हिमालय में आई बाढ़ में जान को छोड़कर सब कुछ तबाह हो गया – हमारे स्कूल के बच्चे – 22 मई 2015

आज मैं आपका परिचय एक और परिवार के साथ करवाना चाहता हूँ, जिसने हाल ही में अपनी दो लड़कियों को हमारे स्कूल में भर्ती करवाया है। लड़कियों के नाम हैं रामेश्वरी और करिश्मा, जिनकी उम्र क्रमशः 10 और 5 साल है।

परिवार में तीन और सदस्य हैं: लड़कियों के माता-पिता और उनका बड़ा भाई, जो 16 साल का है और अभी एक सस्ते निजी स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ रहा है। रामेश्वरी भी अभी तक उसी स्कूल में पढ़ती थी लेकिन फिर उसके माता-पिता ने कोशिश की कि उनकी दोनों लड़कियों को हमारे स्कूल में प्रवेश मिल जाए। इससे उनकी बड़ी मदद हो जाएगी क्योंकि वास्तव में उन्हें कई जीवनोपयोगी मूलभूत वस्तुओं के लिए पैसों की सख्त ज़रूरत है!

परिवार के पास ज़्यादा कुछ भी नहीं है। दो साल पहले उन्हें बिल्कुल नए सिरे से जीवन की शुरुआत करनी पड़ी थी, जब उत्तर भारत में आई भयंकर बाढ़ ने उत्तराखंड में स्थित उनके घर और खेतों को तहस-नहस कर दिया था। तब तक वे जीवन भर हिमालय पहाड़ के पठारों पर रह रहे थे। उस समय, जब वे अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ गए हुए थे, उन्होंने यह समाचार सुना कि उनके इलाके में भयंकर बाढ़ आई हुई है। उन्होंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से फोन पर संपर्क करने की बहुत कोशिश की लेकिन किसी ने उनके फोन का उत्तर नहीं दिया। उत्तर देने के लिए कोई बचा ही नहीं था-उनका पूरा गाँव ही बाढ़ में बह गया था और लगभग सभी मित्र और परिवार वाले काल के गाल में समा गए थे!

बाद में एक बार वे सिर्फ अपने घर की हालत देखने गए थे लेकिन वहाँ कुछ भी नहीं बचा था कि जिसके सहारे जीवन की पुनः शुरुआत की जा सके! इसलिए उन्हें एक रिश्तेदार से दूसरे रिश्तेदार के यहाँ चक्कर काटने पर मजबूर होना पड़ा। कभी वे किसी मित्र या परिचित के घर चले जाते, कभी-कभार कोई काम भी कर लेते लेकिन कुल मिलाकर हर लिहाज से उन्हें भुखमरी का जीवन गुज़ारना पड़ रहा था। लगभग एक साल पहले वे किसी तरह वृंदावन पहुँचे, जहाँ वैसे भी काम की खोज में बहुत से लोग आते रहते हैं।

इस तरह पिछले दो साल से रामेश्वरी का पिता कई तरह के अलग-अलग काम करता रहा है और अंततः अब उसे यहाँ एक प्लास्टिक बैग फैक्टरी में सुरक्षा गार्ड की नौकरी मिल गई है। उसे 3500 रुपए यानी लगभग 60 डॉलर प्रतिमाह प्राप्त होते हैं और कुछ घंटे ओवरटाइम करने पर कभी-कभी कुछ अधिक। उसकी पत्नी भी परिवार की कुल आमदनी में अपना योगदान देती है: वह एक दुकानदार को जानती है, जो उसे कभी-कभी हिन्दू देवताओं के चित्र दे देता है, जिन्हें वह अपनी रंगीन पत्थरों की कला से सजा देती है और उसी दुकानदार को वापस कर देती है। एक चित्र को सजाने पर उसे 3 से 5 रुपए तक मिल जाते हैं और इस तरह एक डॉलर कमाने के लिए उसे 15 से 20 चित्रों को सजाना पड़ता है!

इतने दुर्भाग्य के बाद कुल मिलाकर इसे सौभाग्य ही कहा जाना चाहिए कि उनकी मुलाक़ात एक ऐसे व्यक्ति से हो गई, जो सरकार द्वारा मुफ्त फ्लॅटों के आवंटन की योजना के अंतर्गत आवेदन-पत्र लेने हेतु प्रभारी नियुक्त था। कुल मिलाकर 800 फ्लॅटों का आवंटन होना था और आवेदन-पत्र दाखिल करने के बाद, उनमें से वे भी एक थे, जिनकी लॉटरी लग गई थी! इस तरह वे अब एक फ्लॅट में रह रहे हैं, जिसमें बाथरूम और संडास है, छोटी सी बालकनी है और दो कमरे हैं, जिनमें से एक रसोई की तरह इस्तेमाल होता है। क्योंकि उनके पास उनका कोई विशेष सामान नहीं है, वह छोटा सा फ्लॅट भी खाली-खाली सा लगता है-लेकिन अब वह उनका अपना है!

जब हमने रामेश्वरी से उसके पुराने घर के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसे अब भी सब कुछ याद है। उसकी बहुत सी सहेलियाँ थीं और उसने बताया कि कभी-कभी वह उन्हें बहुत मिस करती है। आप इस विषय में कुछ भी नहीं कर सकते सिवा इसके कि उस नन्ही सी बच्ची के लिए दुखी हों, जिसने इतनी सी उम्र में कितना कुछ खो दिया!

लेकिन हमें पूरा विश्वास है कि जब जुलाई से नया स्कूली सत्र प्रारम्भ होगा, उसे हमारे स्कूल में बहुत सी नई सहेलियाँ मिल जाएँगी और रामेश्वरी और उसकी बहन करिश्मा, दोनों प्राथमिक शालाओं से पहले की कक्षाओं में यानी के जी से अपनी पढ़ाई की शुरुआत करेंगी!

आप भी इन लड़कियों जैसे दूसरे बच्चों की मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें! शुक्रिया!

बाढ़ प्रवण क्षेत्र में दो कमरों में छः वयस्क और दो बच्चे – हमारे स्कूल के बच्चे- 30 अगस्त 2013

अपने बच्चों के विषय में हर शुक्रवार, नियमित रूप से जारी होने वाली हमारी रिपोर्टें और बच्चों के घरों के वीडियो देखकर हमारी एक स्पोंसर ने ईमेल भेजकर पूछा कि क्या उसके द्वारा प्रायोजित बच्चे के घर से भी हम ऐसा वीडियो बनाकर लाएँगे और उसका भी परिचय करवाएँगे। वह उस लड़के के बारे में, उसके रहन-सहन के बारे में कुछ विस्तार से जानना चाहती थी और साथ ही उसके परिवार से 'मिलना' भी चाहती थी। वैसे भी हमने तय किया था कि हम लोग एक-एक करके सभी बच्चों के पास जाएंगे और उन्हें आपसे मिलवाएँगे, इसलिए हमें मुरारी से मिलने में कोई दिक्कत नहीं थी!

मुरारी 13 साल का है और पाँच साल से हमारे स्कूल में पढ़ रहा है। नर्सरी (pre-school) से शुरू करके अब वह तीसरी कक्षा में है। वह अपने परिवार के साथ रहता है और उसके दो बड़े भाई हैं, जिनकी उम्र 26 और 24 साल है। इस तरह बहुत समय तक, पिछले साल तक, जब उसके सबसे बड़े भाई की पत्नी ने एक शिशु यानी उसके भतीजे को जन्म दिया, वह घर का बेबी-बॉय रहा है। बच्चे के जन्म की घटना से पहले उनके यहाँ एक और सुखद कार्य, दूसरे भाई के विवाह, सम्पन्न हुआ था। इस भाई की पत्नी भी अब उनके साथ ही रहती है, जैसा कि भारत में सामान्य सी बात है। अर्थात, अब उस दो कमरे, एक संडास और थोड़ी सी खुली जगह वाले घर में छह वयस्क, मुरारी और वह छोटा शिशु एक साथ रहते हैं। उसी खुली जगह में हमने उनसे बातचीत की।

मुरारी के पिता के साथ अपनी बातचीत के दौरान ही हमें पता चला कि पहले वह एक बढ़ई था लेकिन बढ़ती उम्र और एक सड़क दुर्घटना के बाद, जैसा कि उसने बताया, उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती और वह लकड़ी के साथ कठोर श्रम कर पाने में असमर्थ है और जब कभी मिल जाता है, छोटा-मोटा फुटकर काम कर लेता है। इस काम से ज़्यादा आमदनी नहीं हो पाती मगर उसके दोनों बड़े लड़के मजदूरी करते हैं और हालांकि इन सबकी कुल आमदनी भी पर्याप्त नहीं होती, परिवार किसी तरह चल रहा है।

अपनी छत पर वे एक और कमरा बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं, जिससे सबसे बड़ा भाई और उसकी पत्नी अलग कमरे में रह सकें। इससे एक और लाभ यह होगा कि बारिश के दिनों में, जैसा कि इस बाढ़ प्रवण इलाके में अक्सर होता है, अगर पानी बढ़कर घर में आने लगे तो वे वहाँ जाकर कुछ दिन रह सकते हैं।

मुरारी का घर संजू, जिससे हम पहले ही आपको मिलवा चुके हैं, के घर से ज़्यादा दूर नहीं है। सन 2010 में, जब वृन्दावन में बहुत बाढ़ आई थी, मुरारी के घर में बाढ़ का पानी घुस गया था और वह बाढ़ उतरने तक आश्रम में रहने आया था। परिवार के दूसरे सभी लोग, चोरों के डर से, कई दिन छत पर डेरा डाले पड़े रहे। उन्हें डर था कि कहीं उनका थोड़ा-बहुत सामान भी चोर उठाकर न ले जाएँ।

जबकि पानी की समस्या वहाँ बनी ही रहती है, मुरारी उस जगह से प्रेम करता है और वहीं रहता है। "मेरे स्कूल के सभी दोस्त वहीं आसपास ही रहते है," वह कहता है। अभिभावक खुश हैं कि वे मुरारी को हमारे स्कूल भेज सके, जिससे उन पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कुछ कम हो सका। उन्हें उम्मीद है कि पढ़कर मुरारी अच्छी आमदनी वाली कोई नौकरी पा लेगा, क्योंकि अभी से वह परिवार के किसी भी सदस्य से ज़्यादा अंग्रेज़ी जानता है। उसके शिक्षक सहमत हैं-मुरारी अच्छा विद्यार्थी है, पढ़ने में तेज़ है और अगर अपने यार-दोस्तों से अपना ध्यान हटाकर एकाग्र होकर पढ़ाई करे तो वह और भी अच्छी तरह से और ज़्यादा जल्दी विषय को पकड़ सकता है, उन्हें आपस में जोड़ सकता है और उन्हें बेहतर ढंग से समझ सकता है।

जब मानसून की बारिश बहुत खतरनाक हो जाती है – हमारे स्कूल के बच्चे- 16 अगस्त 2013

आज मैं आपको हमारे स्कूल में पढ़ रहे एक विद्यार्थी, संजू से मिलवाना चाहता हूँ। संजू बारह साल का है और पिछले दस साल से वृन्दावन में निवास कर रहा है। उसे कोई दूसरा घर याद ही नहीं है और यह इलाका, जहां वह रह रहा है, उसे बहुत भाता है क्योंकि उसके कई मित्र भी इसी इलाके में, आसपास ही, रहते हैं। यहाँ एक ही बात उसे खलती है: हर साल बारिश के मौसम में अपने माँ-बाप को परेशान देखना और इस सवाल का सामना करना: "क्या इस साल बाढ़ में घर बचा रहेगा या नहीं?"

संजू के पिता रिक्शा चलाते हैं। उन्होंने हमेशा ऐसे ही काम किए हैं जिसमें रोज़ अनिश्चित कमाई ही हो पाती है और इसलिए वह शहर दर शहर भटकते फिरते हैं। अपने गाँव में उनका एक घर है-पर वहाँ काम नहीं है, जिससे वह कुछ कमा सकें और अपने परिवार का लालन-पालन कर सकें। उनकी पत्नी कलकत्ता की है मगर उसकी एक बहन वृन्दावन में रहती है और इसी कारण वह अपने दो साल के बेटे, संजू और एक माह की उसकी बहन को लेकर वृन्दावन आ गए थे। आते ही फिर एक बच्चा हो गया और उन्होंने तय किया कि अगर आर्थिक दृष्टि से संभव हुआ तो आगे वृन्दावन में ही बस जाएंगे। उन्होंने एक मकान खरीदा और खुश थे कि रहने को एक घर तो हुआ। फिर मानसून आया और बारिश का पानी न सिर्फ छत से टपकने लगा बल्कि दरवाजा तोड़कर घर के भीतर भी चला आया।

हर साल परिवार की यही हालत होती है। पानी से बचने के लिए उन्हें घर में जगह-जगह बाल्टियाँ या दूसरे बर्तन रखने पड़ते हैं जिससे उनके, दो कमरों के छोटे से, घर में पानी न भरे। लेकिन जब बारिश का पानी सड़कों और गलियों में बहना शुरू करता है तो उसे घर में आने से रोकने का कोई उपाय वे नहीं कर पाते। पूरा इलाका बाढ़-प्रवण है क्योंकि घर यमुना नदी के बहुत किनारे पर बना हुआ है।

सन 2010 की पिछली बाढ़ के दौरान उन पर जैसे अक्षरशः आसमान ही फट पड़ा था: उनका घर छत तक पानी में डूब गया था। जब पानी का स्तर ऊपर जा रहा था तब उसका आवेग इतना अधिक था कि घर की दीवारे उसे बरदाश्त नहीं कर पाईं। दीवारों में दरारें पड़ गईं और लगता था कि घर ही पानी में बह जाएगा। उस साल हमने भी वृन्दावन और उसके आसपास के इलाके में बहुत सा चैरिटी का काम किया था। हमने स्वास्थ्य-केंद्र स्थापित किए थे, भोजन की व्यवस्था की थी, जहां हम स्वयं बारिश में तबाह लोगों के लिए भोजन पकाते थे। यहाँ तक कि जिनका संपर्क दुनिया से कट गया था, उन पीड़ितों के पास हम नावों की सहायता से पहुंचे और भोजन वितरित किया। उस समय संजू और उसकी माँ ने हमें अपना घर दिखाया था: वह ऐसा नज़र आता था जैसे जल्द ही बाढ़ में बह जाएगा। आप सन 2010 की बाढ़ का वह दृश्य नीचे दिये गए वीडियो में देख सकते हैं।

अपने दूसरे बच्चों को लेकर संजू की माँ को अपने रिश्तेदारों के घर आश्रय लेना पड़ा और संजू, कुछ दूसरे पीड़ित बच्चों के साथ, हमारे यहाँ, आश्रम में, रहने आ गया। यहाँ आने के कारण, बाढ़ के बावजूद उनकी पढ़ाई में कोई व्यवधान उपस्थित नहीं हुआ और वह नियमित रूप से स्कूल की पढ़ाई जारी रख सका। अपने जैसे ही दूसरे गरीब लोगों की तरह संजू के पिताजी को भी छत पर सोना पड़ा, जिससे उनका थोड़ा बहुत, जो भी सामान बचा रह गया था, उसे चोरों से बचाया जा सके।

किसी तरह आश्चर्य ही था कि, कुदरत की कृपादृष्टि ही थी कि बाढ़ दीवारों को बहाकर नहीं ले जा सकी। धीरे-धीरे पानी का स्तर नीचे आया और परिवार खुश था कि उनका घर जहां था, वहीं मौजूद है। घर में जगह-जगह दरारें पड़ गई थी और वहाँ नमी के मारे सांस लेना दूभर था। परिवार के पास घर की मरम्मत के लिए धन नहीं था। पैसे की कमी के चलते दीवारों को जोड़ना और दरारों को भरना भी संभव नहीं था। अगली बार जब नदी में बाढ़ आएगी, तब क्या हालत होगी? क्या हालत होगी, जब किसी दिन तूफान और पानी का बहाव इतना तेज़ होगा कमजोर दीवारे बाढ़ में बह जाएंगी? वे जानते हैं कि वे खतरे में हैं, किसी भी दिन दीवारें उन पर गिर सकती हैं लेकिन उनके पास कोई चारा नहीं है। जो पैसा वे कमाते हैं वह बाल-बच्चों और अपने लिए भोजन और कपड़े-लत्तों के इंतज़ाम में ही खर्च हो जाता है।

कम से कम उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता नहीं करनी पड़ती। संजू पहले से हमारे स्कूल में पढ़ता है और उन्होंने अपने दूसरे बच्चों को भी अगले साल से हमारे स्कूल में भेजने का वादा किया है। इस तरह बच्चों को गरमागरम भोजन भी मिल जाएगा और वे स्कूल में रहकर कुछ न कुछ सीख सकेंगे और अपने परिवार का भविष्य कुछ उज्ज्वल बनाने में अपना योगदान कर सकेंगे!