12 साल की मोनिका की मदद कीजिए! वह बुरी तरह जल गई है – 15 दिसंबर 2014

आज मैं एक ब्लॉग श्रृंखला शुरू करने जा रहा हूँ। यह पूरा सप्ताह मैं अपने स्कूल की एक लड़की, मोनिका को समर्पित करना चाहता हूँ।

ऊपर दिए गए चित्र में आप मोनिका को देख सकते हैं। बाईं तरफ वाले चित्र में उसका 4 मई 2014 से पहले का चेहरा है और दाहिनी तरफ दस दिन पुराना फ़ोटो है, उसके साथ हुई दुर्घटना के सात माह बाद का चित्र।

मोनिका जब 5 मई 2014 के दिन स्कूल नहीं आई तो हमने सोचा कि वह भी दूसरे कई बच्चों की तरह कुछ दिन पहले से ही गर्मी की छुट्टियों पर चली गई है। कुछ बच्चे हर साल यही करते हैं। उस वक़्त हम बिल्कुल नहीं जान पाए थे कि मोनिका अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी भीषण दर्द में छटपटा रही है।

अपने घर में वह मिट्टी के तेल के स्टोव पर चाय बनाना चाहती थी, जिसकी आँच तेज़ करने के लिए उसे पम्प करना पड़ता है। या तो किसी बात से उसका ध्यान बँट गया या फिर वह किन्हीं ख्यालों में खोई हुई होगी और उसी झोंक में वह कुछ ज़्यादा और तेज़ी के साथ पम्प करती चली गई और दुर्भाग्य से तेल का फव्वारा स्टोव की लौ के साथ उसके चेहरे, हाथ और छाती तक पहुँच गया और वह इतनी बुरी तरह जल गई कि सिर्फ त्वचा ही नहीं, गहराई तक मांस भी झुलस गया।

परिवार उसे तत्काल अस्पताल ले गया मगर उन्हें पहले वृन्दावन फिर वहाँ से मथुरा, फिर आगरा और अंत में दिल्ली तक के चक्कर लगाने पड़े तब जाकर उन्हें ऐसा डॉक्टर मिल पाया, जो आग से जले इतने गंभीर ज़ख्मों को ठीक कर सकता! उस समय के बारे में, एक के बाद दूसरे अस्पताल में भर्ती होने और वहाँ से बाहर निकलने की कहानी मैं आपको कल बताऊँगा।

और अंत में वे वृन्दावन लौट आए। स्कूल का नया सत्र शुरू हो चुका था और स्वाभाविक ही शिक्षकों ने नोटिस किया कि मोनिका अनुपस्थित है, हालांकि वह अकेली अनुपस्थित लड़की नहीं थी। फिर यह कोई अनहोनी बात भी नहीं थी-कुछ बच्चे हर साल नए सत्र में दिखाई नहीं देते: या तो उनका परिवार कहीं और चला जाता है या फिर वे किसी दूसरे स्कूल में पढ़ने लगते हैं। बाद में जब मोनिका की एक सहेली ने बताया कि मोनिका के साथ दुर्घटना हो गई है तो हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक उसके घर गए और पता किया कि वह स्कूल क्यों नहीं आ रही है। उन्होंने मोनिका को स्कूल आने के लिए बहुत प्रोत्साहित किया और कुछ दिनों के बाद वह आने भी लगी। जब तक वह नहीं आई थी, हमें उसके साथ हुए हादसे की गम्भीरता का अंदाज़ा नहीं था!

उसे देखने के बाद हमें लगा कि उसके इलाज के लिए तुरंत हरकत में आने की आवश्यकता है। फ़ोटो में आप उसकी जलकर बदरंग हुई त्वचा तो देख सकते हैं मगर उससे आपको यह अनुमान नहीं हो पाता कि दरअसल वह अपनी गरदन तक घुमाने में असमर्थ है! नीचे दिए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि उसकी गरदन की गतिविधि में कितना ज़्यादा असर हुआ है! उसकी त्वचा इतनी जकड़ गई है कि वह दाएँ और बाएँ देख तो पाती है मगर देखने के लिए उसे शरीर का ऊपरी हिस्सा दाएँ-बाएँ सरकाना पड़ता है। अपनी ठुड्डी भी वह नीचे-ऊपर नहीं कर पाती। उसके हाथ की भी यही स्थिति है क्योंकि उसकी काँख की त्वचा भी जल चुकी है। सिर्फ 90 डिग्री तक ही (यानी फर्श के समान्तर) वह अपना हाथ उठा पाती है, इससे अधिक नहीं-और इतना करने में भी उसे अत्यंत पीड़ा होती है!

मोनिका ने उसके साथ हुई सारी घटना की जानकारी देते हुए बताया कि उसकी आँखों और त्वचा में आज भी दर्द होता है। दर्द कुछ कम हो इसके लिए वह रोज़ नियमित रूप से नारियल का तेल लगाती है। हमने चर्चा के लिए उसकी माँ को स्कूल बुलाया और उसके परिवार के रहन-सहन और आर्थिक स्थिति का जायज़ा लेने उसके घर भी गए। उनकी हालत देखकर हम स्तब्ध रह गए और मैंने बिना किसी का नाम लिए उसकी माँ पर एक ब्लॉग लिखा। हमने तुरन्त दिल्ली के नज़दीक के एक अस्पताल में वहाँ के प्लास्टिक सर्जन के साथ अपॉइंटमेंट लिया। पिछले कई माह से वह किसी डॉक्टर के पास नहीं गई थी क्योंकि न तो उसकी माँ के पास उसे दिल्ली ले जाने लायक पैसे थे और न ही उसकी माँ इतने दिन तक काम छोड़ सकती थी। इसके अलावा, उसे डॉक्टर के पास ले जाने वाला कोई दूसरा उपलब्ध नहीं था।

पिछले सप्ताह, बुधवार के दिन हम मोनिका को अस्पताल ले गए, आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुड़गाँव। हमने यह अस्पताल क्यों चुना, यह मैं आपको कल बताऊँगा। मोनिका के लिए क्या किया जा सकता है, तीन प्लास्टिक सर्जनों की एक टीम से चर्चा करके हमने पता किया कि मोनिका के इलाज के संबंध में क्या किया जा सकता है।

उसके शरीर की कार्यक्षमता पुनर्स्थापित करने के लिए मोनिका पर अब पाँच सर्जरीज़ या शल्यचिकित्साएँ की जानी आवश्यक हैं। दोनों आँखों के लिए एक, क्योंकि अभी वह आँखों की पलकें झपकाने पर भी आँखें पूरी तरह बंद नहीं होतीं, जिसके चलते आँखें सूखती हैं और उसे तकलीफ होती है। एक उसकी गरदन पर, जिससे वह उसे फिर से हिला-डुला सके। एक और, उसके मुँह पर, जिसे वह अभी पूरा खोल नहीं पाती और बहुत छोटे-छोटे कौर ही ले पाती है। और अंत में उसकी बाँह पर एक, जिससे वह आसानी के साथ, स्वतंत्रतापूर्वक अपना हाथ चला सके। डॉक्टरों ने बताया कि इन सब कामों के लिए वे उसकी जाँघ से त्वचा निकालकर आवश्यक स्थानों पर प्रतिरोपित करेंगे। इतना हो जाने के बाद ही वे चेहरे, छाती और बाहों के जले हिस्सों पर लेसर चिकित्सा शुरू करेंगे।

यह एक बड़ी लंबी प्रक्रिया होगी। डॉक्टरों ने बताया कि कुछ सर्जरियाँ एक साथ भी की जा सकती हैं और तब सिर्फ तीन सर्जरियाँ ही करनी पड़ेंगी। लेकिन इसके बाद भी दो सर्जरियों के बीच कम से कम चार से पाँच माह का अंतराल रखना ज़रूरी है, जिससे वह पूरी तरह स्वस्थ हो सके! इतना ही नहीं, जब वह बड़ी होगी, तब अगले पाँच से दस साल बाद उसे पुनः यही सर्जरियाँ करवानी होंगी क्योंकि जली हुई त्वचा शरीर के विकास के साथ उसी अनुपात में फिर कभी विकसित नहीं हो पाएँगी! इन सर्जरियों के बिना भविष्य में उसके कुछ अंगों के सामान्य परिचालन की संभावना नहीं रहेगी। इस पृष्ठ पर आप डॉक्टरों द्वारा प्रस्तावित मोनिका पर की जाने वाली सर्जरियों के विभिन्न चरणों का और उन पर होने वाले अनुमानित व्यय का विवरण देख सकते हैं।

जैसे ही हमने स्कूल में मोनिका को देखा, हमने सोच लिया था कि हम उसकी मदद करेंगे। दरअसल इसका निर्णय पहले ही लिया जा चुका है, अब तो हम सिर्फ उसके क्रियान्वयन के विभिन्न पहलुओं पर बारीकी से विचार कर रहे हैं कि किस तरह उसकी मदद की जाए।

हमने मोनिका की मदद करने का निर्णय कर लिया है-और आप भी हमारे इस काम में हाथ बँटा सकते हैं! हम चाहते हैं कि उसकी पहली सर्जरी के लिए जल्द से जल्द पर्याप्त रकम जमा हो जाए! आपका चंदा या दान इस मामले में बहुत मददगार साबित हो सकता है!

सहायता भेजने संबंधी विस्तृत जानकारी यहाँ प्राप्त करें!

भारत के निजी स्कूल किस तरह शिक्षा को भ्रष्ट व्यापार में तब्दील किए दे रहे हैं! – 26 मार्च 2014

भारत के निजी स्कूलों के बारे में अपने खयालात के इज़हार के साथ मैंने निजी स्कूलों पर जारी इस श्रृंखला की शुरुआत की थी, जिसमें मैं आपको वहाँ अपनाई जाने वाली लम्बी, उबाऊ और श्रमसाध्य प्रवेश-प्रक्रिया के बारे में बता चुका हूँ लेकिन जिस विषय पर मैंने अभी सिर्फ संक्षिप्त टिप्पणी की है वह दरअसल सबसे बड़ी समस्या है और हमेशा की तरह वह है पैसा! दरअसल, शिक्षा बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है! एक विशाल, भ्रष्ट व्यापार!

हमें कई बार उन पश्चिमी मेहमानों की प्रतिक्रिया सुनने को मिलती है, जो भारत में माता-पिता द्वारा बच्चों की शिक्षा पर किये जाने वाले व्यय के बारे में सुनकर हैरान रह जाते हैं. जब हम उनसे कहते हैं कि हमारा स्कूल सिर्फ उन्हीं बच्चों के लिए है, जिनके माता-पिता उन्हें उन स्कूलों में भर्ती कराने में असमर्थ रहते हैं, जहाँ फीस ली जाती है तो वे आश्चर्य से पूछते हैं: ‘क्या? आपके देश में बच्चों की पढाई के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है?’

कई पश्चिमी देशों में शिक्षा पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता है। हो सकता है कुछ जगह किताबें-कापियां खुद खरीदनी पड़ती हों मगर स्कूलों में फीस या चंदे के रूप में प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क आदि वसूल नहीं किया जाता। भारत में स्थिति कुछ अलग है।

जी हाँ! यहाँ सरकारी स्कूल हैं, जो मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं- कम से कम यह उन्हें ऐसा करना चाहिए! वहाँ स्कूल फीस नहीं लगती और सरकारें लम्बे-चौड़े इश्तहार प्रकाशित करती हैं कि वहाँ बच्चों को शिक्षा के अलावा मुफ्त भोजन भी मुहैया कराया जाता है- लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा वहाँ प्रदान की जाती है वह अक्सर बिलकुल निरुपयोगी और घटिया होती है! वहाँ अक्सर शिक्षक पढ़ाने ही नहीं आते और जब आते भी हैं तो आपस में बैठकर गपशप करते रहते हैं। कई जगह स्कूलों का इस्तेमाल कबाड़ख़ाने की तरह किया जाता है और यहाँ तक कि जानवर बाँधने के लिए भी उनका इस्तेमाल होता देखा गया है! कहीं कहीं शिक्षक अपने किसी स्थानापन्न को स्कूल भेज देते हैं, जो कम पढ़ा-लिखा और अयोग्य होता है और जिसे वे अपनी पक्की, सरकारी तनख्वाह में से कुछ रुपया दे देते हैं। इस दौरान शिक्षक अपने किसी निजी व्यापार में लगे होते हैं और इस तरह एक साथ दो स्रोतों से पैसा कमाते हैं। यह है सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का हाल! किसी को कोई परवाह ही नहीं है!

स्वाभाविक ही अपढ़ माता-पिता भी, जो आर्थिक रूप से भी कमज़ोर होते हैं, इस स्थिति से अनभिज्ञ नहीं होते। उन्होंने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा मगर वे भी देखते-समझते हैं कि उनके लड़के-लड़कियां एक के बाद एक परीक्षाएं पास करते हुए अगली कक्षाओं में पहुँचते जा रहे हैं मगर अपने नाम तक लिख नहीं पाते। हिंदी में लिखा छोटा-मोटा वाक्य भी ठीक से पढ़ नहीं पाते!

इन अभिभावकों में से कुछ शिक्षा के महत्व को समझते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे अधिक पढ़-लिख सकें- मगर उनके पास अपने बच्चों को किसी अच्छे निजी स्कूल में भेजने के लिए पर्याप्त रुपया नहीं होता। एक ऐसा स्कूल, जहाँ उन्हें वास्तव में पढ़ाया जाए! स्कूलों की वर्दियां और किताबें महँगी होती हैं, मासिक फीस बहुत अधिक होती है- 30 से 50 यू एस डॉलर यानी लगभग 2000 से 3000 रूपए तक! यह वह रकम है जो हमारे स्कूल के कई बच्चों के अभिभावक माह भर में कमा पाते हैं। वे किस तरह अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेज सकते हैं!

और सबसे मुख्य बात तो औपचारिक रूप से वितरित परिचय-पुस्तिकाओं में लिखा ही नहीं होता: अनौपचारिक प्रवेश-शुल्क, स्कूल को अनिवार्य रूप से दिया जाने वाला चन्दा, बच्चे को प्रवेश-प्रक्रिया में उत्तीर्ण कराने और उसका प्रवेश सुनिश्चित कराने के लिए दी जाने वाली रिश्वत! सामान्यतः यह रकम कुल मिलाकर 700 से 850 यू एस डॉलर यानी करीब 40 से 50 हजार रुपयों तक होती है। और अगर आप अपने बच्चे से प्रेम करते हैं और आपके लिए इतनी रकम खर्च करना सम्भव है तो आप यह सौदा मंज़ूर कर लेते हैं।

चंदे की शक्ल में इतनी बड़ी रकम अदा किये बगैर आप अपने बच्चे को किसी भी अच्छे स्कूल में दाखिल नहीं करवा सकते। हर व्यक्ति को इन स्कूलों में अपने बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए यह रकम अदा करनी ही होगी। और इन स्कूलों का भ्रष्ट प्रशासन-तंत्र यह सुनिश्चित करेगा कि रकम सही हाथों में पहुँच जाए।

आपको बच्चों की किताबें और कापियां स्कूल से ही खरीदनी पड़ती हैं और हर किताब-कापी पर स्कूल को अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है। इसी तरह स्कूल से ही वर्दियां भी खरीदनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत बाज़ार में उपलब्ध उन्हीं वर्दियों की कीमत से बहुत ज़्यादा होती है।

भ्रष्टाचार! पैसा! व्यापार! भारत में बच्चों की शिक्षा के साथ यही खिलवाड़ हो रहा है।

और निश्चय ही यह देश को और आने वाली पीढ़ियों को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाने वाला रास्ता कतई नहीं है!

एक नयी परियोजना: बच्चों के लिए नए योग-वस्त्र और चटाइयाँ!-19 अगस्त 2013

अगर आप हमारे सूचना-पत्र के नियमित पाठक हैं तो संभवतः आपको इस बारे में जानकारी होगी, जिसे आज मैं आगे बता रहा हूँ। हमने एक नयी योजना शुरू की है: हमें अपने स्कूल के बच्चों को योग करने के दौरान इस्तेमाल होने वाली चटाइयाँ और योग-वस्त्र उपलब्ध कराने हैं-और इस कार्य में हम आपका सहयोग पाकर प्रसन्न होंगे!

साल भर हमारे आश्रम में मिलने-जुलने वाले आते रहते हैं। वे हमारे स्कूल आते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं, वे उन्हें भोजन करता देखते हैं और अपनी कक्षाओं में उन्हें रोज़ योग करता हुआ देखकर खुश होते हैं। चाहे वे योग-विश्रांति शिविर में आएँ चाहे आसपास के इलाकों में घूमने-फिरने या चाहे सिर्फ आराम फरमाने आएँ, सभी को बच्चों से खुशी-खुशी मिलवाया जाता है। स्कूल की योग कक्षाएँ हमें पसंद हैं और इस बात पर हमें गर्व है कि हमारे बच्चे योग भी सीखते हैं-लेकिन उनके योग-वस्त्र और योग में इस्तेमाल होने वाली चटाइयाँ बहुत खराब हो गई हैं और देखने में अच्छी नहीं लगतीं!

हमने सन 2010 में योग कक्षाएँ शुरू की थीं। हमारे स्कूल में जिम नहीं था कि बच्चों के खेल-कूद का कोई इंतज़ाम हो सके, मगर शारीरिक व्यायाम भी ज़रूरी था-इस तरह योग कक्षाएँ शुरू करने का हमारा निर्णय तर्कसम्मत ही था। स्पष्ट ही, योग करने में उस तरह, बहुत बड़े स्थान की आवश्यकता नहीं होती जैसी कि दूसरे व्यायामों में होती है। बच्चों के लिए सिर्फ एक चटाई की आवश्यकता होती है। यही हमने किया-और हमारा वह प्रयास बहुत सफल भी हुआ। बच्चों ने उसे बहुत पसंद किया, हमारे मेहमान भी उन्हें योग करता देखकर बड़े खुश होते हैं और कई तो उनके साथ योग करना भी शुरू कर देते हैं।

अंग-संचालन के अलावा योग मानसिक रूप से भी बच्चों के लिए बड़ा लाभप्रद है। योग सिर्फ शारीरिक व्यायाम ही नहीं है बल्कि एकाग्रता, याददाश्त और विचारों को केन्द्रित करने में भी वह बड़ा लाभप्रद साबित होता हैं। इसके अलावा, जब कि दूसरे खेल बच्चों में प्रतियोगिता की भावना का संचार करते हैं, जिसमें हमेशा दूसरों पर और दूसरों के विकास पर ध्यान देना पड़ता है, योग में खुद पर ही ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। वैसे ही, भविष्य में बच्चों को तीव्र प्रतिस्पर्धा का सामना करना है-स्कूल और ‘खेल’ की कक्षाओं में इसकी आवश्यकता नहीं है।

जब बारिश नहीं होती थी, स्कूल आने पर बच्चे रोज़ योग किया करते थे। वे अपने सामान्य कपड़े पहनकर योग करते थे और सप्ताहांत में उन्हें धो लेते थे। वे अपनी चटाइयाँ रोज़ उठाते और उन्हें एक साथ रख देते। इस बात को तीन साल हो चुके हैं, उन्हीं चटाइयों में और उन्हीं योग-वस्त्रों में उन्होंने तीन साल योग किया। स्वाभाविक ही बच्चे बड़े हो चुके हैं। कुछ पतलूनें अब कैप्री जैसी दिखाई देती हैं क्योंकि बच्चे ऊंचे हो चुके हैं, वस्त्रों का रंग उड़ गया है और उन पर छपी आकृतियाँ खराब हो चुकी हैं। घर्षण से चटाइयाँ, उन जगहों पर बुरी तरह घिस गई हैं, जहां हाथ और पैर ज़्यादा पड़ते हैं। कुछ चटाइयाँ पूरी तरह फट चुकी हैं और फेंक दी गई हैं।

मुझे लगता है कि आप वस्तुस्थिति समझ रहे हैं और अब अगर मैं आपसे कहूँ कि हमारे यहाँ इस साल बहुत से नए विद्यार्थी भी आ गए हैं, और जो सबसे छोटे हैं उन्हें योग नहीं करना चाहिए क्योंकि सबके लिए पर्याप्त चटाइयाँ उपलब्ध नहीं हैं तो आपके सामने परिस्थिति की गंभीरता और भी अधिक स्पष्ट हो जाएगी। इसीलिए नई चटाइयाँ और नए योग-वस्त्र खरीदने की हमारी यह परियोजना प्राथमिकता के साथ पूरी की जानी ज़रूरी है। दूसरी अति आवश्यक वस्तुओं की खरीद के मद्देनजर-जैसे भोजन और शिक्षण के मद में होने वाला खर्च-अब तक हम इन वस्तुओं की खरीद को मुल्तवी करते रहे हैं, लेकिन आज हम आपसे गुजारिश करते हैं कि बच्चों को अच्छे योग वस्त्रों में और नई चटाइयों पर योग करने की सुविधा प्रदान करने के हमारे इस अभियान में आप भी सहभागी बनें!

योग-वस्त्रों और चटाइयों की अनुमानित लागत कुल 1500 यूरो है। एक व्यक्ति के लिए यह बहुत बड़ी राशि है और एक ही मद में इतनी बड़ी राशि खर्च करना हमारे लिए संभव नहीं है। लेकिन अगर आप सब थोड़ी-थोड़ी राशियों से हमारी मदद करेंगे तो मुझे विश्वास है कि हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।

यहाँ आप इस संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अपना अंशदान भी कर सकते हैं

हमारी मदद कीजिए! आपके सहयोग की न सिर्फ हम कद्र करते हैं बल्कि योग परिवार के बीच या ऐसे व्यक्तियों के बीच, जो बच्चों के लिए योग के लाभों के प्रति जाग्रत है, इस परियोजना के प्रचार के लिए किए जाने वाले आपके प्रयासों के लिए भी हम आभार व्यक्त करते हैं। योगी, योग शिक्षक, योग विद्यार्थी और सभी जिनके दिल बच्चों के लिए धड़कते हैं-हम उन सभी से अंशदान प्राप्त करके प्रसन्न होंगे!

मैं आप सबको अग्रिम धन्यवाद देता हूँ और एक बार यह परियोजना पूरी हो जाए, फिर मैं बच्चों के नए योग-वस्त्र और नई चटाइयाँ आपको दिखाने हेतु प्रस्तुत रहूँगा!