भारत में विवाह पवित्र बंधन है इसलिए पति के द्वारा किया गया जबरन सम्भोग बलात्कार नहीं – 6 मई 2015

भारतीय संस्कृति

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ जो सामान्यतः हमारे समाज में चर्चा का सबसे सदाबहार विषय होता है और मैं भी इस पर अपने ब्लॉग में अक्सर लिखता रहता हूँ: भारत में महिलाओं की स्थिति। आज पुनः इस विषय पर लिखने का कारण सरकार के एक मंत्री का वह बयान है, जिसमें उसने कहा है कि भारतीय संस्कृति में विवाह के अंतर्गत बलात्कार के विचार का कोई अस्तित्व नहीं है। अगर यह सच है तो क्या इससे अच्छी कोई बात हो सकती है?

इस मूर्खतापूर्ण वक्तव्य तक हम कैसे पहुँचे, मैं बताता हूँ: संयुक्त राष्ट्र के जनगणना कोष के अध्ययन का हवाला देते हुए एक महिला संसद सदस्य ने कहा कि भारत में 75% विवाहित महिलाओं के साथ उनके पतियों द्वारा बलात्कार किया जाता है। सदस्य ने सरकार से पूछा कि इस बारे में वह क्या कार्यवाही करने जा रही है।

सत्ताधारी पार्टी के एक मंत्री का जवाब यह था कि यह विचार पश्चिम से आया है और भारत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 'यह विचार हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है!' क्योंकि भारत में, उनके मुताबिक, विवाह एक पवित्र ईश्वरीय विधान और मांगलिक संबंध माना जाता है और भारतीयों की धार्मिक आस्थाओं और संस्कृति के कारण ऐसे कुकृत्य होते ही नहीं हैं।

निश्चित ही आप इस वक्तव्य पर स्तब्ध रह गए होंगे! मैं आपको बताना चाहता हूँ कि भारत में हम लोग एक धर्म समर्थक सरकार से, जो भारत की प्राचीन संस्कृति को बचाए रखने के एजेंडे पर काम कर रही है, इससे बेहतर वक्तव्य की अपेक्षा ही नहीं करते! फिर भी एक भारतीय के रूप में हमारे नेताओं की विचारशून्यता और कुबुद्धि पर सोच-सोचकर हैरान रह जाता हूँ जो ऐसी घटिया और हास्यास्पद बातें ज़बान पर लाते हैं!

हमारी प्राचीन संस्कृति में तलाक़ की कोई अवधारणा मौजूद ही नहीं है। तलाक़ शुरू ही हुआ, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई और संविधान बना। हिन्दू कोड बिल में तलाक़ का प्रावधान किया गया और महिलाओं के अधिकारों को दर्ज किया गया। उसके बाद ही एक पत्नी के होते हुए दूसरी महिला के साथ विवाह को गैरकानूनी घोषित किया गया। इसका ज़ोरदार विरोध हुआ, तर्क दिए गए कि पति को छोड़ना यानी तलाक़ लेना हिन्दू संस्कृति के विरुद्ध है क्योंकि हिन्दू धर्म के अनुसार दंपत्ति सात जन्मों के लिए विवाहबद्ध होते हैं। विरोध करने वालों का कहना था कि ऐसे क़ानून हमारी पवित्र और दिव्य हिन्दू धार्मिक संस्कृति को नष्ट कर देंगे।

मुझे लगता है, मंत्री महोदय यह भी भूल गए कि अतीत में हमारी इस महान संस्कृति में पति के मरने के बाद उसकी विधवा को पति के साथ ज़िंदा जला देने की परंपरा थी, जिससे वह पुनर्जन्म लेकर पुनः उसी व्यक्ति की पत्नी बन सके। राजा राममोहन रॉय के प्रयत्नों से इस घृणित परंपरा को क़ानून बनाकर समाप्त किया गया-हालाँकि, उसके बाद भी कई सालों तक हिन्दू संस्कृति के झंडाबरदारों ने इस परंपरा का त्याग नहीं किया क्योंकि वे सोचते थे कि यह क़ानून उनकी संस्कृति को नष्ट कर देगा।

उस समय हिन्दू धर्म में पुरुषों को कई पत्नियाँ रखने की आज़ादी थी और मंदिरों में पुरोहितों, पुजारियों और धर्मगुरुओं की यौनेच्छाओं की पूर्ति के लिए धार्मिक वेश्याएँ रखी जाती थीं, जिन्हें देवदासी कहा जाता था!

यह सब एक समय हमारी संस्कृति थी। आप हमारे समाज की हालत समझ सकते हैं, इस देश की परम्पराओं और इतिहास पर उनके विश्वासों को समझ सकते हैं! और भारतीय इतिहास के हर कालखंड में हिन्दू धर्म ने महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा है। उनकी हैसियत किसी वस्तु से बढ़कर नहीं रही है, वे सिर्फ उपभोग की और बच्चे जनने की मशीने भर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र कह सकता है कि भारत में 75% शादीशुदा महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं और इसे अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन हमारी राष्ट्रवादी, धार्मिक सरकार इस बात से सहमत नहीं है क्योंकि 'यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध' है! जी हाँ, इस देश में स्त्रियों को उनकी औकात दिखाने के लिए पुरुष उन पर बलात्कार करते हैं, यह दर्शाने के लिए कि देखो, तुम कमज़ोर हो! और महिलाओं को बलात्कार की शिकायत ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो दोष उसी का होता है-वे अनुपयुक्त कपड़े पहनकर या अपने अनुचित व्यवहार से पुरुषों को बलात्कार के लिए आमन्त्रित करती हैं! अगर आप महिलाओं के प्रति कुछ अधिक दरियादिल हैं, उनके प्रति दया दिखाना चाहते हैं तो आप उनके कपड़ों या व्यवहार पर भले ही टिप्पणी न करें मगर कहेंगे कि 'कभी कभी लड़कों से युवावस्था के जोश में गलती हो ही जाती है', जैसा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के पिता मुलायम सिंह ने कुछ समय पहले कहा था।

परंपरागत भारतीय संस्कृति में एक महिला अपने पति की मिल्कियत होती है। अपनी पत्नी पर उसका सम्पूर्ण अधिकार होता है। महिलाओं को यह शुरू से ही पता होता है। पुरुष अपनी लड़कियों को अनजान लड़कों की तरफ देखने या बात तक करने से मना करते हैं। उनका कन्यादान होता है, विवाह के समय उसे अनजान व्यक्ति को दान कर दिया जाता है और एक ऐसे व्यक्ति के साथ सोने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, जिसे वह जानती तक नहीं होती। क्या बलपूर्वक किया गया यह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) किसी बलात्कार से कम है?

लेकिन नहीं, विवाह के पश्चात् पति द्वारा पत्नी के साथ बिना सहमति के सम्भोग करना भारत में बलात्कार नहीं माना जाता। निश्चय ही संयुक्त राष्ट्रसंघ गलत होगा। शिकायत करने वाली हर महिला गलत होगी।

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