पति, पत्नी और प्रेमी तथा उनकी समस्या सुलझाने वाले दस लोग – 8 अप्रैल 2015

सम्बन्ध

पिछले कुछ समय से मैं धोखेबाज़ दंपत्तियों के बारे में लिखता रहा हूँ और उसमें मैंने ज़िक्र किया है कि आजकल विवाह के बाहर सेक्स संबंध बहुत आम हो चुके हैं। पश्चिम में भी यह होता है लेकिन निश्चित ही पश्चिम में यह नहीं होता कि कई लोगों का पूरा समूह आपके यहाँ इकट्ठा होकर आपकी सारी वैवाहिक समस्याएँ सुलझाने लगें!

जी हाँ, यह मैं गंभीरता पूर्वक कह रहा हूँ-भारत में ऐसा होता है। जब परिवार में कोई मामला सामने आता है तो कुछ बुजुर्ग या दूसरे आदरणीय लोग इकट्ठा होकर समस्या का हल ढूँढ़ते हैं। शायद आप सोच रहे होंगे कि यह ग्रामीण इलाकों में होता होगा लेकिन ऐसा नहीं है। यह सिर्फ दूरदराज़ के ग्रामीण इलाकों में ही नहीं बल्कि वृन्दावन जैसे शहरों में भी होता है!

दरअसल, पूर्णेन्दु को भी ऐसे मामलों में सादर निमंत्रित किया जाता है। जब किसी परिवार या कोई दंपत्ति के सामने कोई समस्या पेश आती है और वह आसपास के लोगों को पता चलती है तो लोग समझते हैं कि यह एक सामाजिक कार्य है। सामान्य भारतीय की यह फितरत होती है कि वह दूसरों की मदद करने की कोशिश करता है-और गोपनीयता के बारे में बहुत से भारतीयों की समझ पश्चिमी समझ से बहुत अलग है। अपनी गोपनीयता को लेकर और दूसरों की गोपनीयता को लेकर भी। जब दूसरे किसी व्यक्ति का कोई मसला सामने आता है तो वे खोद-खोदकर सारी और सही-सही जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। इससे आप कल्पना कर सकते हैं कि वे दूसरों को सलाह देने में भी कोई संकोच नहीं करते!

लेकिन अजीब बात है कि यह बहुत से लोगों के मामलों में काम कर जाता है!

जैसा कि आप अब तक जान गए होंगे, वास्तव में तलाक़ कभी भी विकल्प नहीं होता। दंपत्ति लड़ते रहेंगे, आप कल्पना नहीं कर सकते कि पहले से अधिक लड़ेंगे और खुले आम, सबके सामने लड़ेंगे लेकिन अलग होने का ख्याल भी उनके दिल में नहीं आएगा! मगर इस समस्या का कोई न कोई समाधान तो निकालना ही होगा। तो हर समाज में या आसपास कुछ सम्माननीय लोग होते हैं, उनके बुज़ुर्ग या शहर या कस्बे के पुराने बाशिंदे, जैसे पूर्णेन्दु, जिसे अक्सर ऐसी मीटिंगों में बुलाया जाता है।

ये सब लोग साथ बैठते हैं और सभी एक के बाद एक अपने-अपने नज़रिए से समस्या पर विचार रखते हैं। अंत में वे किसी एक निदान पर एकमत होकर या, आवश्यकता पड़ने पर वोटिंग करके, कोई न कोई समाधान प्रस्तुत करते हैं। यह लाइव टॉक शो जैसा होता है और स्वाभाविक ही, मामले के संपर्क में आने वाले सभी लोगों का मनोरंजन भी!

लेकिन ये समाधान विचित्र और आश्चर्यजनक हो सकते हैं और किसी किताब से बढ़कर समाज का आईना प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, एक पुरुष, उसकी पत्नी और उसकी प्रेमिका वाले एक मामले के निपटारे हेतु विचार-विमर्श और मध्यस्थता करने जब कुछ और लोगों के साथ पूर्णेंदु एक मीटिंग में शामिल हुआ। पुरुष ने एक नया घर बनवाया था और जब वह पूरा हो गया तो वहाँ निचली मंज़िल पर उसने अपनी दुकान स्थानांतरित कर ली और सबसे ऊपरी मंज़िल पर अपने परिवार के साथ रहने भी लगा! इतना ही नहीं, उसने अपनी प्रेमिका को भी पहली मंज़िल यानी बीच वाली मंज़िल पर रहने के लिए निमंत्रित कर लिया! स्वाभाविक ही, उसकी पत्नी को यह योजना पसंद नहीं आई…और इससे वह भड़क उठा क्योंकि उसने तो पूरा मकान ही इसी इरादे से और इसी योजना को मद्देनजर रखते हुए बनवाया था! और इसके अलावा, उसकी प्रेमिका उससे पैसों की मांग भी करने लगी, आखिर वह भी तो पिछले दस साल से लगातार उसके साथ सोती रही थी!

मीटिंग के गणमान्य सभासदों ने निर्णय किया कि घर की शांति के लिए यह अच्छा होगा कि उसकी प्रेमिका उन लोगों के साथ एक ही मकान में न रहे। तो प्रेमिका को वह विशाल और आरामदेह फ्लॅट मिल गया जहाँ परिवार पहले रहा करता था-और पुरुष को अपनी पत्नी से वादा भी करना पड़ा कि प्रेमिका के ज़ेवरों पर किए गए खर्च के बराबर रकम वह उसे भी अदा करेगा!

समझौते का बढ़िया तरीका? है न?

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