाराम’ शब्द का इस्तेमाल क्यों करते हैं? यह गलतफहमी पैदा करता है, आपके अधिकतर आलेख सेक्स से संबन्धित होते हैं”

जब कि मुझे डिगाने की ऐसी कोशिशों की तरफ ध्यान देने की ज़रूरत ही नहीं समझता, इसे पढ़कर तो मैं हँसे बगैर नहीं रह सका और सोचा कि इस बारे में अपने विचार आप लोगों के साथ साझा करूँ।

चलिए, सबसे पहले इस टिप्पणी का विश्लेषण किया जाए: मैं इस व्यक्ति की नज़र में पथभ्रष्ट क्यों हूँ? क्योंकि मैं शादीशुदा हूँ और ‘स्वामी’ कहलाता हूँ, जिसका, इस व्यक्ति की नज़र में, मुझे अधिकार नहीं है।

तो, इसका अर्थ है अगर मैं शादीशुदा हूँ और ‘स्वामी’ न कहलाऊँ, तो कोई दिक्कत नहीं होगी? शायद हाँ, तब मैं एक सामान्य पति होऊँगा, एक सामान्य व्यक्ति, जो रोज़ अपना ब्लॉग लिखता है।

अगर मैं स्वामी कहलाऊँ और शादीशुदा न होऊँ तब भी क्या आपको दिक्कत नहीं होगी? जी हाँ, क्योंकि तब मैं शायद दूसरे स्वामियों की तरह जीवन बिता रहा होऊँगा: तब मेरी सैकड़ों गर्लफ्रेंड्स होंगी, जहाँ जाऊँगा वहीं अपनी महिला अनुयायियों के साथ सो सकूँगा और जो मेरे साथ सोने के लिए राज़ी नहीं होंगी, उन्हें जबर्दस्ती या ब्लैकमेल करके सोने के लिए मजबूर कर सकूँगा। वे ‘स्वामी’ यह सब करते हैं और उनके सैकड़ों और हजारों अनुयायी यह सब जानते हुए भी इन अनैतिक बातों को सहजता से स्वीकार भी कर लेते हैं। उनके विरुद्ध कोर्टों में बलात्कार के प्रकरण चल रहे होते हैं और वे धर्म-गुरु कहलाते हैं, जब कि मुझे पथभ्रष्ट कहा जा रहा है क्योंकि मैं एक महिला से प्रेम करता हूँ और उसी से विवाह करने का फैसला किया? गजब! बढ़िया तर्क है, मानना पड़ेगा!

मैं अपने स्वामी होने और मेरी वेबसाइट का नाम ‘जयसियाराम’ क्यों है, इस बारे में अपने ब्लॉगों में बहुत पहले लिख चुका हूँ। इस प्रश्न का उत्तर मैं कई बार विस्तार से दे चुका हूँ। उसी को संक्षेप में कहना हो तो यह कि ‘स्वामी’ का अर्थ सिर्फ मालिक होता है। मेरे व्यक्तिगत अतीत के कारण यह नाम मुझे मिला है और मेरा मानना है कि मैं उसे अभी भी इस्तेमाल कर सकता हूँ क्योंकि मैं खुद अपना मालिक हूँ। कोई दूसरा मेरा मालिक नहीं है-मैं, मैं हूँ और मेरा हूँ!

और फिर ऊपर से मैं सेक्स पर लिखने की हिम्मत दिखाता हूँ!

मुझे लगता है कि यह इस व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या है। हाँ, मैं सेक्स पसंद करता हूँ और उसके बारे में बात करना भी। और मैं महसूस करता हूँ कि इस दक़ियानूसी समाज में, जहाँ सेक्स पर सैकड़ों प्रकार की पाबन्दियाँ हैं, यह मेरी ज़िम्मेदारी भी बनती है कि मैं बच्चों और दूसरे लोगों से उसके बारे में खुलकर बात करूँ। इस समाज में, जहाँ स्वामी और धर्मगुरु हर जगह सेक्स कर सकता है, कई औरतों से यौन संबंध कायम कर सकता है लेकिन जहाँ सेक्स पर खुलकर बात करना अच्छा नहीं माना जाता।

फिर, जैसा उस व्यक्ति का खयाल है, मैं अधिकतर सेक्स पर ही नहीं लिखता। और इसी बात से मैं अपने जवाब का समापन करना चाहूँगा: मेरा मानना है कि वास्तविक पथभ्रष्ट मैं नहीं हूँ। पथभ्रष्ट वह है, जो हर जगह सिर्फ सेक्स देखता है और उसी के बारे में पढ़ता है और फिर सोचता है कि मेरे ‘अधिकांश ब्लॉग’ सेक्स पर ही लिखे गए हैं, जब कि मेरे कुल 2694 ब्लॉगों में से सिर्फ 60 ब्लॉग ही ऐसे हैं, जिन्हें ‘सेक्स’ की श्रेणी में रखा गया है।

भारत में विवाह पवित्र बंधन है इसलिए पति के द्वारा किया गया जबरन सम्भोग बलात्कार नहीं – 6 मई 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ जो सामान्यतः हमारे समाज में चर्चा का सबसे सदाबहार विषय होता है और मैं भी इस पर अपने ब्लॉग में अक्सर लिखता रहता हूँ: भारत में महिलाओं की स्थिति। आज पुनः इस विषय पर लिखने का कारण सरकार के एक मंत्री का वह बयान है, जिसमें उसने कहा है कि भारतीय संस्कृति में विवाह के अंतर्गत बलात्कार के विचार का कोई अस्तित्व नहीं है। अगर यह सच है तो क्या इससे अच्छी कोई बात हो सकती है?

इस मूर्खतापूर्ण वक्तव्य तक हम कैसे पहुँचे, मैं बताता हूँ: संयुक्त राष्ट्र के जनगणना कोष के अध्ययन का हवाला देते हुए एक महिला संसद सदस्य ने कहा कि भारत में 75% विवाहित महिलाओं के साथ उनके पतियों द्वारा बलात्कार किया जाता है। सदस्य ने सरकार से पूछा कि इस बारे में वह क्या कार्यवाही करने जा रही है।

सत्ताधारी पार्टी के एक मंत्री का जवाब यह था कि यह विचार पश्चिम से आया है और भारत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 'यह विचार हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है!' क्योंकि भारत में, उनके मुताबिक, विवाह एक पवित्र ईश्वरीय विधान और मांगलिक संबंध माना जाता है और भारतीयों की धार्मिक आस्थाओं और संस्कृति के कारण ऐसे कुकृत्य होते ही नहीं हैं।

निश्चित ही आप इस वक्तव्य पर स्तब्ध रह गए होंगे! मैं आपको बताना चाहता हूँ कि भारत में हम लोग एक धर्म समर्थक सरकार से, जो भारत की प्राचीन संस्कृति को बचाए रखने के एजेंडे पर काम कर रही है, इससे बेहतर वक्तव्य की अपेक्षा ही नहीं करते! फिर भी एक भारतीय के रूप में हमारे नेताओं की विचारशून्यता और कुबुद्धि पर सोच-सोचकर हैरान रह जाता हूँ जो ऐसी घटिया और हास्यास्पद बातें ज़बान पर लाते हैं!

हमारी प्राचीन संस्कृति में तलाक़ की कोई अवधारणा मौजूद ही नहीं है। तलाक़ शुरू ही हुआ, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई और संविधान बना। हिन्दू कोड बिल में तलाक़ का प्रावधान किया गया और महिलाओं के अधिकारों को दर्ज किया गया। उसके बाद ही एक पत्नी के होते हुए दूसरी महिला के साथ विवाह को गैरकानूनी घोषित किया गया। इसका ज़ोरदार विरोध हुआ, तर्क दिए गए कि पति को छोड़ना यानी तलाक़ लेना हिन्दू संस्कृति के विरुद्ध है क्योंकि हिन्दू धर्म के अनुसार दंपत्ति सात जन्मों के लिए विवाहबद्ध होते हैं। विरोध करने वालों का कहना था कि ऐसे क़ानून हमारी पवित्र और दिव्य हिन्दू धार्मिक संस्कृति को नष्ट कर देंगे।

मुझे लगता है, मंत्री महोदय यह भी भूल गए कि अतीत में हमारी इस महान संस्कृति में पति के मरने के बाद उसकी विधवा को पति के साथ ज़िंदा जला देने की परंपरा थी, जिससे वह पुनर्जन्म लेकर पुनः उसी व्यक्ति की पत्नी बन सके। राजा राममोहन रॉय के प्रयत्नों से इस घृणित परंपरा को क़ानून बनाकर समाप्त किया गया-हालाँकि, उसके बाद भी कई सालों तक हिन्दू संस्कृति के झंडाबरदारों ने इस परंपरा का त्याग नहीं किया क्योंकि वे सोचते थे कि यह क़ानून उनकी संस्कृति को नष्ट कर देगा।

उस समय हिन्दू धर्म में पुरुषों को कई पत्नियाँ रखने की आज़ादी थी और मंदिरों में पुरोहितों, पुजारियों और धर्मगुरुओं की यौनेच्छाओं की पूर्ति के लिए धार्मिक वेश्याएँ रखी जाती थीं, जिन्हें देवदासी कहा जाता था!

यह सब एक समय हमारी संस्कृति थी। आप हमारे समाज की हालत समझ सकते हैं, इस देश की परम्पराओं और इतिहास पर उनके विश्वासों को समझ सकते हैं! और भारतीय इतिहास के हर कालखंड में हिन्दू धर्म ने महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा है। उनकी हैसियत किसी वस्तु से बढ़कर नहीं रही है, वे सिर्फ उपभोग की और बच्चे जनने की मशीने भर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र कह सकता है कि भारत में 75% शादीशुदा महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं और इसे अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन हमारी राष्ट्रवादी, धार्मिक सरकार इस बात से सहमत नहीं है क्योंकि 'यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध' है! जी हाँ, इस देश में स्त्रियों को उनकी औकात दिखाने के लिए पुरुष उन पर बलात्कार करते हैं, यह दर्शाने के लिए कि देखो, तुम कमज़ोर हो! और महिलाओं को बलात्कार की शिकायत ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो दोष उसी का होता है-वे अनुपयुक्त कपड़े पहनकर या अपने अनुचित व्यवहार से पुरुषों को बलात्कार के लिए आमन्त्रित करती हैं! अगर आप महिलाओं के प्रति कुछ अधिक दरियादिल हैं, उनके प्रति दया दिखाना चाहते हैं तो आप उनके कपड़ों या व्यवहार पर भले ही टिप्पणी न करें मगर कहेंगे कि 'कभी कभी लड़कों से युवावस्था के जोश में गलती हो ही जाती है', जैसा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के पिता मुलायम सिंह ने कुछ समय पहले कहा था।

परंपरागत भारतीय संस्कृति में एक महिला अपने पति की मिल्कियत होती है। अपनी पत्नी पर उसका सम्पूर्ण अधिकार होता है। महिलाओं को यह शुरू से ही पता होता है। पुरुष अपनी लड़कियों को अनजान लड़कों की तरफ देखने या बात तक करने से मना करते हैं। उनका कन्यादान होता है, विवाह के समय उसे अनजान व्यक्ति को दान कर दिया जाता है और एक ऐसे व्यक्ति के साथ सोने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, जिसे वह जानती तक नहीं होती। क्या बलपूर्वक किया गया यह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) किसी बलात्कार से कम है?

लेकिन नहीं, विवाह के पश्चात् पति द्वारा पत्नी के साथ बिना सहमति के सम्भोग करना भारत में बलात्कार नहीं माना जाता। निश्चय ही संयुक्त राष्ट्रसंघ गलत होगा। शिकायत करने वाली हर महिला गलत होगी।

पति, पत्नी और प्रेमी तथा उनकी समस्या सुलझाने वाले दस लोग – 8 अप्रैल 2015

पिछले कुछ समय से मैं धोखेबाज़ दंपत्तियों के बारे में लिखता रहा हूँ और उसमें मैंने ज़िक्र किया है कि आजकल विवाह के बाहर सेक्स संबंध बहुत आम हो चुके हैं। पश्चिम में भी यह होता है लेकिन निश्चित ही पश्चिम में यह नहीं होता कि कई लोगों का पूरा समूह आपके यहाँ इकट्ठा होकर आपकी सारी वैवाहिक समस्याएँ सुलझाने लगें!

जी हाँ, यह मैं गंभीरता पूर्वक कह रहा हूँ-भारत में ऐसा होता है। जब परिवार में कोई मामला सामने आता है तो कुछ बुजुर्ग या दूसरे आदरणीय लोग इकट्ठा होकर समस्या का हल ढूँढ़ते हैं। शायद आप सोच रहे होंगे कि यह ग्रामीण इलाकों में होता होगा लेकिन ऐसा नहीं है। यह सिर्फ दूरदराज़ के ग्रामीण इलाकों में ही नहीं बल्कि वृन्दावन जैसे शहरों में भी होता है!

दरअसल, पूर्णेन्दु को भी ऐसे मामलों में सादर निमंत्रित किया जाता है। जब किसी परिवार या कोई दंपत्ति के सामने कोई समस्या पेश आती है और वह आसपास के लोगों को पता चलती है तो लोग समझते हैं कि यह एक सामाजिक कार्य है। सामान्य भारतीय की यह फितरत होती है कि वह दूसरों की मदद करने की कोशिश करता है-और गोपनीयता के बारे में बहुत से भारतीयों की समझ पश्चिमी समझ से बहुत अलग है। अपनी गोपनीयता को लेकर और दूसरों की गोपनीयता को लेकर भी। जब दूसरे किसी व्यक्ति का कोई मसला सामने आता है तो वे खोद-खोदकर सारी और सही-सही जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। इससे आप कल्पना कर सकते हैं कि वे दूसरों को सलाह देने में भी कोई संकोच नहीं करते!

लेकिन अजीब बात है कि यह बहुत से लोगों के मामलों में काम कर जाता है!

जैसा कि आप अब तक जान गए होंगे, वास्तव में तलाक़ कभी भी विकल्प नहीं होता। दंपत्ति लड़ते रहेंगे, आप कल्पना नहीं कर सकते कि पहले से अधिक लड़ेंगे और खुले आम, सबके सामने लड़ेंगे लेकिन अलग होने का ख्याल भी उनके दिल में नहीं आएगा! मगर इस समस्या का कोई न कोई समाधान तो निकालना ही होगा। तो हर समाज में या आसपास कुछ सम्माननीय लोग होते हैं, उनके बुज़ुर्ग या शहर या कस्बे के पुराने बाशिंदे, जैसे पूर्णेन्दु, जिसे अक्सर ऐसी मीटिंगों में बुलाया जाता है।

ये सब लोग साथ बैठते हैं और सभी एक के बाद एक अपने-अपने नज़रिए से समस्या पर विचार रखते हैं। अंत में वे किसी एक निदान पर एकमत होकर या, आवश्यकता पड़ने पर वोटिंग करके, कोई न कोई समाधान प्रस्तुत करते हैं। यह लाइव टॉक शो जैसा होता है और स्वाभाविक ही, मामले के संपर्क में आने वाले सभी लोगों का मनोरंजन भी!

लेकिन ये समाधान विचित्र और आश्चर्यजनक हो सकते हैं और किसी किताब से बढ़कर समाज का आईना प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, एक पुरुष, उसकी पत्नी और उसकी प्रेमिका वाले एक मामले के निपटारे हेतु विचार-विमर्श और मध्यस्थता करने जब कुछ और लोगों के साथ पूर्णेंदु एक मीटिंग में शामिल हुआ। पुरुष ने एक नया घर बनवाया था और जब वह पूरा हो गया तो वहाँ निचली मंज़िल पर उसने अपनी दुकान स्थानांतरित कर ली और सबसे ऊपरी मंज़िल पर अपने परिवार के साथ रहने भी लगा! इतना ही नहीं, उसने अपनी प्रेमिका को भी पहली मंज़िल यानी बीच वाली मंज़िल पर रहने के लिए निमंत्रित कर लिया! स्वाभाविक ही, उसकी पत्नी को यह योजना पसंद नहीं आई…और इससे वह भड़क उठा क्योंकि उसने तो पूरा मकान ही इसी इरादे से और इसी योजना को मद्देनजर रखते हुए बनवाया था! और इसके अलावा, उसकी प्रेमिका उससे पैसों की मांग भी करने लगी, आखिर वह भी तो पिछले दस साल से लगातार उसके साथ सोती रही थी!

मीटिंग के गणमान्य सभासदों ने निर्णय किया कि घर की शांति के लिए यह अच्छा होगा कि उसकी प्रेमिका उन लोगों के साथ एक ही मकान में न रहे। तो प्रेमिका को वह विशाल और आरामदेह फ्लॅट मिल गया जहाँ परिवार पहले रहा करता था-और पुरुष को अपनी पत्नी से वादा भी करना पड़ा कि प्रेमिका के ज़ेवरों पर किए गए खर्च के बराबर रकम वह उसे भी अदा करेगा!

समझौते का बढ़िया तरीका? है न?

तलाक विकल्प नहीं है, तब भी नहीं जब पति और पत्नी सिर्फ पराई स्त्री या पराए मर्द के साथ सेक्स सम्बन्ध रखते हों! 6 अप्रैल 2015

पिछले सप्ताह सेक्स पर लिखते हुए मैं लगातार बताता रहा हूँ कि सेक्स को लेकर दम्पतियों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा खुलापन होना चाहिए। दुर्भाग्य से पिछले हफ्ते ही एक उदाहरण मेरे सामने आया कि कैसे लोग सेक्स को लेकर कुछ ज़्यादा ही खुले होते हैं: वे आपस में एक दूसरे को ही धोखा दे रहे हैं! यहाँ आकर पुनः हमारा सामना भारत की जटिल मगर चिरपरिचित समस्या, अरेंज्ड मैरेज (प्रायोजित विवाह) से होता है।

आजकल मैं देखता हूँ कि बड़ी संख्या में पुरुष अपनी पत्नियों के साथ और महिलाएँ अपने पतियों के साथ धोखा करते हैं! यह एक तथ्य है। हमारे आसपास ही इतने सारे मामले देखने में आते हैं कि मुझे इसके उदाहरण ढूँढ़ने कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं है। पिछले हफ्ते हमें ऐसे ही एक दंपति के बारे में पता चला है।

पुरुष और महिला, दोनों ही हमारे आश्रम के कर्मचारी रहे हैं और अब किसी और आश्रम में काम करते हैं। यह पुरुष लंबे समय से अपनी पत्नी के साथ धोखा करता आया था। पहले भी हमने सुना था और हम जानते थे कि घर में इसी कारण वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं लेकिन इस विषय में हमने उनसे पूछताछ नहीं की थी क्योंकि कोई भी 'सामान्यतया' दूसरों के साथ ऐसी बातें करना पसंद नहीं करता-लेकिन सिर्फ 'सामान्यतया'।

इस शब्द पर मैं ज़ोर दे रहा हूँ क्योंकि अब यह बात छिपाना संभव नहीं रह गया है। जिस आश्रम में वे काम कर रहे थे, उस आश्रम और उसका झगड़ा अब सड़क पर आ गया है क्योंकि वह आश्रम के कुछ धनाढ्य मेहमानों के साथ भी सेक्स करने लगा था। जैसी कि आप कल्पना कर रहे होंगे यह बात किसी को भी नागवार गुज़रेगी और निश्चित ही अब वे वहाँ के रोजगार से हाथ धो बैठेंगे।

स्वाभाविक ही इस विवाद से उनके घर में भी कोहराम मच गया, बीबी यह कहकर लड़ने-झगड़ने लगी कि क्यों वह अपने जननांग को काबू में नहीं रख पाता। वह उस आश्रम का काम छोड़ने की ज़िद कर रही है क्योंकि वहाँ पति को सुहुलियत है कि वहां वह दूसरी औरतों के साथ यौन संबंध रख सके!

लेकिन उसकी बात सुनकर वह बेशर्मी से हँसने लगा। यह उसके लिए कोई धमकी नहीं थी, जैसा कि उसने पत्नी से कहा भी। जो भी उसे समझाने जाता या इस विषय में बात करता उसे भी वह हँसकर टाल देता! वह बेधड़क कहता, हम कहीं भी चले जाएँ, मेरे लिए औरतों की कोई कमी नहीं है!

यहाँ मैं एक मज़ेदार खुलासा करना चाहता हूँ: सिर्फ वही अपनी पत्नी को धोखा नहीं दे रहा है! पत्नी भी उसे धोखा दे रही है!

उनके यहाँ और भी कई समस्याएँ हैं, जिनमें पत्नी के साथ घरेलू हिंसा से लेकर पति का जुआ खेलना और खासा रुपया उसमें बरबाद करना भी शामिल है। लेकिन आज मैं उनकी व्यक्तिगत समस्याओं पर लिखना नहीं चाहता- मैं आपका ध्यान सेक्स के कारण होने वाली तबाही की ओर खींचना चाहता हूँ: दरअसल वे आपस में प्यार ही नहीं करते। उनके आपस में यौन संबंध नहीं हैं। साथ रहकर वे कतई खुश नहीं हैं। वे साथ रहते हैं तो सिर्फ एक कारण से: क्योंकि वे शादीशुदा हैं। वे शादीशुदा क्यों हैं? क्योंकि उनके अभिभावकों ने आपस में उनकी शादी करवा दी।

और अब उन्हें इस शादी को ज़िंदगी भर ढोना है-लड़ते-झगड़ते, आपस में मार-पीट करते, एक-दूसरे के साथ बेईमानी करते हुए। इसके कारण वे नौकरी छोड़ने की बात करते हैं, कहीं और जाकर रहने की बात करते हैं लेकिन एक बार भी अलग होने की, तलाक लेने की बात नहीं करते, बल्कि सोचते तक नहीं! क्योंकि बाहरी व्यक्ति के लिए सबकुछ ठीकठाक दिखना चाहिए!

इस मामले में बाहरी व्यक्ति कोई भी वह व्यक्ति हो सकता है, जिससे वे कभी मिले तक न हों क्योंकि उन्हें जानने वाले तो अब सभी जानते कि उनके घर की क्या हालत है, उनके आपसी संबंध कैसे हैं!

मैं एक बार और दोहराना चाहता हूँ: यह बहुत असाधारण या अनोखी परिस्थिति नहीं है! ऐसे न जाने कितने मामले सामने आते रहते हैं और मैं समझता हूँ कि इस समस्या की जड़ में अरेंज्ड मैरेज यानी प्रायोजित विवाह और सेक्स को लेकर भारतीय समाज में व्याप्त कई तरह की वर्जनाएँ हैं।

धार्मिक और सामाजिक कारण, जिनके चलते भारतीय महिलाएँ अत्याचारपूर्ण संबंधों में बंधी रहती हैं – 2 दिसंबर 2014

कल मैंने एक स्कूली लड़की की माँ के बारे में बताया था, जो अपने पति को छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, इसके बावजूद कि वह खुद पैसे कमाती है और उसका पति उसे मारता-पीटता है। मैं इस विषय पर और विस्तार से लिखना चाहता था कि क्यों भारतीय महिलाएँ, उनके घर के अत्याचारी और कई बार अकल्पनीय रूप से हिंसक माहौल के बावजूद, अक्सर अपने पति और परिवार के साथ ही बंधी रहती हैं।

जैसा कि मैंने ज़िक्र किया था, सामान्यतः आर्थिक सुरक्षा इसका एक प्रमुख कारण है। बहुत सी महिलाएँ पढ़ी-लिखी नहीं होतीं, कभी घर से बाहर निकलकर कोई काम नहीं किया होता और इसलिए अक्सर उनकी अपनी कोई आमदनी नहीं होती। स्वाभाविक ही, उन्हें यह एहसास होता है कि वे अपना भरण-पोषण खुद नहीं कर सकतीं, अपने बच्चों का खर्च उठाना तो दूर की बात है!

दूसरा, और मेरे विचार में ज़्यादा महत्वपूर्ण कारण है, तलाक को लेकर भारतीय समाज का दकियानूसी रवैया। तलाक किसी भी महिला के लिए भयानक होता है। पहले एक जीवनसाथी का होना, फिर अचानक उसका न होना। अक्सर तलाक के लिए महिला को ही दोषी ठहराया जाता है, पुरुष को नहीं। भले ही वह कहती रहे कि उसका पूर्व-पति शराबी था, उसके साथ मार-पीट करता था, लोगों की प्रतिक्रिया यही होती है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, अर्थात उसने भी कुछ न कुछ गलत बात की होगी और इसी कारण वह उस पर हाथ उठाने पर आमादा हुआ, जोकि, स्वाभाविक ही, उसका अधिकार है। दुर्भाग्य से भारत में घरेलू हिंसा आज भी इतनी सामान्य और सर्वव्यापी है कि लोगों को इन बातों पर कोई अचरज भी नहीं होता!

दुखद, अपमानजनक और अत्याचार पूर्ण सम्बन्ध में बने रहने का एक और कारण धर्म है। जी हाँ, मेरे विचार से हर धर्म दंपत्तियों से और विशेष रूप से महिलाओं से कहता है कि दांपत्य एक पवित्र बंधन है। कि तुम्हें अपने पति या पत्नी की देखभाल करनी चाहिए। महिलाओं के मामले में यह भी कि उसका भला-बुरा, सब कुछ अपने पति पर निर्भर है। कि तुम्हें पति की आज्ञा का पालन करना ही होगा।

हिन्दू धर्म में स्त्रियों के लिए पति को छोड़ना पाप माना जाता है। विवाह दैवी कार्य है और आपसे इस बात की अपेक्षा नहीं की जाती कि आप इस पवित्र बंधन को तोड़ेंगे, जो कि ईश्वर की ओर मिली नेमत है। सच तो यह है कि जब आप हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह करते हैं तो सिर्फ इस जन्म के लिए नहीं करते बल्कि अगले सात जन्मों के लिए विवाह बंधन में बंधे रहते हैं!

जब मैंने रमोना को यह बताया तो उसने रूखे स्वर में उत्तर दिया: 'तो क्या हुआ? हो सकता है यह उनका सातवाँ जीवन हो? और मैं हँसे बगैर न रह सका। बिल्कुल, सही बात है, आप कैसे जान सकते हैं?

इस धर्मप्रधान देश में, जहाँ बहुसंख्यक लोग परम्पराओं और पुराने रीति-रिवाजों पर बहुत ज़ोर देते हैं और अपने तरीके से अपना जीवन ‘मर्यादा' के साथ जीते हैं, अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत महिला को सराहना नहीं मिलती। एक महिला, जो अपने विवाह को बर्बाद करने पर तुली हो, जो अपने बच्चों को उनके पिता से दूर कर रही हो या जो परिवार के लिए शर्मनाक स्थितियाँ पैदा कर रही हो, उसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

या उस महिला को जो स्वाभिमानी हो, जो अपने शरीर, मस्तिष्क और भावनाओं सहित अपने जीवन का आदर करती हो। जो आईने में बिना आँसू बहाए झाँक सकती हो। जो इतनी मजबूत हो कि खुद पर आने वाली हर मुसीबत का सामना कर सकती हो और जो उसे सही लगता हो, अपनी मर्ज़ी से कर सकती हो। अपनी और अपने बाल-बच्चों कि सुरक्षा कर सकती हो।

अपने आत्मसम्मान के लिए उठ खड़े हों और पुनः अपने जीवन की लगाम खुद अपने हाथ में ले लें। आप कर सकते हैं-और, हालांकि बहुत से लोग आपके विरुद्ध होंगे, आपके साथ खड़े होने वाले भी कम नहीं होंगे!

जब हमने एक नाबालिग लड़की का विवाह रोकने में सफलता पाई – 10 अप्रैल 2014

पिछले दिनों हमारे स्कूली बच्चों के घरों में हुए अपने सामान्य अनुभवों की जानकारी देने और उसके बाद भारत में लड़कियों और महिलाओं की हालत का ज़िक्र करने के बाद आज मैं एक और समस्या पर चर्चा करना चाहता हूँ: लड़कियों का बाल-विवाह। अपने स्कूल की एक लड़की के उदहारण से मैं अपनी बात स्पष्ट करूंगा: लड़की का नाम है पूजा।

पिछले हफ्ते हमारी एक शिक्षिका के पास तीसरी कक्षा में पढने वाली एक लड़की आई। पंद्रह साल की उस लड़की ने अपनी शिक्षिका से कहा कि स्कूल में यह उसका आखिरी साल है और अगले साल नया सत्र शुरू होने पर वह स्कूल नहीं आएगी। कारण पूछने पर लड़की ने बताया कि कुछ महीनों के भीतर ही उसके माता-पिता उसका विवाह कर देना चाहते हैं।

तीन दिन बाद रमोना और पूर्णेंदु उसके घर के सामने खड़े थे। वैसे भी वे दोनों पूजा के घर कई बार हो आए थे मगर सारे बच्चे उन्हें कभी घर पर नहीं मिले कि वे उनका वीडिओ बना पाते। इत्तफाकन इस बार सारा परिवार घर पर मौजूद था। पूजा उनकी तीसरे नंबर की बेटी है और उससे छोटा एक भाई और दो छोटी बहनें और हैं। उसकी दो बड़ी बहनों का विवाह पहले ही हो चुका है और दोनों के दो-दो बच्चे हैं।

इस प्रश्न पर कि क्या वे इस साल पूजा का विवाह करने की योजना बना रहे हैं, उसके अभिभावकों ने स्पष्ट, दोटूक स्वर में कहा कि 'हाँ'। उसके बाद पूर्णेंदु ने पूजा से पूछा कि क्या वह भी विवाह करना चाहती है और उसका उत्तर था: 'मैं वही करूंगी, जो मेरे माँ-बाप मुझसे करने के लिए कहेंगे'। उसके बाद जो हुआ वह बहुत लम्बा वाद-विवाद था, जिसमें पूर्णेंदु ने उन्हें विस्तार के साथ बताया कि क्यों इस साल पूजा का विवाह करना उचित नहीं है।

सबसे पहले उसने कानूनी कारण बताए: अठारह साल की उम्र से पहले किसी के साथ भी लड़की का विवाह करना गैरकानूनी है। इस तर्क का उन पर कोई असर दिखाई नहीं दिया-हालाँकि वे थोड़ा बेचैन जरुर हो गए। तब उसने पूछा कि क्या पूजा को पढ़ाने में उनका कोई खर्च होता है, जिसे वे उसकी शादी करके बचाना चाहते हैं। उनका जवाब था: नहीं, क्योंकि वह हमारे स्कूल में पढ़ती है, जहाँ उनसे एक रुपया भी वसूल नहीं किया जाता। अंत में उसने कहा कि पूजा अगर पढ़ लेती है तो भविष्य में उसे इस पढ़ाई का लाभ मिल सकता है। यह भी कि उनके जैसे कमज़ोर तबके की लड़कियां भी आजकल सफल व्यापारी बन रही हैं और सिर्फ अपनी ही नहीं बल्कि सारे परिवार की मदद कर रही हैं। इसके अलावा पढ़ाई-लिखाई इस बात की भी ज़मानत है कि वह चाहे तो पैसा कमाने के लिए कोई रोज़गार कर सकती है, नौकरी कर सकती है-क्योंकि कोई कुछ नहीं कह सकता कि भविष्य के गर्त में क्या छिपा है।

अंततः वे पूजा की पढ़ाई जारी रखने के लिए राजी हो गए। अभिभावकों के इस निर्णय के बाद पूजा के चेहरे पर आई संतोषपूर्ण मुस्कान देखते ही बनती थी। दरअसल विवाह के लिए यह बहुत कम उम्र है-मगर गरीब परिवारों में यह कभी-कभार होने वाला बिरल बात नहीं है। हम अक्सर किशोरवय लड़कियों को गोद में बच्चा लिए देखते हैं: बच्चा, जो उनके छोटे सहोदर जैसा लगता है मगर उनका खुद का बच्चा होता है!

वयस्क होने से पहले ही इन लड़कियों को जिन अनुभवों से गुज़रना पड़ता है, जिन उत्तरदायित्वों का बोझ उन्हें ढोना पड़ता है और जिन भावनात्मक और मानसिक उत्पीड़न से वे गुजरती हैं, उनके बारे में सोचना भी बेहद कष्टकारी है।

हमें खुशी है कि कभी-कभी अपना विवाह रुकवाने में हम उन अल्पवयस्क लड़कियों की मदद कर पाते हैं, जैसा कि पूजा के प्रकरण में हम कर पाए।

हमें पता है कि यही उद्देश्य लेकर अगले साल हमें पुनः इस परिवार के पास जाना पड़ सकता है। लेकिन इस समय हम खुश हैं कि हम पूजा को पढ़ाई का एक और साल मुहैया करा सके।

हनीमून पर निकले ब्लॉग पढ़ने वाले नव-दंपति से आश्रम में शानदार मुलाक़ात! 10 फरवरी 2014

आज आश्रम से एक दंपति की बिदाई हुई, जो एक तरह से हमारे लिए एक खास दंपति थे: यह पहले दंपति थे, जिनके लिए हमने हनीमून की पूरी व्यवस्था की! उनके लिए पूरा कार्यक्रम तैयार करके आश्रम में उनकी अगवानी करना हमारे लिए बड़ी खुशी का बायस था, विशेषकर इसलिए कि वे मेरे ब्लॉगों के जरिये हमें पहले से जानते थे।

हमारे युवा मित्र, विनय और उनकी पत्नी, शुभा दक्षिण भारत के शहर बैंगलोर के रहने वाले हैं, जहाँ वे एक अंतर्राष्ट्रीय आईटी कंपनी में कार्यरत हैं। वहीं उनका परिचय हुआ और दोनों आपस में प्रेम करने लगे। दो साल तक उन्होंने साथ में काम किया और आखिर इसी जनवरी में उनका विवाह हो गया। पिछले साल जब उन्होंने हमसे पूछा कि क्या हम उनके हनीमून का इंतज़ाम कर सकते हैं तो हम बड़े खुश हुए और हमने उत्तरी भारत के ठंडे मगर खुशनुमा इलाकों में उनके लिए एक हनीमून यात्रा आयोजित की, जहाँ वे जीवन में पहली बार बर्फ़बारी का लुत्फ़ उठा सकते थे।

हमने उन्हें सलाह दी कि हिमायल की सैर करने के बाद वे हमारे आश्रम होते हुए दिल्ली के लिए रवाना हों, जहां से उन्हें वापसी के लिए हवाई जहाज पकड़ना था। यहाँ से वे आसानी के साथ आगरा जाकर प्रेम की सबसे महानतम निशानी, ताजमहल को देख सकते हैं और हमारे यहाँ आयुर्वेदिक मालिश का आनंद भी उठा सकते हैं।

जब वे अपनी हनीमून यात्रा से वापस आए और हमें चर्चा का मौका मिला तब मुझे पता चला कि कितनी संजीदगी से वे मेरे ब्लॉग पढ़ते रहे हैं! कुछ देर हम विभिन्न विषयों पर बातें करते रहे, उनके और अपने जीवन के विषय में चर्चा हुई और मुझे महसूस हुआ कि यह कितनी सुखद बात है कि आज मैं उन लोगों को जान पा रहा हूँ जो मुझे, मेरे परिवार को और जीवन की महत्वपूर्ण बातों पर मेरे नज़रिये को बहुत पहले से जानते रहे हैं।

उसके लिए जीवन में यह पहला मौका था जब लगातार दो घंटे तक वह किसी का ब्लॉग पढ़ता रहा था, एक-एक प्रविष्टि को क्लिक करके विभिन्न विषयों पर मेरे विचार पढ़ता रहना और उन पर गंभीरतापूर्वक विचार करना। लड़की ने बताया कि वे दोनों रोज़ ही मेरे ब्लॉग पढ़ते और उनमें से कुछ पसंदीदा अंशों को कॉपी-पेस्ट करके अपने-अपने प्रिय कोटेशन्स के रूप में एक दूसरे को भेजते रहते थे।

इन युवा दंपति ने मुझे बताया कि मैं उनसे मिल रहा हूँ जिन्हें मैंने अपने लेखन से प्रभावित किया था। उनके लिए यह अकल्पनीय था कि वे एक दिन रात दस बजे तक बैठकर अपने प्रिय ब्लॉग-लेखक के साथ सुखद चर्चा में निमग्न रहेंगे, उस लेखक के साथ, जिसकी पंक्तियाँ वे रोज़ ही पढ़ा करते थे। मेरे लिए तो यह पुनः इस महान आधुनिक मीडिया, इंटरनेट आदि का पुनरोद्घाटन जैसा ही था, जो संसार भर के लोगों को आसानी के साथ एक दूसरे से जुड़ने की सुविधा मुहैया कराता है।

आज उन्होंने आश्रम से बिदा ली है लेकिन हम सब आश्रमवासी इस नव-दंपति के लिए अशेष शुभकामनाएँ व्यक्त करते हैं कि उनके जीवन में प्रेम सदा-सदा के लिए बना रहे!

अपने अरेंज्ड मैरेज के विषय में वर और वधु कैसा अनुभव करते हैं? 2 दिसंबर 2013

पूरे पिछले हफ्ते मैं भारतीय विवाहों के विषय में लिखता रहा हूँ। संदर्भ था: भारतीय विवाहों में आमंत्रित किए जाने पर पश्चिमी लोगों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और अपने सम्मोहक और भड़कीले विवाह में वर और वधू की भूमिका! लेकिन अभी भी एक प्रश्न बचा रह गया है, जो पश्चिमी लोग यह पता चलने पर पूछते हैं कि विवाह अरेंज्ड था:

9) नव विवाहित दंपति इस विषय में क्या सोचते हैं? वे ऐसे अरेंज्ड विवाह से खुश होते हैं या दुखी?

स्वाभाविक ही यह प्रश्न जायज है क्योंकि उनके चेहरे देखकर आप समझ नहीं सकते कि वे सचमुच खुश हैं या संध्या-समारोह में सकुचाते, मुसकुराते हुए सिर्फ अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं! उनसे अपेक्षा है कि वे राजकुमार और राजकुमारी जैसे नज़र आएँ। दूल्हा गंभीर और गौरवान्वित दिखाई दे और दुल्हन शर्मीली और अपने परिवार से बिदा होने के दुख में, स्वाभाविक ही, थोड़ी गमगीन। लेकिन सवाल यह है कि उनकी वास्तविक भावनाएँ क्या हैं, इस विवाह से वे कैसा महसूस कर रहे हैं?

निश्चय ही इस पर कोई सामान्य टिप्पणी करना मुश्किल है कि कोई व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है क्योंकि इस विवाह के पीछे हजारों कहानियाँ हो सकती हैं। ऐसे अरेंज्ड विवाहों से अनजान और अनभ्यस्त विदेशियों की यह आम प्रवृत्ति होती है कि वे दंपति को इस विवाह से असंतुष्ट और दुखी समझ बैठते हैं। यह आवश्यक नहीं है और अधिकतर ऐसा नहीं होता कि वर और वधू दुखी ही हों।

एक पारंपरिक परिवार में एक युवा व्यक्ति पहले से जानता है कि उसका विवाह अरेंज्ड ही होना है। इस नियति को न सिर्फ वे खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं बल्कि बचपन से उसका इंतज़ार भी कर रहे होते हैं! वे फिल्मों में नायक और नायिका को आपस में मिलते हुए और लंबे प्रेम-प्रसंग के पश्चात आपस में विवाह करते हुए देखते हैं मगर उन्हें अपना खुद का जीवन बहुत अलग जान पड़ता है: अभिभावक अपनी लड़कियों को हमउम्र लड़कों से दूर रखते हैं, विवाह से पहले दूसरे लड़कों के साथ घूमना-फिरना सामाजिक रूप से अस्वीकार्य होता है और अगर कोई लड़की किसी लड़के से मिलते-जुलते पाई जाती है और उसके साथ हँसते-खिलखिलाते (प्रसन्न) दिखाई देती है तो यह अभिभावकों के लिए शर्म की बात मानी जाती हैं।

व्यक्तिगत संबंध इस समाज में सामान्य नहीं हैं, कम से कम भारतीयों के विशाल बहुमत के लिए। इसलिए प्रेम-विवाह आज भी दुर्लभ ही हैं और जब कि 'लव कम अरेंज्ड मैरेज' की संख्या बढ़ रही है, अभी भी अधिकांश लड़के और लड़कियों में यह हिम्मत नहीं होती कि सामाजिक रूप से स्वीकृत सीमा को लांघ सकें, अपने विवाह के लिए अपनी पसंद के किसी व्यक्ति का नाम सुझा सकें। किसी दूसरे लड़के या लड़की में अपनी रुचि ज़ाहिर करके वे अपने अभिभावकों को नाराज़ नहीं करना चाहते, उन समस्याओं से जूझने का खतरा नहीं उठा सकते, जो उनके ऐसा करने पर पेश आ सकती हैं। शायद वे ऐसे परिवेश में ही नहीं रहते, जो इसकी इजाज़त देता है। हो सकता है कि वे घूमने-फिरने वाले बहिर्मुखी व्यक्ति न हों, जो ऐसे किसी व्यक्ति को अपने लिए खोज सकें।

सारांश यह कि ऐसे कुछ लोग हो सकते हैं, जो अपने अभिभावकों द्वारा चुने गए जीवन साथी से खुश न हों, कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो न तो खुश हों और न दुखी, जो अपने विवाह के नतीजे से पूरी तरह अनजान, दिग्भ्रमित से हों और कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो किसी और से विवाह करना चाहते थे मगर अपनी नियति से अब समझौता कर चुके हों। इसके बावजूद यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि अधिकांश युवा अपने विवाह से खुश होते हैं और विवाह के दिन पूरे समारोह का पूरा आनंद उठाते हैं!

अनजानी दुनिया में प्रवेश की उत्तेजना, प्रसन्नता, गर्व और कुछ घबराहट भी-मैं समझता हूँ, अपने विवाह के दिन यही भावनाएँ आम तौर पर भारतीय नव-दम्पतियों में पाई जाती हैं।