अपरा का चौथा जन्मदिन समारोह – 10 जनवरी 2016

कल अपरा का चौथा जन्मदिन था! हर साल की तरह स्कूल के बच्चों और बहुत सारे दोस्तों के साथ इस साल भी शानदार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें स्वादिष्ट खाने का लुत्फ भी लिया गया!

दिन की शुरुआत हुई आश्रम की सजावट के साथ। हमारा इरादा सिर्फ फुग्गे लगाने का था-लेकिन हजारों की संख्या में! इस इरादे से हमने फुग्गे और फुग्गे फुलाने की मशीन खरीदी, जो बिजली से चलती है और पल भर में फुग्गे फुला देती है। अन्यथा हमें कई दिन पहले से मुँह से फुग्गे फुलाने पड़ते! कुछ अनुभवी लोगों ने तड़के सबेरे से फुग्गे फुलाने शुरू किए और फिर उनसे रंगीन तोरणद्वार बनाए और बड़ी-बड़ी सुंदर मालाएँ भी बनाईं।

हमारी अपेक्षा से कुछ देर से रसोइयों ने अपना काम शुरू किया। मेरे खयाल से गलती उनकी नहीं थी, हमारी थी कि हम कुछ ज्यादा उम्मीद कर गए। रसोइयों ने सफाई पेश की: “इतनी ठंड है, कोई भी इतनी जल्दी सबेरे नहीं उठना चाहता!” खैर, आखिर किसी तरह वे जागे और फिर योजना के अनुसार एक से एक स्वादिष्ट खाने की वस्तुएँ बनाने की तैयारी शुरू कर दी।

दस बजे लगभग सारे खास मेहमान पधार चुके थे: यानी हमारे स्कूल के बच्चे! उनके अलावा हमारे कुछ सबसे प्यारे मित्र भी धीरे-धीरे आने लगे-और उसके बाद नाच-गाने के साथ तुरंत ही हमने पार्टी शुरू कर दी। बच्चे जब झूम-झूमकर नाचने-गाने लगते हैं, तो वह समय सबसे खूबसूरत होता है और बड़ों सहित दूसरे सब भी अपनी झिझक और शर्म भूलकर उसमें शामिल हो जाते हैं!

इसी बीच अपरा को भूख लग गई-आखिर जब से उठी थी उसने कुछ नहीं खाया था, क्योंकि वह भी तो सारी तैयारियों में लगी हुई थी और बाद में उपहार ले रही थी, चॉकलेट खा रही थी! तो जब सब लोग गानों की धुनों पर थिरक रहे थे, रमोना उसे लेकर खाने के स्टाल्स की तरफ चली गई, जहाँ नूडल्स थे, पैनकेक थे और कुछ दूसरे नाश्ते और मिठाइयाँ रखी थी और अब भी तैयार किए जा रहे थे, जिससे मेहमानों को गरमागरम नाश्ता प्राप्त हो सके। वहाँ रमोना ने एक प्लेट में अपरा के लिए सबसे पहले नूडल्स निकाले और उसके जर्मन नाना के लिए आलू की टिकिया। धींगामस्ती और होहल्ले के सबसे पीछे बैठकर दोनों ने पार्टी के पहले स्वादिष्ट कौर का स्वाद लिया!

अपरा को पहले ही खिलाकर रमोना ने अच्छा किया क्योंकि जब औपचारिक रूप से नाश्ते का दौर शुरू हुआ तो स्कूल के बच्चे उन पर टूट पड़े और बहुत देर तक कोई दूसरा खानों तक पहुँच ही नहीं सकता था क्योंकि सामने अपनी बारी का इंतज़ार करता हुआ बच्चों का विशाल हुजूम होता था! काफी समय बाद तक वे लोग अपने मुँह में एक से एक स्वादिष्ट नाश्ते लिए फिरते रहे और पेट भरने तक खाते रहे। उनके लिए यह पार्टी का सबसे शानदार दौर होता है और वे उस अत्यंत सुस्वादु नाश्ते को भोजन की तरह खाते हुए बेहद खुश और रोमांचित थे।

केक काटने से पहले कुछ और नाच-गाना हुआ। अपरा ने पहला कट लगाया और बाद में सबको उस अत्यंत स्वादिष्ट केक का एक-एक टुकड़ा प्राप्त हुआ। जब अपरा ने अपना हिस्सा खा लिया, वह भी डांस फ्लोर पर नाच रहे लोगों में शामिल हो गई और अपना खुद का प्रदर्शन भी प्रस्तुत किया-एक डांस जिसे पिछले हफ्ते ही उसने सीखा था।

अंत में, जब बच्चे और हमारे कुछ मेहमान चले गए, अपरा ने अपने उपहार खोलना शुरू किया: सुंदर वस्त्र, रंगीन पेंसिलें और दूसरे खेल-खिलौने!

अंत में हमने आराम से बैठकर सुस्वादु डिनर के साथ पार्टी का समापन किया और शाम का बाकी का समय उन दोस्तों के साथ बढ़िया गपशप में गुज़ारा, जो रात को रुकने वाले थे।

पार्टी बहुत शानदार रही: अपरा के जन्म का चौथा स्मरण और पुराने मित्रों के साथ दोबारा एकत्र होने का सुअवसर!

दीपों, मिठाइयों और मित्रों के साथ दीवाली का हर्षोल्लास – 11 नवंबर 2015

आज दिवाली का दिन है, प्रकाश का भारतीय उत्सव! होली के साथ यह त्योहार साल भर के दो सबसे बड़े उत्सवों में से एक है और स्वाभाविक ही सभी इसके आने की राह देखते हैं। और हमारे जर्मन अतिथि भी योजना बनाकर इसी अवसर का आनंद उठाने भारत आए हैं जिससे वे भी इस समारोह का हिस्सा बन सकें।

पिछले कुछ दिनों से ही हमारे मित्र शहर के वातावरण में क्रमशः हो रहे परिवर्तन का अनुभव कर पा रहे हैं। सभी स्कूलों में अभी त्योहार की छुट्टियाँ चल रही हैं और बच्चे स्वच्छंद होकर परिवार सहित ख़रीदारी करने, रिश्तेदारों से मिलने और त्योहार की तैयारियों के सिलसिले में बाहर निकल आए हैं। धीरे-धीरे पूरे शहर में लोग अपने घरों के सामने वाले हिस्से को रंगबिरंगे बल्बों की रोशनी से सजाते जा रहे हैं।

दो दिन पहले हमारे एलेक्ट्रिशियन ने आकर आश्रम को भी उसी प्रकार सजाना शुरू कर दिया था और कल शाम से हम प्रकाश से रोशन हुए अपने आश्रम के भवन, उद्यान, स्कूल और रेस्तराँ के सौंदर्य पर मंत्र-मुग्ध हो रहे हैं।

इसके साथ ही आश्रम की रसोई भी पूरी तेज़ी के साथ दिवाली की मिठाइयाँ बनाने में लग चुकी हैं। कल सारा दिन हमारे रसोइए बाहर से बुलाए अतिरिक्त कारीगरों के साथ मिलकर स्वादिष्ट से स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनाने के उद्देश्य से आटा बेलने, विभिन्न मसालों को काटने-पीसने, उनका मिश्रण तैयार करने, अलग-अलग मिठाइयों को तलने या बेक करने में जुटे हुए थे! पूरा आश्रम कई तरह की बहुत शानदार खुशबुओं से भर गया है और हमारे जर्मन मित्रों का समूह उन्हें अपनी पहली चाय के साथ चख भी चुका है और भोजन के समय भी उनका आस्वाद लेने में मस्त है!

आज सुबह से साफ-सफाई का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है और शाम के लिए सभी अपने अच्छे से अच्छे कपड़े तैयार करने में लगे हैं। हम बस अभी तेल के दिये निकालने ही वाले हैं। उनको तैयार करना पड़ता है। पहले रुई से बत्तियाँ बनाई जाती हैं और दियों में तेल भरकर बत्तियों को जलाया जाता है। पूरे आश्रम परिवार और हमारे मेहमानों के लिए इतना काम सारी दोपहर बिताने के लिए पर्याप्त है, और यह सब सचमुच बड़ा दिलचस्प होता है!

अंत में, रोशनी से चमकते आश्रम की सुंदरता में, शायद अच्छे से अच्छे कपड़े पहनकर और इस दिन को कुछ खास महसूस करते हुए हम सब साथ मिलकर अपने काम की सुंदरता का आनंद लेंगे। शानदार डिनर, शायद कुछ नाच-गाना भी और ढेर सारी मस्ती!

और हालांकि उसे सर्दी हो गई है, फिर भी अपरा, जो आश्रम की सबसे छोटी सदस्य है, इस मौज-मस्ती के केंद्र में बनी हुई है!

मैं आप सभी को एक अत्यंत उल्लासपूर्ण दीवाली की शुभकामनाएँ देता हूँ और आशा करता हूँ कि जिस तरह हम यहाँ पूरी मौज-मस्ती के साथ दीवाली मना रहे हैं, आपकी दीवाली भी वैसी ही खूबसूरत हो और यह समय आपके जीवन का अविस्मरणीय समय बन जाए!

सभी को बहुत सारा प्यार!

यहाँ आप हमारे दिवाली समारोह के चित्र देख सकते हैं।

छोटी सी डांसर अपरा ने दिया स्वतः प्रवर्तित नृत्य प्रदर्शन – 9 नवम्बर 2015

साल में एक बार, हमारे शहर में एक मेला लगता है, जिसे शहर के लोग मेरी किशोरावस्था के समय से ही मनाते चले आ रहे हैं। यह मेला ‘बाल मेला’ कहलाता है और पूरे शहर के सभी स्कूल इसमें होने वाली कला प्रतियोगिताओं, नृत्य और नाट्य प्रदर्शन इत्यादि और कई तरह के दूसरे कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर इस कार्यक्रम को आकर्षक बनाते हैं।

जब मैं स्कूल में था, तब हम भी हिस्सा लिया करते थे और मुझे याद है कि मैंने कई बार मंच पर प्रस्तुति दी थी। बच्चों को मैदान के एक कोने में स्टाल्स लगाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। एक वर्ष मैंने चाय और नाश्ते की दुकान लगाई थी-हालांकि नाश्ता मेरी माँ ने घर पर तैयार किया था। बाद में मेरे पास कैमरा भी आ गया था और उस साल मैंने लोगों की बहुत फोटो खींचीं। बाद में मैं उन्हें डिवैलप करवाके उनके घर पहुँचाता था, जिसकी मुझे संतोषजनक कीमत मिल जाती थी।

जैसा कि मैंने बताया, हमारी फ़्रांसीसी मित्र मेलनी भी लंबे समय के लिए आश्रम आई हुई है। शाम को वह स्वयं भी फायर-डांस (अग्नि नृत्य) प्रस्तुत करके हमारा और हमारे अतिथियों का मनोरंजन करती है, जिसमें वह जलते हुए गेंद को अपने चारों तरफ घुमाते हुए नृत्य करती है। वह सचमुच दर्शनीय होता है, और यह पता चलने पर कि ‘बाल-मेला’ शुरू होने वाला है, पूर्णेंदु ने अपने मित्र से बात की, जोकि इस कार्यक्रम का आयोजक भी था। निश्चित ही समारोह की यह शुरुआत बहुत शानदार रही!

फिर, हमारे मेहमानों का काफी बड़ा समूह हमारे साथ था और हम उन्हें अपने शहर की कुछ रौनक भी दिखाना चाहते थे! इसलिए पूर्णेंदु उन सभी को, यानी मेलनी, हमारे अन्य अतिथि और स्वाभाविक ही, अपरा सहित आश्रम के सभी बच्चों को उस समारोह में ले गया।

वहाँ, सभी ने बहुत अच्छा समय बिताया। आम तौर पर जैसा कि भारत में होता है, नृत्य का कार्यक्रम पूर्व-घोषित समय से काफ़ी देर बाद शुरू हुआ, किन्तु दर्शकों को उनके सब्र का बड़ा अच्छा फल मिला-उस विशाल मंच पर मेलनी के शानदार फायर डांस के रूप में। अपरा ने जब नृत्य देखा तो वह भी मंच पर जाकर डांस करने के लिए मचलने लगी।

तब पूर्णेन्दु ने एक बार फिर अपने मित्र से बात की और जल्द ही उद्घोषक ने हमारे बाल-सितारा का नाम घोषित किया! वह मंच पर आई और अपने एक प्रिय गाने पर अपना नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे उसने पहले-पहल इन्हीं गर्मियों में सीखा था। उसके नृत्य को बहुत सराहा गया और कार्यक्रम में भागीदारी करने के ईनाम के तौर पर उसे एक मैडल और कप मिला, जिसे लेकर वह खुशी-खुशी और सगर्व घर लौटी!

जब वे सब वापस लौटने को थे, आयोजकों ने हमारे सभी अतिथियों को भी मंच पर आमंत्रित किया। हम आज सबेरे नाश्ते के समय भी वहाँ के अनुभवों का ज़िक्र करते हुए आपस में हँसी-मज़ाक करते रहे कि किस तरह आयोजकों ने उन्हें समारोह का विशिष्ट अतिथि बनाया और कैसे वे बड़ी शान से चलते हुए स्टेज पर पहुँचे और स्वागत समारोह में गंभीर भागीदारी की!

ओह, और अब हम दोनो, अपरा के माता-पिता, गर्व से अभिभूत हैं कि हमारी बच्ची सैकड़ों अपरिचित लोगों के बीच बिना किसी पूर्व-तैयारी के, उन्हीं कपड़ों में, जिन्हें उसकी माँ ने जल्दबाज़ी में पहना दिया था, पूरे आत्मविश्वास के साथ स्टेज पर जाकर अपना नृत्य प्रस्तुत कर सकती है! अपरा को भी बहुत मज़ा आया और आज मैं गर्व से कह सकता हूँ कि वह मेरी बेटी है, एक ऐसे बाप की बेटी, जो स्वयं अपनी किशोरावस्था और युवावस्था में विशाल जनसमूह के बीच, सैकड़ों मंचीय कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुका है।

आजकल हम एक साथ बहुत से कार्यक्रमों की तैयारी में व्यस्त हैं! 8 नवंबर 2015

मैं जानता हूँ कि मैं आपको कई बार बता चुका हूँ कि इस समय हम लोग कितने व्यस्त हैं-और यह व्यस्तता कल अचानक और बढ़ गई! जर्मनी से आठ बड़े खूबसूरत लोगों का एक दल हमारे यहाँ दो हफ्ते होने वाले समारोह का आनंद लेने आ पहुँचा है! हम इस समय पूरी तरह व्यस्त हैं-और हमें यह अच्छा लग रहा है!

पिछले कुछ दिनों से हम अपने सामान्य कामों में और इस दल के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में गले-गले तक व्यस्त रहे। इस दल में कई महिलाएँ और पुरुष शामिल हैं, जिनमें से दो लोग आश्रम में पहले भी दो बार आ चुके हैं। वे अब हमारे मित्र बन चुके हैं और हमें शुरू से पता था कि उन लोगों के साथ और उनके साथ आए दूसरे मेहमानों के साथ हमारा समय शानदार गुज़रेगा।

उनके आने के बाद शाम को फ़्रांस से आई मित्र मेलनी द्वारा प्रस्तुत फायर शो से उनका स्वागत किया गया। मेलनी हमारे साथ ही है और अभी काफी समय हमारे साथ रहेगी। आज प्रातः उन्होंने योग कक्षा का आनंद लिया और इस समय बाजार में खरीदारी करने और वृंदावन का थोड़ा-बहुत जायज़ा लेने गए हैं!

अगले कुछ दिनों में वे आयुर्वेदिक पाकशाला में हिस्सा लेंगे, वृंदावन, मथुरा और आगरा की सैर करेंगे और उसके पश्चात्, स्वाभाविक ही, दीपावली समारोह में भी शामिल होंगे, जो सिर्फ तीन दिन बाद यहाँ आयोजित किया गया है!

लेकिन सिर्फ जर्मनी से आए दल की अगवानी और दीपावली समारोह की तैयारियों में ही हम व्यस्त नहीं हैं! दीवाली के तुरंत बाद, 13 नवंबर को अपरा, रमोना और मैं जर्मनी जाने के लिए कार द्वारा आश्रम से दिल्ली विमानतल की ओर रवाना हो जाएँगे!

लगभग डेढ़ साल हो चुके हैं और अपरा ने अपनी माँ के देश को नहीं देखा है और हम उस समय का और अधिक इंतज़ार नहीं कर सकते जब वह वहाँ का अनुभव प्राप्त करे, वहाँ के शानदार दोस्तों और परिवार के सदस्यों से मिले-जुले और वहाँ के जीवन का आनंद ले! गर्मियों में हम अपने रेस्तराँ को रंग-रूप देने में व्यस्त थे इसलिए वहाँ नहीं जा पाए लेकिन हम पूरा साल वहाँ जाए बगैर नहीं रह सकते लिहाजा दो माह पहले हमने अपने कार्यक्रमों का कैलेंडर चेक किया तो पता चला कि इन दो समूहों के बीच हमारे पास सिर्फ तीन हफ़्तों का समय है, जिन्हें हम जर्मनी में गुज़ार सकते हैं!

दिल्ली में ख़ास तौर पर एक दिन हमने गर्म कपड़ों की खरीदारी के किए नियत किया, जिससे जर्मनी जाने के बाद वहाँ की ठंड से बच सकें। जर्मनी में अपरा को इस बार हम स्नो फॉल दिखाने वाले हैं, जिसे वह अपने जीवन में पहली बार देखेगी। हम क्रिसमस मार्केट भी जाएँगे और वहाँ हॉट चॉकलेट और स्ट्राबेरी आईस्क्रीम भी खाएँगे।

अपनी इस रोमांचकारी यात्रा का विवरण मैं आपको नियमित रूप से देता रहूँगा!

2016 में रंगों के त्यौहार, होली की मस्ती में हमारे साथ शामिल हों – 22 अक्टूबर 2015

अगर आपको हमारा न्यूज़-लेटर लगातार मिल रहा है तो आपको उसके साथ हमारा एक निमंत्रण-पत्र भी प्राप्त हुआ होगा: 2016 की होली पर हमारे द्वारा आयोजित ‘होली रिट्रीट 2016’ का निमंत्रण! जबकि पिछले वर्षों में उत्सव की विशेष छूट के साथ हम सभी लोगों को सामान्य रूप से आमंत्रित करते थे, इस बार हमने संपूर्ण ब्यौरेवार कार्यक्रम तैयार करके लोगों को भारत के, हमारे आश्रम के और निश्चय ही, होलिकोत्सव की मौज-मस्ती और उससे जुड़े समारोहों के प्रत्यक्ष अनुभव का अवसर प्रदान करने की योजना बनाई है!

जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दूँ कि होली भारत के दो सबसे बड़े वार्षिक त्योहारों में से एक है! वास्तव में यह रंगों का विशाल समारोह है और जबकि, सारा भारत इसे वसंत ऋतु में सिर्फ एक दिन मनाता है, यहाँ, वृंदावन में सारा शहर पूरे एक सप्ताह तक रंगों में सराबोर रहता है!

साल का यह सबसे अनोखा समय होता है जब आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे आपका बचपन पुनः लौट आया हो! आप एक-दूसरे को छका सकते हैं, मूर्ख बना सकते हैं, अपने कपड़ों की चिंता किए बगैर एक-दूसरे पर रंग डाल सकते हैं, उनके चेहरों पर रंग मल सकते हैं!

हमारे होली रिट्रीट कार्यक्रम के ज़रिए आप भारतीय संस्कृति का आंतरिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे-जिसकी शुरुआत होगी आश्रम में आयोजित स्वागत समारोह से और उसके पश्चात एक गाइड के साथ वृंदावन शहर के विस्तृत भ्रमण का इंतज़ाम भी होगा, जिससे आप उस धार्मिक और ऐतिहासिक शहर को आतंरिक रूप से जान-पहचान सकें, जहाँ आप अगले एक या दो सप्ताह रहने वाले हैं। उसके बाद आप देखेंगे कि वृंदावन के मुख्य मंदिर में होली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है, कैसे हम खुद प्राकृतिक ताज़े रंग तैयार करते हैं और उसके बाद होली के अंतिम दिन, आश्रम में आप स्वयं होली समारोह में हिस्सा ले सकेंगे। हमारे आश्रम के निजी समारोह में आप पूर्णतः सुरक्षित वातावरण में होली की मौज-मस्ती, हुड़दंग और उसकी दीवानगी में सराबोर हो सकेंगे!

होली का त्यौहार संपन्न हो जाने के बाद आपकी छुट्टियाँ कुछ शांतिपूर्वक बीतेंगी किंतु खातिर जमा रखें, ज़रा भी कम रोमांचक नहीं होंगी! अब आप हमारे स्कूल का दौरा करेंगे और स्कूल के बच्चों से मिलेंगे, यशेंदु के साथ प्रश्नोत्तर चर्चा में भाग लेंगे, जहाँ आप अपने मनचाहे सवाल पूछ पाएँगे और निश्चय ही, ताजमहल देखने हेतु आगरा भी जाएँगे! भारतीय मसालों के प्रदर्शन होंगे, जिसमें आप जान सकेंगे कि कौन से मसाले आश्रम के भोजन में ऐसा लाजवाब स्वाद भर देते हैं और आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में आप इन व्यंजनों को खुद अपने घर में बनाना सीख सकेंगे। समारोह-कार्यक्रम का अंतिम पड़ाव, होगा शाम को यमुना नदी के किनारे आयोजित होने वाले अग्नि अनुष्ठान के साथ और उसके पहले थोड़ी-बहुत खरीदारी होगी और शहर का एक और चक्कर लगाया जाएगा। उसके बाद एक बिदाई पार्टी होगी और फिर आप अपने दिल में यहाँ की सुखद यादों को लेकर अपने-अपने गंतव्य-स्थानों की ओर प्रस्थान करेंगे।

इस बीच हर दिन योग-सत्र आयोजित किए जाएँगे और आपको आश्रम में आराम करने का, आयुर्वेदिक मालिश और इलाज करवाने का, बच्चों के साथ मिलने-जुलने और खेलने का, वृंदावन के बाज़ारों की रंगीनियों में खरीदारी करने का और आसपास के वातावरण का जायज़ा लेने का भरपूर वक़्त भी मिलेगा!

इस होली रिट्रीट में हम चाहते हैं कि होली समारोह की मौज मस्ती के साथ आपको भारत की आश्चर्यजनक संस्कृति में यह एहसास भी हो कि आपका ध्यान रखा जा रहा है-और हम अभी से आपके साथ रंगों में तरबतर होने का इंतज़ार कर रहे हैं!

यहाँ आप होली रिट्रीट-2016 के सभी विवरण प्राप्त कर सकते हैं!

और यहाँ आप पिछले होली समारोह के चित्र देख सकते हैं।

एक और समारोह, जिसने बच्चों को आश्चर्य में डाल दिया – 19 अक्टूबर 2015

कल मैंने आपको शनिवार को संपन्न अपने जन्मदिन समारोह के बारे में बताया था। असल में पार्टी सुबह-सुबह बच्चों के भोजन और उनके लिए एक अनपेक्षित विस्मय के साथ शुरू होने वाली थी। लेकिन शनिवार को वृंदावन के एक इलाके में चुनाव होने वाले थे और क्योंकि हमारे स्कूल के कई बच्चे उसी इलाके से आते हैं, उनकी उस दिन की छुट्टी घोषित कर दी गई थी। लिहाजा वे उस दिन पार्टी में शामिल न हो सके और हमें एक बार और पार्टी आयोजित करने का मौका मिल गया-और इतना ही नहीं, इस समारोह में एक और सुयोग का आनंद भी सम्मिलित हो गया: थॉमस और आइरिस के भारतीय विवाह की दसवीं वर्षगाँठ के उत्सव का आनंद!

आज सुबह बच्चे आए तो यही सोच रहे होंगे कि रोज़ की तरह वह भी एक सामान्य दिन होगा लेकिन वे आश्चर्य में पड़ गए जब उन्हें भोजन के लिए पुकारा गया और उन्हें पता चला कि यह कोई सामान्य भोजन नहीं है, हम और हमारे मेहमान पहले से वहाँ मौजूद थे और उन लोगों का इंतज़ार कर रहे थे कि बच्चे आएँ और भोजन शुरू किया जाए! इस तरह हम सबने एक साथ दोपहर का भोजन किया और उसके बाद, जब सब खा-पीकर निपट गए और पुनः एकत्र हुए, बच्चों के लिए एक और आश्चर्य इंतज़ार कर रहा था: जी हाँ, सारे बच्चों को नए बस्ते प्राप्त हुए!

यह मेरे परिवार और मेरे मित्रों द्वारा मुझे दिया गया जन्मदिन का उपहार था! उन्होंने हर बच्चे के लिए पहले ही एक-एक बस्ता बनवाकर रख लिया था, जिन्हें अब हम वितरित कर सकते थे। लेकिन सबसे बड़ा उपहार तो मुझे मिला था बच्चों के चेहरों पर खिली मुस्कुराहटों के रूप में! जिस तरह वे अपने नए बस्तों को हाथ में लेकर उलट-पलट रहे थे, जाँच रहे थे कि नए बैग में क्या-क्या नई खूबियाँ हैं, हर ज़िप को खोलकर देखते थे कि नए बस्ते में पहले के मुकाबले कितनी जगह है, उसे देखकर मैं भाव विभोर हो गया!

लेकिन सिर्फ मेरे जन्मदिन के कारण ही हमने आज के दिन को इस तरह नहीं मनाया! असल में आज का दिन एक और संयोग के कारण खुशी और समारोह का एक ख़ास दिन बन गया था: आज थॉमस और आइरिस के भारतीय विवाह की दसवीं सालगिरह थी। विश्वास नहीं होता कि इतना समय गुज़र गया, मगर वास्तव में आज से दस साल पहले थॉमस और आइरिस पहली बार हमारे आश्रम आए थे। यह सन 2005 की बात है, जब जर्मनी में हम एक-दूसरे से मिले थे और हमें एक-दूसरे को जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। फिर उन्होंने भारत की यात्रा की और हमारे यहाँ आए। और यहाँ उन्होंने भारतीय पद्धति से विवाह किया था-और, स्वाभाविक ही, हमें उस दिन को भी समारोह पूर्वक मनाना था!

इस प्रकार, एक तरह से वह बर्थडे और शादी की वर्षगाँठ की तीसरी सम्मिलित पार्टी थी जिसे हमने बच्चों के साथ साझा किया!

ऐसा शानदार परिवार और ऐसे खूबसूरत दोस्त पाकर मैं अभिभूत हूँ-और यह बड़ी ख़ुशी की बात है कि मैं इस ब्लॉग के ज़रिए आपके साथ भी इस ख़ुशी को साझा कर पा रहा हूँ! मुझे आशा है कि किसी दिन आप भी हमारे किसी समारोह में सम्मिलित होंगे!

साल गिनना भूल कर, जीवन से प्यार करते हुए जन्मदिन मनाना! 14 अक्टूबर 2015

आज फिर वह दिन आ गया है जब मैं अपनी उम्र के सालों की गिनती बदलता हूँ। आज मेरा जन्मदिन है-14 अक्टूबर। और आपके पूछने से पहले ही बता दूँ कि मैं कल से एक दिन भी अधिक बड़ा महसूस नहीं कर रहा हूँ!

मैं जानता हूँ कि मैं पहले भी इस बात का ज़िक्र कर चुका हूँ, और शायद किसी जन्मदिन के दिन ही, कि यह संख्या, जो आप किसी को अपनी उम्र की जानकारी देते हुए बताते हैं, मेरे लिए विशेष महत्व की नहीं है। कुछ दिन पहले रमोना ने हमारे किसी मेहमान को हँसते हुए बताया, ‘आप उनसे उनकी उम्र पूछेंगे तो वे कम से कम 2 मिनट सोचेंगे कि वे वास्तव में कितने साल के हैं!’

वास्तव में, जितना व्यस्त मैं रहता हूँ, उतना व्यस्त रहने लायक युवा मैं आज भी महसूस करता हूँ और अपने अनुभवों के अनुरूप पर्याप्त उम्रदराज भी महसूस करता हूँ। मैं उम्र की इस संख्या को मुझे निर्देश देने की आज़ादी क्यों दूँ कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए या कैसा व्यवहार करना चाहिए? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उम्र के हिसाब से मैं दूसरों से अपनी तुलना भी नहीं करता। अगर मैं यह करने लगूँ तो यह बड़ा पेचीदा मामला हो जाएगा: मेरे कुछ पुराने सहपाठी आज दादा-दादी या नाना-नानी बन चुके हैं जब कि मेरे कुछ मित्र हैं जो अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं, अभी किसी संबंध में मुब्तिला ही हो रहे हैं या समय के ऐसे ही किसी पड़ाव पर हैं जिसे मैं पहले ही पार कर चुका हूँ! इसलिए तुलना करना ही बेमानी हो जाता है?

नहीं, जीवन के इस पड़ाव पर मैं बहुत खुश हूँ। मैं अक्सर रहता ही हूँ। मेरे पास मेरा परिवार है, शानदार दोस्त हैं, मैं अपने काम में पर्याप्त व्यस्त भी रहता हूँ, मेरा काम भी अच्छी तरह तरक्की कर रहा है और मैं अपने अच्छे स्वास्थ्य का पूरा आनंद भी ले रहा हूँ। फिलहाल, जब कि रमोना और मैं यह लिख रहे हैं, मुझे हँसी आ रही है क्योंकि मेरी बच्ची मेरे पीछे खड़ी अपने चाचा के साथ ठिठोली करते हुए हँस रही है। अब जीवन की इस सुनहरी धूप में मैं अपने आपको बूढ़ा महसूस करने की सोच भी नहीं सकता!

आज सबेरे वह बड़ी खुश और उल्लसित थी, उसने मुझे जगाकर कहा कि आज मेरा जन्मदिन है। उसने रमोना को बताया कि वह बहुत सारा केक खाएगी-लेकिन फिर रमोना से उसने सुना कि पार्टी का आयोजन थॉमस और आइरिस के आने के बाद, सप्ताहांत में किया जाएगा! बाप रे! यह सुनकर अपरा बहुत गुस्सा हो गई और शिकायती स्वर में तुरंत उसने कहा कि नहीं, पार्टी आज ही होनी चाहिए, शनिवार को नहीं। रमोना ने समझाने की बहुत कोशिश की कि पार्टी का मज़ा लेने हमारे दोस्त भी आ रहे हैं लेकिन अपरा का तर्क था कि वे उसकी बर्थडे-पार्टी में आ सकते हैं!

रमोना ने हाथ डाल दिए: ‘ओके ओके, हम आज भी एक छोटी सी पार्टी रख लेते हैं और…शनिवार को बड़ी वाली रख लेंगे!’ यह गलत रणनीति सिद्ध हुई! इसका बड़ा तगड़ा विरोध हुआ: ‘नहीं! बड़ी पार्टी आज ही होगी, बड़ा केक भी आज ही आएगा क्योंकि बर्थ डे भी आज है!’ खैर, तो हम आज भी एक पार्टी रख रहे हैं और एक शनिवार को भी रख लेंगे!

पार्टी के लिए हम वैसे भी कभी मना नहीं करते! और मैं अभी से बहुत सारी पार्टियों का इंतज़ार करने लगा हूँ!

धर्म, सेक्स, ईश्वर और आपके पूर्वजों के बीच क्या संबंध है? 13 अक्टूबर 2015

आज से नवरात्रि की शुरुआत है, जो हिंदुओं का एक पवित्र त्योहार है और कई दिनों तक चलता है। यह बताने के स्थान पर कि इन नौ दिनों में हिन्दू क्या करते हैं, मैं आज आपको बताऊँगा कि वे क्या नहीं करते: सेक्स। जी हाँ, और इसे 15 दिन और खींचकर लंबा कर दिया जाता है, जो दोनों मिलाकर 24 दिन हो जाते हैं और माना जाता है कि अच्छे, आस्थावान हिन्दू इन 24 दिनों में संभोग नहीं करते। गजब!

असल में इस बात का एहसास मुझे हाल ही में एक मित्र के साथ बातचीत के दौरान हुआ। वह उच्च जाति का धार्मिक व्यक्ति है और हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों का सख्ती के साथ पालन करता है। बातचीत के दौरान उसने बताया कि दो हफ्तों से उसने सम्भोग नहीं किया है। अपने जीवन में वार्षिक श्राद्ध के इन दो हफ़्तों के दौरान उसने कभी सेक्स नहीं किया। तभी मुझे आगामी त्योहारों में होने वाले जश्न का खयाल आया और मैंने पूछा, ‘तब तो नवरात्रि के अगले दस दिन भी तुम सम्भोग नहीं करोगे?’ उसने कहा कि नही, बिल्कुल नहीं-नवरात्रि के दिन तो बहुत पवित्र होते हैं, सम्भोग का सवाल ही नहीं उठता!

न जाने कितने हिन्दू यह पढ़कर मुझे भला-बुरा कहेंगे-नवरात्रि का पहला दिन है और इसे चर्चा के लिए यही विषय मिला!

पिछले 15 दिन का समय हर साल वह समय होता है जब हिन्दू अपने पूर्वजों को याद करते हैं। इन दिनों में वे अपने मृत पूर्वजों के लिए कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। वे मानते हैं कि इस समय उनके मृतक रिश्तेदार उनके करीब होते हैं। इन दिनों में वे कोई नया या शुभ कार्य शुरू नहीं करते क्योंकि वे मानते हैं कि यह समय अशुभ है और इसलिए उस काम में व्यवधान उपस्थित होंगे। इस समय आप जो भी करें, उसे अपने पुरखों के विचार के साथ करें। सेक्स करना उनके प्रति असम्मान होगा, उनकी अवज्ञा मानी जाएगी और ऐसा करके आप अपने माता-पिता, दादा-दादी और दूसरे पूर्वजों का अपमान कर रहे होंगे!

लेकिन आज और आने वाले नौ दिनों की बात बिल्कुल दूसरी है। नवरात्रि का समय शुभ समय है और आम हिन्दू इन दिनों में बहुत से समारोह आयोजित करते हैं, नए काम शुरू करते हैं और मानते हैं कि ईश्वर का आशीर्वाद इन कार्यों के साथ होगा और उनका परिणाम अच्छा और शुभ होगा! और वे सेक्स करके उसकी पवित्र, लाभदायक ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहेंगे!

जी नहीं, सेक्स एक पाप की तरह है, वह किसी शुभ काम को खराब कर सकता है, जो भी अच्छा काम आप शुरू करना चाहते हैं, उसमें वह व्यवधान उपस्थित कर सकता है! यहाँ, भारत में सेक्स बहुत खराब और अपवित्र काम माना जाता है! आप सोच सकते हैं कि अगर आपके मन में सेक्स को लेकर ऐसी भावनाएँ हैं तो आप सेक्स करते हुए खुद को कितना अपराधी महसूस करेंगे! धर्म के अनुसार भारत में सिर्फ वंशवृद्धि हेतु सेक्स की मान्यता है और अगर आपका उद्देश्य बच्चे पैदा करना नहीं बल्कि प्रेम के वशीभूत अपनी और अपने साथी की शारीरिक क्षुधा शांत करना है तो निश्चित ही वह सर्वथा अनुचित है!

उसके करीब आना, जिसे आप प्रेम करते हैं, उससे लिपटना, चूमना, आनंद लेना और सबसे बढ़कर, अपनी शारीरिक इच्छाओं को संतुष्ट करना आदि हर तरह से बुरा और अनुचित माना जाता है। यहाँ तक कि वे लोग भी, जो सामान्य रूप से सोचने-समझने वाले हैं और समझते हैं कि सेक्स में कोई बुराई नहीं है, सेक्स को लेकर जड़ जमाए बैठी नकारात्मक भावनाओं के चलते सामान्य दिनों में भी अपने साथी के साथ सोते हुए अपराधी महसूस करते हैं। इन पवित्र दिनों में वे सेक्स के बारे में क्या सोचते होंगे, आप कल्पना कर सकते हैं! और यह इन नौ दिनों की ही बात नहीं है, साल भर में यहाँ त्योहारों के इतने सारे शुभ दिन हैं जब-उन लोगों के लिए, जो सेक्स को पाप मानते हैं-प्रेम का यह समारोह वर्जित है।

लेकिन यह इतना गलत विचार है कि मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अपना विरोध ठीक तरह से कैसे व्यक्त करूँ! इस धरती पर मौजूद सबसे शानदार चीज़, प्रेम के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा शारीरिक मिलन, दो शरीरों का पिघलकर एक हो जाना, प्रेम के चलते होने वाली वह इंद्रियजन्य अनुभूति, वह भावना आदि, इन सभी को धर्म ने आसुरी करार दे दिया है। इन सीमाओं से हमें बाहर निकलना होगा-अपने व्यवहार के धरातल पर ही नहीं, बल्कि अपने दिलो-दिमाग से भी इन गलत विचारों को निकाल बाहर करना होगा!

प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति गलत नहीं है बल्कि बहुत सुंदर है!

आश्रम में होली – उन्मादी मगर हर तरह से सुरक्षित मौज-मस्ती – 8 मार्च 2015

होली-समारोह का समापन हो गया है! हमने रंगों के इस त्योहार पर एक बार फिर एक खास, शानदार और अविश्वासनीय रूप से बेहद रंगीन समारोह का आयोजन किया था!

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि इस पूरे समय अपरा पर होली का बुखार चढ़ा हुआ था। वह रोज़ होली खेलती और सबसे कहती कि मुझे रंग चाहिए और हमारे कर्मचारियों को भी अपने साथ मिला लेती और उनके साथ बाज़ार जाकर खुद रंग खरीद लाती! उस पर जैसे होली के उन्माद का विस्फोट हुआ था!

होली के अंतिम दिन यानी 6 मार्च को हमारे यहाँ सबसे बड़ा समारोह आयोजित किया गया था, जिसमें न सिर्फ गुलाल से बल्कि रंगीन पानी से होली खेली गई और कई रंगों के रंगीन पानी की पिचकारियों से आपस में रंगों की बौछार की गई! यशेंदु और आश्रम के कर्मचारियों ने पिछली रात फूलों को उबालकर रंगीन पानी तैयार किया था और इसलिए पानी भी पर्याप्त गरम था। लेकिन अपरा का निर्णय था कि वह सूखे रंगों से ही होली खेलेगी और वह ज़रा अलग हटकर, गीला होने से बचते हुए होली खेलती रही!

लेकिन हमारे मेहमान बेहिचक हमारे साथ रंग खेलने बाहर निकल आए! हमारी तरह उन्होंने भी होली खेलने का भरपूर मज़ा लिया और पिछले साल की तरह उनके शरीर, सारे अंग-प्रत्यंगों सहित, रंगों में पूरी तरह सराबोर होते रहे। मुख्य समारोह के समापन तक हम सब थककर चूर हो चुके थे-फिर भी कल हर व्यक्ति बाहर निकल आया था और अलसाया सा त्यौहार के माहौल का और स्वाभाविक ही, स्वादिष्ट मिठाइयों और नमकीन नाश्तों का लुत्फ़ उठा रहा था!

कल एक जर्मन महिला आश्रम आई थी और अगले महीनों के विश्रांति सत्रों के बारे में पूछ रही थी। होली के दर्मियान वह वृन्दावन में ही थी-लेकिन होली का सबसे मुख्य दिन यानी छह मार्च उसने होटल के कमरे में बंद रहकर गुज़ारा क्योंकि उसके एक दिन पहले यानी पाँच मार्च को उसके साथ एक अप्रिय घटना हो गई। दरअसल, उस दिन वह होटल से बाहर निकली थी और बाहर भीड़ ने न सिर्फ उसे अच्छी तरह रंग दिया बल्कि मौके का फायदा उठाकर उसके शरीर के साथ छेड़खानी की और उसके साथ कई तरह से अभद्र व्यवहार भी किया। ऐसी भीड़भाड़ में, जब लोग होली के हुड़दंग में उन्मत्त हो चुके हों, ऐसी बातें होती ही रहती हैं-और महिलाएँ, कमरे में बंद रहने के अतिरिक्त, इस मामले में विशेष कुछ नहीं कर सकती। यह बड़े दुर्भाग्य और शर्म की बात है!

इसी कारण ट्रेवल एजेंसियों और ऑनलाइन ट्रेवल फोरम्स ने महिलाओं को आगाह करना शुरू कर दिया है कि मुख्य होली के दिन वे बाहर न निकलें अंदर ही रहें या फिर अपने जान-पहचान वाले समूह के साथ, गेस्ट हॉउस में ठहरे परिवारों के साथ या अन्य आपसी लोगों के साथ ही होली खेलें, सड़क पर निकलकर बाहर नहीं।

हमें ख़ुशी और सन्तोष है कि हमारे आश्रम में हम विदेश से आने वाले मेहमानों को सुरक्षित वातावरण में होली के संपूर्ण हुड़दंग का मज़ा लेने का मौका प्रदान करते हैं और वह भी यहाँ, वृन्दावन जैसी होली के लिए मशहूर जगह में। जी हाँ, हम सब पागलों की तरह होली खेलते हैं, सब एक-दूसरे की ओर दौड़ते-भागते फिरते हैं, बच्चे बनकर एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं-मगर हम कितना भी बहक जाएँ, हम जानते हैं कि किस तरह हर हाल में सामने वाले का सम्मान अक्षुण रखा जाना चाहिए। हमारे साथ हमारे कर्मचारी, हमारे मित्र गण, हमारे मेहमान, हमारे बच्चे और हमारे परिवार होते हैं। यह काफी बड़ी भीड़ होती है लेकिन किसी की गरदन पर भी रंग मलना है तो हम सब इतना भर जानते हैं कि हर हाल में सिर्फ और सिर्फ होली का आनंद लेना है, इसके इतर कुछ भी नहीं!

और इस समारोह में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के लिए वह सिर्फ मौज-मस्ती और आमोद-प्रमोद ही बना रहता है! और अब, होली-समारोह की समाप्ति के बाद हमारे मन में उस सुखद समय की यादें हैं कि कैसे हम एक बार फिर बच्चे बन गए थे और रंगों की परवाह किए बगैर होली खेलते रहे! साल का यह सबसे बढ़िया समय होता है-और हम इस समय को दुनिया भर के अपने मित्रों के साथ गुज़ारकर और इस अनुभव में सबको सहभागी बनाते हुए, उसे सबके साथ साझा करते हुए बहुत खुश होते हैं!

अगले साल भी इसी तरह की शानदार होली खेलने का इंतज़ार हम अभी से करने लगे हैं!

इस वर्ष के होली समारोह के चित्र यहाँ देख सकते हैं

हर साल उत्तरोत्तर अधिक मौज-मस्ती – अपरा का होली समारोह – 5 मार्च 2015

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि वृन्दावन में होली की शुरुआत हो चुकी है। और अपरा इस समारोह के केंद्र में है! उसे बड़ा मज़ा आ रहा है-और हमें उससे भी ज़्यादा!

महीनों से नहीं तो भी कई हफ्तों से वह होली समारोह का इंतज़ार कर रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से उसका जोशोखरोश बढ़ता ही जा रहा है। वह लोकप्रिय होली-गीतों के वीडियो देख रही है, उन पर नाच रही है और हमें अक्सर बताती रहती है कि कैसे वह होली के दिन हम सबको रंगों से सराबोर कर देगी।

और आखिर होली का दिन आ ही गया! जब मैं अपरा को होली खेलता देखता हूँ तो मैं भी अपने बचपन की स्मृतियों में डूब जाता हूँ। जब मैंने अपने भाइयों से पूछा तो पता चला, वे भी ऐसा ही महसूस करते हैं। पिछले हफ्ते एक दिन सबेरे उठते ही अपरा ने पूछा, "आज होली है?" और जब हमने बताया कि तीन दिन बाद है तो उसने प्रश्न दाग दिया: "क्या तीन दिन बाद, आज नहीं है?" होली के पहले दिन शाम को अचानक उसके मन में क्या आया कि वह परेशान सी मेरे पास आई और दुखी स्वर में पूछा: "अब होली खतम हो गई क्या?"

मुझे भी अपने बचपन की याद आती है जब सबेरे उठते ही हम सड़क पर निकल पड़ते थे और होली खेलने लगते थे! हमारा घर मुख्य मंदिर के पास ही था, जहाँ हर वक़्त भीड़-भाड़ रहा करती थी, हर तरफ रंग-गुलाल होता था और हर वक़्त कोई न कोई होता था, जिस पर हम रंग डाल सकते थे या उस पर गुलाल फेंक सकते थे। हम सारा दिन बाहर सड़क पर होली खेलते हुए गुज़ार देते थे और सिर्फ खाना खाने घर वापस आते थे।

रात को, जब हम सोते थे तो अपनी पिचकारी हाथों में लिए ही सो जाते थे। रात भर के लिए भी उससे अलग होना हमें गवारा नहीं होता था!

वृन्दावन में होली कई दिन मनाई जाती है और होली के पहले ही दिन से ही अपरा रंगों से खेल रही थी! सड़क के नज़दीक जाकर पहले वह गुलाल से होली खेलती रही। दूसरे दिन हमारे आश्रम में कई तरह के रंगों के युद्ध का खेल खेला जा रहा था-और न सिर्फ अपरा और दूसरे लड़के बल्कि रमोना, यशेंदु और मैं भी रंगों में सराबोर हो गए थे। उसके अगले दिन हमने सोचा उसकी पिचकारी पहली बार रंगीन गरम पानी से भर दी जाए-और उससे मौज-मस्ती में और इजाफा हो गया! कल उसका चाचा पूर्णेन्दु वापस आया और हमारे साथ होली के खेल में शामिल हो गया। इसके अलावा बहुत से मेहमान तो थे ही। मैं तो आज की रंगीन धींगा-मस्ती और आमोद-प्रमोद का इंतज़ार कर रहा हूँ और उसके बाद कल तो इस हुड़दंग और मौज-मस्ती का चरमोत्कर्ष होना ही है!

मुझे यह भी याद आया कि जब होली -समारोह का समापन हो जाता था तो हम किस कदर दुखी हो जाते थे-लेकिन, फिलहाल, दुखी तब होंगे जब वह समय आएगा! अभी तो अपनी सलोनी बच्ची को लेकर अपने आपको रंगों में झोंक देने का समय है, होली की शुरुआत है! अब वह इतनी बड़ी हो गई है कि खुद अपने दोस्त ढूँढ़कर उनके साथ होली खेलती है! इस होली में वह त्यौहार को बेहतर समझने लगी है और हर साल यह आनंद बढ़ते ही चले जाना है!