क्या करें जब चीज़ें आपके आदर्शों के अनुरूप न हों – 24 नवंबर 2015

कुछ समय पहले मैंने लिखा था कि आप कभी-कभी आदर्शवाद को खींच-तानकर यथार्थ से बहुत दूर ले जाते हैं और फिर दैनिक जीवन में दुखी होते रहते हैं। मेरा मानना है कि जीवन में अपने लिए कुछ आदर्शों का होना अच्छी बात है और सामान्य रूप से क्या सही है और क्या गलत, इस बात की स्पष्ट समझ हर एक के लिए उपयोगी और लाभदायक ही है। लेकिन यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि दुनिया आदर्श नहीं है-और बदलाव लाने की दिशा में हम सिर्फ अपने स्तर पर ही कुछ अच्छा कर सकते हैं।

और ऐसा करने की बहुत सी संभावनाएँ मौजूद हैं! सिर्फ आप अपनी नौकरी का उदाहरण लें: हो सकता है, आप वहाँ का माहौल बदल न पा रहे हों लेकिन, उदाहरण के लिए, आप कोई दूसरी नौकरी पाने का प्रयास कर सकते हैं जो आपके आदर्शों के अनुरूप हो या कम से कम उसके विरुद्ध न हो! एक शाकाहारी के रूप में आप किसी कसाई के यहाँ काम नहीं करेंगे। कार्यालय में भी नहीं क्योंकि वह आपके आदर्शों के विपरीत है। लेकिन कोई ऐसा रोजगार खोजना, जो आपके हर आदर्श के अनुसार चलता हो, असंभव है!

मैं आपके सामने एक उदाहरण रखता हूँ। मान लीजिए आप किसी ऐसी कंपनी में काम करते हैं जो आपके आदर्शों की समर्थक है और वह जगह आपकी नौकरी के लिए सबसे उचित जगह है। मान लीजिए कि वह एक दुकान है जो जैविक खाद्यों और मेलों में बेचे जाने वाली सामग्रियों का व्यापार करती है। वह पूरी तरह आपके आदर्शों के अनुरूप है-सिर्फ दुकान के एक हिस्से को छोड़कर: दुकान के एक कोने में आध्यात्मिक या अतींद्रियवादी सामान भी बेचने के लिए रखा हुआ है-टेरो कार्ड्स, क्रिस्टल बॉल्स और आधुनिक डायनों, अतींद्रियवादियों और जादुई इलाज करने वालों के लिए तरह-तरह का सामान! आप इससे सहमत नहीं हैं, आपका विश्वास है कि यह लोगों में अंधविश्वास फैलाने वाली वस्तुएँ हैं-लेकिन आपको उस सामान को भी बेचना है!

यह आदर्श स्थिति नहीं है-मगर आप अकेले एक आदर्श दुनिया निर्मित नहीं कर सकते! इस दुनिया में हर तरह की चीजों का अस्तित्व है और अगर आप अति-आदर्शवादी हैं तो दुनिया में होने वाली बहुत सी बातों से आपको परेशानी होती रहेगी! इसलिए जो बातें आदर्श नहीं हैं, उनसे चिपके रहने से बेहतर है कि जितना संभव हो अपने आदर्शों के करीब पहुँचने की कोशिश करना-और शेष बातों को जैसी भी वे हैं, स्वीकार करना!

इस तरह जितना आप सोच रहे हैं, उससे आगे आप जा सकते हैं। कोशिश करके देखें। जैसे, मान लीजिए आपको पता चलता है कि जिस बैंक में आपका खाता है, वह आपके पैसे का उपयोग अस्त्र-शस्त्रों के व्यापार में लगा रही है, जिनका उपयोग युद्धों में किया जाता है और जिसके आप समर्थक नहीं हैं-या उन परियोजनाओं में जिसे आप उचित नहीं समझते और आपके आदर्शों के विरुद्ध हैं। अगर यह बात आपको परेशान करती है तो थोड़ी खोज करके कोई ऐसा बैंक ढूँढ़िए, जो पर्यावरण या दीर्घकालिक संवहनीय परियोजनाओं में आपका पैसा लगा रहे हैं- और निश्चित ही, ऐसी बैंकें भी अस्तित्व में हैं!

कुछ ऐसी चीज़ें भी हो सकती हैं, जो आपके लिए पूरी तरह वर्जित हैं और जिन्हें आप फिलहाल बदल नहीं सकते। ऐसे मामलों में उन्हें, जैसी हैं, उसी हालत में स्वीकार करना होगा-कि इस दुनिया में हर चीज़ आदर्श नहीं है, कि कुछ मामलों में बदलाव का काम हम भविष्य में कुछ समय बाद शुरू करेंगे, जैसे लोगों के पूर्वग्रह जाते-जाते ही जाते हैं। ऐसी बातों के लिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। उनके प्रति निस्पृह न हों-मैं यह सलाह नहीं दे रहा हूँ। आप पूरी शक्ति के साथ किसी गलत बात के विरुद्ध अपने विचार पर कायम रहें और इंतज़ार करें कि जब संभव होगा तब उन्हें बदलने की कोशिश की जाएगी। लेकिन उन बातों पर उद्विग्न होकर अपनी ऊर्जा और समय बरबाद न करें, जिन्हें आप इस समय कतई बदल नहीं सकते क्योंकि उन पर आपके प्रचंड क्रोध का कोई असर नहीं होने वाला है!

उन्हें बेहतर बनाने की संभावना सदा बनी रहती है, भले ही उसका अस्तित्व लंबे समय तक बना रहे-आप स्वयं एक बेहतर उदाहरण बनकर यह काम कर सकते हैं। आपके पास आपकी ईमानदारी है और आप उसे संभालकर रखें, उसकी हिफाजत करें। आपको बेईमान होने की ज़रूरत नहीं है। अगर स्थितियाँ आपको उस तरफ धकेल रही हैं तो उन्हें बदलने का प्रयास कीजिए। अन्यथा अच्छी, सुंदर बातों का नज़ारा कीजिए और खुश रहिए।

क्या करें जब आपको नकारात्मक लोगों की संगत में रहना पड़े? 4 नवंबर 2015

दो दिन पहले मैंने आपको उन लोगों के बारे में बताया था जो भीतर से ही बेहद नकारात्मक होते हैं, इतने कि उन्हें किसी हालत में संतुष्ट नहीं किया जा सकता। कल मैंने बताया कि हमारे आश्रम आने के इच्छुक लोगों के बारे में हम पहले से पता करने की भरसक कोशिश करते हैं कि वह अपने निवास के दौरान हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं, जिससे ऐसी स्थितियों से बचा जा सके। लेकिन ऐसा हो ही जाता है कि ऐसे लोग हमारे यहाँ प्रवेश पा जाएँ। हम उनसे किस तरह निपटते हैं और जब आप अपने आपको ऐसे अत्यंत नकारात्मक लोगों के बीच पाएँ तो आप क्या कर सकते हैं।

सेवा क्षेत्र के उद्यमी होने के नाते इसे हम अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं कि अपने हर ग्राहक को संतुष्ट करें। यह एक बहुत रूखा वाक्य लगता है लेकिन यही सच है: जब हमारा काम ही है कि हम अपने आश्रम में लोगों के ठहरने की व्यवस्था करें तो चाहते हैं कि आश्रम आने वाला हर ग्राहक हमसे संतुष्ट हो! यह एक खुली दुकान की तरह है, हम उसका विज्ञापन भी करते हैं और सामान्यतया वह सबके लिए खुली है। और इसीलिए हम सभी को पूरी तरह संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

उन लोगों के साथ भी, जो हमेशा नकारात्मक रवैया रखते हैं, हम संपूर्ण व्यावसायिक कौशल और सत्यनिष्ठा के साथ पेश आते हैं। हम उन्हें भी संतुष्ट करने की पूरी कोशिश करते हैं, उनसे फीडबैक लेते हैं, उनकी हर तरह की मांग पूरी करने का प्रयास करते हैं। लेकिन जो लोग नकारात्मक होते हैं, हर बात में नुख्स निकालना जिनकी आदत होती है, वे हमेशा नकारात्मक ही बने रहना चाहते हैं। जब हमें महसूस होता है कि उन्हें संतुष्ट करना किसी भी हाल में संभव नहीं है, कि खुश होने के लिए उन्हें स्वयं बदलने की ज़रूरत है तो हम अपनी रणनीति बदल देते हैं।

स्वाभाविक ही, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने वाले के साथ आपके संबंध कैसे हैं-कि उसे संतुष्ट और प्रसन्न करने के लिए आपको इतनी ज़हमत उठाने की ज़रूरत है भी या नहीं। अगर ऐसे लोगों के साथ रहने की मजबूरी पेश आ ही गई है तो भरसक उनसे वाद-विवाद से बचने की कोशिश करें। ऐसी स्थिति पैदा न होने दें जहाँ सामने वाला बहुत परेशान हो जाए। वे क्या कह रहे हैं, सुनें और जहाँ सहमत होने की संभवना हो, अपनी सम्मति दें। अगर सहमत न हों तो प्रखर रूप से अपना विरोध प्रकट करने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ सुनें-जब बहुत ज़रूरी हो तभी अपना मत प्रकट करें। आप पहले से ही जानते हैं कि हर बात में नकारात्मक होने की उनकी आदत है इसलिए शांत और संयत बने रहें और उन्हें जो कहना है, कहने दें।

निश्चित ही, आप कह सकते हैं कि इससे, स्वाभाविक ही, बातचीत में कमी आ जाती है। आप जानते हैं कि कुछ भी पूछने से कुछ निकलकर नहीं आने वाला है इसलिए सामने वाले से आप पूछने में भी घबराते हैं कि उसके क्या हालचाल हैं। आप प्रश्न पूछना कम कर देते हैं लेकिन जो थोड़ी बहुत प्रसन्नता और संतुष्टि या आपसी समझ बची रह गई है, उसे बचाए रखने के लिए आप गुड मॉर्निंग, गुड ईवनिंग जैसा सामान्य औपचारिक वार्तालाप जारी रखते हैं।

इसके बावजूद सामने वाला असंतुष्ट या नाखुश होने के लिए कोई न कोई बात ढूँढ़ ही सकता है। ऐसे लोग सिर्फ इस बात पर दुखी हो सकते हैं कि दूसरे इतने खुश क्यों हैं। वास्तव में यह उनके लिए खुश होने का एक मौका सिद्ध हो सकता है-लेकिन मौके का लाभ उठाने के स्थान पर वे पछताने का मौका ढूँढ़ते हैं कि दूसरे खुश क्यों हैं।

जैसा कि मैंने कहा, खुश रहने में आप उनकी मदद कर ही नहीं सकते। जैसी भी परिस्थिति हो, आपको सिर्फ उसे स्वीकार करने की ज़रूरत है और संयत रहने की। पहले भी आप ऐसे लोगों से मिल चुके होंगे और मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यह आगे भी होता रहेगा। कुछ समय के लिए आपके रास्ते मिलेंगे लेकिन एक दिन आएगा जब आप अपने-अपने अलग रास्तों पर चल पड़ेंगे।

आपके लिए भी यह एक मौका है कि चीज़ें या परिस्थितियाँ जैसी भी हों, उन्हें आप स्वीकार करना सीखें-बिना उन पर अधिक परेशान हुए!

जहाँ तक हो सके, नकारात्मक लोगों से दूर रहें – 3 नवंबर 2015

कल मैंने उन लोगों की चर्चा की थी, जिन्हें संतुष्ट करना वास्तव में असंभव कार्य है क्योंकि वे अंदरूनी तौर पर भयंकर रूप से नकारात्मक होते हैं। इस प्रकार वे न सिर्फ खुद हर वक़्त दुखी रहते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी दुखी कर देते हैं। जैसा कि मैंने बताया, हालांकि कभी-कभार ही हुआ है, लेकिन आश्रम में हमारा पाला भी ऐसे नकारात्मक लोगों से पड़ता रहा है। कभी-कभार ही क्यों? क्योंकि हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोगों के साथ अपनी ईमेल चर्चाओं में ही हम यह जान लेने की कोशिश करते हैं कि हम उन्हें संतुष्ट कर पाएँगे या नहीं।

सामान्यतया हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोग ईमेल द्वारा हमसे संपर्क करते हैं। जो लोग हमारे साथ आश्रम में रहना चाहते हैं, हमसे तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं और हम अपने प्रस्तावित विश्रांति कार्यक्रमों की और पर्यटन व्यवस्था संबंधी जानकारियाँ देते हुए उन्हें प्रत्युत्तर भेजते हैं। अपने ईमेल संदेशों में ही ज़्यादातर लोग यह साफ बताते हैं कि वे क्या चाहते हैं और हमसे उन्हें क्या अपेक्षाएँ हैं-अगर वे नहीं बताते तो हम ही उनसे साफ़-साफ़ पूछ लेते हैं। हम उन्हें स्पष्ट कर देते हैं कि हम कौन हैं और कैसे लोग हैं, कि हम ईश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं रखते, कि हमारे आश्रम में कोई गुरु नहीं है और अधिकतर हम लोग समय की पाबंदी को लेकर पूरी तरह स्वतंत्र हैं, जैसे रात को कब सोना है या सुबह कब जागना है।

इतने से ही भगवद्भक्ति हेतु वृंदावन आने वाले, तीर्थयात्री टाइप के और गुरुओं की खोज में निकले लोग हमारी सूची से बाहर हो जाते हैं, जो या तो श्रद्धावश, ईश्वर की आराधना हेतु या फिर गुरुओं से आदेश प्राप्त करने वृंदावन आते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जिनकी कोई न कोई अपेक्षा होती है लेकिन उनका क्या किया जाए, जो सिर्फ नकारात्मक होते हैं और किसी ऐसी चीज़ की तलाश में होते हैं जो उन्हें सुखी और संतुष्ट कर सके?

लेकिन इमेल्स आपको ध्यान से पढ़ने होंगे। बल्कि, इमेल्स से अधिक आपको ईमेल पढ़ते हुए उनके बारे में होने वाली अनुभूति पर ध्यान देना होगा। कभी-कभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता लेकिन अक्सर आपसे बहुत से शंकालु प्रश्न किए जाते हैं, जिनसे आपको एहसास हो जाता है कि वह व्यक्ति दरअसल अभी से, आपको बिना जाने-पहचाने, बिना रूबरू मुलाक़ात किए, बिना पता किए कि आप क्या करते हैं, आपकी आलोचना कर रहा है।

अगर आपको शुरू में ही यह एहसास हो जाए कि कोई आपके साथ व्यर्थ ही नकारात्मक हो रहा है, जबकि वह व्यक्ति अभी हज़ारों मील दूर है, यदि आपको लगे कि आपको किसी बात पर अपनी सफाई देनी पड़ रही है और लगे कि इस व्यक्ति के साथ किसी वाद-विवाद में पड़ने से अच्छा होगा कि अपनी सामान्य, शांतिपूर्ण, कामकाजी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएँ और यह एहसास हो कि यह व्यक्ति समय गुज़ारने के लिए ठीक नहीं है। अपने घर पर लगातार कुछ हफ्ते रहने के लिए तो बिल्कुल नहीं, जब उसके साथ आपको सशरीर भी साथ रहना होगा!

ऐसे किसी भी मामले में उन्हें मना करने की हम पूरी कोशिश करते हैं। उनके साथ ईमेल पर हुई बातचीत के दौरान होने वाले अपने एहसासात पर गौर करते हुए और इस बात पर विचार करते हुए कि उस व्यक्ति को अपने आश्रम में आमंत्रित किया जाना आसान होगा या कठिन, हम बारीकी से परीक्षा करते हैं। हम जानते हैं कि हम हर व्यक्ति को खुश और संतुष्ट नहीं कर सकते। यह जीवन का एक सामान्य सच है और हम उसे स्वीकार करते हैं। लेकिन हम कोशिश करते हैं कि जिसे कोई भी खुश और संतुष्ट नहीं कर सकता, उसे आमंत्रित करके अपने लिए कठिनाई मोल न लें!

इन सभी भरसक कोशिशों के बाद भी कभी-कभी यह संभव नहीं हो पाता कि सिर्फ ईमेल के ज़रिए आप लोगों के मन की सारी बातें पढ़ सकें। अनुभव के साथ इस बात में महारत हासिल होती जाती है और अब क्वचित ही होता है कि कोई ऐसा व्यक्ति आश्रम का मेहमान बन सके लेकिन यह सामाजिक व्यवहार की सामान्य दैनिक उलझनें हैं और अब भी यह कभी-कभी हो ही जाता है।

तो क्या किया जाए अगर ऐसे किसी व्यक्ति के साथ आपका पाला पड़ ही जाए? कल के ब्लॉग में मैं इसी विषय पर लिखना चाहता हूँ।

जब कभी भी कुछ भी ठीक होता नज़र नहीं आता क्योंकि संतुष्टि भीतर से आती है – 2 नवंबर 2015

कल मैंने सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिए के बारे में संक्षेप में लिखते हुए बताया था कि कैसे वह आपके जीवन को प्रभावित कर सकता है या नहीं कर सकता। क्या कभी किसी ऐसे व्यक्ति से आपका सामना हुआ है जो इतना अधिक नकारात्मक है कि किसी भी स्थिति में संतुष्ट नहीं रह सकता? जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे कई बार ऐसे लोग मिले और मेरा दावा है कि उनके लिए आप कुछ भी कर लें, वे कभी संतुष्ट नहीं हो सकते-क्योंकि सकारात्मकता भीतर से आती है!

इसलिए स्वभाव से ही ऐसे लोग जीवन में किसी ऐसी वस्तु की तलाश में होते हैं जो उन्हें संतोष प्रदान कर सके। अपने व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ और समय-समय पर हमारे आश्रम के कई अतिथियों से भी। जो व्यक्ति किसी भी सेवा क्षेत्र के उद्यम से जुड़ा है, जानता होगा कि ऐसे लोग सबसे अक्खड़ और तकलीफदेह ग्राहक साबित होते हैं!

अब यह कोई ज़रूरी नहीं है कि ऐसे लोग भले व्यक्ति नहीं हो सकते, कि वे अक्सर बहुत कुत्सित या बुरे इंसान ही होते हों या आपका बुरा चाहने वाले हों या आपको ही बुरा व्यक्ति समझते हों! स्वाभाविक ही, ऐसे लोग भी हो सकते हैं लेकिन मैंने अक्सर देखा है कि यह कोई नियम नहीं है कि ऐसा ही हो! वास्तव में वे अपने स्वभाव से मजबूर होते हैं, वे भीतर से ही ऐसे होते हैं कि हर वक़्त शिकायत करते रहें, हर बात में नकारात्मकता की तलाश में रहें और किसी भी स्थिति में सुखी और संतुष्ट न हों!

उदाहरण के लिए, एक बार हमारे आश्रम में एक आस्ट्रेलियाई महिला आई, जो अपने पूरे मुकाम के दौरान कोई न कोई नकारात्मक बात ढूँढ़ती ही रहती थी। उसके यहाँ पहुँचते ही हमने उसकी यह आदत भाँप ली। क्योंकि मैं इत्तफाकन बाहर ही था, जैसे ही उसकी कार आश्रम पहुँची, मैंने ही उसका स्वागत किया। अधिकतर लोग लंबी यात्रा के बाद किसी ठिकाने लगने पर प्रसन्न ही होते हैं और सोचते हैं कि देखें, आगे क्या-क्या नया देखने को मिलता है लेकिन उसके साथ तत्क्षण मुझे प्रतीत हुआ कि यह महिला वैसी प्रसन्नचित्त महिला नहीं है-उसी पल मुझे उसके चेहरे पर यह लिखा दिखाई दे रहा था।

उसे खुश करने के लिए हमने वह सब किया, जो कर सकते थे-लेकिन उसे खुश करने में सफल नहीं हो सके। जब बाज़ार में वह साफ़-सफाई के सामान की दुकान खोज नहीं पाई तो उसे उसकी मर्ज़ी का सारा सामान उपलब्ध कराने से लेकर उसके संपूर्ण विश्रांति कार्यक्रम में परिवर्तन करने तक, हमने सब कुछ आजमाया मगर अफसोस…

मैं घटनाओं के विस्तार में नहीं जाना चाहता किंतु आप कल्पना कर सकते हैं-वे कोई महत्वपूर्ण मामले नहीं थे याकि ज़रूरी चीजें नहीं थीं, पहले किसी अतिथि को उनसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी और कुछ वस्तुएँ उसके देश में उपलब्ध उन्हीं वस्तुओं से सिर्फ देखने में अलग थीं और सिर्फ इसीलिए वे उसके काम नहीं आ सकती थीं।

मज़ेदार बात यह कि सिर्फ भारत में मौजूद परिस्थितियाँ ही उसकी परेशानी का सबब नहीं थीं या सिर्फ भारतीयों से ही उसे परेशानी नहीं थी! वास्तव में प्रकृति से ही उसे किसी भी बात से खुश न होने की आदत थी यानी यह उसकी स्वभावगत विशेषता ही बन गई थी। और इस स्वभाव में बाहर से कोई सुधार संभव नहीं था। आप कितनी ही खूबसूरत जगह चले जाएँ, आपको अगर उसमें नुस्ख ही देखना है तो वही आपको नज़र आएगा! आप अच्छे से अच्छा खाना सामने रख दें, अच्छे से अच्छे कपड़े या ज़रूरी सामान ले आएँ या चर्चा करने के लिए एक से एक जानकार लोगों को बिठा दें-उन्हें संतुष्टि न मिलनी है, न मिलेगी।

अगर उपरोक्त वर्णन में आपको अपनी थोड़ी भी झलक दिखाई देती है तो जान लीजिए कि खुश रहने के लिए खुद आपको ही अपने आप में बदलाव लाना होगा! मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कभी-कभी आप कितना अधिक दुखी महसूस कर सकते हैं कि न जाने क्यों कोई बात ठीक हो ही नहीं रही है। आप अच्छे व्यक्ति हैं, आसपास के लोग अच्छे हैं और कोई घटना भी ऐसी नहीं हुई है जिसे दुखद कहा जा सके। तो इन बातों पर गौर करें और समझें कि आपको भीतर से बदलने की ज़रूरत है! यह लंबा काम हो सकता है और कभी-कभी कठिन भी, लेकिन आप ऐसा कर सकते हैं!

मैं अपने जीवन में सदा खुश रहा हूँ और मुझे चीजों को सकारात्मक रोशनी में देखना पसंद है। कृपया मेरे इस नज़रिये के साझीदार बनें। अगले कुछ दिन मैं आपको बताऊँगा कि यदि आप भी ऐसे लोगों के बीच रहते हैं तो आप क्या कर सकते हैं-और हम ऐसी परिस्थितियों से पल्ला झाड़ने के लिए क्या करते हैं।

क्या सकारात्मक नज़रिया आपको फूड पॉयज़निंग से बचा सकता है? 1 नवंबर 2015

कल के स्वादिष्ट व्यंजन के बाद मैं आज भोजन संबंधी एक और ब्लॉग लिखना चाहता हूँ। ठीक-ठीक कहें तो, भारतीय भोजन संबंधी। बल्कि कहें कि भारत में सड़क के किनारे मौजूद ठेलों पर मिलने वाले भोजन के संबंध में, तो अधिक उचित होगा। सामान्य रूप से वह भोजन और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ग्रहण करना उचित होगा या नहीं, इस संबंध में।

पिछले हफ्ते हमारे मेहमानों के साथ हुई चर्चा में यह प्रश्न उभरकर सामने आया था। शहर की सड़कों पर उड़ने वाली धूल को इंगित करते हुए एक महिला अतिथि ने कहा कि वह बाहर सड़क पर मौजूद ठेलों पर कभी कोई चीज़ नहीं खाएगी क्योंकि वहाँ के खाने की गुणवत्ता और साफ़-सफाई संतोषजनक नहीं होती, कि सस्ती चाट के ठेले वाले आपको उच्चस्तरीय और साफ़-सुथरा भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते। दूसरे मेहमान का तर्क था कि यह महज एक मानसिक स्थिति है, दिमाग की व्यर्थ कुशंका है और यदि आप सकारात्मक नज़रिया रखें तो ठेलों पर खाने से आपके सामने कोई समस्या पेश नहीं आएगी!

आप जानते हैं, मैं स्वयं सकारात्मक रवैया रखने का कायल हूँ। उसके बगैर न सिर्फ बहुत सी चीज़े उससे अधिक खराब नज़र आती हैं, जितनी कि वे वास्तव में होती हैं बल्कि वे और बदतर होती चली जाती हैं। निश्चय ही सकारात्मक होना आपको स्वस्थ रहने में मदद करता है। यदि आप अत्यंत नकारात्मक हैं तो आप ज़रा-ज़रा सी बात पर कुशंकाएँ करेंगे और भयभीत होंगे। उसके चलते आपका शरीर और मन और उनकी पूरी कार्यप्रणालियाँ हर वक़्त तनावग्रस्त रहेंगी। तनाव का मुकाबला करने में आपकी बहुत सारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खर्च होती है जो अन्यथा आपके शरीर की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली को मज़बूती प्रदान करती। इसलिए तनावग्रस्त होने पर रोगों से लड़ने वाले इम्यून सिस्टम को मज़बूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। रोगों या व्याधियों का आक्रमण होने पर आपका शरीर पूरी शक्ति के साथ उनका मुकाबला नहीं कर पाता, जैसा सामान्यतया उसे करना चाहिए-और इसलिए आप आसानी से और जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते रहते हैं। इसके अलावा, आपके नकारात्मक रवैये के चलते आपको मामूली चीजें और घटनाएँ ज़रूरत से ज़्यादा गंभीर लगती हैं!

स्वास्थ्य और सकारात्मकता के बारे में मेरे सोच का यह संक्षिप्त और तात्कालिक विवरण है। लेकिन कुछ इससे अधिक गंभीर कारक भी होते हैं, जैसे, जीवाणु, विषाणु और नुकसानदेह रसायन और ये कारक इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आप सकारात्मक रवैया रखते हैं या नहीं!

महज सकारात्मक होने के कारण आप ज़हर नहीं खा सकते! मैं बहुत से सकारात्मक लोगों को जानता हूँ, जिन्हें सकारात्मक रवैया रखने के बावजूद तरह-तरह की बीमारियों का मुकाबला करना पड़ता है, खान-पान संबंधी ही नहीं, दूसरी भी! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि महज सकारात्मक रवैया आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से दूर नहीं रख सकता!

अब अगर आप भारत दौरे पर हैं और मुझसे या हमसे सलाह चाहते हैं तो मैं भी आपसे यही कहूँगा कि सड़क पर खोमचे या ठेले वालों के यहाँ मत खाइए। मैं खुद वहाँ कभी नहीं खाता क्योंकि मैं इस बात का पूरा ख़याल रखता हूँ कि कौन-कौन से और कैसे खाद्य पदार्थ मेरे पेट में और मेरे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे आश्रम आने वाले बहुत से मेहमान जब तक यहाँ आश्रम का भोजन ग्रहण करते रहे, स्वस्थ रहते हैं लेकिन जैसे ही वे घूमने निकलते हैं और जहाँ, जैसा खाना मिलता है, खा लेते हैं तो वे बीमार पड़ जाते हैं।

भारतीय लोग उनका सेवन कर सकते हैं क्योंकि उनके शरीर उन बैक्टेरिया के आदी हो चुके हैं, जो इन ठेलों के खानों के ज़रिए पेट में पहुँचते होंगे। जीवन की शुरुआत से वे वहाँ हर तरह का भोजन, चाट-पकौड़े इत्यादि खाते रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बैक्टेरिया उनके लिए अच्छे हैं-लेकिन आप लोग, जो पश्चिमी देशों से कुछ दिन के लिए यहाँ आते हैं और जिनके पेट ने पहले कभी ऐसे भोजन का अनुभव नहीं लिया, उन्हें खाकर अवश्य बीमार पड़ जाएँगे!

सकारात्मक रवैया होना निश्चय ही बड़ी अच्छी बात है लेकिन साथ ही आपको इस बात की सावधानी भी रखनी चाहिए कि आप कहाँ खा-पी रहे हैं और क्या और कैसा खा रहे हैं। सड़क के किनारे ठेलों पर खाने के स्थान पर किसी अच्छे रेस्तराँ में भोजन या नाश्ता-पानी कीजिए। सड़क पर खड़े होकर फलों का रस भी मत लीजिए, भले ही फल आपके सामने रखे हों और ताज़े ही क्यों न दिखाई दे रहे हों-आप नहीं जानते, कहाँ के पानी से उन्हें धोया गया है और जूसर में कौन-कौन से बैक्टेरिया पहले से मौजूद हैं!

मेरा उद्देश्य किसी को भयभीत करना नहीं है लेकिन यह बात हर टूरिस्ट गाइड बुक में निरपवाद रूप से लिखी होती है। कृपया अपने शरीर का ख़याल रखिए, भले ही आप कितना ही सकारात्मक रवैया रखते हों!

आपका प्रत्यक्ष ज्ञान (ग्रहण-बोध) आपकी दुनिया को बदल देता है – 21 अक्टूबर 2015

मैंने हाल ही में लिखा था कि अपने आसपास की दुनिया को सकारात्मक रूप से देखना चाहिए लेकिन क्योंकि यह एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है-विशेष रूप से, जब आप इस बात का विचार करते हैं कि बड़ी संख्या में लोग अवसाद और मानसिक तथा शारीरिक थकान से ग्रसित दिखाई देते हैं-मैं आज इसी विषय पर एक बार फिर कुछ विस्तार से लिखना चाहता हूँ। अपने आसपास की विसंगतियों के बीच अच्छाइयाँ तलाश करने के हुनर के बारे में!

यथार्थ को हम सब अलग-अलग नज़रिए से देखते हैं। किसी भी मनोवैज्ञानिक अध्ययन का यह मूल तत्व है: आपका कोई भी अनुभव दूसरे को भी वैसा ही अनुभव के बावजूद ठीक वैसा ही नहीं होता क्योंकि आपकी और उसकी पृष्ठभूमि अलग-अलग होती है। यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चों का ग्रहण-बोध भी भिन्न होता है क्योंकि वे अलग-अलग अनुभवों से गुज़रे होते हैं।

इस मामले में आपके लालन-पालन का तरीका एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आपके अभिभावकों ने आपको किस तरह बड़ा किया, किन मूल्यों को वे ज़्यादा महत्व देते हैं और उन्होंने दुनिया को देखने का कौन सा नजरिया आपको दिया, इत्यादि? इन प्रश्नों के उत्तर, मुख्य रूप से, आपको यह बता देते हैं कि आप किस तरह दुनिया को देखते हैं।

आप पर दूसरा बड़ा प्रभाव होता है, आपकी संस्कृति का। जिस देश में आप रहते हैं, आपके आसपास के लोग जिन मूल्यों और जिन आदर्शों को साधारणतया मानते हैं। ये बातें आपके अभिभावकों द्वारा सिखाई गई बातों से अधिक व्यापक होती हैं और ये बातें आपके नज़रिए को एक ख़ास दिशा में मोड़ देती हैं और आपके यथार्थ को परिवर्तित करती हैं। रमोना और मैं इसे अक्सर देखते हैं और और कई मामलों में इसे घटित होता हुआ पाते हैं! ज़्यादा विस्तार में न जाते हुए अब खबरों को हम अपने-अपने भिन्न नज़रियों के अनुसार ग्रहण करते हैं क्योंकि हम लोग मूलतः इस धरती के भिन्न और सुदूर इलाकों के रहने वाले अलग अलग व्यक्ति हैं! निश्चय ही हर व्यक्ति अपने आप में अलग और विशिष्ट होता है लेकिन संस्कृति आप पर ऐसा गहरा प्रभाव डालती है, जिससे आप आसानी के साथ मुक्त नहीं हो सकते!

अंत में, एक क्षणिक स्थिति में, उस वक़्त जिस खास पल में आप व्यवहार कर रहे हैं, वह भी आपके आसपास होने वाली घटनाओं के बारे में आपके ग्रहण-बोध को प्रभावित करता है। मैं कुछ उदाहरण आपके सामने रखता हूँ: गर्भवती होने की इच्छा रखने वाली या स्वयं कोई गर्भवती महिला अचानक अपने आसपास मौजूद गर्भवती महिलाओं को दूसरों से ज़्यादा नोटिस करने लगती है। वे पहले भी उसके आसपास मौजूद थीं-लेकिन अब वह उन्हें नोटिस करती है क्योंकि वह स्वयं उसी स्थिति से गुज़र रही है और उसका मन उसी बात पर लगा हुआ है!

मान लीजिए अगर आप अपने काम में व्यस्त हैं और अधिकतर काम के बारे में ही सोचते रहते हैं और आपके पास इस बात की फुर्सत नहीं है कि अपने शहर की सुंदरता को देख सकें, उसका आनंद ले सकें या इस बात का आपको पता नही हो पाता कि आपके आसपास के लोग क्या कर रहे हैं। यह सब पहले भी मौजूद था लेकिन जब आपका काम पूरा हो जाता है और आपको उन्हें देखने का अवसर मिलता है तो आपको लगता है, जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं!

जब आप पहले-पहल प्रेम में पड़ते हैं तो सारी दुनिया आपको खूबसूरत, शानदार, आश्चर्यजनक और अत्यंत सुखद नज़र आती है! आपको लगता है, आपके आसपास का हर शख्स सुंदर और भला है और दुनिया में प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं है।

लेकिन जब आप मुश्किल में होते हैं तो आपको अपने चारों ओर बुरी चीजें ही दिखाई देती हैं। क्योंकि आप बुरे विचारों से घिरे हुए हैं, आपको कोई चीज़ सुंदर नज़र ही नहीं आती!

मैं इनकी ओर इशारा क्यों कर रहा हूँ? मेरे ख़याल से यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि आपके पास एक और संभावना भी मौजूद है! कि आप दूसरे नज़रिए से भी चीजों को देख सकते हैं! आपको अपने सोचने की दिशा में परिवर्तन करना होगा और आप देखेंगे कि चीज़े तुरंत, उसी समय से ठीक होना शुरू हो गई हैं!

अपने अंदर गहरे जड़ जमाए बैठे मूल-तत्वों को और उन अनुभूतियों को दरकिनार करना वास्तव में बहुत मुश्किल होता है। हालाँकि यह संभव है! लेकिन आपको इसी से शुरुआत करने की ज़रूरत नहीं है-निश्चित ही चीजों को देखने के तरीके को बदलने के काम को आप अपनी वर्तमान परिस्थितियों के मुताबिक़ क्रमशः, धीरे-धीरे शुरू कर सकते हैं! जब आपके विचार नकारात्मक दिशा में गमन करने लगें तो उन पर लगाम लगाने का प्रयास कीजिए और अपने आपको बताइए कि यह सिर्फ इसलिए है कि इस समय आपका ग्रहण-बोध नकारात्मक है! आप भी अलग तरह से सोच सकते हैं! सोचने का एक अलग तरीका निर्मित करने भर की ज़रूरत है!

मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है-क्योंकि यह आपको एक पूर्णतया नई सकारात्मकता से भर देगा, आपको शान्ति और सुकून का अनुभव होगा। दरअसल वह आपको अधिक खुशनुमा जीवन की ओर अग्रसर होने में मदद करेगा!

आपका आसपास आपका आईना नहीं बल्कि परस्पर प्रभाव के साथ दोनों का अनुकूलन है – 12 अक्टूबर 2015

अगर आप आध्यात्मिक परिदृश्य के मध्य रहते हैं या आत्मसुधार की पुस्तकों आदि में रुचि रखते हैं तो आपने उस सिद्धांत के बारे में पहले ही पढ़ रखा होगा या उसके बारे में किसी से सुना होगा जिसके अनुसार दूसरे आपको आपका ही आईना दिखा रहे होते हैं। अक्सर इस सिद्धांत को खींच-खाँच कर काफी दूर तक ले जाया जाता है-मेरे हिसाब से, कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही-लेकिन इस बात में काफी हद तक सत्यता भी है। सिर्फ एक दृष्टिकोण से: जब हम किसी समूह में या कुछ लोगों के साथ होते हैं तो हम आसानी के साथ खुद अपना व्यवहार बदलकर दूसरों के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं और दूसरों जैसे दिखाई देने की कोशिश करते हैं। स्वाभाविक ही, हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम किस प्रकार के रवैये को स्वीकार कर सकते हैं और किसे नहीं!

संभव है आपने खुद इसे नोटिस किया हो या न भी किया हो। आप अपने दिन का एक हिस्सा अपने काम में खर्च करते हैं, एक हिस्सा अपने परिवार के साथ और शायद एक और हिस्सा अपने दोस्तों के साथ। इस तरह आपके आसपास अलग-अलग समय पर शायद दो या तीन तरह के लोगों का समूह होता है-और उनके साथ भिन्न तरह का व्यवहार करते हैं, न सिर्फ इसलिए कि हर बार समय की प्रकृति भिन्न होती है बल्कि इसलिए भी कि हर बार वे भी भिन्न-भिन्न तरह से व्यवहार कर रहे होते हैं और आप उनके व्यवहार के साथ अपने व्यवहार का सामजस्य बिठाते हैं।

उदाहरण के लिए अगर आपके कार्यालय का रवैया नकारात्मक है तो आप पाएँगे कि आपके सहकर्मी बहुत अधिक शिकायत करते हैं। जब आप यह बात नोटिस करते हैं, तत्क्षण आपको याद आता है कि आप भी यही करते हैं! क्यों? क्योंकि यह आपके कार्यालय का सामूहिक रवैया है! एक समूह में हम दूसरे सभी लोगों की स्वीकृति चाहते हैं और इसलिए, जान-बूझकर भले न करते हों मगर, हम दूसरों की नकल कर रहे होते हैं। वे कुढ़ते हैं? हम भी कुढ़ते हैं। और नकारात्मकता के मामले में यह नीचे, और नीचे खींचने वाला भँवर बन जाता है! जब आप इसे नोटिस कर लेते हैं तब कह सकते हैं कि वे आपको आईना दिखा रहे हैं या आप यह भी कह सकते हैं कि आपने माहौल के साथ तालमेल बिठा लिया। लेकिन कुछ भी हो, आपको अधिकाधिक सकारात्मक बने रहने की कोशिश करनी चाहिए।

यही बात सकारात्मक तरीके से भी होती है। अगर आप सकारात्मक लोगों के बीच रहते हैं तब भी आप उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकते। अगर आपके आसपास के लोग सकारात्मक हैं तो आपके लिए भी सकारात्मक होना बहुत आसान हो जाता है! हँसते-बोलते, चुटकुलेबाज़ी करते हुए, मौज-मस्ती करते हुए-जो लोग ऐसा करते हैं, उनके साथ यह सबसे बढ़िया होता है!

इसका अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि दूसरे आप पर कोई प्रभाव डाल रहे हैं और इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अगर आप किसी नकारात्मक व्यक्ति से मुलाक़ात करते हैं तो आप बहुत ज़्यादा नकारात्मक हो जाते हैं। इसका सिर्फ इतना अर्थ है कि आपके आसपास उपस्थित लोगों पर आपका भी काफी तगड़ा असर हुआ है, विशेष रूप से उन पर, जिनके साथ आप दिन का अधिकाधिक समय गुज़ारते हैं!

इसलिए चाहे आप काम कर रहे हों, चाहे घर पर हों या दोस्तों के साथ समय बिता रहे हों- सकारात्मक बने रहने पर ध्यान दें और तब आप उनकी नकारात्मकता के साथ तालमेल बिठाने से बचते हुए अपनी सकारात्मकता से उन्हें प्रभावित कर पाएँगे!

अपने अत्यल्प साधनों से भी योगदान करें क्योंकि छोटी चीज़ का भी असर होता है – 6 अक्टूबर 2015

कल मैंने आपको हमारी एक मेहमान के बारे में बताया था जो इस कारण खुद को अपराधी महसूस कर रही थी कि अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से सेवा करने की जगह समुद्री बीच पर जाकर विश्रांति प्राप्त करना चाहती थी। ऐसे नरमदिल, संवेदनशील लोगों की, जो वास्तव में दूसरों की मदद करना चाहते हैं, अक्सर एक दूसरी समस्या होती है: उन्हें इस संसार की बुरी हालत देखकर बड़ा दुःख होता है।

जो थोड़ा भी संवेदनशील होगा वह इस एहसास को एक हद तक समझ सकता है: कोई भी अखबार उठाकर देखें, हर तरफ मारा-मारी की खबरें-दुनिया भर में मानव जाति एक-दूसरे का गला काटने पर आमादा, इस धरती को नष्ट करने को आतुर, दूसरे सभी प्राणियों के कष्टों का अंत नहीं! टीवी और रेडियो की खबरें देखकर ऐसा लगता है, जैसे प्रलय बस आने ही वाला है!

सीरिया और मध्य-पूर्व के युद्धों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि लोग भूखों मर रहे हैं, उनके साथ हर तरह की ज्यादती हो रही है, उनकी सरे आम हत्याएँ की जा रही हैं, लोग अपने देशों से भागने को मजबूर हैं, शरणार्थियों की समस्या भीषण रूप ले चुकी है और उसके कारण दक्षिणपंथी ताक़तें मजबूत हो रही हैं। दुनिया भर में सभी धर्म एक-दूसरे के खिलाफ युद्धरत हैं, मंदिरों-मस्जिदों में या आतंकवादियों के बमों से रोजाना निरपराध लोग मारे जा रहे हैं। आतंकवादी समूह शक्तिशाली हो रहे हैं, कहीं से भी लड़कियों का अपहरण कर लेना या नवयुवकों को बहला-फुसलाकर उनके दिमाग में फितूर पैदा करना आम बात हो गई है। निरपराध लोगों को, जिनमें डॉक्टर, नर्सें और सेवा करने वाले कर्मचारी शामिल हैं, मौत के घाट उतारा जा रहा है। हजारों एकड़ जंगलों को आग के हवाले कर दिया जाता है, किशोर बंदूकें लेकर स्कूल जाते हैं और अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू कर देते हैं, नशीले पदार्थों का व्यवसाय करने वाले गुंडों ने शहरों को खतरनाक बना दिया है। और उस पर बड़े-बड़े व्यावसायिक कार्पोरेशन्स और निश्चित ही सरकारें हैं जो सिर्फ अपने स्वार्थ और आर्थिक लाभ को ध्यान में रखती हैं।

रोज़ सबेरे उठते ही आपको यह सब देखना-सुनना पड़ता है-इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ लोग जब दुनिया की इस हालत पर विचार करते हैं तो अवसादग्रस्त हो जाते हैं! इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि आप सोचते हैं कि दुनिया में क्लेश बढ़ता ही जा रहा है और आपके प्रयास उसके सामने कुछ भी नहीं हैं, उनका कोई असर नहीं होने वाला है।

लेकिन आपका अवसादग्रस्त हो जाना किस तरह इस मामले में सहायक होगा? यदि आप बिस्तर पर लेटकर आँसू बहाएँ तो क्या किसी को कोई लाभ हो सकता है? अगर आप बाहर निकलना बंद कर दें कि दुनिया बहुत बुरी है, तब कुछ होगा? उत्तर है, नहीं होगा! बल्कि अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपने लिए चिंतित करके आप दुनिया का दुःख और बढ़ा देंगे!

उठिए, उन भावनाओं को निकाल बाहर कीजिए और अपनी छोटी सी दुनिया को खुशनुमा बनाइए। अपने से शुरू कीजिए और सबसे पहले सुनिश्चित कीजिए कि आप खुश रहेंगे। फिर दूसरों की मदद कीजिए। जो समस्याएँ आपको सबसे ज़्यादा मथती हैं, उन्हें दूर करने में लोगों की मदद कीजिए। अगर आपको लगता है कि आप बेघर लोगों की या शरणार्थियों की मदद करना चाहते हैं तो आपके शहर में ही कोई न कोई रैनबसेरा या कोई स्वयंसेवी संगठन होगा, जहाँ जाकर आप स्वैच्छिक रूप से उनका हाथ बँटा सकते हैं। अगर आपका मन चीनी फैक्ट्रियों में जारी अमानवीय कार्य-प्रणालियों का विरोध करना चाहता है तो सुनिश्चित करें कि आप उनका सामान न खरीदकर किसी ज़िम्मेदार कंपनी का सामान ही खरीद रहे हैं, जो ऐसी अनुचित और गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त नहीं हैं! जब भी आपको लगे कि आप अपना समय और पैसा इन सत्कार्यों में लगा सकते हैं तो जहाँ ज़रूरत हो, ऐसा अवश्य करें। सोशल मीडिया के ज़रिए, पिटीशन भेजकर और आसपास के लोगों को उसकी जानकारी देकर ऐसे कार्यों के प्रति अपना समर्थन अवश्य व्यक्त करें।

आप सारे युद्धों को रोक नहीं सकते। इस ग्रह की सारी समस्याओं का निपटारा आप अकेले नहीं कर सकते! हाँ, आप अपनी दुनिया में परिवर्तन ला सकते हैं। दुनिया के विशाल परिदृश्य में वह बहुत छोटा सा प्रयास होगा, गहरे अँधेरे में प्रकाश की हल्की सी किरण जैसा! लेकिन आप ऐसी इकलौती किरण नहीं हैं और इसलिए हम सब साथ मिलकर एक विशाल प्रकाश-पुंज बन सकते हैं, सब मिलकर दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए काम कर सकते हैं।

अपनी सतह पर कुछ न कुछ अवश्य कीजिए- फर्क अवश्य पड़ेगा!

सकारात्मक रवैया बनाए रखें – कठिनाइयाँ आपको और मजबूत बनाएँगी! 10 सितंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि भले ही आपके अनुसार, परिस्थितियाँ अत्यंत खराब हों, उनसे पार पाने में आप खुद अपनी मदद कर सकते हैं! मैं पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ कि बाद में जब आप पीछे मुड़कर देखेंगे तो आपको लगेगा कि जो हुआ, अच्छा हुआ, उससे आपको लाभ ही हुआ है। और यही बात आपको उस परिस्थिति से पूरी तरह बाहर निकाल सकती है।

कुछ लोगों के लिए यह समझ उम्र के साथ पैदा होती है। पहले-पहल जब आपके जीवन में उथल-पुथल मचती है या कोई हादसा बरपा होता है तो आप बुरी तरह टूट जाते हैं और आपको लगता है कि यह क्लेश अब जीवन भर कभी समाप्त नहीं होगा। जब आप जीवन में दो-चार बार ऐसे अनुभवों से गुज़र लेते हैं तो दिल में भीतर ही भीतर आप जान रहे होते हैं कि ये हालात भी गुज़र जाएँगे। स्वाभाविक ही सभी को उन कठिन परिस्थितियों से गुज़रना ही पड़े, यह ज़रूरी नहीं है!

मैं जानता हूँ कि इस बात में कोई खास दम नहीं है कि 'जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है' और यह बात बहुत अव्यावहारिक भी है लेकिन वास्तव में नज़र यही आता है- यह बात अलग है कि आप अभी देख नहीं पा रहे हैं। अगर आप पूरे समय उन्हीं कष्टदायक और निराशाजनक अनुभूतियों में लिप्त रहेंगे, सोचते रहेंगे कि आप बरबाद हो गए, आप पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, तो आपको इस तथ्य पर विश्वास नहीं होगा।

लेकिन आपको इस विचार से छुटकारा पाना ही होगा। अपने मित्रों से चर्चा करें, उनकी आपबीती सुनें और आप क्या महसूस करते हैं, बताएँ। कोई अच्छा संगीत सुनें, प्रकृति के नजदीक जाएँ, खुली धूप में बैठें, कुछ व्यायाम आदि करें, तैरने चले जाएँ, दौड़ें, गरम पानी से नहाएँ, मालिश करवाएँ और कुछ पसंदीदा नाश्ता-पानी करें। कोई ऐसा काम करें, जिससे तुरंत आपका मन हल्का हो जाए, आपको अच्छा लगे- और फिर अपनी परिस्थिति पर दोबारा विचार करें।

जो भी आप करें, मायूसी के साथ न करें और न ही किसी भय से या क्रोधवश या कोई चिंता दिल में लिए हुए करें- यह न सोचें कि आपका संसार टूटकर बिखर जाने वाला है। जो भी अच्छा बन पड़े, करें और जो भी करें भविष्य पर नज़र रखकर करें, यह जानते हुए कि आगे आने वाला समय अच्छा ही होगा।

धीरज रखें- सब कुछ ठीक हो जाएगा और आप जब पीछे मुड़कर देखेंगे तो पाएँगे कि इस विकट समय ने आपको मजबूत ही किया है!

क्या आपके ‘जीवन का सबसे खराब समय’ चल रहा है? उससे बाहर निकलिए! 9 सितंबर 2015

कल मैंने आपको एक आस्ट्रियन मित्र के बारे बताया था, जिसने मुझे फोन पर अपनी एक समस्या के बारे में बताया, जिस पर वह अपने करीबी मित्रों के साथ चर्चा नहीं कर सकता था। चर्चा के दौरान किसी बिन्दु पर उसने कहा कि जिन परिस्थितियों से वह अभी गुज़र रहा है, वह उसके जीवन का सबसे अशुभ समय है। अपने जीवन में न जाने कितनी बार मैं ये शब्द सुन चुका हूँ। मेरे सलाह-सत्रों में अक्सर लोग इस ‘अशुभ समय’ की चर्चा करते हैं और इसलिए मैंने सोचा, आज के ब्लॉग में कुछ पंक्तियाँ इसी विषय पर लिखी जाएँ- इन परिस्थितियों पर और उनसे उपजी अनुभूतियों पर।

जब भी आपको लगे कि आप ऐसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं तो सबसे पहले उसे ठीक-ठीक जान-समझ लें। जब आपको पूरी तरह विश्वास हो जाए कि आप ‘जीवन के सबसे खराब समय’ से गुज़र रहे हैं, तभी आप शांतिपूर्वक चीजों को तब्दील करने का उपाय कर सकते हैं।

ऐसी परिस्थिति तब उत्पन्न होती है, जब जीवन में अचानक, अनपेक्षित और अप्रत्याशित परिवर्तन आते हैं; जब ऐसी बातें होती हैं, जिनसे निपटने की तैयारी आपने नहीं की होती, आपके पास सोचने का इतना समय ही नहीं होता कि इस परिस्थिति का मुक़ाबला कैसे किया जाए। कोई अपघात, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएँ, अपने किसी प्रियकर की मृत्यु, नौकरी छूटना, जीवनसाथी, रिश्तेदारों या मित्रों से संबंध-विच्छेद या परस्पर संबंधों में छल-कपट का अंदेशा। स्वाभाविक ही, इनमें और भी बहुत सी बातें जोड़ी जा सकती हैं लेकिन मूल बात यह है कि ये बातें आपको निराश करती हैं, आप दुखी और इतने अवसाद-ग्रस्त हो जाते हैं कि आपका मस्तिष्क कोई सकारात्मक बात सोच ही नहीं पाता। अक्सर ऐसा इसलिए होता है कि कई चीज़ें, एक के बाद एक, बहुत तेज़ी से घटित होती हैं और वास्तव में सोचने का समय ही नहीं मिल पाता।

जिस किसी भी घटना के कारण आप उन परिस्थितियों से दो-चार हो रहे हों, उस पर ठहरकर समग्र विचार करें। समझने की कोशिश करें कि इस परिवर्तन का या इस परिस्थिति का ठीक-ठीक कारण क्या है और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करें। थोड़ा सा समय इस दुख को दें क्योंकि जिसके खोने का दुख आपको हो रहा है या जो तकलीफ आपको पहुँची है, उसका बाहर निकलना आवश्यक है। यह पूरी तरह सामान्य बात है और आपको इस भावनात्मक दौर से गुज़रना ही होगा। और उसके बाद आप उससे बाहर निकल आएँ।

सुनने में आसान लगता है न? लेकिन अमल में लाना मुश्किल है! क्योंकि उसके प्रति आपका रवैया गलत है! असल में लोग उसकी छोटी-मोटी बातों के विस्तार को पीछे छोड़ना नहीं चाहते। वे उसके मामूली 'अगर-मगर' में उलझे रह जाते हैं- अगर यह होता तो क्या होता, वैसा होता तो अच्छा होता, आदि आदि- जबकि ये बातें उन्हें कहीं नहीं ले जातीं। वे घटनाओं के मुख्य हिस्सों को मन में दोहराते रहते हैं या किसी तरह उन्हीं पिछली बातों पर आने की कोशिश करते हैं और इस तरह वहीं गोल-गोल घूमते रहते हैं।

और जब अंततः समझ में आ जाता है कि यह संभव ही नहीं है, कितना भी संघर्ष या कोशिश कर लें, पीछे नहीं लौटा जा सकता तो अत्यंत निराश हो जाते हैं, अवसादग्रस्त हो जाते हैं। आप समय को वापस नहीं ला सकते, घटित हो चुकी बातों को अघटित नहीं किया जा सकता और अतीत के अपने कर्मों को आप बदलकर ठीक नहीं कर सकते। लेकिन जो हो चुका है, आपके सामने घटित हो रहा है, उस पर अपना सोचने का तरीका आप बदल सकते हैं, उस पर अपना नजरिया बदल सकते हैं-और इस तरह उस परिस्थिति से और उस पर अपने नकारात्मक सोच से पार पा सकते हैं।

जो हो चुका है, उसका विश्लेषण करने और उसे समझने के लिए आपको समय चाहिए। लेकिन एक समयांतराल के बाद आपको अतीत के बारे में सोचना छोड़ना ही होगा और यह समझना होगा कि आपके सामने, आगे एक नया सबेरा है। ये भावनाएँ और ये एहसासात ताउम्र नहीं रहने वाले हैं! अच्छा समय फिर आएगा और हमेशा से हम रोज़ सबेरे उठकर इसी दिशा में प्रयत्न करते हैं!