जब मैं जर्मनी में था, कुछ मित्र अपने मित्रों की कहानियाँ सुना रहे थे। उनमें से एक कहानी ने मुझे वैसी ही स्थितियों का सामना करने को मजबूर बहुत सी भारतीय महिलाओं के विषय में सोचने को विवश कर दिया। मैंने सोचा, आखिर दोनों में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है: वैवाहिक संबंधों में कुछ महिलाएँ अपने पतियों के विवाहेतर संबंधों को बड़ी सहजता के साथ स्वीकार कर लेती हैं-सुविधाजनक होने के कारण या फिर डर के मारे!
एक दोस्त ने मुझे बताया, एक महिला, जिसे वह बीस साल से भी ज़्यादा समय से जानता है, अपने पति के साथ काफी समय से अत्यंत असामान्य परिस्थितियों में रह रही है: उसका पति हफ्ते में लगभग एक बार उससे मिलने घर आता है। बाकी समय वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहता है। जब वह घर आता है तो सब कुछ ऐसा होता है जैसे वे दोनों सामान्य विवाहित पति-पत्नी हों: वह अपने गंदे कपड़े लेकर आता है और वह उन्हें धोती है, उस रोज़ वह एक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए खाना बनाती है और इस तरह वह एक सामान्य काम पर से घर लौटा हुआ पति होता है!
लेकिन वे एक साथ नहीं सोते-और कहानी के इसी बिंदु पर मुझे पूछना ही पड़ा: क्या पहले शुरू हुआ, अलग-अलग बिस्तरों पर सोना या गर्लफ्रेंड के साथ रहना? अलग-अलग बिस्तरों सोना पहले शुरू हुआ था! एक बार महिला ने अपने पति से कहा था कि वह भविष्य में उसके साथ यौन संबंध नहीं रखना चाहती। वह उसके साथ सोना नहीं चाहती थी और उसने पति के सामने यह विकल्प भी रखा कि यदि वह चाहे तो कहीं और जाकर अपनी यौन ज़रूरतें पूरी कर सकता है।
बहुत से कारण थे कि वे अलग नहीं हुए और मुख्य रूप से सिर्फ इसलिए कि यह बहुत आसान और सुविधाजनक था: वे अपने टैक्स और बैंक खाते एक रखे हुए थे, जिस तरह वह हमेशा से रहती आई थी, अब भी रह सकती थी और पति को उसकी स्वतंत्रता भी उपलब्ध हो गई। उनके संबंध अच्छे हैं, यानी बाकी सब कुछ ठीक है।
मेरे मन में तुरंत उन परिवारों का खयाल आया, जिनसे मिलने रमोना अक्सर उनके घर जाती रहती है-हमारे स्कूली बच्चों के घर, जहाँ अक्सर महिलाएँ ढोंग करती हैं, जैसे वे एक सामान्य, सुखी दाम्पत्य संबंध में बंधी हुई हैं जबकि वास्तव में उनके पति ज़ोर-शोर से विवाहेतर संबधों में मुब्तिला होते हैं। एक नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पति और पत्नी के बीच बेगानापन व्याप्त है और उनके बीच आन्तरिक संबंधो का लोप हो चुका है-लेकिन वे विवाह का भ्रम बनाए रखती हैं। दंपति के रूप में साथ जीवन बिताने का ढोंग, क्योंकि संबंध विच्छेद की तुलना में यह आसान और सुविधाजनक है और एक ऐसे समाज में जहाँ एकाकी महिला पर लोगों का कहर टूट पड़ता हो, निश्चित ही तलाकशुदा कहलाने से बहुत बेहतर!
मुझे समानताएँ नज़र आती हैं। मुझे लगता है, कुल मिलाकर दोनों स्थानों पर स्थिति एक जैसी है। इसी तरह चलाना अधिक सुविधाजनक है। साथ ही मैं यह फैसला नहीं दे रहा हूँ कि यह ठीक है या गलत है या कि यह एक देश के संदर्भ में सही और दूसरे की परिस्थितियों में गलत है! मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि मैंने दोनों में ये समानताएँ पाईं और उन्हें आपके सामने रख रहा हूँ।
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