आश्रम आने के विषय में पूछताछ का एक उदाहरण, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया – 5 नवंबर 2015

कुछ लोगों ने यह जानने में रुचि दिखाई है कि जब हम लोगों को आश्रम न आने के लिए प्रेरित करने की कोशिश करते हैं तो ठीक-ठीक क्या करते हैं। मैं आपके सम्मुख धार्मिक उद्देश्य से वृंदावन आने की इच्छुक एक महिला के साथ हाल ही में हुए वार्तालाप का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

दरअसल ज़्यादातर हम इसी कारण ‘नहीं’ कहते हैं। वैसे आजकल इस बारे में पूछताछ पहले से बहुत कम हो गई है क्योंकि हमने अपनी वेबसाइट पर ही इन बातों को साफ-साफ लिख रखा है। लेकिन फिर भी कभी-कभार हमें ऐसे ईमेल मिल ही जाते हैं और उन्हीं का एक उदाहरण नीचे दे रहा हूँ।

पूछताछ करते हुए उसने हमें ईमेल भेजा जिसमें ‘यहाँ आने का कारण’ लिखा था:

वृंदावन की यात्रा करना सदा से मेरा सपना था। मुझे आशा है कि ईश्वर की कृपा से मैं यह यात्रा कर सकूँगी। आश्रम आकर और कुछ दिन वहाँ आश्रम का जीवन बिताकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। मैं वहाँ के मंदिरों में भगवान के दर्शन करना चाहती हूँ, हरिनाम जपना चाहती हूँ और परिक्रमा करना चाहती हूँ।

उसका इतना भर बताना हमारे लिए पर्याप्त था कि हमारी पटरी नहीं बैठ पाएगी। इसलिए हमने उसे यह जवाब भेजा:

आश्रम आने की इच्छा प्रकट करने के लिए हम आपका शुक्रिया अदा करते हैं। हमें आपकी पूरी जानकारी प्राप्त हो गई है।

दुर्भाग्य से हमें नहीं लगता कि हमारा आश्रम आपके निवास के लिए उपयुक्त स्थान होगा। हम अधार्मिक और नास्तिक लोग हैं और ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते।

हमारे यहाँ किसी तरह का कोई धार्मिक समारोह नहीं होता और न ही पूजा-पाठ इत्यादि की कोई व्यवस्था है।

हमे पूरा विश्वास है कि वृंदावन में आपको कई दूसरे स्थान मिल जाएँगे जहाँ आप प्रसन्नतापूर्वक रह सकेंगी क्योंकि वे अपने यहाँ आध्यात्मिक वातावरण और दूसरे धार्मिक व्यक्तियों का साथ सुनिश्चित करते हैं।

क्योंकि हम नास्तिक हैं, ईश्वर को नहीं मानते, हमें लगता है कि आप वास्तव में हमारे यहाँ उपलब्ध वातावरण में प्रसन्न नहीं रह सकेंगी। हमारा अनुभव है कि धार्मिक कारणों से वृंदावन आने वाले लोग हमारे यहाँ आकर प्रसन्न नहीं होते और हमारे दूसरे मेहमानों को अपने दृष्टिकोण से प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। उन्हें धार्मिक चर्चा आदि में ज़्यादा रुचि होती है और हमारे यहाँ चर्चा का विषय अक्सर इसके विपरीत होता है। हमारे विचार में यह स्थिति दोनों पक्षों के लिए सुविधाजनक नहीं होगी।

बहुत सादा और स्पष्ट लेकिन इसके बाद भी इतना नम्र और संजीदा कि किसी को बुरा न लगे। तो इस तरह की पूछताछ पर हम उपरोक्त आशय का जवाब लिखने की कोशिश करते हैं।

आध्यत्मिक मूर्खता, जिसका दावा है कि सी-सेक्शन माँ और बच्चे के बीच के लगाव को बाधित करता है – 12 अगस्त 2015

कुछ समय पहले रमोना ने अपनी फेसबुक वाल पर एक टिप्पणी पढ़ी और ऊँचे स्वर में उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा, ' आध्यत्मिक मूर्खता!' उसके स्वर में हल्का सा तिरस्कार का भाव था, जिसे सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ और मैंने पूछा, 'ऐसा क्या पढ़ लिया भई!' उसके किसी जान-पहचान वाले ने एक पोस्ट की थी, जिसमें महिलाओं को सलाह दी गई थी कि वे बच्चे को प्राकृतिक रूप से जन्म दें, न कि सी-सेक्शन द्वारा बच्चा पैदा करने का निर्णय लें। टिप्पणी में उनसे दर्द से बचने के लिए लगाया जाने वाला एपिड्यूरल लगवाने के लिए भी हतोत्साहित किया गया था। कारण? उसके अनुसार, महिलाएँ प्रसव-पीड़ा के ज़रिए ही अपने बच्चे से घनिष्टता के साथ जुड़ पाती हैं और इसलिए एपिड्यूरल या सी-सेक्शन द्वारा प्रसव माँ और बच्चे के बीच विकसित होने वाले लगाव में बाधक होता है।

खैर, मेरी पत्नी सोशल नेटवर्क पर चर्चा करने में ज़्यादा रस नहीं लेती इसलिए वहाँ उसने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन बाद में हमने इस विषय पर जो बातें कीं, वे उस पोस्ट को पूरी तरह ख़ारिज कर देती हैं।

निश्चित ही, यह तो हम जानते हैं कि इन विचारों का उद्गम स्थल कहाँ है: आजकल बच्चे की पैदाइश के दिन और समय का पहले से चुनाव करने का नया चलन शुरू हो गया है और जब बच्चे का वज़न एक ख़ास सीमा तक बढ़ जाता है तो उसे शल्यक्रिया द्वारा सी-सेक्शन के ज़रिए सुरक्षित रूप से बाहर निकालना संभव हो जाता है। ऐसी भी औरतें हैं जो प्राकृतिक रूप से बच्चा पैदा करने की कोशिश भी नहीं करतीं, चाहे वह दर्द के डर से हो या किसी और मनगढ़ंत कारण से।

वह व्यक्ति शायद इसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश कर रहा था। रहस्यवादी अतिशयोक्तियों और कण-कण के बीच मौजूद आध्यात्मिक संबंधों पर अपने विश्वास के चलते वह महज यह नहीं कह सकता: जन्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, उसके ज़रिए अपने शरीर में पैदा हो रहे परिवर्तनों को स्वाभाविक मानकर सहजता के साथ स्वीकार करें। नहीं, हमें उसमें प्रेम और लगाव का अतिरिक्त संचार करना चाहिए, जिससे उसे और अधिक महत्वपूर्ण और ज़्यादा आध्यात्मिक बनाया जा सके।

कुछ लोगों ने इस सिद्धांत पर शक ज़ाहिर करते हुए टिप्पणियाँ लिखीं और उसकी सचाई का प्रमाण माँगा लेकिन उसने कह दिया कि उसे प्रमाण की ज़रूरत नहीं है। यह अनुभव की बात है कि लोग उन चीजों से ज़्यादा प्रेम करते हैं, जिन्हें वे बहुत तकलीफ उठाकर प्राप्त करते हैं।

गज़ब! मतलब हर माँ, जिसके बच्चे को चिकित्सकीय जटिलताओं के चलते शल्यक्रिया द्वारा बाहर निकालना पड़ता है, चिल्ला-चिल्लाकर डॉक्टरों और रिश्तेदारों को कोसती है! क्योंकि उसे प्रसव-पीड़ा नहीं सहनी पड़ी, उसे वह दर्द अनुभव नहीं करना पड़ा, जो कथित रूप से उसके अंदर और ज़्यादा प्यार और लगाव भर देता!

भयानक प्रसव-पीड़ा के बाद पैदा हुए अपने बच्चे के प्रति माँ के उत्कट प्रेम के बारे में इस तरह बात करना बड़ा भावपूर्ण लग सकता है, जबकि वास्तविकता यह है कि वह जन्म देते समय दर्द के कारण, बल्कि कहा जाना चाहिए कि दर्द के बावजूद, अपनी सारी परेशानियाँ और लगाव भूल जाती है। लेकिन यह पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है क्योंकि इसका अर्थ यह होगा कि जो महिलाएँ सी-सेक्शन के ज़रिए या सिर्फ दर्द सहन न कर पाने के कारण एपिड्यूराल लगवाकर बच्चे पैदा करती हैं, वे अपने बच्चे से उतना प्रेम नहीं करतीं। अपने बच्चे के साथ उतना लगाव महसूस नहीं करतीं।

अपरा के जन्म के समय हमने भी सी-सेक्शन करवाया था। डॉक्टरों की बहुतेरी कोशिशों के बाद भी रमोना को न सिर्फ दर्द नहीं उठा बल्कि बच्चे को जन्म देने की पूरी प्रक्रिया के दौरान उसे किसी असुविधा का एहसास भी नहीं होता था। अंत में जब डॉक्टरों ने हमसे कहा कि प्राकृतिक प्रसव के लिए और इंतज़ार करना खतरे से खाली नहीं है तो हमने अपनी बच्ची के लिए तय किया कि वह इस संसार में शल्यक्रिया के ज़रिए ही प्रवेश करे। क्या हमें वह प्रसव-पीड़ा और लगाव अनुभव करने के लिए हृदयाघात या मस्तिष्काघात का खतरा मोल लेना चाहिए था? क्या इससे बच्चे को जन्म देने का हमारा अनुभव कम मूल्यवान हो जाता है?

जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता। और मैं सोच-समझकर "प्रसव का हमारा अनुभव" कह रहा हूँ क्योंकि मैं भी शुरू से आखिर तक इस अनुभव में सम्मिलित रहा था। जब डॉक्टर रमोना के पेट पर चीरा लगा रहे थे, मैं उसका हाथ पकड़े वहीं खड़ा था और देख रहा था कि यह आश्चर्य कैसे प्रकट होता है और कैसे मेरी बेटी पहली बार इस संसार को अपनी आँखों से देखती है।

जी नहीं, आप यह नहीं कह सकते कि अपरा से रमोना का लगाव ज़रा भी कम है, सिर्फ इसलिए कि उसने सात घंटे प्रसव-पीड़ा नहीं झेली- क्योंकि नवजात शिशु के साथ किसी भी दूसरी महिला के लगाव से उसके लगाव में मैंने आज तक कोई अंतर नहीं पाया है! आप मुझसे यह भी नहीं कह सकते अपरा का जन्म-समय किसी दूसरे बच्चे के जन्म-मुहूर्त से रत्ती भर भी कम महत्वपूर्ण है- क्योंकि हम अस्पताल में बिताए अपने समय को शुरू से आखिर तक आज भी पूरी शिद्दत के साथ याद करते हैं!

और यह बात दुनिया की हर महिला के लिए सच है। अपने बच्चे के प्रति आपका लगाव आपके प्रेम पर निर्भर है न कि प्रसव-पीड़ा के किसी ख़ास अंतराल पर!

अंत में यह कि मेरे पास एक और तर्क है, बल्कि सबसे बड़ा तर्क: मैं अपनी बेटी के साथ बहुत लगाव महसूस करता हूँ। मैंने कोई प्रसव-पीड़ा नहीं झेली, यहाँ तक कि वह मेरे पेट में भी नहीं रही लेकिन फिर भी वह मेरा अटूट हिस्सा है- इस बात से इस तथ्य पर कोई असर नहीं पड़ता कि वह किस प्रक्रिया से गुज़रकर इस संसार में आई है। पिता भी अपनी बेटी से उतना ही लगाव रखता है भई!

तो, जिन मामलों में आध्यात्मिक मूर्खताओं की ज़रूरत नहीं है, उनसे उसे दूर ही रखिए- इससे आप दूसरों को अपमानित करने से बचे रहेंगे!

क्या आध्यात्मिकता (धार्मिकता) का अर्थ यह है कि आप दगाबाजी करें फिर अपने आप को माफ़ भी कर दें? 15 जुलाई 2015

कुछ सप्ताह पहले यहाँ आश्रम के एक मेहमान के साथ मैंने एक व्यक्तिगत सलाह सत्र किया था। वह शारीरिक विश्रांति और मानसिक स्पष्टता हेतु भारत आया था और इसलिए उसने हमारे आयुर्वेद योग अवकाश कार्यक्रम की बुकिंग की थी। कार्यक्रम के अंतर्गत वह योग कक्षाओं में शामिल हुआ और आयुर्वेदिक मालिश और चिकित्सा प्राप्त की। इससे बढ़कर, उसने मुझसे बात करने की इच्छा भी प्रकट की। वास्तव में वह महज अपनी निजी गुप्त बातों और उनके चलते उसके मस्तिष्क में व्याप्त जटिलताओं को सुलझाने के उद्देश्य से सारी बातचीत करना चाहता था।

उस व्यक्ति ने अपने संबंध के बारे में मुझे बताया। वह आठ साल से एक महिला के साथ संबंध रखे हुए थे। वे एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और एक दूसरे की भावनाओं का खयाल रखते थे लेकिन कभी विवाह करने का विचार उनके मन में नहीं आया। वे जिस तरह रहा करते थे, उसी में खुश थे और उन्हें एक दूसरे के होने के बारे में किसी आधिकारिक प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं थी। पिछले तीन साल से वे एक साथ, एक छत के नीचे रह भी रहे थे।

बोलते-बोलते इसी क्षण वह थोड़ा हिचकिचाया फिर कहा, "लेकिन मैं कभी भी उसके प्रति वफ़ादार नहीं रहा था।" वह काफी समय से अपने साथी के साथ धोखेबाज़ी कर रहा था और कई दूसरी महिलाओं के साथ यौन संबंध रखे हुआ था। ये सभी संबंध उन महिलाओं से होते थे, जिनसे वह कुछ समय पहले ही मिला होता था, फिर उनके बीच एक रात का संबंध बन जाया करता था और बाद में कभी उनकी मुलाक़ात नहीं होती थी। संयोग से, एक महिला ऐसी भी थी जो दोनों की साझा मित्र थी।

अपने सलाह सत्रों में अब तक मैं बहुत से लोगों से बातचीत कर चुका हूँ और यह विषय मेरे लिए कतई नया नहीं था। इसलिए जब यह व्यक्ति चुप हुआ और उसने बड़ी आशा से मेरी तरफ आँख उठाकर देखा तो मैंने उसे वही सलाह दी, जो अक्सर इन मसलों पर देता आया हूँ: सच का दामन न छोड़ें! अगर आप किसी और से प्रेम करते हैं तो उसे अपने साथी से कहें। अगर आप यह बात छिपाते हैं तो यह भेद जहर बनकर धीरे-धीरे न सिर्फ आपके संबंधों को दूषित करेगा बल्कि आपके दिमाग को भी करेगा। समय आएगा, जब आप अपने आपको इतना बुरा समझने लगेंगे कि अपना भेद छिपा नहीं पाएँगे। अभी भी मौका है, अगर आप ईमानदारी से सारी बातें खुलकर उसे बता दें और माफी माँग लें तो संभव है, वह आपको क्षमा कर दे।

लेकिन मेरी सलाह पर उसकी प्रतिक्रिया पर मैं स्तब्ध रह गया: "ओह, मैं अपने आपको गुनहगार नहीं समझता! मैं उस तरह का आदमी नहीं हूँ। मैं अपने आपको माफ कर सकता हूँ! लेकिन मुझे डर है कि वह इतना घबरा जाएगी कि अवसादग्रस्त हो सकती है! जिस घर में हम रह रहे हैं, वह उसी का है- वह मुझे निकाल बाहर करेगी…पता नहीं, इस शहर में मैं अपना घर ले पाऊँगा या नहीं!"

चलिए, सच तो सामने आया: आध्यात्मिक रूप से यह आदमी इतना पहुँचा हुआ है कि एक महिला के साथ दगाबाज़ी करके खुद अपने आपको माफ कर सकता है और ऊपर से यह दावा भी कर सकता है कि वह उस महिला से प्रेम करता है! इससे ज़्यादा क्या स्पष्ट होना था! फिर, वह उस महिला के साथ उसके घर में रहने में अपना फायदा भी स्पष्ट देख रहा है… अब उसके दिमाग का एक भ्रम मुझे दूर करना था: अगर आप ऐसा कुछ करते हैं, जिससे आपके साथी को नुकसान पहुँचे और फिर उस बात को उससे छिपाते भी हैं तो स्पष्ट है कि आप उससे प्रेम नहीं करते बल्कि सिर्फ उसके प्रेम का लाभ उठाना चाहते हैं!

आईने की तरह साफ – क्या ख़याल है आपका?

3 तरह के लोग, जो हमारे आश्रम में रहना पसंद करते हैं – 12 फरवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हमारे पास धार्मिक रुचियों वाले कई लोगों के ईमेल आते हैं, जो हमारे आश्रम आना चाहते हैं लेकिन स्वाभाविक ही उनकी धार्मिक अपेक्षाओं को पूरा करना हमारे लिए संभव नहीं होता। मैंने यह भी बताया था कि कैसे उनके ईमेल या चिट्ठियों की पंक्तियों से या उनकी भाषा से ही आप उनके सोच की दिशा और उनके इरादे भाँप सकते हैं। यह सही है कि आश्रम आने की इच्छा व्यक्त करते हुए कभी-कभी हमें ऐसे सन्देश प्राप्त होते हैं लेकिन अधिकतर संदेश ऐसे लोगों के होते हैं, जो इनसे ठीक विपरीत विचार और भावनाएँ रखते हैं।

वास्तव में दूसरी तरह के ईमेल हमारे पास ज़्यादा आते हैं। खुले तौर पर धार्मिक लोगों के अलावा, जिनके बारे में मैंने कल लिखा था, तीन तरह के लोगों से आज आपको मिलवाना चाहता हूँ, जो हमसे आश्रम के बारे में पूछताछ करते हैं।

1) सामान्य स्त्री पुरुष जो तनाव मुक्ति की खोज में यहाँ आते हैं

पहले 'वर्ग' में वही 'मुख्यधारा' के लोग होते हैं, जो कॉर्पोरेट दुनिया की तनाव और भागदौड़ वाली ज़िन्दगी से ऊबकर और अपने काम की, घर की और आम जीवन की गुमनामी से आजिज़ आकर सुकून की खोज में यहाँ आते हैं। ये लोग जीवन में अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं और शान्ति, तनाव मुक्ति, यहाँ तक कि अपनी शारीरिक तकलीफों के इलाज के लिए यहाँ आते हैं। वे ऐसे उपाय चाहते हैं, जिनकी सहायता से उनके विभिन्न व्यसनों, शारीरिक व्याधियों का इलाज हो सके, कुछ ऐसे व्यायाम सीख सकें, जो उन्हें उनके मौजूदा दर्द से राहत प्रदान कर सकें और भविष्य में भी उन्हें होने से रोक सके।

निश्चय ही हर तरह के लोगों के लिए हमारे दरवाज़े खुले हैं क्योंकि हम जानते हैं कि योग और आयुर्वेद विज्ञान के अंग हैं, जो न सिर्फ शारीरिक व्याधियों में बल्कि मानसिक शान्ति के लिए भी बहुत उपयोगी हैं। हमारे आश्रम में कुछ दिन ठहरकर ही उन्हें बहुत लाभ हो सकता है-और हम जीवन के हर पड़ाव पर स्थित, हर स्तर के, हर क्षेत्र में काम करने वाले और हर जगह के लोगों को मित्र बनाकर और उनके बारे में जानकर खुश होते हैं!

2) स्वास्थ्य-सचेत लोग जिन्हें अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा होती है

हमसे पूछताछ करने वाले दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं, जो अपने शरीर और इस धरती के लिए निरापद वैकल्पिक जीवन-चर्या में रुचि रखते हैं। वे निरामिष, शाकाहारी, कच्चा खाने वाले, चिकित्सक, मालिश इत्यादि और वैकल्पिक चिकित्सा में दिलचस्पी रखने वाले और ऐसे ही कई तरह के लोग होते हैं। कोई भी, जो यह जानता है कि योग और आयुर्वेद उसे एक और दृष्टिकोण, अतिरिक्त ज्ञान और बहुत सी नई टिप्स और जीवन-शैली से परिचित कराएगा, उन्हें जानने-समझने में मदद करेगा, जीवन में नए परिवर्तन लाने में सहायक होगा।

हम इन लोगों का खुले मन से, बाहें फैलाकर स्वागत करते हैं और हमारे पास जो कुछ भी है, उनके साथ साझा करके खुश होते हैं और हम खुद भी उनके ज्ञान और अनुभवों से बहुत कुछ सीखते हैं। ज्ञान का आदान-प्रदान और एक दूसरे की सहायता-शानदार!

3) भारत यात्रा का सपना देखने वाले गूढ़ और रहस्यमय हिप्पी

गूढ़ और रहस्यमय बातों में रुचि रखने वाले लोग अगले वर्ग में आते हैं। ये लोग अपने आपको आध्यात्मिक या रूहानी कहते हैं लेकिन धार्मिक कहलाना पसंद नहीं करते। जो पुरुष और महिलाएँ दर्शन-शास्त्र और एक अलग तरह की जीवन-शैली में रुचि रखते हैं, जो दूसरों से, अपने समाज से अपने आपको ‘कुछ खास और अलग’ पाते हैं और उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। अपने आपकी खोज में वे अक्सर लंबी यात्राएँ करने के लिए तैयार होते है। इस बात को समझने के लिए कि आखिर वे क्या चाहते हैं, वे कौन हैं और उन्हें कौन सी बात खुश कर सकती है। वे अपने जीवन का गहरा अर्थ खोजना चाहते हैं और उसे योग और आयुर्वेद के माध्यम से समझने की कोशिश करने के लिए तत्पर हैं।

मैं हिप्पी शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ लेकिन बहुत से लोग, भले ही इस वर्ग में आते हों, अपने आपको इस नाम से जोड़ना नहीं चाहेंगे और इस ओर ध्यान नहीं देंगे। मैं जानता हूँ कि इन लोगों के लिए भी हमारे दिल खुले हुए हैं और हमें इस बात की खुशी है कि अक्सर हम इन लोगों के लिए स्वर्ग साबित हो सकते हैं, ऐसी शीर्ष जगह, भारत में आने के बाद जिनके यहाँ वे निःसंकोच भ्रमण कर सकते हैं-क्योंकि अक्सर देखा यह गया है कि यह देश उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग सिद्ध होता है। जैसा कि मैंने कल बताया, निश्चय ही हमारे आश्रम में उन्हें एक ऐसी जगह मिल जाती हैं, जहाँ धार्मिक कट्टरता और कूपमंडूकता का कोई स्थान नहीं है। इस दीवाने मुल्क से हम धीरे-धीरे उनका परिचय करवाते हैं और अपने जीवन में उन्हें शामिल करके, अपने प्यार और जीवंतता से उन्हें अपना बनाकर, हम आशा करते हैं कि उनकी तलाश में, उनकी खोज में उनकी मदद कर सकेंगे।

आध्यात्मिक होने की जगह मैं भौतिकवादी होना क्यों पसंद करूँगा – 29 जनवरी 2015

आध्यात्मिक मंडली में यह आम धारणा व्याप्त है कि भौतिकवादी न होना आध्यात्मिक होना है। जितना ज़्यादा आप आध्यात्मिक होंगे उतना ही कम भौतिकवादी होंगे। अधिकांश आध्यात्मिक लोग कहते हैं कि वे उस सीमा तक आध्यात्मिक हो जाना चाहते हैं, जिसके आगे सभी भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। मैं इस विचार का विरोधी हूँ। मैं नहीं समझता कि यह संभव हो सकता है और वास्तव में मैं तो कहना चाहता हूँ कि मैं भौतिकवादी होना चाहता हूँ।

जी हाँ, मैं भौतिकवादी होना चाहता हूँ। क्यों? क्योंकि जिन बच्चों की हम मदद कर रहे हैं, उन्हें भौतिक चीजों की ज़रूरत है! अगर हम पैसे न कमाएँ और हमारे चैरिटी संगठन को आर्थिक सहायता प्राप्त न हो तो हम किस तरह उनके भोजन, किताब-कापियों, पेन-पेंसिलों और वर्दियों या शिक्षकों की व्यवस्था कर पाएँगे?

चलिए ठीक है, मैं मानता हूँ कि भौतिक वस्तुओं को जमा करना और सिर्फ इसलिए जमा करते जाना कि आप उन्हें देख सकें या देखकर खुश हो सकें या यह सोचकर खुश हो सकें कि आपके पास कहीं न कहीं ये वस्तुएँ मौजूद हैं, ठीक नहीं है। लेकिन फिर भी हम भौतिक संसार में रह रहे हैं। आप आध्यात्म या आध्यात्मिकता के बिना ज़िंदा रह सकते हैं मगर भौतिक वस्तुओं के बगैर थोड़े समय के लिए भी जीवित नहीं रह सकते।

आप भोजन करते हैं, जो एक भौतिक वस्तु है। आप कपड़े पहनते हैं, वह भी भौतिक चीज़ है। आप अपने घर को गरम रखते हैं (गर्मियों में कूलर लगाते हैं), वह भी एक भौतिक काम है! सभी चीज़ें भौतिक वस्तुओं से ही प्राप्त होती हैं और हर कोई, जिसके पास खाना, कपड़ा या मूलभूत सुविधाओं से युक्त घर नहीं है, ठीक यही चीज़ें चाहता है: खाने-पहनने के लिए और और खुद के लिए मामूली सुविधाएँ जुटाने के पर्याप्त भौतिक साज़ो-सामान!

तो अगर आप आध्यात्मिक राह पर कदम रख चुके हैं और विश्वास करते हैं कि आपको अब हर भौतिक वस्तु की आवश्यकता को समाप्त कर देना है, तो भूल जाइए। वास्तविक आध्यात्मिकता तब प्राप्त होती है जब आप अपनी भौतिक सुख-सुविधाएँ दूसरों के साथ साझा करना सीख लेते हैं।

वारेन बफे और बिल गेट्स जैसे लोग भी-जो धार्मिक नहीं हैं, यहाँ तक कि नास्तिक हैं- अपनी आमदनी का 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा दूसरों को दान कर दे देते हैं। मेरे लिए तो वे उन आध्यात्मिक गुरुओं, धार्मिक पंडे-पुजारियों और लोगों से ज़्यादा आध्यात्मिक हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े मंदिर और आश्रम तामीर किए हैं, जब कि वे हर वक़्त दूसरों को आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाते रहते हैं, कहते हैं भौतिकता से नाता तोड़ लो! दूसरों की भौतिक दौलत को लूटकर वे स्वयं अमीर बनते हैं और खुद के आध्यात्मिक होने का दिखावा करते हैं।

अगर आप भौतिकवादी हैं और अपनी भौतिक वस्तुओं को दूसरों के साथ साझा करना जानते हैं तो आपको आध्यात्मिकता की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। जब आप दूसरों के साथ अपनी वस्तुएँ या सुख-सुविधाएँ साझा करते हैं तो ऐसी भौतिकता बहुत अच्छी है। सभी को भोजन, कपड़े-लत्ते और सुख-सुविधाओं की आवश्यकता होती है। यदि आप सिर्फ इतना सोच लें और साझा करने का महत्व समझ जाएँ तो आप सारे आध्यात्मिक उपदेशों जिन्हें अब तक आपने सीखा है तिलांजलि दे सकते हैं।

अगर आप अपनी भौतिक वस्तुएँ दूसरों के साथ साझा करना जानते हैं तो आपको आध्यात्मिकता की ज़रूरत नहीं है। लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि किसी भौतिक वस्तु की आपको ज़रूरत नहीं है क्योंकि आपने चरम आध्यात्मिकता को प्राप्त कर लिया है!

संगीत, योग, नृत्य और सेक्स का अद्भुत समन्वय! 24 अगस्त 2014

सन 2006 में ऐंग्सबका, स्वीडन में आयोजित "नो माइंड फेस्टिवल" के बारे में मैंने आपको बताया था, जहाँ मैं दो सप्ताह रहा और कई व्याख्यान दिए थे। मैंने ज़िक्र किया था कि आगंतुकों ने वहाँ बेहतरीन वक़्त गुज़ारा, वहाँ उन्हें बेफिक्र और तनावमुक्त वातावरण उपलब्ध था। और आज मैं अपने उसी विवरण को आगे बढ़ाता हूँ: उन दो हफ्तों में ढेर सारा सेक्स भी देखा गया!

जी हाँ, उत्सव के उन दो हफ्तों में बहुत से लोग एक-दूसरे के साथ बल्कि यों कहें कि अजनबियों के साथ भी सो रहे थे। वे वहाँ मौज-मस्ती करने आए थे और आप जानते ही हैं कि कौन सी बात अधिकतर लोगों को आनंद प्रदान करती है? जी हाँ, वही!

मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। वहाँ रोज़ नए प्रेमी युगल दिखाई देते थे, लोग दिन में आपस में मिलते थे, शाम को आग के चारों ओर बैठते और धीरे-धीरे नजदीक आते हुए उस ओर पहला कदम बढ़ाते। अक्सर, वे एक साथ हाथ में हाथ डाले टेंट का रुख करते। मुझे एहसास हुआ कि उनमें से कुछ लोग वहाँ सिर्फ इसीलिए आए थे।

अब जो बात मैं आपसे कहना चाहता हूँ वह बहुत महत्वपूर्ण है: जब मैं ऐसी पंक्तियाँ लिखता हूँ तो मेरे कुछ पाठक सोच सकते हैं कि मैं जिन बातों का वर्णन कर रहा हूँ, वे बुरी बातें है। कुछ यह भी सोच सकते हैं कि ऐसे आयोजन में मेरी उपस्थिति ही अनुचित थी। और, कुछ दूसरों को यह एहसास होता होगा कि मैं खुद भी इसे गलत मानता हूँ, कि मैं इस उत्सव और उसके आयोजकों की आलोचना कर रहा हूँ।

अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत सोच रहे हैं। जब मैं उन लोगों के बारे में लिखता हूँ, जो सेक्स में मुब्तिला होते हैं तो मैं सिर्फ वह लिखता हूँ जो मैंने अपनी आँखों से देखा। जब आप सुनते हैं तो आप अपने कानों से सुनते हैं। लेकिन मैं वास्तव में ईमानदारी के साथ विश्वास करता हूँ कि यह पूरी तरह नैसर्गिक और सुंदर है!

अपने शहर में आप अपने जैसा सोचने वाले जितने लोगों से मिल सकते हैं उससे कहीं अधिक लोगों आप इस तरह के आयोजनों में मिल पाते हैं! आखिर वे वहाँ आए ही इसलिए हैं कि वे भी आप जैसा ही सोचते हैं, वही चाहते हैं जो आप भी चाह रहे होते हैं! ऊपर से वहाँ कई ऐसी कार्यशालाएँ चल रही होती हैं जो आपको अपनी यौनेच्छाओं को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती हैं। उदाहरण के लिए, मैंने भी वहाँ एक व्याख्यान 'सेक्स और स्वतंत्रता' विषय पर दिया था। फिर वहाँ कुछ सेक्स सम्बन्धी कार्यशालाएँ भी चल रही थीं और कुल मिलाकर हर तरफ यही सन्देश दिया जा रहा था कि आपको अपनी भावनाओं का दमन करने की जगह उन्हें व्यक्त होने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए।

तो अगर आपको अच्छा लग रहा है, आप किसी की तरफ आकर्षित हैं और सामने वाला भी आपके प्रति यही महसूस कर रहा है तो फिर एक रात एक-दूसरे के साथ क्यों न गुज़ारी जाए? अगर यह साथ आगे बढ़ता है तो बहुत अच्छा! नहीं, तो भी कोई बात नहीं! उस उत्सव में मेरे अंदर भी अगर किसी के लिए ऐसी भावना पैदा हो जाती तो मैं भी वही करता- और उसे बुरा भी नहीं मानता! मैं उस वक़्त अकेला भी था-लेकिन एक कार्यशाला निदेशक के रूप में मेरे पास दूसरी भी कई जिम्मेदारियाँ थीं और मैं उन लोगों के साथ बहुत करीबी रिश्ते नहीं बनाना चाहता था, जिनके साथ मैं काम कर रहा था।

इतना पढ़ने के बाद अगर आप यह सोच रहे हैं कि वह उत्सव सिर्फ सेक्स के बारे में था तो मैं आपको रोकना चाहता हूँ। जैसा कि मैंने पिछले सप्ताह बताया था, सौन्दर्य से ओत-प्रोत नैसर्गिक वातावरण में वहाँ कई बढ़िया कार्यशालाएँ, व्याख्यान, योग-सत्र, पेंटिंग, बहुत सा संगीत और सुंदर नृत्य आदि के कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। एक दूसरे के साथ होने की संभावना, अपने समय का सम्पूर्ण आनंद उठाना, सिर्फ दूसरों के साथ ही नहीं खुद अपने आपसे साक्षात्कार करना। लोग वाकई वहाँ बड़े खुश थे।

उन दो हफ्तों के "नो माइंड फेस्टिवल" की मेरी यही सुखद स्मृतियाँ हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं खुद भी बहुत से लोगों से मिल सका, उन्हें जान सका। उनमें से कई मेरे बहुत अच्छे मित्र बन गए, जिनके साथ आज भी मेरे प्रगाढ़ संबंध बरकरार हैं।

नशीले पदार्थों का सेवन करने के बाद होने वाला मतिभ्रम आध्यात्मिक अनुभव नहीं है – 27 अप्रैल 2014

पिछले हफ्ते आपको मैंने अपने कुछ युवा मित्रों के समूह के साथ जंगल में बिताए सप्ताहांत के विषय में बताया था। उनमें से कुछ गाने-बजाने वाले संगीतज्ञ थे और सामान्य रूप से वे सभी भारत, भारतीय संगीत और भारतीय अध्यात्म की ओर आकृष्ट थे। और दुर्भाग्य से उन सभी की नशीले पदार्थों की मस्तिष्क को चलायमान कर देने वाली शक्तियों में भी दिलचस्पी थी, बल्कि उससे वे अभिभूत थे। इस बात ने मुझे लोगों के ‘आध्यात्मिक अनुभव’ और नशीले पदार्थों के बीच मौजूद संबंध पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया।

युवक-युवतियों के इस समूह से मैं पहली बार तब मिला था जब वे मेरे ध्यान-सत्र में शामिल होने के लिए आए थे। वे सब कार्यक्रम की समाप्ति के बाद भी रुके रहे और हम सब आपस में बातचीत करते रहे। चर्चा रोचक थी और मज़ा आ रहा था। अगले दिन वे फिर आए और हमने थोड़ा सा गाने-बजाने का आनंद भी लिया। वे विभिन्न विषयों पर मेरे विचार जानने की कोशिश करते रहे और फिर किसी ने यह सवाल दागा: क्या आप धूम्रपान करते हैं? जब मैंने कहा कि नहीं तो उन्होंने स्पष्ट किया कि वे सिर्फ तंबाकू पीने की बात नहीं कर रहे हैं।

मैंने पुनः एक बार साफ-साफ ‘नहीं’ कहा और सलाह दी कि आप लोग भी किसी तरह का नशा न किया करें।

लेकिन मैं उनके इस भ्रम का कि मैं नशा करता होऊंगा, कारण जानता हूँ: यही कि मैं भारत से हूँ, मैंने अधिकांश जीवन एक साधु की तरह जिया है, मैं एक गुफा में एकांतवास कर चुका हूँ और मैं अपने कार्यक्रमों में आध्यात्मिकता, ध्यान-योग और उससे संबन्धित विषयों पर बात करता रहता हूँ। पहले मैं भी बहुत से भारतीय साधुओं की तरह, जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि वे लोग नशा करके ‘आध्यात्मिक अनुभव’ प्राप्त करते हैं, मैं लम्बी जटायें भी रखता था। लेकिन मेरे खयाल से इन दोनों बातों का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है।

किसी ने मुझे खुलकर नहीं बताया कि वे नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, तंबाखू के बारे में भी नहीं-शायद इसलिए कि वे मेरा और मेरे विचारों का सम्मान करते थे या शायद इस डर से कि मैं उनके प्रति कोई गलत धारणा न बना लूँ। लेकिन उस दिन जंगल में, कम से कम कुछ लोग नशीले पदार्थों का सेवन कर रहे थे और सुरूर में पहले से कुछ अधिक निश्चिंत और तनाव-मुक्त लग रहे थे। अपने मन की बात बताने के लिए कुछ ज़्यादा तैयार, खुलकर हंसने के लिए, दिमाग पर ज़ोर डाले बगैर हंसने-गाने और खुशी मनाने को उत्सुक।

मुझे क्यों लगता है कि यह ठीक नहीं है? क्योंकि मैं समझता हूँ कि आप किसी नशीले पदार्थ का सेवन किए बगैर भी विचार-शून्यता, बेफिक्री, तनाव मुक्ति और खुलेपने की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं! मैं सोचता हूँ कि नशीले पदार्थ के सेवन के जरिये प्राप्त की गई यह स्थिति किसी भी तरह से आध्यात्मिक अनुभव नहीं है बल्कि महज उसका भ्रम है।

इस तरह मित्रों के उस समूह ने जाना कि वे मुझे जो समझ रहे थे, मैं वह नहीं हूँ। शायद इसीलिए इतना खुशनुमा सप्ताहांत उनके साथ गुजारने के बाद भी मेरे साथ उनका बहुत नजदीकी रिश्ता नहीं बन पाया। शायद वे मुझसे कुछ और ही अपेक्षा किए हुए थे। नशा करके बहकना, मदहोश होना और समझना कि वे आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त कर रहे हैं! माफ करें, इस पर मेरा ज़रा भी विश्वास नहीं है।

क्यों आप खुद कठपुतली बनकर अपने जीवन को किसी गुरु के हवाले करना चाहते हैं?- 22 जुलाई 2013

आज गुरु-पूर्णिमा है, जिसे आचार्य दिवस भी कहा जा सकता है। इस दिन हर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। सारा साल भले ही वह उसे भूला हुआ हो, आज के दिन वह गुरु के पास अवश्य आएगा, गुरु के पाँव पखारेगा, उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेगा और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करेगा। अगर वह बहुत दूर रह रहा है तो वह उससे फोन पर बात करेगा और उनसे आशीर्वाद लेगा। मैं खुद भी बहुत समय तक गुरु की भूमिका में रहा हूँ और इस स्थिति से वाकिफ हूँ। मैं अब बदल चुका हूँ, इतना बदल चुका हूँ कि जिस बात की मैं सालों पहले खुद अनुशंसा किया करता था उसी का आज मैं कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ। इसके साथ ही गुरुवाद के इस चलन का भी।

मैं धर्म-ग्रन्थों में लिखी बातों पर भरोसा किया करता था और उसी का उपदेश देते हुए उसका प्रचार-प्रसार करता था। वह यह कि: "गुरु के बिना आपकी मुक्ति नहीं है। मुक्ति ही मनुष्यमात्र का लक्ष्य होना चाहिए और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे जीवन भर प्रयास करते रहना चाहिए-इसलिए हर एक को चाहिए कि पहले वह एक ऐसे गुरु की तलाश करे जो उसे मुक्ति दे सकता है।"

आज मैं महसूस करता हूँ कि लोगों की यही हालत इस क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ है। भोले भाले, मासूम लोग उनके पास आते हैं और उन्हें तीन बातें सिखाई जाती हैं:

1) आपको मुक्ति तभी मिलेगी जब आप किसी को गुरु बना लें।

2) जैसे आपके एक ही पिता हो सकते हैं उसी तरह आप जीवन में सिर्फ एक ही व्यक्ति को गुरु बना सकते हैं।

3) आपको अपना सर्वस्व गुरु को समर्पित करना होगा। वह आपकी सारी ज़िम्मेदारी वहन करेगा और बदले में आपको वही करना होगा जो उसका आदेश हो।

जिस पल आप अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण करते हैं, आप अपने सारे कर्मकांड उसे अर्पित कर देते हैं। आप उसकी सलाह पर चलते हैं और अपनी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, उसके साथ ही करते हैं। उसके इस दावे पर

कि वह आपको इस मृग-माया से निकालकर मुक्ति दिलाएगा, आप अपनी सहमति से और खुशी-खुशी उसकी कठपुतली बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वाभाविक ही गुरु इसे और इसके साथ आने वाली हर चीज को पसंद करते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है। अपने शिष्यों को अपने साथ बनाए रखने के लिए वे इस नियम का प्रचार करते हैं कि किसी भी शिष्य का एक ही गुरु हो सकता है।

यह पूरी व्यवस्था ही मेरे विचार में, दुरुपयोग तथा शोषण करने के इरादे से ही बनाई गई है और यही कई दशकों से, बल्कि सदियों से हो रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों के मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रखते हैं और वे जान-बूझकर दौलत पाने और न सिर्फ अपने शारीरिक सुख बल्कि अपनी स्वैर, अप्राकृतिक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी उनका दुरुपयोग करते हैं। वहाँ होने वाले कृत्य बेहद अनैतिक और समाजविरोधी होते है।

मेरे विचार में गुरु महज एक शिक्षक होता है, जो कि उसका शाब्दिक अर्थ भी है। अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो आपको गुरु की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं स्कूल जाता था तो कक्षा के सारे बच्चे शिक्षकों को आदर के साथ ‘गुरुजी’ कहा करते थे। इस बात से कोई मतलब नहीं होता था कि वह व्यक्ति कौन है। कोई भी, जिससे आप कुछ सीखते हैं, आपका गुरु हो सकता है, भले ही वह आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो। और इस तरह आपके कई गुरु हो सकते हैं, जो भी आपको शिक्षा प्रदान करता है।

किसी की कठपुतली मत बनिए। जिससे भी आप कुछ सीखते हैं उसे आप आदरपूर्वक शिक्षक का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहिए। अपने संबंध को सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ही बना रहने दें और उसमें किसी दैवत्व के पहलू को जगह न दें।

लोग यह तर्क कर सकते हैं कि अगर आप धर्मग्रंथों और धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं तो आपको एक आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु की आवश्यकता हो सकती है। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा इसी काम में खर्च किया है। आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आखिर आप क्यों इस धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं? मेरे विचार में यह बिलकुल व्यर्थ है। आप एक ईमानदार और सुखपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। इसके लिए वेदों, कुरान या बाइबल की आपको कहाँ आवश्यकता है? उन्हें पढ़कर आप अपने ज्ञान के क्षितिज को सीमित कर लेंगे, अपने रास्ते को संकरा कर लेंगे और संदेहग्रस्त हो जाएंगे। तो अगर आपको ऐसे दर्शन की आवश्यकता ही नहीं है तो फिर धार्मिक गुरु की आवश्यकता क्यों होगी?

अपने गुरु आप खुद बनिए। आपका प्रेम, आपकी सहज विनम्रता और नैतिकता आपकी गुरु है। यही चीज़ें आपको सही रास्ता दिखाएंगी। बस, उन्हें वैसा करने आज़ादी दे दीजिए।

अतीत में धर्म क्रूर थे और आज भी वैसे ही हैं – 9 अप्रैल 2013

कल मैंने उन पुरातन धर्मों के बारे में लिखा था, जिनसे आजकल कुछ लोगों को बड़ा मोह हो गया है। यह अजीब बात है कि वे उनके क्रूर और भयावह पहलुओं को बड़ी आसानी से भूल जाते हैं या उन्हें अनदेखा करते हैं। जब वही आदिम क्रूरताएँ और सांस्कृतिक विश्वास उन्हें आज दिखाई देते हैं तब वे ऐसा नहीं करते!

उस आदिम धर्म या आदिम विश्वास को ढूंढने आपको अतीत में बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा। सिर्फ अफ्रीका के आदिवासियों के बीच जाएँ, जहां आज भी लोग पत्थरों और पेड़-पौधों के प्रेतात्माओं में विश्वास रखते हैं, जहां आज भी छोटी-छोटी बच्चियाँ और युवा औरतें खतने की यातना सहन करने के लिए मजबूर की जाती हैं। ऐसा वे इसलिए करते हैं कि वैसा आदिकाल से किया जा रहा है। परंपरा से, संस्कृति के नाम पर और अंत में पुरातन काल से चले आ रहे विश्वासों के कारण। हो सकता है आप उन्हें उस अर्थ में धर्म न मानें क्योंकि उसके नियम लिखे हुए नहीं हैं, लेकिन वे मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रसारित होते रहे हैं इसलिए दोनों में कोई अंतर नहीं हैं, वे भी धर्म ही हैं।

संभव है आप उसे सुदूर अतीत का होने के कारण कंधे उचकाते हुए कहें कि वे इतने पुरातन हैं जबकि यहीं, अफ्रीका में आज भी वैसी ही भयानक वारदातें हो ही रही हैं, बच्चे भूखे मर रहे हैं, युद्ध में रोज़ हजारों की संख्या में लोग मारे जा रहे हैं। आप सोच सकते हैं कि वे अफ्रीकी आदिवासी मानो उसी आदिम अतीत के अवशेष हैं। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि ऐसी क्रूरता, परंपरा और विश्वासों की वही भयावह क्रूरता आगे फैलती हुई आज के, आधुनिक और विश्व के सबसे बड़े धर्मों का भी अभिन्न हिस्सा बन गई है!

ज़रा सऊदी अरब जैसे देशों पर गौर करें! हाल ही में एक बदमाश ने एक व्यक्ति को चाकू मार दिया जिसकी चोट से वह व्यक्ति लकवाग्रस्त हो गया। वहाँ इस्लामिक शरिया कानून लागू हैं जिनके अनुसार वहाँ के न्यायाधीशों ने उस अपराधी के लिए ऐसी भयानक सज़ाओं का प्रावधान किया जिसमें उसके मेरुदंड को चोट पहुंचाना शामिल था ताकि अपराधी भी किसी तरह लकवाग्रस्त हो जाए। आँख का बदला आँख, और खून का बदला खून!

इस दुनिया में ऐसी भी जगहें हैं जहां औरतें खरीदी बेची जाती हैं क्योंकि धर्म कहता है कि मर्दों के लिए औरतें किसी जिंस की तरह एक संपत्ति ही हैं। इसी दुनिया में ऐसी जगहें हैं जहां औरतों को मारा पीटा जाता है क्योंकि धर्म उनके माता-पिता और पतियों को आदेश देता है कि अगर औरतें आज्ञाकारी नहीं हैं तो उन्हें अनुशासन में रखना उनका कर्तव्य है। मैं कह रहा हूँ 'इस दुनिया में कुछ जगहें', और इससे ऐसा लगता है जैसे ऐसी जगहें कहीं सुदूर इलाकों में हैं। अगर मैं कहूँ कि ऐसा यहीं, आपके आसपास, चारों तरफ हो रहा है तो आप अनुभव करेंगे कि वाकई दुनिया के बहुत से लोगों के लिए यह एक दर्दनाक यथार्थ है! आप इन्हें देखकर अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते!

क्रूरता, रक्तपात और युद्ध सभी धर्मों के अभिन्न हिस्से हैं। ईसाइयों की बाइबल में भी बहुत से क्रूर वाक्य हैं और हिंदुओं के विभिन्न धर्मग्रंथों में भी। आप उन धर्मग्रंथों की अच्छी बातों का हवाला देकर यह नहीं कह सकते कि आप सिर्फ उन अच्छी बातों का ही अनुकरण करते हैं। अगर आप किसी धर्म को मानते हैं तो फिर क्रूरता भी उस धर्म का हिस्सा है जिसका आप अनुकरण करते हैं क्योंकि आपका धर्म उन्हीं धर्मग्रंथों पर आधारित है।

अपने आपको धर्म की उस क्रूरता से अलग करने का सिर्फ और सिर्फ एक उपाय है और वह यह कि आप अपने आपको उस धर्म से ही अलग कर लें।

मेरा यह अटूट विश्वास है कि अधिकांश लोग किसी न किसी दिन यह अवश्य करेंगे और यह भी कि आज जिस रूप में हम धर्म को जानते हैं, वह अपना महत्व खो देंगे और अंततः समाप्त होकर इतिहास के गर्त में समा जाएंगे, जैसा कि उनके पहले के धर्मों के साथ भी हुआ है।

केल्टिक और अमरीका के मूल निवासियों की आध्यात्मिकता पर मुग्ध हैं? उनकी रक्तपिपासु क्रूरता पर भी गौर करें! – 8 अप्रैल 2013

शुक्रवार को हिमालय यात्रा पर गए सहभागी वापस आए। कुछ ऋषिकेश में रुक गए थे, जहां से उन्हें आगे की यात्रा करनी थी और बाकी आश्रम वापस आ गए। कल हमारे अंतिम मेहमान, हमारे मित्र सिल्विया, मेलोनी, थॉमस और आइरिस ने हमसे विदा ली। उन्मुक्त, बैठे ठाले और बतकही में उनके साथ एक और दिन बिताना सुखद रहा। इस दौरान मुझे थॉमस के साथ कुछ दिन पहले हुई एक चर्चा की याद आती रही: हमारे पूर्वजों की आध्यात्मिकता और कुछ लोगों का उसके प्रति आदर युक्त सम्मोहन।

मैंने थॉमस को बताया कि मैं समझता हूँ कि वर्तमान रूप में धर्म लोगों के साथ सदा के लिए नहीं रहने वाला है। वे सहमत हुए और हम लोग उन धर्मों के बारे में बातें करते रहे जो पहले अस्तित्व में थे और आज जिनकी हम सिर्फ कहानियाँ ही सुनते हैं।

हम जानते हैं कि यूनानी पौराणिक कथाओं में विभिन्न गुणों वाले सैकड़ों देवी-देवताओं का जिक्र आता है, अर्ध-देवता, दैत्य, आदि और जब भी लोग उनके बारे में सुनते हैं, उन्हें परी-कथाओं की, डिज्ने फिल्मों की और बच्चों के कॉमिक्स की याद आती है। रोमन देवता भी लगभग वैसे ही थे और हालांकि बच्चे स्कूलों में उनके बारे में पढ़ते हैं, मगर वे भी जानते हैं कि ये सब कोरी कल्पनाएँ हैं और यथार्थ से उनका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है। लेकिन इन सभ्यताओं से भी पहले कुछ संस्कृतियाँ थीं जिनके बारे में आम तौर पर बच्चों को पढ़ाया नहीं जाता। क्योंकि उन्हें पढ़ाया नहीं जाता और लोग उनके बारे में ज्यादा कुछ जानते नहीं हैं इसलिए जब भी वे उनके बारे में सुनते हैं तो वह सब उन्हें बड़ा दिलचस्प लगता है। उन लोगों के विश्वास, हालांकि बहुत व्यवस्थित नहीं थे और उन्हें 'धर्म' कहना ठीक नहीं होगा, मगर आखिर वे भी थे तो विश्वास ही, देवी-देवताओं पर, अलौकिक शक्तियों पर और यहाँ तक कि जादू-टोनों पर और काल्पनिक ऊर्जाओं पर। बहुत से लोग उनको लेकर अति उत्साहित और मंत्रमुग्ध हो उठते हैं और अगर पहले से उनका मानसिक विकास कुछ ऐसा हुआ है कि आसानी से प्रभावित हो जाता है तो वे उन विश्वासों को सच मान लेते हैं और उन्हें लगता है कि उस जमाने के विश्वास मौजूदा विश्वासों से भी बेहतर थे। पश्चिम में जैसा माहौल है उसमें उन्हें अमरीका के मूल निवासियों के विश्वासों को लेकर ज़्यादा मोह होता है जबकि कुछ लोगों को केल्ट लोगों के विश्वास अधिक आकर्षित करते हैं। यह अभी तक जारी है। जो लोग इन बातों पर भरोसा करते हैं और उनसे प्रभावित भी हैं वे बताएंगे कि कैसे उन लोगों के पास ज्ञान का खज़ाना था और कितनी बातें, जिन्हें हम भूल गए हैं, उनके यहाँ मौजूद थीं और यह भी कि उनकी सभ्यता इस ज्ञान और विचारों की बदौलत किस तरह आज की हमारी सभ्यता से अधिक शक्तिशाली और उन्नत थी।

सदियों पहले के उन मूल निवासियों के बारे में हमारी बहुत सी दूसरी जानकारियों को वे सिरे से नज़रअंदाज़ कर देते हैं! या फिर वे शायद उनके बारे में जानते ही नहीं हैं! थॉमस और आइरिस, जिन्हें जर्मनी में केल्ट्स लोगों द्वारा छोड़े गए अवशेषों की छानबीन करने में अच्छी ख़ासी रुचि रही है, बताते हैं कि एक बार वे एक संग्रहालय में गए थे जहां उनके पुरातन काल के कर्मकांडों को दर्शाया और उनका विवरण दिया गया था। वह सब उसके बिल्कुल विपरीत था जो आम तौर पर लोग उनके बारे में समझते हैं! उनमें मनुष्यों की बलि देने का रिवाज था मृतकों के कुछ हिस्सों का वे भक्षण भी करते थे क्योंकि वे मानते थे कि ऐसा करने से वे उन मृतकों की शक्तियों को प्राप्त कर सकते हैं। वे लोग बर्बर थे और आज के मूल्यों के अनुसार उन कृत्यों को अमानवीय कहा जाता। ठीक यही बात मैंने पिछले समय के अमरीका के मूल निवासियों के बारे में भी सुनी थी।

तो आप देखें, क्या हो रहा है-जो वे नहीं जानते उसके सम्मोह में वे खुद को और दूसरों को भी विश्वास दिलाना चाहते हैं कि पुरातन समय कितना महान था, कि उस समय लोग आज के मुकाबले अधिक आध्यात्मिक थे और जीवन और दुनिया के बारे में उनकी समझ हमसे बेहतर थी। वास्तविकता यह है कि वे लोग सिर्फ प्रेतात्माओं पर भरोसा किया करते थे क्योंकि उनके पास कई चमत्कारिक प्राकृतिक घटनाओं का कोई स्पष्टीकरण मौजूद नहीं था। वे बर्बर थे क्योंकि उनकी दुनिया कबीलों और कुटुम्बों के बीच हिंसक युद्धों तक सीमित थी। वे जंगली जानवरों का शिकार किया करते थे जिससे उन्हें खाने के लिए मांस, पहनने के लिए उनका चमड़ा और औज़ार बनाने के लिए उनकी हड्डियाँ उपलब्ध होते थे।

हाँ, अगर वे कहें कि पुरातन काल में जब चीज़ें सहज और सरल थीं तब समय आसान भी था, इस लिहाज से कि लोगों को बहुत सी चीज़ें उपलब्ध नहीं थीं या जब विज्ञान ने दुनिया की बहुत सी बातों को स्पष्ट नहीं किया था और लोगों के पास आज की तरह रोज़मर्रा के काम में सहायता के लिए उपकरण मौजूद नहीं थे और जब जीवन की रफ्तार धीमी थी और इस कारण आज की तरह भागमभाग नहीं थी; तो उनकी बात मानी जा सकती है। लेकिन वह समय आज से बेहतर नहीं था- वह तो रक्तरंजित, खूंखार, ठंडा और खतरनाक समय था।