जब हमने एक नाबालिग लड़की का विवाह रोकने में सफलता पाई – 10 अप्रैल 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

पिछले दिनों हमारे स्कूली बच्चों के घरों में हुए अपने सामान्य अनुभवों की जानकारी देने और उसके बाद भारत में लड़कियों और महिलाओं की हालत का ज़िक्र करने के बाद आज मैं एक और समस्या पर चर्चा करना चाहता हूँ: लड़कियों का बाल-विवाह। अपने स्कूल की एक लड़की के उदहारण से मैं अपनी बात स्पष्ट करूंगा: लड़की का नाम है पूजा।

पिछले हफ्ते हमारी एक शिक्षिका के पास तीसरी कक्षा में पढने वाली एक लड़की आई। पंद्रह साल की उस लड़की ने अपनी शिक्षिका से कहा कि स्कूल में यह उसका आखिरी साल है और अगले साल नया सत्र शुरू होने पर वह स्कूल नहीं आएगी। कारण पूछने पर लड़की ने बताया कि कुछ महीनों के भीतर ही उसके माता-पिता उसका विवाह कर देना चाहते हैं।

तीन दिन बाद रमोना और पूर्णेंदु उसके घर के सामने खड़े थे। वैसे भी वे दोनों पूजा के घर कई बार हो आए थे मगर सारे बच्चे उन्हें कभी घर पर नहीं मिले कि वे उनका वीडिओ बना पाते। इत्तफाकन इस बार सारा परिवार घर पर मौजूद था। पूजा उनकी तीसरे नंबर की बेटी है और उससे छोटा एक भाई और दो छोटी बहनें और हैं। उसकी दो बड़ी बहनों का विवाह पहले ही हो चुका है और दोनों के दो-दो बच्चे हैं।

इस प्रश्न पर कि क्या वे इस साल पूजा का विवाह करने की योजना बना रहे हैं, उसके अभिभावकों ने स्पष्ट, दोटूक स्वर में कहा कि 'हाँ'। उसके बाद पूर्णेंदु ने पूजा से पूछा कि क्या वह भी विवाह करना चाहती है और उसका उत्तर था: 'मैं वही करूंगी, जो मेरे माँ-बाप मुझसे करने के लिए कहेंगे'। उसके बाद जो हुआ वह बहुत लम्बा वाद-विवाद था, जिसमें पूर्णेंदु ने उन्हें विस्तार के साथ बताया कि क्यों इस साल पूजा का विवाह करना उचित नहीं है।

सबसे पहले उसने कानूनी कारण बताए: अठारह साल की उम्र से पहले किसी के साथ भी लड़की का विवाह करना गैरकानूनी है। इस तर्क का उन पर कोई असर दिखाई नहीं दिया-हालाँकि वे थोड़ा बेचैन जरुर हो गए। तब उसने पूछा कि क्या पूजा को पढ़ाने में उनका कोई खर्च होता है, जिसे वे उसकी शादी करके बचाना चाहते हैं। उनका जवाब था: नहीं, क्योंकि वह हमारे स्कूल में पढ़ती है, जहाँ उनसे एक रुपया भी वसूल नहीं किया जाता। अंत में उसने कहा कि पूजा अगर पढ़ लेती है तो भविष्य में उसे इस पढ़ाई का लाभ मिल सकता है। यह भी कि उनके जैसे कमज़ोर तबके की लड़कियां भी आजकल सफल व्यापारी बन रही हैं और सिर्फ अपनी ही नहीं बल्कि सारे परिवार की मदद कर रही हैं। इसके अलावा पढ़ाई-लिखाई इस बात की भी ज़मानत है कि वह चाहे तो पैसा कमाने के लिए कोई रोज़गार कर सकती है, नौकरी कर सकती है-क्योंकि कोई कुछ नहीं कह सकता कि भविष्य के गर्त में क्या छिपा है।

अंततः वे पूजा की पढ़ाई जारी रखने के लिए राजी हो गए। अभिभावकों के इस निर्णय के बाद पूजा के चेहरे पर आई संतोषपूर्ण मुस्कान देखते ही बनती थी। दरअसल विवाह के लिए यह बहुत कम उम्र है-मगर गरीब परिवारों में यह कभी-कभार होने वाला बिरल बात नहीं है। हम अक्सर किशोरवय लड़कियों को गोद में बच्चा लिए देखते हैं: बच्चा, जो उनके छोटे सहोदर जैसा लगता है मगर उनका खुद का बच्चा होता है!

वयस्क होने से पहले ही इन लड़कियों को जिन अनुभवों से गुज़रना पड़ता है, जिन उत्तरदायित्वों का बोझ उन्हें ढोना पड़ता है और जिन भावनात्मक और मानसिक उत्पीड़न से वे गुजरती हैं, उनके बारे में सोचना भी बेहद कष्टकारी है।

हमें खुशी है कि कभी-कभी अपना विवाह रुकवाने में हम उन अल्पवयस्क लड़कियों की मदद कर पाते हैं, जैसा कि पूजा के प्रकरण में हम कर पाए।

हमें पता है कि यही उद्देश्य लेकर अगले साल हमें पुनः इस परिवार के पास जाना पड़ सकता है। लेकिन इस समय हम खुश हैं कि हम पूजा को पढ़ाई का एक और साल मुहैया करा सके।