अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। क्यों? 2 जून 2015

कल मैंने एक परिचित का ज़िक्र किया था, जिसकी निगाह में, अश्लील फिल्मों के कारण भारत में बलात्कार के प्रकरण बढ़े हैं। मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मेरे विचार में काम-वासना एक सुंदर एहसास है। आज मैं उन गलत तर्कों के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिनके द्वारा यह प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है कि अश्लील फिल्मों के कारण बलात्कारों की संख्या में इजाफा हो रहा है क्योंकि वे कामोत्तेजना पैदा करती हैं।

साधारण शब्दों में कहा जाए तो यह निष्कर्ष पूरी तरह गलत है। अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। यह गलत है कि पुरुष अश्लील फिल्में देखते हैं, कामोत्तेजित होते हैं और किसी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते तो बाहर निकलकर स्त्रियॉं के साथ बलात्कार करना शुरू कर देते हैं। अश्लील फिल्में देखने का अर्थ यह नहीं है कि आप लोगों के साथ बलात्कार करने लगते हैं!

बहरहाल, यह बताना आवश्यक है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं! कुछ लोगों को यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लग सकती है लेकिन यह एक तथ्य है। फिर क्यों नहीं वे भी कामोत्तेजना में पागल होकर बलात्कार करने निकल पड़तीं? इस विचार पर हँसे नहीं-जी हाँ, ऐसा भी होता है, जहाँ महिलाएँ बलात्कार करती हैं और पुरुष पीड़ित की भूमिका में होता है। बस ऐसा कभी-कभी ही होता है और सिर्फ एक मामूली अपराध मानकर उसे दबा दिया जाता है। लेकिन यह सच है कि महिलाएँ भी अश्लील फिल्में देखती हैं। तो फिर उनकी काम-वासना कहाँ निकलती है?

पहले जब अश्लील फिल्में नहीं हुआ करती थीं तब भी बहुत सी दूसरी कलाएँ और साहित्य होता था, जैसा कि मैने कल ज़िक्र भी किया था। यह हजारों सालों से हो रहा है, यह नई बात नहीं है! खजुराहो के मंदिरों में उकेरे गए कामोद्दीपक मूर्तिशिल्पों की कल्पना करें! आपके अनुसार तो यह होना चाहिए कि इन कामोत्तेजक मूर्तियों को देखने वाला हर शख्स, भले ही वे मूर्तियाँ तकनीकी रूप से उतनी विकसित न हों, काम-वासना में इस कदर पागल हो जाना चाहिए कि किसी भी स्त्री को पकड़कर बलात्कार शुरू कर दे। उन पर्यटकों की कल्पना करें, जो इन कामसूत्र मंदिरों को देखने के लिए पैसे खर्च करते हैं और मूर्तियों को देखकर इतने कामोत्तेजित हो जाते हैं कि पास से निकल रही किसी महिला पर्यटक को दबोच लेते हैं! वाकई ये मंदिर बहुत खतरनाक हैं और उन्हें वैश्विक-घरोहर माना गया है! आश्चर्य है!

मज़ाक छोड़िए। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि न तो अश्लील फिल्में और न ही काम-वासना बलात्कार का कारण होते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि महिलाओं के कपड़े बलात्कार का कारण है। कुछ दूसरे कहते हैं, भारतीय समाज का पश्चिमीकरण इसका कारण है। कुछ ज़्यादा ही मूर्ख लोग कहते हैं कि गलती मोबाइल फोनों की और पश्चिमी खान-पान की है-और बहुत से लोग उनकी बात पर यकीन भी कर लेते हैं! आप अपने विचार अपने पास रखें, मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। मेरी नज़र में, कामोत्तेजना का दमन ही इसका मुख्य कारण है और कुछ मामलों में-स्त्रियॉं का दमन करने के इरादे से और उन्हें उनकी औकात बताने तथा दूसरी वस्तुओं की तरह, उपभोग की वस्तु मान लेना बलात्कार कारण है।

आप समझ गए होंगे कि मैं किस ओर इशारा कर रहा हूँ: जो समाज सेक्स को लेकर ज़्यादा खुले हुए हैं और जहाँ लैंगिक समानता काफी हद तक मौजूद है, वहाँ उन मुल्कों के मुकाबले, जहाँ स्त्रियों का दमन किया जाता है और सेक्स अब भी वर्जनामुक्त नहीं है, यौन अपराध कम होते हैं! जहाँ वर्जनाएँ हैं, दमन है और जहाँ सेक्स संबंधी हर बात आप छिपाते हैं या उन्हें छिपाकर करना पड़ता हैं तो परिणामस्वरूप यह दमन और ये वर्जनाएँ विस्फोटक रूप से सामने आती हैं।

उन पुरुषों के लिए, जो महिलाओं के दमन में विश्वास रखते हैं, बलात्कार अपने शक्ति-प्रदर्शन का और महिलाओं को उनका नीचा स्थान दिखाने का ज़रिया बन जाता है। एक ऐसा दुष्कर्म, जिससे वे महिलाओं की इच्छाशक्ति का खात्मा कर देना चाहते हैं और सिद्ध करना चाहते हैं कि वह उससे कमज़ोर है। इसके लिए कामोत्तेजना की ज़रूरत नहीं है, इसमें किसी तरह का यौन-आनंद प्राप्त नहीं होता। मेरा विश्वास है कि बलात्कारी भी इससे कोई संतोष प्राप्त नहीं कर सकता!

और, जैसा कि मैंने पहले भी इशारा किया, महिलाओं की और खुद अपनी नैसर्गिक सहज-प्रवृत्ति और यौन ज़रूरत के इस दमन के मूल में धर्म मौजूद है। धर्म, परंपरा और संस्कृति ने अप्राकृतिक ढंग से यौनेच्छाओं को लोगों के मन में एक मानसिक दैत्य में तब्दील कर दिया है। आपको स्वतंत्र रूप से अपनी सेक्स विषयक इच्छाओं के विषय में निर्णय लेने की अनुमति नहीं है, आपको सेक्स के बारे में सोचने की या उसका आनंद उठाने की अनुमति नहीं है! यह दमन ही एक सीमा के बाद उसे एक विस्फोट के रूप में फटने के लिए मजबूर कर देता है!

अगर आपका सहजीवन (वैवाहिक जीवन) सुखद और प्रेममय है तो स्वाभाविक ही, आपकी काम-वासना को बाहर निकलने का मौका मिल जाता है और आप दमित कामेच्छा से मुक्त होते हैं। जिस व्यक्ति को यौन संतुष्टि प्राप्त है वह भला बलात्कार क्यों करेगा? अगर आपके आसपास कोई नहीं है, जिससे आप यौन संतुष्टि प्राप्त कर सकें तो फिर बात अलग है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी बलात्कार कतई तार्किक परिणति नहीं है! सभी जानते हैं कि इसका भी उपाय है: आप खुद अपनी मदद कर सकते हैं! जी हाँ, पुरुष और महिलाएँ, दोनों के पास अपनी यौन क्षुधा शांत करने के उपाय उपलब्ध हैं। दुर्भाग्य से उन पर भी पाबंदी है: धर्म कहता है कि वे उपाय करने से आप अंधे हो जाएँगे, कि आप अपनी ऊर्जा व्यर्थ खो बैठेंगे, कि ऐसा करना पापकर्म है! आगे किसी दिन मैं एक पूरा ब्लॉग हस्तमैथुन पर लिखना चाहूँगा, जिसमें मैं उन समस्याओं पर भी प्रकाश डालूँगा, जिनके चलते लोग हस्तमैथुन करके अपराध बोध से ग्रसित हो जाते हैं।

और अंत में हम इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि अश्लील फिल्में बलात्कार का कारण नहीं हैं। कारण काम-वासना का दमन है-और भारत में बढ़ते यौन अपराधों की भयावह स्थिति भी इसी का नतीजा है!

कामुकता – एक आनंदित करने वाली नैसर्गिक अनुभूति – उसे बीमारी समझने वाले स्वयं बीमार हैं – 1 जून 2015

कुछ समय पहले मेरे एक परिचित ने अश्लील फिल्मों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी नज़र में ये फिल्में लोगों के मन में काम-वासना या कामोत्तेजना पैदा करती हैं और उसी का परिणाम है कि भारत में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती चली जा रही हैं। संक्षेप में, वे सोचते हैं कि जितना ज़्यादा अश्लील फिल्में लोग देखेंगे, उतनी ही अधिक संख्या में महिलाओं पर बलात्कार होगा।

इससे पहले कि मैं और विस्तार में जाऊँ, मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ: कामुकता या कामोत्तेजना बुरी चीज़ कतई नहीं है। यह इंद्रियों में होने वाली एक नैसर्गिक संवेदना, अनुराग और एहसास है और वह सभी में पाई जाती है। पुरुष और स्त्रियाँ, शारीरिक रूप से सक्षम या अक्षम, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, यह हर एक व्यक्ति में मौजूद होती है। काम-वासना सब में है-सच यह है कि अगर आपमें नहीं है तो आपके शरीर में कोई न कोई विकृति है! हर एक में अलग-अलग परिमाण में काम-वासना पाई जाती है, जो उनके शरीर में मौजूद हार्मोन्स और निश्चित ही, मानसिक अवस्थाओं से उपजी भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है।

सामान्य परिस्थितियों में भी वह आसानी से उत्पन्न हो जाती है। वास्तव में, एक मामूली विचार भी काम-वासना पैदा करने के लिए पर्याप्त है। इसके लिए फिल्म या किसी कामोत्तेजक फोटो या तस्वीर की ज़रूरत नहीं है! इसके अलावा, सामान्य बॉलीवुड या हॉलीवुड मूवी भी आपमें कामोत्तेजना या काम-वासना पैदा कर सकती है-या अपने कार्यालय में अपनी कुर्सी पर बैठे, कोई बिल्कुल अलग काम करते हुए भी महज एक विचार आपमें कामोत्तेजना पैदा कर सकता है! इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक या मानसिक गड़बड़ी है और वह कामोत्तेजना महसूस नहीं कर पाता तो घंटो अश्लील फिल्में देखता रहे, उसे कभी, कोई कामोत्तेजना नहीं होगी!

न सिर्फ कामवासना नैसर्गिक है, वह वास्तव में बहुत खूबसूरत चीज़ भी है! काम-वासना की भावना से और खासकर जब आप उसे संतुष्ट कर देते हैं तो आप भीतर तक स्वतः ही खुशी और आनंद में डूबने-उतराने लगते हैं, परितुष्ट महसूस करते हैं, प्रेम की गहरी अनुभूति में सराबोर हो उठते हैं। काम-वासना आपको असीम प्रसन्नता और मुक्ति प्रदान करती है और मेरी नज़र में, वह बलात्कार जैसे घृणित अपराध का कारण हो ही नहीं सकती! इस उत्कट आनंद के साथ बलात्कार की कोई संगति नहीं बैठती। लेकिन इसके बारे में और अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

काम-वासना हमेशा से इस संसार का हिस्सा रही है। यह सर्वव्यापी है-साहित्य से लेकर कलाओं तक, घरों में मौजूद मूर्तियों से लेकर पूजास्थलों में उकेरी गई चित्रकारी तक। तकनीक के विकास के साथ इनकी प्रतिकृतियाँ सर्वसुलभ हो गई हैं, माउस के एक क्लिक के साथ आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत हाजिर! लेकिन दुर्भाग्य से कामवासना या कामोत्तेजना के बारे में वही पुरानी समझ अब भी बरकरार है, उसमें रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं हुआ है।

आज भी बहुत से लोग काम-वासना को बुरी चीज़ समझते हैं। जितना अधिक वे कट्टर होते जाते हैं, काम-वासना, सेक्स और उसके आसपास मौजूद हर चीज़ को वे उतना ही अधिक बुरा समझते जाते हैं। कामुक होना बीमार मस्तिष्क होने का प्रमाण माना जाता है। एक स्वस्थ मस्तिष्क में ऐसे कामोत्तेजक विचार नहीं आ सकते और पाक-साफ़ शरीर में ऐसे एहसासात, ऐसी इच्छाएँ और वासनाएँ पैदा भी नहीं होनी चाहिए। अगर आप सेक्स का आनंद लेते हैं या उसके बारे में सोचते भी हैं तो अपने आपको अपराधी महसूस करना चाहिए। शारीरिक वासनाओं की अनुभूति का दमन किया जाना चाहिए। अतिधार्मिक लोग ब्रह्मचर्य की इसी धारणा पर विश्वास करते हैं। सन्यास के ज़रिए वे पवित्रता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

मैं समझता हूँ कि यही वास्तव में रुग्ण सोच है। धर्म ने लोगों के मन में यह बात बिठा दी है कि कामुकता बुरी चीज़ है। यह पूर्वाग्रह ही लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बनाता है! ब्रह्मचर्य पूरी तरह अप्राकृतिक विचार है। संभोग का दमन करके शुद्धि प्राप्त करने का दावा करना पूरी तरह अवैज्ञानिक है लेकिन धर्म इसकी परवाह नहीं करता!

यौनेच्छाओं का यही दमन पुरुषों और महिलाओं को उसकी खोज की ओर, उसकी अधिकाधिक जाँच-परख की ओर उद्यत करता है, भले ही यह वे ढँके-छुपे तरीके से करते हों। और उसके बाद वह कई रुग्ण तरीकों से फूट पड़ता है-यौन अपराध की शक्ल में, जिन्हें होता हुआ हम रोज़ देखते हैं, क्योंकि अपनी नैसर्गिक उत्तेजनाओं को बाहर निकालने का कोई रास्ता उनके पास नहीं होता!

कामुकता: सैकड़ों सालों से उसकी शोहरत एक मनोविकार के रूप, एक गर्हित अनुभूति के रूप में रही है और मेरे विचार में, इस धारणा को बदलने का वक़्त आ गया है!

अपने दुख का मुकाबला कैसे करें? क्या उसे दबाकर? क्या उसका दमन करके? 12 दिसंबर 2013

कल मैंने बताया था कि मेरे विचार में अपने प्रियकर के निधन की पीड़ा में धार्मिक दर्शन किसी तरह मदगार साबित नहीं होते। मैंने कहा था कि आपको यह दर्दनाक सत्य स्वीकार करना ही पड़ता है। निश्चय ही यह एक वास्तविकता है लेकिन इस दुख के कई चरण होते हैं और मैं चाहूँगा कि खुद अपने अनुभवों का संदर्भ लेकर उन पर कुछ प्रकाश डालूँ।

पहला चरण होता है, ज़बरदस्त सदमा। इसकी विकरालता और मियाद इस बात पर निर्भर करती है कि आप उसकी मृत्यु की संभावना और स्वाभाविकता से किस हद तक वाकिफ थे तथा मृतक से आपके कितने प्रगाढ़ संबंध थे।

अगर अपने बारे में कहूँ तो यह मियाद एक हफ्ते की रही, जब मैं 2006 में विदेश दौरे पर था और वहीं मुझे एक दर्दनाक कार हादसे में अपनी छोटी बहन के देहांत की खबर मिली। मैं अपना होशोहवास खो बैठा और यह हालत पूरे एक सप्ताह रही। मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं था कि ऐसा हो सकता है। मैं रोया नहीं और अपने दर्द को बाहर निकालना मेरे लिए मुश्किल हो गया। एक दिन, सबेरे-सबेरे मैंने अपने छोटे भाई से कहा, उसे गूगल में देखो, वह हमें वहाँ मिल जाएगी, चलो हम उससे बात करते हैं। मैं मानने के लिए तैयार ही नहीं था कि वह अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन अंततः एक दिन वास्तविकता मेरे सामने अपने विराट रूप में प्रकट हुई और मेरे आंसुओं का बांध टूटकर बह निकला।

और अम्माजी के देहांत के वक़्त हम सब उनके पास थे और जब अम्माजी को दिल का दौरा पड़ा, हम सब उनके आसपास ही थे लेकिन अस्पताल ले जाने की हमारी हर कोशिश के बावजूद वे हमें छोड़ कर चली गईं। यह स्पष्ट होने के बाद से कि वह सदा-सदा के लिए हमें छोड़ कर चली गई हैं उनके दाहसंस्कार तक मेरी आँख से आंसू नहीं निकले। लेकिन जब मैं आश्रम वापस आया तो बिना माँ का आश्रम बहुत खाली-खाली लगा और दुख अचानक आंसुओं के रूप में फूट निकाला। फिर हम सब साथ-साथ रोने लगे।

मेरे विचार में यह दूसरा चरण होता है और बहुत महत्वपूर्ण होता है। दुख को पूरी तीव्रता के साथ महसूस करें। फिर उसे बाहर निकलने दें, आंसुओं की, सिसकियों की शक्ल में रोएँ। इस प्रक्रिया का पूरा होना आवश्यक है, इस दौरान अपनी भावनाओं को रोकने की कोशिश बिल्कुल न करें!

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इस प्रक्रिया को ठीक तरह से पूरा नहीं होने देते। अपनी प्रकृति और स्वभाव के चलते या अपनी सांस्कृतिक परंपरा के चलते, वे अपने दिल के चारों ओर पत्थर की कठोर दीवार निर्मित कर लेते हैं और अपने दर्द को बाहर नहीं निकलने देते। वे संयमी होने का नाटक करते हुए उसका दमन करते हैं, जो कि ठीक नहीं है। उसे बाहर निकलने का रास्ता दें। चाहें तो बंद कमरे में आँसू बहाएँ लेकिन मैं कहता हूँ कि लोग उन आंसुओं को देखकर आपके विषय में कोई धारणा नहीं बनाने वाले! अपने दुख को दूसरों के साथ साझा करने पर आप अधिक शीघ्रता के साथ उससे मुक्त हो सकेंगे और आप दूसरों के साथ स्थायी रूप से जुड़ पाएंगे!

जीवन रुकता नहीं है। अपने आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढालना पड़ता है और संभव है मृतक द्वारा छोड़ी जगह कभी भर न पाए। कुछ समय के लिए मैं अपनी बहन की तस्वीर की तरफ देख भी नहीं पाता था। अम्माजी की तस्वीर की तरफ देखना भी बहुत समय तक बड़ा मुश्किल था। लेकिन उन स्मृतियों को बीच-बीच में बाहर निकालकर उसमें डूब जाना अच्छी बात है, अतीत की ऐसी स्मृतियाँ सुखद ही होती हैं।

ऐसी परिस्थितियों में कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो भविष्य में गकड़िया (जलते कोयले पर सिंकी मोटी रोटियाँ) या गाजर का हलुवा नहीं खाएँगे क्योंकि हमारी माँ ये व्यंजन दुनिया में सबसे अच्छा बनाती थीं। और हमेशा वह उनके हाथों ही उपलब्ध हुआ करता था। लेकिन हम ये व्यंजन बनाना जानते हैं और हमारे पास अम्माजी से सीखे हुए कर्मचारी भी हैं इसलिए हम अक्सर उन्हें बनाते-खाते हैं। जब हम उन्हें खाते हैं तो उन गकड़ियों और गाजर के हलुवे की याद करते हैं, जिसे अम्माजी हमें बनाकर खिलाया करती थीं और साथ-साथ एकाध आँसू बहा लेते हैं या बस उनकी याद में भीगे हुए चुपचाप खाते रहते हैं।

संसार (जीवन) चलता रहता है और उसके अनुसार हमारा जीवन गुज़रता रहता है। हमारे मस्तिष्क में सुखद स्मृतियाँ होती हैं और दिल में प्रेम। स्मृतियों को अपने दिल से दूर न करें। उन्हें जियेँ, उनसे प्रेम करें और आप अनुभव करेंगे कि वह व्यक्ति आपके बिल्कुल करीब आ गया है, आपके दिल में बस गया है।