मैं पथभ्रष्ट और अनैतिक हूँ क्योंकि मैं शादीशुदा हूँ, स्वामी कहलाता हूँ और सेक्स की बातें करता हूँ – 10 मई 2015

मेरा जीवन

अपने एक ब्लॉग पर हाल ही में मुझे एक टिप्पणी प्राप्त हुई है, जिसका उस ब्लॉग से कोई संबंध नहीं था कि वह क्या लिखा है बल्कि इस बात से था कि मैं कौन हूँ: यानी वह व्यक्ति मेरे बारे में क्या सोचता है। और यह उसकी बातों से पूरी तरह स्पष्ट होता है। उसकी वह प्रबुद्ध टिप्पणी जस की तस नीचे दे रहा हूँ:

“आप पथभ्रष्ट व्यक्ति हैं; शादीशुदा व्यक्ति को खुद को स्वामी कहने का कोई हक़ नहीं है; आप अपनी वेबसाइट के नाम में ‘सियाराम’ शब्द का इस्तेमाल क्यों करते हैं? यह गलतफहमी पैदा करता है, आपके अधिकतर आलेख सेक्स से संबन्धित होते हैं”

जब कि मुझे डिगाने की ऐसी कोशिशों की तरफ ध्यान देने की ज़रूरत ही नहीं समझता, इसे पढ़कर तो मैं हँसे बगैर नहीं रह सका और सोचा कि इस बारे में अपने विचार आप लोगों के साथ साझा करूँ।

चलिए, सबसे पहले इस टिप्पणी का विश्लेषण किया जाए: मैं इस व्यक्ति की नज़र में पथभ्रष्ट क्यों हूँ? क्योंकि मैं शादीशुदा हूँ और ‘स्वामी’ कहलाता हूँ, जिसका, इस व्यक्ति की नज़र में, मुझे अधिकार नहीं है।

तो, इसका अर्थ है अगर मैं शादीशुदा हूँ और ‘स्वामी’ न कहलाऊँ, तो कोई दिक्कत नहीं होगी? शायद हाँ, तब मैं एक सामान्य पति होऊँगा, एक सामान्य व्यक्ति, जो रोज़ अपना ब्लॉग लिखता है।

अगर मैं स्वामी कहलाऊँ और शादीशुदा न होऊँ तब भी क्या आपको दिक्कत नहीं होगी? जी हाँ, क्योंकि तब मैं शायद दूसरे स्वामियों की तरह जीवन बिता रहा होऊँगा: तब मेरी सैकड़ों गर्लफ्रेंड्स होंगी, जहाँ जाऊँगा वहीं अपनी महिला अनुयायियों के साथ सो सकूँगा और जो मेरे साथ सोने के लिए राज़ी नहीं होंगी, उन्हें जबर्दस्ती या ब्लैकमेल करके सोने के लिए मजबूर कर सकूँगा। वे ‘स्वामी’ यह सब करते हैं और उनके सैकड़ों और हजारों अनुयायी यह सब जानते हुए भी इन अनैतिक बातों को सहजता से स्वीकार भी कर लेते हैं। उनके विरुद्ध कोर्टों में बलात्कार के प्रकरण चल रहे होते हैं और वे धर्म-गुरु कहलाते हैं, जब कि मुझे पथभ्रष्ट कहा जा रहा है क्योंकि मैं एक महिला से प्रेम करता हूँ और उसी से विवाह करने का फैसला किया? गजब! बढ़िया तर्क है, मानना पड़ेगा!

मैं अपने स्वामी होने और मेरी वेबसाइट का नाम ‘जयसियाराम’ क्यों है, इस बारे में अपने ब्लॉगों में बहुत पहले लिख चुका हूँ। इस प्रश्न का उत्तर मैं कई बार विस्तार से दे चुका हूँ। उसी को संक्षेप में कहना हो तो यह कि ‘स्वामी’ का अर्थ सिर्फ मालिक होता है। मेरे व्यक्तिगत अतीत के कारण यह नाम मुझे मिला है और मेरा मानना है कि मैं उसे अभी भी इस्तेमाल कर सकता हूँ क्योंकि मैं खुद अपना मालिक हूँ। कोई दूसरा मेरा मालिक नहीं है-मैं, मैं हूँ और मेरा हूँ!

और फिर ऊपर से मैं सेक्स पर लिखने की हिम्मत दिखाता हूँ!

मुझे लगता है कि यह इस व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या है। हाँ, मैं सेक्स पसंद करता हूँ और उसके बारे में बात करना भी। और मैं महसूस करता हूँ कि इस दक़ियानूसी समाज में, जहाँ सेक्स पर सैकड़ों प्रकार की पाबन्दियाँ हैं, यह मेरी ज़िम्मेदारी भी बनती है कि मैं बच्चों और दूसरे लोगों से उसके बारे में खुलकर बात करूँ। इस समाज में, जहाँ स्वामी और धर्मगुरु हर जगह सेक्स कर सकता है, कई औरतों से यौन संबंध कायम कर सकता है लेकिन जहाँ सेक्स पर खुलकर बात करना अच्छा नहीं माना जाता।

फिर, जैसा उस व्यक्ति का खयाल है, मैं अधिकतर सेक्स पर ही नहीं लिखता। और इसी बात से मैं अपने जवाब का समापन करना चाहूँगा: मेरा मानना है कि वास्तविक पथभ्रष्ट मैं नहीं हूँ। पथभ्रष्ट वह है, जो हर जगह सिर्फ सेक्स देखता है और उसी के बारे में पढ़ता है और फिर सोचता है कि मेरे ‘अधिकांश ब्लॉग’ सेक्स पर ही लिखे गए हैं, जब कि मेरे कुल 2694 ब्लॉगों में से सिर्फ 60 ब्लॉग ही ऐसे हैं, जिन्हें ‘सेक्स’ की श्रेणी में रखा गया है।

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