जब महिलाएँ अपने पति के विवाहेतर संबंधों को स्वीकार कर लेती है – 7 दिसंबर 2015

You are currently viewing जब महिलाएँ अपने पति के विवाहेतर संबंधों को स्वीकार कर लेती है – 7 दिसंबर 2015

जब मैं जर्मनी में था, कुछ मित्र अपने मित्रों की कहानियाँ सुना रहे थे। उनमें से एक कहानी ने मुझे वैसी ही स्थितियों का सामना करने को मजबूर बहुत सी भारतीय महिलाओं के विषय में सोचने को विवश कर दिया। मैंने सोचा, आखिर दोनों में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है: वैवाहिक संबंधों में कुछ महिलाएँ अपने पतियों के विवाहेतर संबंधों को बड़ी सहजता के साथ स्वीकार कर लेती हैं-सुविधाजनक होने के कारण या फिर डर के मारे!

एक दोस्त ने मुझे बताया, एक महिला, जिसे वह बीस साल से भी ज़्यादा समय से जानता है, अपने पति के साथ काफी समय से अत्यंत असामान्य परिस्थितियों में रह रही है: उसका पति हफ्ते में लगभग एक बार उससे मिलने घर आता है। बाकी समय वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहता है। जब वह घर आता है तो सब कुछ ऐसा होता है जैसे वे दोनों सामान्य विवाहित पति-पत्नी हों: वह अपने गंदे कपड़े लेकर आता है और वह उन्हें धोती है, उस रोज़ वह एक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए खाना बनाती है और इस तरह वह एक सामान्य काम पर से घर लौटा हुआ पति होता है!

लेकिन वे एक साथ नहीं सोते-और कहानी के इसी बिंदु पर मुझे पूछना ही पड़ा: क्या पहले शुरू हुआ, अलग-अलग बिस्तरों पर सोना या गर्लफ्रेंड के साथ रहना? अलग-अलग बिस्तरों सोना पहले शुरू हुआ था! एक बार महिला ने अपने पति से कहा था कि वह भविष्य में उसके साथ यौन संबंध नहीं रखना चाहती। वह उसके साथ सोना नहीं चाहती थी और उसने पति के सामने यह विकल्प भी रखा कि यदि वह चाहे तो कहीं और जाकर अपनी यौन ज़रूरतें पूरी कर सकता है।

बहुत से कारण थे कि वे अलग नहीं हुए और मुख्य रूप से सिर्फ इसलिए कि यह बहुत आसान और सुविधाजनक था: वे अपने टैक्स और बैंक खाते एक रखे हुए थे, जिस तरह वह हमेशा से रहती आई थी, अब भी रह सकती थी और पति को उसकी स्वतंत्रता भी उपलब्ध हो गई। उनके संबंध अच्छे हैं, यानी बाकी सब कुछ ठीक है।

मेरे मन में तुरंत उन परिवारों का खयाल आया, जिनसे मिलने रमोना अक्सर उनके घर जाती रहती है-हमारे स्कूली बच्चों के घर, जहाँ अक्सर महिलाएँ ढोंग करती हैं, जैसे वे एक सामान्य, सुखी दाम्पत्य संबंध में बंधी हुई हैं जबकि वास्तव में उनके पति ज़ोर-शोर से विवाहेतर संबधों में मुब्तिला होते हैं। एक नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पति और पत्नी के बीच बेगानापन व्याप्त है और उनके बीच आन्तरिक संबंधो का लोप हो चुका है-लेकिन वे विवाह का भ्रम बनाए रखती हैं। दंपति के रूप में साथ जीवन बिताने का ढोंग, क्योंकि संबंध विच्छेद की तुलना में यह आसान और सुविधाजनक है और एक ऐसे समाज में जहाँ एकाकी महिला पर लोगों का कहर टूट पड़ता हो, निश्चित ही तलाकशुदा कहलाने से बहुत बेहतर!

मुझे समानताएँ नज़र आती हैं। मुझे लगता है, कुल मिलाकर दोनों स्थानों पर स्थिति एक जैसी है। इसी तरह चलाना अधिक सुविधाजनक है। साथ ही मैं यह फैसला नहीं दे रहा हूँ कि यह ठीक है या गलत है या कि यह एक देश के संदर्भ में सही और दूसरे की परिस्थितियों में गलत है! मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि मैंने दोनों में ये समानताएँ पाईं और उन्हें आपके सामने रख रहा हूँ।

Related posts

क्या करें जब चीज़ें आपके आदर्शों के अनुरूप न हों - 24 नवंबर 2015

क्या करें जब चीज़ें आपके आदर्शों के अनुरूप न हों – 24 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि क्या करें जब आप कुछ आदर्शों के समर्थक होते हैं और देखते हैं कि ...
क्या करें जब असुरक्षा की भावना से पीड़ित लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें? 18 नवंबर 2015

क्या करें जब असुरक्षा की भावना से पीड़ित लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें? 18 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु एक ऐसे व्यक्ति का खाका खींच रहे हैं, जो मूलतः असुरक्षाग्रस्त होता है और दूसरों को नीचा दिखाकर ...
इस संज्ञान का मुकाबला कैसे करे कि आप ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहने वाले हैं? 28 अक्टूबर 2015

इस संज्ञान का मुकाबला कैसे करे कि आप ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहने वाले हैं? 28 अक्टूबर 2015

स्वामी बालेंदु घातक बीमारियों और अपंगता के बारे में लिखते हुए बता रहे हैं कि ऐसी बीमारियों या ऐसे अपघातों ...
समस्याओं के प्रति आपका रवैया-आप उनसे घबराते हैं या उनका डटकर मुकाबला करते हैं? 26 अक्टूबर 2015

समस्याओं के प्रति आपका रवैया-आप उनसे घबराते हैं या उनका डटकर मुकाबला करते हैं? 26 अक्टूबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि समस्याओं का सामना होने पर कैसे आपकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि उनके प्रति आपकी प्रतिक्रिया को ...
आपका प्रत्यक्ष ज्ञान (ग्रहण-बोध) आपकी दुनिया को बदल देता है - 21 अक्टूबर 2015

आपका प्रत्यक्ष ज्ञान (ग्रहण-बोध) आपकी दुनिया को बदल देता है – 21 अक्टूबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे आपका लालन-पालन, आपकी संस्कृति, और आपकी परिस्थितियाँ आपके दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं-और ...
अपने अत्यल्प साधनों से भी योगदान करें क्योंकि छोटी चीज़ का भी असर होता है - 6 अक्टूबर 2015

अपने अत्यल्प साधनों से भी योगदान करें क्योंकि छोटी चीज़ का भी असर होता है – 6 अक्टूबर 2015

स्वामी बालेंदु लोगों प्रोत्साहित करते हुए निवेदन कर रहे हैं कि दुनिया में हो रही बुरी बातों पर निराश और ...
जीवन का आनंद लेते हुए खुद को अपराधी महसूस न करें! 5 अक्टूबर 2015

जीवन का आनंद लेते हुए खुद को अपराधी महसूस न करें! 5 अक्टूबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि क्यों बिना किसी अपराधबोध के आपको वही काम करना चाहिए जिसे आप वास्तव में ...
जब आप जीवन को सहज, सामान्य रूप से लेते हैं तो वह सरल हो जाता है! 16 अप्रैल 2015

जब आप जीवन को सहज, सामान्य रूप से लेते हैं तो वह सरल हो जाता है! 16 अप्रैल 2015

स्वामी बालेन्दु उन लोगों के बारे में लिख रहे हैं, जो सहज-सामान्य बातों को तो सामान्य रूप से लेते ही ...
अगर मामूली से मामूली काम भी आपको कठिन लगता है तो कृपया इसे अवश्य पढ़ें - 15 अप्रैल 2015

अगर मामूली से मामूली काम भी आपको कठिन लगता है तो कृपया इसे अवश्य पढ़ें – 15 अप्रैल 2015

स्वामी बालेन्दु उन लोगों के बारे में लिख रहे हैं जो ईमानदारी से सोचते हैं कि हर नई योजना और ...

Leave a Reply