धार्मिक और सामाजिक कारण, जिनके चलते भारतीय महिलाएँ अत्याचारपूर्ण संबंधों में बंधी रहती हैं – 2 दिसंबर 2014

भारतीय संस्कृति

कल मैंने एक स्कूली लड़की की माँ के बारे में बताया था, जो अपने पति को छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, इसके बावजूद कि वह खुद पैसे कमाती है और उसका पति उसे मारता-पीटता है। मैं इस विषय पर और विस्तार से लिखना चाहता था कि क्यों भारतीय महिलाएँ, उनके घर के अत्याचारी और कई बार अकल्पनीय रूप से हिंसक माहौल के बावजूद, अक्सर अपने पति और परिवार के साथ ही बंधी रहती हैं।

जैसा कि मैंने ज़िक्र किया था, सामान्यतः आर्थिक सुरक्षा इसका एक प्रमुख कारण है। बहुत सी महिलाएँ पढ़ी-लिखी नहीं होतीं, कभी घर से बाहर निकलकर कोई काम नहीं किया होता और इसलिए अक्सर उनकी अपनी कोई आमदनी नहीं होती। स्वाभाविक ही, उन्हें यह एहसास होता है कि वे अपना भरण-पोषण खुद नहीं कर सकतीं, अपने बच्चों का खर्च उठाना तो दूर की बात है!

दूसरा, और मेरे विचार में ज़्यादा महत्वपूर्ण कारण है, तलाक को लेकर भारतीय समाज का दकियानूसी रवैया। तलाक किसी भी महिला के लिए भयानक होता है। पहले एक जीवनसाथी का होना, फिर अचानक उसका न होना। अक्सर तलाक के लिए महिला को ही दोषी ठहराया जाता है, पुरुष को नहीं। भले ही वह कहती रहे कि उसका पूर्व-पति शराबी था, उसके साथ मार-पीट करता था, लोगों की प्रतिक्रिया यही होती है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, अर्थात उसने भी कुछ न कुछ गलत बात की होगी और इसी कारण वह उस पर हाथ उठाने पर आमादा हुआ, जोकि, स्वाभाविक ही, उसका अधिकार है। दुर्भाग्य से भारत में घरेलू हिंसा आज भी इतनी सामान्य और सर्वव्यापी है कि लोगों को इन बातों पर कोई अचरज भी नहीं होता!

दुखद, अपमानजनक और अत्याचार पूर्ण सम्बन्ध में बने रहने का एक और कारण धर्म है। जी हाँ, मेरे विचार से हर धर्म दंपत्तियों से और विशेष रूप से महिलाओं से कहता है कि दांपत्य एक पवित्र बंधन है। कि तुम्हें अपने पति या पत्नी की देखभाल करनी चाहिए। महिलाओं के मामले में यह भी कि उसका भला-बुरा, सब कुछ अपने पति पर निर्भर है। कि तुम्हें पति की आज्ञा का पालन करना ही होगा।

हिन्दू धर्म में स्त्रियों के लिए पति को छोड़ना पाप माना जाता है। विवाह दैवी कार्य है और आपसे इस बात की अपेक्षा नहीं की जाती कि आप इस पवित्र बंधन को तोड़ेंगे, जो कि ईश्वर की ओर मिली नेमत है। सच तो यह है कि जब आप हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह करते हैं तो सिर्फ इस जन्म के लिए नहीं करते बल्कि अगले सात जन्मों के लिए विवाह बंधन में बंधे रहते हैं!

जब मैंने रमोना को यह बताया तो उसने रूखे स्वर में उत्तर दिया: 'तो क्या हुआ? हो सकता है यह उनका सातवाँ जीवन हो? और मैं हँसे बगैर न रह सका। बिल्कुल, सही बात है, आप कैसे जान सकते हैं?

इस धर्मप्रधान देश में, जहाँ बहुसंख्यक लोग परम्पराओं और पुराने रीति-रिवाजों पर बहुत ज़ोर देते हैं और अपने तरीके से अपना जीवन ‘मर्यादा' के साथ जीते हैं, अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत महिला को सराहना नहीं मिलती। एक महिला, जो अपने विवाह को बर्बाद करने पर तुली हो, जो अपने बच्चों को उनके पिता से दूर कर रही हो या जो परिवार के लिए शर्मनाक स्थितियाँ पैदा कर रही हो, उसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

या उस महिला को जो स्वाभिमानी हो, जो अपने शरीर, मस्तिष्क और भावनाओं सहित अपने जीवन का आदर करती हो। जो आईने में बिना आँसू बहाए झाँक सकती हो। जो इतनी मजबूत हो कि खुद पर आने वाली हर मुसीबत का सामना कर सकती हो और जो उसे सही लगता हो, अपनी मर्ज़ी से कर सकती हो। अपनी और अपने बाल-बच्चों कि सुरक्षा कर सकती हो।

अपने आत्मसम्मान के लिए उठ खड़े हों और पुनः अपने जीवन की लगाम खुद अपने हाथ में ले लें। आप कर सकते हैं-और, हालांकि बहुत से लोग आपके विरुद्ध होंगे, आपके साथ खड़े होने वाले भी कम नहीं होंगे!

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