पूरे पिछले हफ्ते मैं भारतीय विवाहों के विषय में लिखता रहा हूँ। संदर्भ था: भारतीय विवाहों में आमंत्रित किए जाने पर पश्चिमी लोगों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और अपने सम्मोहक और भड़कीले विवाह में वर और वधू की भूमिका! लेकिन अभी भी एक प्रश्न बचा रह गया है, जो पश्चिमी लोग यह पता चलने पर पूछते हैं कि विवाह अरेंज्ड था:
9) नव विवाहित दंपति इस विषय में क्या सोचते हैं? वे ऐसे अरेंज्ड विवाह से खुश होते हैं या दुखी?
स्वाभाविक ही यह प्रश्न जायज है क्योंकि उनके चेहरे देखकर आप समझ नहीं सकते कि वे सचमुच खुश हैं या संध्या-समारोह में सकुचाते, मुसकुराते हुए सिर्फ अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं! उनसे अपेक्षा है कि वे राजकुमार और राजकुमारी जैसे नज़र आएँ। दूल्हा गंभीर और गौरवान्वित दिखाई दे और दुल्हन शर्मीली और अपने परिवार से बिदा होने के दुख में, स्वाभाविक ही, थोड़ी गमगीन। लेकिन सवाल यह है कि उनकी वास्तविक भावनाएँ क्या हैं, इस विवाह से वे कैसा महसूस कर रहे हैं?
निश्चय ही इस पर कोई सामान्य टिप्पणी करना मुश्किल है कि कोई व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है क्योंकि इस विवाह के पीछे हजारों कहानियाँ हो सकती हैं। ऐसे अरेंज्ड विवाहों से अनजान और अनभ्यस्त विदेशियों की यह आम प्रवृत्ति होती है कि वे दंपति को इस विवाह से असंतुष्ट और दुखी समझ बैठते हैं। यह आवश्यक नहीं है और अधिकतर ऐसा नहीं होता कि वर और वधू दुखी ही हों।
एक पारंपरिक परिवार में एक युवा व्यक्ति पहले से जानता है कि उसका विवाह अरेंज्ड ही होना है। इस नियति को न सिर्फ वे खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं बल्कि बचपन से उसका इंतज़ार भी कर रहे होते हैं! वे फिल्मों में नायक और नायिका को आपस में मिलते हुए और लंबे प्रेम-प्रसंग के पश्चात आपस में विवाह करते हुए देखते हैं मगर उन्हें अपना खुद का जीवन बहुत अलग जान पड़ता है: अभिभावक अपनी लड़कियों को हमउम्र लड़कों से दूर रखते हैं, विवाह से पहले दूसरे लड़कों के साथ घूमना-फिरना सामाजिक रूप से अस्वीकार्य होता है और अगर कोई लड़की किसी लड़के से मिलते-जुलते पाई जाती है और उसके साथ हँसते-खिलखिलाते (प्रसन्न) दिखाई देती है तो यह अभिभावकों के लिए शर्म की बात मानी जाती हैं।
व्यक्तिगत संबंध इस समाज में सामान्य नहीं हैं, कम से कम भारतीयों के विशाल बहुमत के लिए। इसलिए प्रेम-विवाह आज भी दुर्लभ ही हैं और जब कि 'लव कम अरेंज्ड मैरेज' की संख्या बढ़ रही है, अभी भी अधिकांश लड़के और लड़कियों में यह हिम्मत नहीं होती कि सामाजिक रूप से स्वीकृत सीमा को लांघ सकें, अपने विवाह के लिए अपनी पसंद के किसी व्यक्ति का नाम सुझा सकें। किसी दूसरे लड़के या लड़की में अपनी रुचि ज़ाहिर करके वे अपने अभिभावकों को नाराज़ नहीं करना चाहते, उन समस्याओं से जूझने का खतरा नहीं उठा सकते, जो उनके ऐसा करने पर पेश आ सकती हैं। शायद वे ऐसे परिवेश में ही नहीं रहते, जो इसकी इजाज़त देता है। हो सकता है कि वे घूमने-फिरने वाले बहिर्मुखी व्यक्ति न हों, जो ऐसे किसी व्यक्ति को अपने लिए खोज सकें।
सारांश यह कि ऐसे कुछ लोग हो सकते हैं, जो अपने अभिभावकों द्वारा चुने गए जीवन साथी से खुश न हों, कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो न तो खुश हों और न दुखी, जो अपने विवाह के नतीजे से पूरी तरह अनजान, दिग्भ्रमित से हों और कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो किसी और से विवाह करना चाहते थे मगर अपनी नियति से अब समझौता कर चुके हों। इसके बावजूद यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि अधिकांश युवा अपने विवाह से खुश होते हैं और विवाह के दिन पूरे समारोह का पूरा आनंद उठाते हैं!
अनजानी दुनिया में प्रवेश की उत्तेजना, प्रसन्नता, गर्व और कुछ घबराहट भी-मैं समझता हूँ, अपने विवाह के दिन यही भावनाएँ आम तौर पर भारतीय नव-दम्पतियों में पाई जाती हैं।
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