आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत
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अपरा के जन्मदिन के सिलसिले में बहुत से मित्र आश्रम आए थे और उन समान सोच-विचार वाले मित्रों के साथ एक बार फिर खुलकर बातचीत करना अत्यंत सुखद रहा! जब हम एक साथ बैठे हुए थे तो एक महिला मित्र ने, जिसका विवाह अभी एक साल पहले ही हुआ था, बताया कि उस पर न सिर्फ उसके परिवार और उसके सास-ससुर का बल्कि सामान्य रूप से सारे समाज का ही बड़ा ज़बरदस्त दबाव है। किस बात का? जल्द से जल्द गर्भवती होने का!

जी हाँ। भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है कि शादी के कुछ ही माह बाद- शादी, जो अक्सर परिवार द्वारा तय की हुई शादी होती है-हर व्यक्ति यह खुशखबर सुन लेता है: बच्चा होने वाला है! यहाँ यही चलन है, यही होना चाहिए और आपकी शादी का यही एकमात्र मुख्य उद्देश्य है! आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बच्चे, और जहाँ तक हो सके, लड़का, पैदा करें और परिवार की वंश वृद्धि सुनिश्चित करें और उसके कारोबार के लिए वारिस तैयार हो! आपके जीवन का यही मुख्य उद्देश्य है: जितना जल्दी हो सके, बच्चा पैदा करो!

उस मित्र ने बताया कि वह और उसका पति फिलहाल बच्चा न पैदा करके पर्याप्त खुश और संतुष्ट हैं और उसके स्थान पर एक दूसरे को जानते-समझते हुए और अपने संबंध को कुछ और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करते हुए कुछ वक़्त गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन भारत में यह विचार ही अत्यंत असामान्य विचार है। यहाँ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि बच्चे तो वह गोंद है या वह चुंबक है जो माता-पिता को एक-दूसरे से मज़बूती के साथ जोड़े रखता है! लेकिन जबकि वे इस तरह रहते हुए खुश हैं, उनका परिवार दुखी है! और वह महिला मित्र परिवार और दूसरे सब लोगों के इस दबाव से बहुत अप्रसन्न है!

एक और मित्र, जिसकी तीन साल की बच्ची उस वक़्त अपरा के साथ खेल रही थी, अपने साथ पेश आए इसी तरह के व्यवहार को याद करने लगी। उसकी सास हर माह उससे पूछती कि उसकी माहवारी रुकी या नहीं! यहाँ तककि बाद में उसने कैलेंडर पर उसकी माहवारी के दिनों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया और ठीक उन्हीं दिनों में उससे खबर दरियाफ्त करने लगी। जब उसे पता चलता कि माहवारी हो गई है और कम से कम इस माह वह गर्भवती नहीं होगी तो वह बहुत दुखी हो जाती!

क्या आपने कभी कल्पना की है कि किसी महिला को अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार पर कैसा महसूस होता होगा? उसे लगता होगा कि उस घर में वह सिर्फ प्रजनन की मशीन भर है, और कुछ भी नहीं! किसी को इससे कोई मतलब नहीं है कि वह खुद क्या चाहती है-आपके आसपास का सारा वातावरण यह सोचता है कि आपको भी बच्चे की चाहत होनी चाहिए। और सब के सब पूरी शिद्दत के साथ वह खुशखबर सुनने का इंतज़ार करते रहते हैं।

अगर कुछ माह या साल भर तक उस खबर की घोषणा नहीं होती तो अफवाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है: उन्हें बच्चा पैदा नहीं हो पा रहा है, कुछ न कुछ गड़बड़ है! कौन दोषी है? ज़रूर लड़की ही बाँझ होगी! अभी इलाज शुरू किया या नहीं? ऐसा तो नहीं कि लड़का सम्भोग में रुचि ही न लेता हो? कहीं वह समलैंगिक तो नहीं! इत्यादि, इत्यादि!

अफवाह फरोश पड़ोसी ऐसी बातों के इंतज़ार में ही होते हैं और रस ले-लेकर मुहल्ले भर में इस सामान्य बात को बहुत बड़े कलंक की तरह पेश करते हैं, जबकि वहाँ सिर्फ प्रकृति अपना खेल खेल रही होती है।

यह बेहद हास्यास्पद है कि हम महिलाओं से, और पुरुषों से भी, कहें कि उनका जीवन कैसा होना चाहिए और जीवन के किस बिंदु पर उन्हें क्या सोचना चाहिए, क्या इच्छा करनी चाहिए! समाज के लिए यह कतई स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता और न ही उस महिला के लिए या उस दंपति के लिए। क्योंकि क्या होगा यदि वे वास्तव में बच्चा पैदा न कर पाएँ? इस परिस्थिति पर दृष्टिपात करेंगे, कल…!

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