आभासी पर्दे के लिए वास्तविक इंसान को अनदेखा न करें – 17 दिसंबर 2015

आभासी पर्दे के लिए वास्तविक इंसान को अनदेखा न करें

जबकि मैं पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया के बारे में लिखता रहा हूँ और कल मैंने बताया था कि वास्तव में मैं भी उसे पसंद करता हूँ, आज मैं आपको एक ऐसी बात बताना चाहता हूँ, जिसे मैं सख्त नापसंद करता हूँ, हालांकि वह सोशल मीडिया से संबंधित नहीं है बल्कि मोबाइल फोनों, टेबलेट जैसी चीजों से संबंधित है: मैं ऐसे व्यक्ति से बात करना पसंद नहीं करता जिसका ध्यान चर्चा के दौरान अपने हाथ में पड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर केंद्रित होता है!

मैं जानता हूँ कि आधुनिक तकनीकी उपकरणों ने हजारों किलोमीटर दूर मौजूद लोगों से संवाद को इतना सहज बना दिया है कि विश्वास नहीं होता। यह कितनी अच्छी बात है कि आप अभी किसी को संदेश भेजें और एक सेकंड के बाद उसका जवाब भी पा लें। यह भी ठीक है कि ये छोटे-छोटे उपकरण आजकल मनोरंजन का साधन भी बन चुके हैं, जिन पर आप घंटों कोई खेल खेल सकते हैं या कोई फिल्म या मनोरंजक वीडियो देख सकते हैं। लेकिन जैसा कि कल अपने ब्लॉग में मैंने लिखा था, वास्तविक दुनिया हर हाल में बेहतर होती है! यथार्थ जीवन अधिक महत्वपूर्ण है! कृपा करके अपने हाथ में पड़े निर्जीव मोबाइल पर्दे के पीछे अपने सामने बैठे वास्तविक, जीते-जागते इंसान की उपेक्षा न करें!

समस्या यह है कि इन उपकरणों के और उनके साथ आने वाले सॉफ्टवेयर और एप्लिकेशन्स के निर्माता ठीक यही चाहते हैं: वे चाहते हैं कि आप उनमें इतना लिप्त हो जाएँ कि पर्दे पर टकटकी लगाए बैठे रहने के अलावा दूसरा कोई काम कर ही न पाएँ। आपमें उस उपकरण को खुद से अलग न करने की तीव्र आतंरिक इच्छा पैदा हो जाए। ऐसा होने में ही उनकी विजय निहित है। अब जो भी वे बेचेंगे, वही आप खरीदेंगे और क्रमशः अपने वास्तविक जीवन का एक हिस्सा खो देंगे क्योंकि अपने आसपास के लोगों के स्थान पर आपने अपने आपको उनके उपकरणों और उनकी नई-नई खोजों में बुरी तरह लिप्त कर लिया है।

बहुत पहले एक चर्चा में यह बात सामने आई थी कि वीडियो गेम्स बच्चों में उनकी लत पैदा कर देते हैं। लेकिन ठहरिए, सिर्फ बच्चों में ही नहीं, बड़ों में भी! मैं शुरू से बच्चों को वीडियो गेम्स से दूर रखने के पक्ष में रहा हूँ जिससे वे उसके आदी न हो जाएँ-क्योंकि भविष्य में उनके वयस्क जीवन पर भी उसका नकारात्मक असर पड़ सकता है!

लेकिन आजकल युवाओं के लिए मोबाइल प्राप्त करना सामान्य बात है। यह स्मार्टफोन होता है, जिससे वे सोशल नेटवर्क का उपयोग भी कर सकते हैं। स्मार्टफोन से उन्हें स्वतः ही अनगिनत एप्लिकेशन्स उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे दिन भर वे बिना किसी टोका-टाकी के कोई भी उपलब्ध एलेक्ट्रोनिक खेल खेल सकते हैं! गेमिंग, संदेश भेजना, फोटो साझा करना, फोटो लेना और न जाने क्या क्या मनोरंजन के साधन-और वह भी सारा दिन।

गलत अंग-मुद्राओं के कारण होने वाली परेशानियों, लगातार मोबाइल से चिपके रहने के कारण आँखों पर होने वाले नकारात्मक असर और गतिविधियों में कमी के चलते सामान्य स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक असर के अलावा यथार्थ से संपर्क टूटने की बहुत बड़ी समस्या भी पेश आती है। यही होता है, जब आप किसी से बात कर रहे होते हैं और एक बार भी उसकी आँखों में झाँककर नहीं देखते क्योंकि उसी वक़्त आप मोबाइल पर आने वाले संदेश पढ़ रहे होते हैं या उनके जवाब दे रहे होते हैं या उससे भी बुरी बात, कोई खेल खेल रहे होते हैं।

यथार्थ में लौटिए, वास्तविक बनिए, वास्तविक जीवन का उपभोग कीजिए और दूसरों के साथ वास्तविक, जीवंत संपर्क बनाइए!

इस बात को समझिए कि आपका वास्तविक जीवन आपकी ऑनलाइन दुनिया से अधिक महत्वपूर्ण है – 4 मार्च 2015

बहुत से लोग आजकल दिन का बहुत सारा समय मोबाइल फोनों और टेबलेटों पर गुज़ारते हैं। वहाँ वे कोई काम नहीं कर रहे होते बल्कि सोशल मीडिया पर यार-दोस्तों से गपशप कर रहे होते हैं। मैं नहीं समझता कि इसमें कोई बुराई है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप ऐसा न करें। लेकिन मैं यह अवश्य कह रहा हूँ कि सतर्क रहें और यह न समझें कि जो भी आप वहाँ पढ़ रहे हैं, सच ही है।

बहुत से लोगों के साथ मैंने ऐसा होते देखा है-विशेष रूप से उनके साथ, जिनकी प्रवृत्ति अपने आपको दूसरों से कमतर समझने की होती है। दूसरों की लिखी मसालेदार टिप्पणियों को, ट्वीटों को और वक्तव्यों को वे पढ़ते हैं और फिर अपने जीवन में हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं।

कुछ समय पहले की ही बात है जब लोग पत्रिकाओं में प्रसिद्ध लोगों के साक्षात्कार पढ़ते थे और सोचते थे कि उनका जीवन कितना शानदार है, उनका शरीर कितना गठीला या लोचदार है और वे किस तरह अपने प्रेमियों के साथ रहते हैं और उनके पास सफलता, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य, सब कुछ है। फिर जब एक दिन वे सुनते थे कि उस व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली तो उन्हें बहुत बड़ा झटका लगता था, वे अचंभित रह जाते थे कि इतना सुखी व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है-कोई भी यह नहीं देख पाता था कि उनका जीवन भी वास्तव में कितना दीन-हीन, कितना अभागा था। जैसा मीडिया में दिखाया जाता था, कम से कम वैसा सम्मोहक तो वह कतई नहीं था।

फिर वे अपने वास्तविक जीवन के मित्रों की ओर देखते और पाते कि वास्तविक, समस्या-ग्रस्त इंसान सिर्फ वे ही नहीं हैं। दिक्कतें, परेशानियाँ और तुनकमिजाजी सिर्फ उनके मित्रों में ही नहीं, बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली लोगों में भी पाई जाती है।

आज, सोशल मीडिया पर उन टिप्पणियों को पढ़कर आप सोच में पड़ जाते हैं कि क्या उन्हें लिखने वाले वास्तव में हमेशा प्रसन्न रहते हैं, क्या वे सम्पूर्ण रूप से निर्दोष, आदर्श व्यक्ति हैं या वास्तविक, सामान्य मनुष्य हैं। और मुझे लगता है कि यहीं पर असली खतरा विद्यमान होता है।

उन लोगों के लिए, जिन्हें दूसरों से अपने आप की तुलना करना पसंद है, इसका परिणाम यह होता है कि वे अपने आपको तुच्छ समझने लगते हैं। स्वाभाविक ही, ये दूसरे लोग, जिन्हें उन्होंने प्रत्यक्ष देखा नहीं होता, कोई प्रख्यात सेलेब्रिटी नहीं होते बल्कि उनके वास्तविक मित्र और जान-पहचान वाले होते हैं! तो उन्हें लगता है कि उनके आसपास का हर कोई वास्तव में एक शानदार दुनिया में, जैसे स्वर्ग में ही रह रहा है और एक से बढ़कर एक, मज़ेदार और सुखद बातों का अनुभव कर रहा है, सबसे इतना प्रेम और प्रशंसा पा रहा है। सिर्फ वे ही हैं, जिन्हें यह सब उपलब्ध नहीं है!

जिन्हें ऐसा महसूस होता है उन्हें मैं यही सलाह देना चाहता हूँ कि कंप्यूटर स्क्रीन से कुछ समय के लिए दूर हो जाएँ और इस आभासी दुनिया के मित्रों से वास्तविक जीवन में आमने-सामने मिलें। वास्तविक दुनिया के साथ अपना ताल्लुक बढ़ाएँ और इस बात को समझें कि आप जो चाहें, कुछ भी लिख सकते हैं और उन बातों को छिपा सकते हैं, जिनसे आपका जीवन वास्तव में प्रभावित होता है। स्वाभाविक ही बहुत से लोग अपने अच्छे, सुखद क्षणों को दूसरों के साथ साझा करना चाहते हैं, जबकि वास्तविक जीवन में, अकेले में वे बहुत बुरी परिस्थितियों का सामना कर रहे होते हैं! वे नहीं चाहते कि इस आभासी दुनिया में कोई भी उन पर दया करे, वे नहीं चाहते कि कोई भी उनके लिए सोशल मीडिया में सहानुभूतिपूर्ण शब्द लिखे, जब कि वास्तविक जीवन में उन्हें सर रखकर रोने के लिए एक कंधे की ज़रूरत है!

आभासी दुनिया बहुत शानदार है, आप उसकी सहायता से दुनिया भर के लोगों से संपर्क बनाए रख पाते हैं और देख सकते हैं कि वे क्या कर रहे हैं-लेकिन अपने वास्तविक जीवन को भूल न जाएँ, हाड़-मांस के वास्तविक लोगों से मिलें-जुलें और आप जैसे हैं, वैसे ही बने रहें, हर तरह की भावनाओं से युक्त, एक सामान्य इंसान!

क्या वास्तव में आप काल्पनिक संसार को वास्तविक संसार से अधिक वरीयता देते हैं? 18 सितम्बर 2014

कल मैंने कुछ कारण बताए थे कि क्यों आपको टीवी नहीं देखना चाहिए। मेरी नजर में टीवी देखना समय बिताने का इतना बुरा तरीका है कि जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। टीवी देखने के विरोध में कुछ और कारणों को सूचिबद्ध करते हुए आज मैं इस विषय का समापन करूँगा:

4) वह विज्ञापनों के हमले का ऐसा ज़रिया है, जिसके प्रभाव से आप मुक़ाबला नहीं रह सकते!

किसी भी टीवी सीरियल या टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्म के बीच ब्रेक लेते हुए लगातार अनेकों विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं। आप आधा घंटा भी लगातार किसी मनोरंजन का या समाचार या किसी जानकारी का या उसे समझने का लाभ नहीं उठा पाते। उन विज्ञापनों में से कुछ तो आप तक पहुँचते ही हैं और जितनी खूबसूरती, चतुराई और मक्कारी के साथ उन्हें तैयार किया गया है उसी अनुपात में वे आपके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं और अपने लक्ष्य में सफल हो जाते हैं! आपको उन वस्तुओं के विज्ञापन इतनी बार देखने पड़ते हैं कि न सिर्फ आप उन्हें अच्छी तरह जानने लगते हैं बल्कि उन पर भरोसा भी करने लगते हैं। सिर्फ बार-बार उन्हें देखते रहने के कारण। इसी तरह ये विज्ञापन आपके अवचेतन में यह एहसास पैदा कर देते हैं कि उन चीजों का आपके पास होना बहुत ज़रूरी हैं भले ही आपके लिए वे कितनी भी अनुपयोगी क्यों न हों। कोई इलेक्ट्रोनिक सामान, खाने-पीने की वस्तुएँ या बीमा पॉलिसियाँ, कुछ भी!

सच यह है कि ये विज्ञापन बेहद असरदार होते हैं। यह अपनी बात मनवाने का, दिमाग को लुंज-पुंज करके उसमें अपनी बात स्थापित करने का बहुत ही नर्मो नाज़ुक और सूक्ष्म मगर बेहद पुरअसर तरीका है, जिसके सामने आप निरुपाय हो जाते हैं! अगर आप नहीं चाहते कि आपके साथ ऐसा हो तो टीवी बंद कर दीजिए!

5) टीवी देखकर आप काल्पनिक दुनिया में खो जाते हैं और फिर जीवन के यथार्थ आपको आवसाद से भर देते हैं!

यह मुद्दा आखिरी मगर कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस पर मैं अधिक जोर भी नहीं दे पाऊँगा क्योंकि यह ऎसी बात है जिसे आप अक्सर समझ ही नहीं पाते, विशेषकर यदि आप बहुत ज़्यादा टीवी देखते हैं: वे टीवी सीरियल और फ़िल्में आपको इस तरह बाँध लेती हैं कि आप उसी में डूब जाते हैं, दूसरी बातों पर सोच ही नहीं पाते। वे महज किस्से-कहानियाँ होती हैं मगर इतनी अच्छी तरह पेश की जाती हैं, उनका निर्देशन इतना यथार्थवादी होता है कि नतीजतन आप इस तरह उनके मुख्य चरित्रों के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं कि उनकी भावनाएँ आपके साथ एकरूप हो जाती हैं! आप उनके साथ दुखी होते हैं, उनका सुख आपका सुख बन जाता है! सवाल यह है कि इसमें समस्या क्या है?

धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से आपका संपर्क कम होता जाता है। आप सोच रहे होंगे कि यह कुछ अतिवादी सोच है मगर ऐसा नहीं है! यह प्रक्रिया जो आपको काल्पनिक दुनिया में खींच ले जाती है, बहुत धीमी गति से काम करती है। इसकी शुरुआत इससे होती है कि आप कल्पना करने लग जाते हैं कि यह एक वास्तविक दुनिया है। आप रुपहले पर्दे की उस दुनिया की तुलना अपने जीवन से करते हैं तो पाते हैं कि आपकी वास्तविक दुनिया उस दुनिया से कभी भी बेहतर नहीं हो सकती!

पहली बात तो यह कि वास्तविक दुनिया कभी भी टीवी और फिल्मों की दुनिया की तरह रोमांचक, रुपहली और उत्तेजक घटनाओं से परिपूर्ण नहीं हो सकती! उसमें पूरे जीवन की कहानी दो घंटों में पेश कर दी जाती है और आपको महसूस होता है कुछ छूट रहा है! टीवी सीरियल्स में हर हफ्ते कोई न कोई मरता है, शादी करता है, किसी न किसी के साथ धोखा होता है, कोई दुर्घटना हो जाती है और बचा लिया जाता है या उसके प्रेमी के साथ उसका मिलन हो जाता है! अगर यह जीवन के बहुत करीब होगा या उससे मिलता-जुलता होगा तो वह बड़ा उबाऊ हो जाएगा और उसे देखना कोई पसंद नहीं करेगा-आखिर आप अपने जैसे किसी साधारण व्यक्ति को क्यों देखना चाहेंगे? आपने गौर किया होगा कि 'बिग ब्रदर' जैसे रियलिटी शो भी ऐसे लोगों को ही चुनते हैं जो अपने जीवन में सामान्य, साधारण लोगों से कुछ अलग होते हैं, जिससे उसे ज़्यादा से ज़्यादा 'असाधारण' और रोचक बनाया जा सके!

टीवी देखने की आदत का आखिर नतीजा क्या होता है? नतीजा यह होता है कि अपने जीवन से जिन लोगों की अयथार्थवादी और गैर मामूली उम्मीदें होती हैं वे निराश हो जाते हैं।

टीवी के पर्दे से दूर रहिए, अपने बच्चों को प्रकृति के नजदीक ले जाइए, वास्तविक दुनिया का आनंद लीजिए!

आपका समय अमूल्य है, उसे टीवी सीरियल देखकर बरबाद न करें! 17 सितंबर 2014

हम लोग इस वक़्त जर्मनी में एक सुखद और भावुक कर देने वाला सप्ताह गुज़ारकर भारत की ओर उड़ान भरने वाले हैं। दुर्भाग्य से अपरा को सर्दी और खाँसी हो गई है और बहुत छींकें आ रही हैं, बल्कि मामूली बुखार भी है। वैसे कोई ख़ास बात नहीं है और हमें विश्वास है कि हम बगैर किसी परेशानी के भारत पहुँच जाएँगे। पिछली बार लगभग पूरे सफ़र में वह सोती रही थी-और मैं भी उसके साथ सोता रहा था। और इस बीच रमोना कोशिश करती रही कि समय गुज़ारने के लिए कोई टीवी कार्यक्रम देखे मगर आखिर उसका मन नहीं हुआ। जब मेरी नींद खुली तो हम टीवी पर चर्चा करते रहे कि किस तरह वह एक व्यसन की तरह चिपक जाता है और यह भी कि क्यों मैं टीवी सीरियलों पर समय बरबाद करने को बहुत बुरा समझता हूँ। तो, ये रहे वे कारण, जिनके चलते मैं समझता हूँ कि आपको टीवी नहीं देखना चाहिए:

1) टीवी देखना समय की बरबादी है!

यह बड़ी सहज, स्वाभाविक तर्कपूर्ण बात है: इस दृश्य-यंत्र के सामने बिताए जाने वाले समय का उपयोग आप बहुत से दूसरे कामों को निपटाने, जैसे, घर की सफाई और उसे व्यवस्थित करने में कर सकते हैं। अगर इन कामों को निपटाने के बाद ही आप टीवी देखने बैठे हैं तो उसकी जगह आप मित्रों से मेल-मुलाक़ात कर सकते हैं, कुछ रचनात्मक कर सकते हैं, चित्रकारी सीख या कर सकते हैं, खेल सकते हैं, तैरने जा सकते हैं या किसी बेहतर काम में अपनी ऊर्जा खपा सकते हैं। टीवी के सामने बैठना आपको कुछ भी प्रदान नहीं करता। वह सिर्फ आपका समय गुज़ारने का काम करता है। अगर आप टीवी पर चल रहे कार्यक्रम में दिमागी तौर पर शामिल हो जाते हैं, उसमें डूब जाते हैं तो दो-तीन घंटे इस तरह गुज़ारना कोई बड़ी बात नहीं है! अगर आपके पास बहुत सारा फालतू समय है तो उसके सामने अवश्य बैठिए लेकिन अगर नहीं है तो इस चीज़ से दूर ही रहें!

2) आप इस समय का उपयोग कुछ नया सीखने में कर सकते हैं मगर करते नहीं!

लेकिन इस पर ईमानदारी के साथ सोचा जाए: जी हाँ, दुनिया को देखने-समझने के लिए टीवी से बढ़कर कुछ नहीं है। वह आपको डॉक्यूमेंटरीज़ देखने की सुविधा प्रदान करता है, दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानने का अवसर। दूसरी संस्कृतियों को गहराई से समझने के लिए, महत्वपूर्ण विषयों पर हो रही चर्चाओं से अपनी ज्ञान-वृद्धि के लिए या रोज़मर्रा जीवन में काम आने वाली वस्तुएँ कैसे काम करती हैं, जानने के लिए आप उनसे सम्बंधित टीवी कार्यक्रम देख सकते हैं। आप ऐसा कर तो सकते हैं मगर अक्सर 90% मामलों में आप ऐसा नहीं कर रहे होते।

आप टीवी का उपयोग निरर्थक मनोरंजन के लिए करते हैं। जी हाँ, ईमानदारी की बात यही है। इसलिए जब आप कोई ताज़ा सीरियल (soap opera) या रियलिटी शो देखते हैं तो यह मत कहिए कि आप अपने सोच-विचार की सीमाओं का विस्तार कर रहे हैं! आप सिर्फ यह चाहते हैं कि मस्तिष्क को कुछ सोचना न पड़े, टीवी आपका शुद्ध मनोरंजन करे और आपके मन को हल्का सा स्पर्श करता हुआ निकल जाए!

3) वह आपको-और आपके बच्चों को और ज़्यादा- आक्रामक बनाता है!

यह कोई नयी बात नहीं है और मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग यह बात नहीं मानते। लेकिन मैं मानता हूँ! ख़ासकर आपके बच्चों के सम्बन्ध में! वे आपको टीवी के सामने बैठा हुआ देखते हैं तो वे भी देखने लगते हैं। और आजकल के टीवी कार्यक्रम, ख़ास बच्चों के लिए तैयार कार्यक्रम भी, इस कदर हिंसा से भरे होते हैं कि मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरी बेटी ये कार्यक्रम देखे! जो वे देखते हैं उस पर सहज ही विश्वास कर लेते हैं, सोचने लगते हैं कि जो टीवी पर दिखाया जा रहा है वही उचित है, वैसा ही होना चाहिए भले ही उसमें लोगों को आपस में लड़ता-झगड़ता, मार-काट करता दिखाया जा रहा हो या निरुद्देश्य अति-हिंसा दिखाई जा रही हो! इसमें टीवी के कारण शारीरिक गतिविधियों में स्वाभाविक ही आ जाने वाली कमी को जोड़ लें, व्यायाम हेतु समयाभाव को जोड़ लें तो ये सब मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करते हैं जिसमें स्वाभाविक रूप से बच्चों के कोमल मस्तिष्क में हिंसा प्रवेश कर जाती है-और आप भी इससे अछूते नहीं रहते!

इस बारे में अपने कुछ और विचार मैं कल के ब्लॉग में लिखूँगा!

Friendshiplog.com – अपने मित्रों की याद को साझा कीजिए- 28 अक्तूबर 2013

मुझे लोकप्रिय होने का अनुभव रहा है। मैंने उस चमक-दमक और ऐश्वर्य को नजदीक से देखा है, जो लोकप्रिय होने के नतीजे में स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। मेरे सामने लोगों का हुजूम होता था और सभी मेरे करीब आना चाहते थे। वह सब बड़ा उत्तेजक है, जीवंत और शानदार है-लेकिन मैंने इससे एक चीज़ सीखी है: आप भीड़ के करीब नहीं हो सकते। भले ही ख्यातिप्राप्त यशस्वी व्यक्ति दिन में अपनी जयजयकार के बीच हाथ हिलाकर अभिवादन स्वीकार करते हुए गर्व से भर उठते हों मगर को शाम को उन्हें भी किसी कंधे की ज़रूरत पड़ती है, जिस पर अपना थका हुआ सिर रखकर वे सुकून पा सकें। ऐसा कोई व्यक्ति, जिसके साथ वे दिल से हंस सकें या रो सकें, अपनी भावनाओं को साझा कर सकें। ऐसा एक मित्र!

जिन लोगों को अपनी परेशानियों के वक़्त मित्र की ज़रुरत पड़ी है वे जानते हैं कि जीवन में इस संबंध (व्यक्ति) की क्या महत्ता है! इन सम्बन्धों को हर वक़्त तरोताजा बनाए रखना आवश्यक है-और इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए हमने एक वैबसाइट शुरू की है: Friendshiplog.com!

यह एक अलग तरह का सोशल मीडिया पेज है। बहुत से परिचितों, या अपरिचितों को जोड़ने के स्थान पर इसमें व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने की सुविधा है। फेसबुक पर बहुत सारे लोग नए सम्बन्धों, नए मित्रों और यहाँ तक कि नए कारोबार आदि की तलाश में रहते हैं। बहुत से लोग समझ नहीं पाते कि इतने सारे अनजान लोगों की रोज़ आने वाली फ्रेंड्ज़ रेक्वेस्ट्स का क्या करें? Friendshiplog पर आप अपने वास्तविक मित्रों से मिलते हैं, जिन्हें आप व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, उनसे प्रेम करते हैं और जिनके साथ बिताए समय की आपके पास बहुत सी साझा स्मृतियाँ हैं!

आप उन स्मृतियों को लिखकर उनका रिकॉर्ड रख सकते हैं, समझ लीजिए, डायरी के रूप में उन यादों का अभिलेख तैयार कर सकते हैं-और आप उन्हें कई भाषाओं में लिख सकते हैं! पेज के फुटर पर आप अंग्रेज़ी, हिन्दी, जर्मन, स्पेनिश और फ्रेंच भाषाओं को सिलैक्ट कर सकते हैं। अपने मित्र को उन पुराने वक़्तों की याद दिलाइए जब आपने एक साथ सुखद समय गुज़ारा था या उनकी मदद के लिए धन्यवाद दीजिए। आपके बारे में पढ़कर और यादों में बसे उन संस्मरणों को पढ़कर आपके मित्र बहुत खुश होंगे। अपने अनुभवों की कहानी लिखकर अपने मित्रों को आभासी आलिंगन में भर लीजिए।

एक छोटी सी कथा लिखने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता-दोस्ती की शुरुआत से अब तक का पूरा विवरण देने की आवश्यकता नहीं है! एक छोटी सी घटना चुनिए, कोई मज़ेदार दिन, कोई रोचक बातचीत, कोई दुखद लमहा, जब मित्र ने आपकी मदद की हो, और उसे अपने मित्र के साथ यहाँ साझा कीजिए। जब आपका मित्र उसे पढ़ेगा तो वह यादों में खो-सा जाएगा! आप उसकी खुशी की कल्पना नहीं कर सकते!

आपके संस्मरण पढ़कर दूसरे भी अपनी मित्रताओं को लेकर प्रेरित होते हैं, उन पर हंस सकते हैं या आपकी कहानी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ सकते हैं। आज की दुनिया में, जहां टीवी, अखबार और इंटरनेट नकारात्मक खबरों से भरे हुए हैं, यह वैबसाइट एक नखलिस्तान की तरह हो सकती है, जहां इन नकारात्मक खबरों के चलते अवसादग्रस्त होने पर आप अपनी और दूसरों की मित्रताओं के विषय में सकारात्मक बातें साझा करके सुकून का अनुभव कर सकते हैं। लोगों द्वारा साझा की गईं मित्रता के अटूट बंधन की कहानियाँ पढ़कर मानवता में अपनी आस्था को पुनर्जीवित कीजिए।

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