एक प्रतियोगिता, जो मुझे अच्छी नहीं लगी, भले ही मैंने उसे जीत लिया था – 20 जुलाई 2014

आज मैं आपको सन 2006 में कोपेनहेगन में दिए गए अपने व्याख्यान के बारे में बताना चाहता हूँ। हर तरह से वह एक अनोखा व्याख्यान रहा। क्यों? आगे बताता हूँ।

कोपेनहेगन में मेरा एक दोस्त था, जिसके बारे में शायद मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ। वह एक लेखक है; दार्शनिक की मानिंद वाकई एक दिलचस्प व्यक्ति। उसने मुझे 2006 में दोबारा अपने यहाँ आने का न्योता दिया और वही उस बार मेरे कार्यक्रम आयोजित करने वाला था। आयोजक के अतिरिक्त वह मेरा मित्र भी था और कार्यक्रमों के बीच मैं उसके साथ एक मित्रतापूर्ण समय गुज़ारने की प्रत्याशा में था।

मैं सबेरे सबेरे कोपेनहेगन आ गया और उसके घर, जहाँ मैं कुछ दिन ठहरने वाला भी था, पहुँचने पर उसने मुझे मेरे कार्यक्रमों की रूपरेखा बयान की। सूची में सबसे पहला स्थान मेरे उसी व्याख्यान का था, जिसका आयोजन उसी दिन होना था और उसने उसके विषय की मूल बातों को स्पष्ट करते हुए कहा: यह व्याख्यान कुछ अनोखा होगा! मैंने पूछा कि ‘अनोखा’ से उसका क्या मतलब है तो उसने विस्तार से समझाना शुरू किया:

उसकी योजना के मुताबिक वहाँ अकेला मैं व्याख्यान नहीं देने वाला था बल्कि वह खुद और हम दोनों का एक और मित्र भी मेरे साथ शामिल रहने वाले थे। हम दोनों के इस साझा मित्र का लोगों के साथ सीधा संपर्क था और वह उनकी शारीरिक समस्याओं पर काम किया करता था। हम तीनों को एक ही विषय पर बोलना था और उसके बाद श्रोताओं को, जोकि इस आयोजन में पैसा खर्च करके हम तीन भिन्न व्यक्तियों को सुनने आने वाले थे, यह निर्णय करना था कि किसका व्याख्यान सबसे अच्छा रहा।

मैं पूरी तरह हतप्रभ रह गया। कार्यक्रम शुरू होने में कुछ घंटे ही बाकी थे और मैंने व्याख्यानों के इस तरह के किसी आयोजन के बारे में सुना तक नहीं था। मैं आज तक ऐसी किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बना था और मेरे अन्दर किसी भाषण प्रतियोगिता में विजयी होने का न तो कोई जज़्बा था और न ही कोई महत्वाकांक्षा थी! ईमानदारी की बात यह कि यह विचार मुझे कतई पसंद नहीं आ रहा था। अपने दोस्तों के विरुद्ध प्रतियोगिता में शामिल होना मुझे अजीब सा लग रहा था! खैर, सारे इंतज़ाम हो चुके थे और मैंने सोचा, चलो पहली बार इस तरह का अनुभव प्राप्त होगा। एक नया, अलग सा अनुभव-अपनी तरफ से अपन अच्छे से अच्छा कुछ करते हैं!

जैसी योजना थी, सबके भाषण हुए। मेरे मित्र ने श्रोताओं के पास हम तीन वक्ताओं के नामों की पर्ची पहुँचा दी, जिस पर भाषणों की समाप्ति पर उन्हें हर वक्ता को अंक प्रदान करने थे। फिर एक के बाद एक हम तीनों ने एक निर्धारित विषय पर-याद नहीं, विषय क्या था-भाषण दिए और श्रोताओं को सोच-समझकर अंक देने के लिए कुछ वक़्त दिया गया। फिर सारे श्रोताओं से पर्चियां वापस ली गईं और अंकों का हिसाब लगाया गया-और फिर वह क्षण भी आ गया जब नतीजे घोषित किए जाने थे:

प्रतियोगिता में मैं विजयी रहा था, दूसरे क्रम पर हमारा वह साझा मित्र था और आयोजक स्वयं तीसरे और अंतिम स्थान पर रहा।

मुझे कोई अचरज नहीं था-आखिर यह मेरा पेशा था! जहाँ तक बाकी दोनों का सवाल था, मुझे लगता है श्रोताओं ने अपनी निजी पसंद के अनुसार अंक दिए होंगे। हमारा वह साझा मित्र ज्ञान का भण्डार ही था और हालाँकि वह पेशावर वक्ता नहीं था, वह सारा दिन लोगों के साथ संपर्क रखे हुए था। वह भी एक लेखक था और जानता था कि अपने विचारों को शब्दों में कैसे व्यक्त किया जाता है।

सारे आयोजन पर हम हँसते रहे, उस पर हल्की-फुलकी बातें करते रहे और श्रोताओं को भी यह अच्छा लगा कि हम सभी ने प्रतियोगिता को खेल की तरह लिया-कम से कम यह ज़ाहिर करते रहे कि हम उसे खेल की तरह ले रहे हैं। मगर पूरे समय मुझे लगता रहा कि मेरे मित्र का अहं आहत हुआ है! उसके चेहरे पर मुस्कान थी, वह भरसक अपने आप पर हँसने का नाटक कर रहा था लेकिन उससे ज़्यादा कुछ न कुछ उसके भीतर घटित हो रहा था! मैं उसे अच्छी तरह जानता था और मुझे लग रहा था कि उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रतियोगिता में वह तीसरे और अंतिम स्थान पर रहेगा।

वह पूरे कार्यक्रम का पूरा आनंद नहीं ले सका-अन्यथा मैं समझता हूँ कि यह विचार उतना बुरा भी नहीं था और उसका भरपूर मज़ा लिया जा सकता था!

दूसरों से तुलना करने पर न तो आपकी सुन्दरता बढ़ती है न ही घटती है- 27 अगस्त 2013

कल मैंने बताया था कि लोग लगातार हर बात में दूसरों से अपनी तुलना करके बहुत अवसादग्रस्त हो जाते हैं। जिस बात पर, खासकर महिलाएं, अपनी तुलना दूसरों से करती हैं, वह है सुंदरता। लेकिन मेरी नज़र में, इस तरह की तुलना ही महिलाओं में स्वाभिमान की कमी और अपने शरीर के बारे में कुंठा और अवहेलना का कारण है।

मुख्य समस्या फिर वही है: बाहरी बातों से अपनी तुलना करना। यह बिल्कुल असामान्य दृश्य नहीं है कि एक महिला किसी और के कमरे में प्रवेश करती हैं और पूरे कमरे का बारीक मुआयना करना शुरू कर देती हैं। यह पिश्टोक्ति होगी लेकिन अधिकांश महिलाएं यह बात मानेंगी-कम से कम दिल ही दिल में-कि वे दूसरी महिलाओं के शरीर और चेहरे को बड़ी उत्सुकता से देखती हैं और उनके वस्त्रों, उनकी देहयष्टि, उनकी तंदरुस्ती, केशसज्जा और यहाँ तक कि मेकअप आदि की तुलना खुद की इन्हीं चीजों से करती हैं। इस जांच के आधार पर उनका स्वाभिमान या तो बढ़ जाता है या कम हो जाता है। अगर सामने वाली महिला थोड़ी मोटी है या उसके चेहरे पर मुहासे हैं या बाल खराब हैं तो उसी अनुपात में वे खुद को ज़्यादा सुंदर अनुभव करने लगती हैं। इसके विपरीत अगर वह महिला उन्हें अपने आप से ज़्यादा सुंदर लगती हैं तो वे अपने वज़न या जिस बात को भी वे अपनी कमजोर नब्ज़ समझती हैं, उसके प्रति अचानक चैतन्य और सतर्क हो जाती हैं।

वैसे मैं यहाँ महिलाओं की बात कर रहा हूँ लेकिन यह सिर्फ महिलाओं की ही समस्या नहीं है! जब पुरुष यही बात करते हैं तो, हो सकता है, सुंदरता के विषय में न सोचें लेकिन कुल मिलाकर मतलब अलग नहीं होता! पुरुष, दूसरे पुरुषों (के पेट की, बाँहों की) की मांसपेशियाँ, उनकी दौलत और स्वाभाविक ही उनका बेफिक्र व्यवहार और विश्वस्त मुस्कुराहट देखते हैं और वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा महिलाएं करती हैं!

लेकिन क्या सुंदरता तभी साबित होगी, जब आप तुलना में जीत जाएंगे? क्या आप वास्तव में तभी अपने आपको सुंदर समझ पाती हैं जब उस फिल्म-स्टार या सुपर-मोडेल स्त्री से, तुलना में, आपसे भी कम सुंदर महिला खड़ी हो? क्या आप वाकई यह सोचती हैं कि आप तभी सुंदर होंगी जब आप उस पोस्टर वाली या टीवी विज्ञापन वाली महिला जैसी दिखने लगेंगी?

मैं समझ सकता हूँ कि जब आप किसी तुलना में बेहतर सिद्ध होते हैं तो अच्छा लगता ही है (फील-गुड फैक्टर जैसी कोई चीज़ होती ही है), भले ही वह आपके मस्तिष्क में होता हो और आपकी विजय को देखने के लिए कोई दर्शक मौजूद नहीं है। लेकिन आपको समझना चाहिए कि वास्तव में आप वहाँ कर क्या रही हैं और इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि आपका खूबसूरती का मानदंड क्या है!

सच्चाई यह है कि सुंदरता का यह आदर्श, यह मानदंड किसी भी तरह से वास्तविक नहीं है क्योंकि हर मीडिया चैनल, हर मोडेल और अभिनेत्री के चेहरे को बेहतर दिखाने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करते हैं। और ऐसे अवास्तविक चित्र को आप अपना आदर्श मान लेती हैं, उसे अपने लिए एक लक्ष्य बना लेती हैं, जिसे पाने के लिए आप कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाती हैं और इसके अलावा, इसी मानदंड पर आप दूसरी औरतों को भी तौलने लगती हैं।

फिर प्रश्न वही है कि अपने आपको समझने (परिभाषित करने) और अपनी पहचान के लिए कि आप कौन हैं, आपको बाहर कितना देखना चाहिए? क्या आपको यह सोचना चाहिए कि "मैं हीथर से दुबली हूँ, मेरी त्वचा का रंग मेरी से बेहतर है, मेरे बाल लूसी से घने हैं?" क्या यह सोचना पर्याप्त नहीं होगा कि "मैं सुंदर हूँ?"

मैं यह कितनी बार कहूँ कि सुंदरता सिर्फ बाहर नहीं है और यह कि सुंदरता की समझ सबके पास अलग-अलग होती है! जब आप कमरे में अकेली होती हैं और तुलना करने के लिए कोई आदर्श या कोई प्रतिस्पर्धी आपके सामने नहीं होता, तब भी आपको खुद को सुंदर ही समझना (महसूस करना) चाहिए! और सुपरस्टार्स की भीड़ के बीच भी आपको अपनी सुंदरता का एहसास होना चाहिए। आप अनूठे हैं, आप जैसा कोई नहीं है और आप सुंदर हैं।

दूसरों के साथ अपनी तुलना मत कीजिए और खुश रहिए! 26 अगस्त 2013

पिछले सप्ताह मैंने कार्यक्षेत्र में होने वाली प्रतिस्पर्धा के बारे में लिखा था, जिसकी अधिकता लोगों को मानसिक रूप से तोड़ देती है और उनका मानसिक और शारीरिक क्षरण होने लगता है। अंततः वे गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ कार्यक्षेत्र में ही देखने को मिलती हो, ऐसा नहीं है, जीवन के हर क्षेत्र में यह सामान्य रूप से मौजूद होती है और अगर आप लगातार दबाव में जीवन बिताना चाहते हैं तो कहीं भी उससे साबका पड़ सकता है! यह काफी हद तक आप पर निर्भर हैं: आप दूसरों के साथ कितनी स्पर्धा करना चाहते हैं या कितनी हद तक किसी के साथ अपनी तुलना करना चाहते हैं? इसके विपरीत, आप खुद अपने आप पर कितनी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा खर्च करना चाहते हैं?

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आज समाज में बड़ी संख्या में लोग तनावग्रस्त पाए जाते हैं क्योंकि समाज में आपसी प्रतिस्पर्धा बहुत सामान्य और आम बात हो गई है। प्रतिस्पर्धा करना है इसलिए दूसरों से अपनी तुलना करना भी सहज-स्वाभाविक है क्योंकि तभी तो आप जान पाएंगे कि कहीं दूसरे आपसे बेहतर तो नहीं कर रहे हैं! अगर आपसे खराब कर रहे हैं तो वह भी अपनी तात्कालिक खुशी के लिए ज़रूरी है। लोग अपने सहकर्मियों के साथ ही प्रतिस्पर्धा नहीं करते, वे अपने बचपन के सहपाठियों के साथ भी यह तुलना करते हैं कि उन्होंने कितनी तरक्की ही है, और उनकी खुद की तरक्की से वे कितना आगे या पीछे हैं! किसी जिम में ट्रेडमिल पर वे कितना तेज़ दौड़ते हैं और उनके मित्र कितना! खुद वे कितना कमा रहे हैं, इसके अलावा वे यह भी देखते हैं कि उनकी पत्नी कितना कमा रही है और फिर उससे अपने पड़ोसी परिवार की कमाई से तुलना करते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी सुंदरता की तुलना किसी अजनबी से भी करने लगते हैं! अपने अवकाश के समय में वे क्या पढ़ रहे हैं, इसकी तुलना वे लोगों द्वारा पूल पर, सी-बीच पर या मेट्रो में पढ़ी जा रही किताबों से करते हैं। क्या मैं अधिक बुद्धिमान हूँ? क्या मैं ज़्यादा सफल हूँ? क्या मैं ज़्यादा सुंदर हूँ? क्या मैं ज़्यादा तेज़, ऊंचा या अच्छा हूँ?

अगर इन सभी सवालों के जवाब ‘हाँ’ में हों, तभी वे संतुष्ट होते हैं। अगर आपमें यह प्रवृत्ति है तो आप समझ सकते हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ। आप हर वक्त तुलना करते रहते हैं, बार-बार अपनी तरफ देखते हैं और फिर किसी दूसरे की तरफ और अगर आप जीत रहे हैं तो इस तुलना का आप पर सकारात्मक असर होता है अन्यथा आप निराश हो जाते हैं।

समस्या यह है कि ऐसा करके आपका ध्यान पूरी तरह दूसरों पर केन्द्रित हो जाता है और आप इन्हीं तुलनाओं के जरिये अपनी पहचान सुनिश्चित करने लगते हैं। आप कौन हैं? मैं दौड़ में जैक से तेज़ हूँ, मैं काम में जैस्मिन से ज़्यादा सफल हूँ, मैं अपने पड़ोसी, मिलर्स से बेहतर अभिभावक हूँ! सब कुछ बाहर है, दूसरे प्रगति में कितना आगे हैं और आप कहाँ है। आप अपने आंतरिक मूल्य, अपनी आंतरिक शक्तियों, अपनी आंतरिक सुंदरता से सम्बद्ध नहीं रह पाते और अंततः अपना महत्व कम कर लेते हैं। यहाँ तक कि आपके ये गुण आपकी जानकारी में ही नहीं रहते क्योंकि आप तो अपना ध्यान दूसरों पर (बाहरी बातों पर) केन्द्रित किए हुए हैं।

आप हमेशा जीत नहीं सकते और स्वाभाविक ही बार-बार हारना तनाव पैदा करता है! पूर्णतावादी और खुद से बहुत ज़्यादा अपेक्षा रखने वाले, हार को और भी ज़्यादा दिल पर ले लेते हैं, जो उन पर और भी ज़्यादा शारीरिक और मानसिक दबाव पैदा करने का कारण बनता है। वैसे ही आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी द्वारा निर्मित दबाव कोई कम नहीं हैं। इसलिए कम हाई-प्रोफ़ाइल नौकरी वाले लोग या जो लोग नौकरी नहीं करते या कोई काम भी नहीं करते, वे भी शारीरिक और मानसिक क्षय (breakout) से पीड़ित रहते हैं।

आप जो हैं, जैसे हैं, वैसे ही महत्वपूर्ण हैं, इस बात को आपको समझना होगा। अपनी सीमाओं के कारण अपने आपको कम आंकने की आदत छोड़कर, अपनी कीमत पहचानना सीखना सीखिए। यह आवश्यक नहीं है कि हमेशा आप सर्वोत्तम या नंबर वन ही हों-सच तो यह है कि आप हो ही नहीं सकते! कोई भी नहीं हो सकता! इस बात को स्वीकार कीजिए कि आप अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं और आपकी प्रतिभा हर वक़्त, हर क्षेत्र में सर्वोत्तम नहीं हो सकती।

अगर आप अपनी यह आदत बदलना चाहते हैं तो प्रतिदिन कम से कम थोड़े समय के लिए ध्यान लगाने की कोशिश अवश्य कीजिए या अपने आप को याद दिलाते रहिए कि किसी के साथ अपनी तुलना करने की आपको आवश्यकता नहीं है। जब भी आप निराश या दुखी हों, उसका कारण जानने की कोशिश कीजिए-कहीं यह इसलिए तो नहीं है कि आप किसी से अपने आपको कमतर महसूस कर रहे हैं? फिर इस एहसास से मुक्त होने का प्रयत्न कीजिए, अपने आपको समझाइए कि आप दोनों ही मनुष्य हैं इसलिए दोनों का एक ही महत्व है, सिर्फ इतना ही कि उसके पास दूसरी विशेषताएँ हैं।

दूसरों से अपनी तुलना करना छोड़ें और खुश रहें!

गहरे अवसाद और बर्न आउट के बाद वापस सामान्य होने की लम्बी और थका देने वाली प्रक्रिया- 22 अगस्त 2013

कल मैंने इस बारे में लिखा था कि कैसे आजकल बहुत से लोग काम के दबाव और उसके तनावों के कारण शारीरिक और मानसिक क्षय से पीड़ित होकर टूट जाते हैं और अंततः गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। आज मैं संक्षेप में ऐसी क्षरण की स्थितियों से उबरने की प्रक्रिया के बारे में लिखना चाहता हूँ।

अपने व्यक्तिगत परामर्श-सत्रों में और अपने आश्रम में मैं कई क्षयग्रस्त लोगों से मिलता रहा हूँ और मैंने कई मनोचिकित्सकों के साथ भी इस विषय पर काम किया है, इसलिए ऐसी स्थितियों में फंसे व्यक्तियों की मानसिक हालत और उनकी भावनाओं की मुझे काफी हद तक ठीक-ठीक समझ है-और इस बात की भी कि अब उन्हें क्या करना चाहिए, जिससे वे सामान्य जीवन में वापस आ सकें।

कल मैंने यह भी लिखा था कि दरअसल उन्हें ‘वापस उसी अवस्था’ में आने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनकी क्षय से पहले की, तथाकथित सामान्य जीवन-पद्धति, उनका जीने का तरीका, उनकी सोच और व्यवहार ने ही मिलकर उन्हें इस हालत में पहुंचाया था! अब तो उन्हें सब कुछ नए सिरे से और नए तरीके से शुरू करना होगा!

जो शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त है उसे सबसे पहले किसी पेशेवर की मदद लेनी होगी क्योंकि वह बीमारी की अंतिम अवस्था में पहुँच चुका है। कई लोगों को चिकित्सालय में कुछ दिन रहना भी पड़ सकता है क्योंकि वे अभी यह भी नहीं समझ पाते कि कैसे जिएँ, क्यों जिएँ?-उनके जीवन का मूल उद्देश्य ही अर्थहीन हो चुका होता है! अक्सर अपने अस्तित्व को वे अपनी नौकरी, अपने पद, अपने काम से पूरी तरह जोड़ चुके होते हैं और उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि अपने आप पर उन्होंने असीमित दबाव डाला हुआ है। इस पतन ने उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली है। उनका शरीर अब जवाब दे गया है और कह रहा है कि इसे अब और चलते रहने नहीं दिया जा सकता, कि वे अब अपनी, खुद की जरूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

आम तौर पर डॉक्टर ऐसे क्षयग्रस्त लोगों को दवाइयाँ खिलाते हैं-अवसाद-रोधी, नींद की गोलियां और कुछ अन्य दवाइयाँ। शुरुआत में या आपातकाल में ये दवाइयाँ अच्छा असर दिखाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद, और यह समय कुछ महीने हो सकता है, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा और खुद शारीरिक और मानसिक स्थिरता की तलाश करनी होगी। यही वह समय है, जब वे अपनी भीतरी खोज शुरू कर सकते हैं और इसी हालत में हमारे आश्रम में कुछ दिन विश्राम लेना कई लोगों को लाभ पहुंचा चुका है।

जब आप ऐसी हालत में होते हैं तो सबसे मुख्य बात आपको यह करनी होती है कि आप अपने आपको खोजें। पैसे और सफलता की दौड़ में आपने अपने आपको पूरी तरह खो दिया है, आपको खुद अपना कोई एहसास नहीं होता। आप कौन हैं? अपने जीवन में आप क्या करना चाहते हैं? क्या करके आप प्रसन्न होते हैं? ये और ऐसे ही कुछ और प्रश्न हैं, जिनका जवाब आपको देना होगा। उसके बाद ही कोई क्षयग्रस्त मरीज अपने जीवन के टुकड़ों को बटोरकर पुनः स्थिरचित्त हो सकता है। कई लोग अपनी नौकरी या कार्यक्षेत्र बदलने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि जो वे इतने दिन करते रहे थे, अब नहीं कर सकते क्योंकि वैसा करने पर वे अपने शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से उबर नहीं पाएंगे।

लेकिन बाहरी चीजों और वातावरण के बदलाव से ही बात नहीं बनेगी, बहुतेरे आंतरिक प्रतिमानों और विचारों से भी आपको मुक्ति पानी होगी! और शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए अपने सामान्य और उबाऊ वातावरण से बाहर निकलकर बिल्कुल नई और अलग जगह पर कुछ दिन बताने से बढ़कर क्या बात होगी! ऐसी परिस्थितियों में हमारे आश्रम आकर आयुर्वेदिक-योग-अवकाश लेने वाले लोगों के साथ हमारा अनुभव बहुत सुखद, प्रेरणास्पद और आशाप्रद रहा है।

उन्होंने हमें बताया है कि रोजाना नियमित आयुर्वेदिक मालिश किस तरह इसमें सहायक रही क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि कोई है, जो पूरे एक घंटे उन पर और उनके शरीर के छोटे-छोटे अंगों पर पूरा ध्यान केन्द्रित किए हुए है। कई सालों से उनका शरीर अपने प्रति उनकी लापरवाही झेल रहा था। वह उनके ध्यान से वंचित था और ठीक यही पाने के लिए वह बेताब था! यह उपचार उन्हें, शारीरिक और मानसिक रूप से विष-मुक्त करने में बहुत सहायक रहा। दैनिक योग-सत्रों में आप शरीर के प्रति अपने प्रेम को पुनर्जीवित करते हैं। खुद से ऊंची से ऊंची अपेक्षाओं के दबाव में, एक नियुक्ति से दूसरी की तरफ भागने-दौड़ने की मजबूरी में आप अपने शरीर के प्रति यह प्रेम-भावना भूल ही चुके थे!

और फिर, और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी, आप यहाँ ऐसा वातावरण और परिवेश प्राप्त करते हैं, जहां आप इस खोज को ज़्यादा अच्छी तरह अंजाम दे सकते हैं कि आप कौन हैं और आपके जीवन का उद्देश्य क्या है, आप क्या चाहते हैं? आप अपने आप में मगन रह सकते हैं-स्वतंत्र, बच्चों के साथ, हमारे परिवार और आश्रम के बच्चों के बीच या विश्रांति के लिए आए दूसरे मेहमानों के साथ। आप विश्राम कर सकते हैं या हमारे कामों में हमारे सहभागी हो सकते हैं, आप पढ़-लिख सकते हैं, ध्यान में लीन हो सकते हैं, दिल जो कहे, वह सब कुछ आप करने के लिए स्वतंत्र हैं। और यह बहुत बड़ा मौका है:आप अपने दिल की आवाज़ सुनना शुरू कर सकते हैं। यही तो आपने आज तक नहीं किया था कि अपने दिल की तनावपूर्ण, चीखती आवाज़ को आप कभी सुन लेते और जिसका खामियाजा आप आज भुगत रहे हैं!

मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त होने के बाद, धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे लोग अपनी पूर्वावस्था में लौट पाते हैं और अधिकतर लोग यही कहते हैं कि यह बाद की अवस्था उनकी पिछली अवस्था से बहुत बेहतर है! मैं कामना करता हूँ कि उन सभी लोगों को, जो ऐसी स्थिति को प्राप्त हुए हैं, यह शक्ति प्राप्त हो कि वे अपने वास्तविक स्वत्व को प्राप्त कर सकें और उनके लिए, जो अब भी पैसे और सफलता की अंधी दौड़ के चलते शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से ही जूझ रहे हैं, यह कि वे यह समझ सकें कि जो वे कर रहे हैं वह उन्हें बड़ी गहरी पीड़ा पहुंचा सकता है।

और जब कभी भी आप अपने परिवेश और वातावरण से दूर कहीं जाना चाहें, हमारे आश्रम के दरवाजे आपके लिए सदा खुले हैं।

सफलता और शिखर पर पहुँचने की महत्वाकांक्षा कहीं तनाव, अवसाद और पतन की राह पर न ले जाए! 21 अगस्त 2013

कल मैंने कामकाजी जीवन में लोगों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा के विषय में लिखा था। ये प्रतिस्पर्धाएँ इसलिए आयोजित की जाती हैं कि लोग सफलता के पीछे दौड़ें और थोड़ा बहुत अतिरिक्त आर्थिक लाभ अर्जित कर सकें। इससे लोगों के जीवन में काम का शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव बढ़ते जाते हैं और जैसे-जैसे वे ऊपर उठते जाते हैं, यह दबाव और तनाव भी बढ़ता जाता है और अंततः वह आपको क्षीण और जर्जर बना देता है। इसे अंग्रेज़ी में बर्न-आउट कहते हैं। हम इसे शारीरिक और मानसिक क्षय कह सकते हैं, जो आगे चलकर लंबे अवसाद में तब्दील हो जाता है और उसके बाद उससे उबरने के लंबे प्रयास और अंततः व्यक्तिगत लक्ष्य और जीवन का अर्थ खोजने की लंबी प्रक्रिया में उलझकर रह जाता है।

विशेषकर बड़ी कंपनियाँ किसी व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करतीं। यह बात हर व्यक्ति जानता है लेकिन एक बार जब आप वहाँ पहुँच जाते हैं, आंकड़ों और पुरस्कारों के उस तंत्र (व्यवस्था) का हिस्सा बन जाते हैं तो यह बात बिल्कुल भूल जाते हैं और अपने सहयोगियों को अपना प्रतिस्पर्धी मानकर व्यवस्था द्वारा प्रायोजित उस दौड़ में शामिल हो जाते हैं। आपकी नज़रें कंपनी के लक्ष्यों पर होती हैं और दाएँ-बाएँ आपको कुछ भी दिखाई नहीं देता। लक्ष्य महज एक आंकड़ा होता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। आपको एक दिन में इतने लोगों से मिलना है, मिले गए इतने लोगों में से इतना प्रतिशत बिक्री में तब्दील हो जाना चाहिए, उतने लोगों से इकरारनामे पर दस्तखत करा लें और अंततः, उतना लाभ, रुपए की शक्ल में कंपनी के खाते में जमा हो जाना चाहिए! आप समझते हैं कि आपने कोई महत्वपूर्ण काम अंजाम दिया है और पूरी कंपनी और उसका नेतृत्व आपसे प्रसन्न हैं और आप पर गर्व करते हैं। जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी और उसका नेतृत्व अपनी सफलता पर खुश हैं, आंकड़ों पर खुश हैं, अपने खाते में आई हुई रकम से खुश हैं, आप पर गर्वित नहीं हैं! जब कि आप अपने अस्तित्व को कंपनी के साथ, उसके लिए निष्पादित अपने महत्वपूर्ण काम के साथ और उसके लिए प्राप्त अपनी सफलता के साथ जोड़ लेते हैं जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी को लक्ष्य तक पहुँचाने की व्यवस्था के काम में आप महज एक छोटे से पुर्जे होते हैं!

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि जो बड़ी कंपनियों में काम नहीं करते वे इन दबावों और तनावों से बचे रहते हैं। विशेषकर स्वरोजगारी और छोटी कंपनियों के मालिकों को भी उतना ही तनाव झेलना पड़ता है क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी सफलता स्वयं उन पर निर्भर है। पैसा आता रहे, इसके लिए उन्हें अक्सर कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है लेकिन वे भी ज़्यादा से ज़्यादा धन कमाने, ज़्यादा से ज़्यादा सफलता अर्जित करने के चक्कर में उसके साथ मुफ्त मिलने वाले तनावों और दबावों के मकड़जाल में उलझकर रह जाते हैं। और आसपास के लोग, समाज, विज्ञापन आदि सभी सफलता के लिए जारी इस अंधी दौड़ को प्रोत्साहित करते हैं।

यह कहना कोई नई बात नहीं होगी कि यह समाज धन-केन्द्रित है। यह भी कोई नई बात नहीं है कि व्यापक जनसमुदाय व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करता। लेकिन आप खुद क्या सोचते हैं? आप क्यों इस खेल में लगे हुए हैं? आप क्यों इस तरह की जीवन पद्धति अपनाए हुए हैं, प्रोग्राम्ड कंप्यूटर या किसी मशीन जैसी? आप अपने मनोरंजन के लिए कुछ नहीं करते, अपने कार्य में सफलता के अलावा कोई दूसरी बात आपको प्रसन्न नहीं कर पाती, आप खुद अपना स्वार्थ भूल जाते हैं, आपका सामाजिक जीवन मृतप्राय होता जा रहा है और आप स्वयं अपनी और ध्यान नहीं देते। महत्वपूर्ण सिर्फ एक बात होती है: काम और उसमें ज्यादा से ज्यादा सफलता! किसी दूसरी बात के लिए आपके पास समय ही नहीं है।

यही वह घड़ी होती है, जब लोग शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त हो जाते हैं। वे टूट जाते हैं और इसका अर्थ यह होता है कि उनकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों का पूरी तरह क्षरण हो चुका होता है। कई लोगों को स्मृतिह्रास या स्मृतिभ्रम हो जाता है-वे सारे अंक और नाम, जो उनके लिए पहले बड़े महत्वपूर्ण थे अब उनकी स्मृति से विलुप्त हो जाते हैं। कई लोगों के लिए, उसके बाद, अवसाद के कठिन समय की शुरुआत हो जाती है। प्रतिपल, क्रमशः उनका पूरा जीवन धराशायी होता चला जाता है, अक्सर आसपास के लोगों ने ऐसी अपेक्षा नहीं की होती। उन्हें पेशेवर सलाहकार की आवश्यकता होती है और जब कि वे हर सप्ताह, नियमित रूप से मनोचिकित्सक के पास जाते हैं, सामान्य हालत में वापस लौटने के लिए उन्हें स्वयं भी इस पर अथक प्रयास करना होगा।

दरअसल, ‘लौटना’ नहीं, वापस, वही जीवन नहीं! नए जीवन की शुरुआत कीजिए, अपने लिए एक अलग जीवन की तलाश कीजिए, एक संतुलित और शांत जीवन!

उपलब्धियां और सफलताएँ जब खुशियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं! 20 अगस्त 2013

कल मैंने आपको अपनी नई परियोजना के विषय में बताते हुए ज़िक्र किया था कि कई खेल ऐसे हैं जो प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करते हैं जब कि आगे चलकर बच्चों को जीवन में प्रतिस्पर्धा का सामना करना ही है। वैसे स्पर्धायुक्त खेल मज़ेदार हो सकते हैं और उनसे दूर रहना हमेशा उचित नहीं कहा जा सकता लेकिन वह प्रतिस्पर्धा, जिसका उन्हें वास्तविक जीवन में, खासकर अपने कामकाजी जीवन में, सामना करना है, वह बहुत सा अनावश्यक और हानिकारक दबाव और तनाव पैदा कर देती है।

दरअसल, यह आजकल स्कूलों में शुरू हो चुका है। जब परीक्षाओं में प्राप्त अंकों की घोषणा होती है तब, स्वाभाविक ही, हमेशा माहौल प्रतिस्पर्धात्मक हो जाता है। हर विद्यार्थी यही देखता है कि उसकी कक्षा के दूसरे बच्चों ने क्या परिणाम हासिल किए हैं और फिर अपने अंकों की तुलना उनके अंकों से करता है और सोचता है कि उनसे कितना अच्छे या बुरे अंक उसे प्राप्त हुए हैं। वह शिक्षा प्रणाली नैसर्गिक प्रतिस्पर्धा को पोषित और पल्लवित करती है जो विभिन्न क्षेत्रों मे पुरस्कार देने की हामी है और हमेशा ‘सर्वप्रथम’ का सम्मान करती है। इससे दूसरे बच्चे भी प्रशंसा प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं और वही सफलता प्राप्त करने में जी-जान लगा देते हैं।

यह स्कूल है, अभी भी यहाँ सुरक्षित वातावरण में, नियमानुसार और स्पष्ट ढांचे में काम होता है। यह वास्तविक जीवन के बीहड़ में संभावित कटु अनुभवों का आधार तैयार करता है। अगर आपने इस मंज़िल तक आकर भी सफलता प्राप्त करने लायक कुछ नहीं सीखा, तो फिर आगे आने वाली ज़िंदगी में वही बातें सीखने के लिए बहुत कड़ा परिश्रम करना होगा।

आप एक बड़ी कंपनी में नौकरी करते हैं क्योंकि आपको लगता है कि उसमें आगे बढ़ने की ज़्यादा संभावनाएं हैं-अधिक से अधिक सफलता प्राप्त करने के अवसर। आप पूरी ताकत लगा देते हैं और कोई उपलब्धि प्राप्त करते हैं, अपने इलाके में सबसे अधिक विक्रय, साल में सबसे ज़्यादा लाभ। आपको ‘साल का नया चेहरा’ या ‘न्यूकमर ऑफ द ईयर’ नामक पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है, वेतन में संभावित बढ़ोत्तरी के साथ आपका सम्मान होता है। अगर आप दूसरे नंबर पर हैं तो आपको कुछ नहीं मिलता। कंपनी की कार्य-प्रदर्शन सूची के अनुसार अगर आप कहीं बीच में हैं या बिलकुल नीचे के कुछ लोगों में आपका नाम आता है तो आप समझिए कि आपका कोई मूल्य नहीं है। आप पर कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी और आपको नीची नज़र से देखा जाएगा। आप कंपनी की सूची में हैं, बस!

मुझे लगता है कि मुझे बहुत ज़्यादा विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह व्यवहार कंपनी में किस तरह का वातावरण निर्मित करता है, उन लोगों के दिलों में किस किस्म की भावनाएँ जन्म लेती हैं, जो जीत नहीं पाए और पीछे रह गए! आधुनिक समाज लोगों को यह सिखाता है: अगर आप उत्कृष्ट हैं तो आप अच्छे हैं। आप अच्छे हैं अगर आप ‘नंबर वन’ हैं। अगर आप ऊपरी लोगों में से एक हैं तो आपका अहं कृत्रिम रूप से बढ़ जाता है और आप और भी अधिक अच्छा काम करना चाहते हैं, जिससे आप कंपनी की बिक्री और लाभ बढ़ा सकें।

कुछ लोग प्रथम श्रेणी वाले, सबसे श्रेष्ठ समूह में दौड़े (काम किया), भरसक कठोर प्रयास किया और अंततः दबाव में आकर टूट गए। दूसरे कुछ वहाँ पहुँचने की बहुत कोशिश करते हैं लेकिन हमेशा मध्यम श्रेणी में बने रहते हैं और कभी भी वहाँ नहीं पहुंच पाते और अवसाद में घिर जाते हैं क्योंकि उन्हें कभी भी वह महत्व प्राप्त नहीं होता, जिसके लिए वे पूरे वक़्त लालायित रहे। फिर वे लोग भी हैं जिन्हें कभी मौका ही नहीं मिला, जो सदा निचली श्रेणी में ही रहे। वे हमेशा इस डर में रहते हैं कि उनकी जगह किसी और को रख लिया जाएगा और कंपनी में भी जड़वत काम करते रहते हैं-क्योंकि वे जानते हैं कि वे कभी भी ‘नंबर वन’ नहीं बन पाएंगे।

हम हमेशा इस तरह नहीं चल सकते! इसे बदलना होगा, थोड़ा सा बैठकर सोचना होगा और इस बात को समझना होगा कि सिर्फ आपकी सफलता ही आपकी पहचान नहीं है। यह हमारे लिए कोई खुशी नहीं लाएगा और न ही कोई आपको उस तरह से पसंद करेगा, जैसा कि वह किया करता था। अगर आप समझते हैं कि आपकी कंपनी आपसे इसलिए प्रेम करती है क्योंकि आप लाभ कमा रहे हैं तो इस बात को भी समझने की कोशिश कीजिए कि आप सिर्फ और सिर्फ इसलिए कंपनी के लिए महत्वपूर्ण हैं या उसके प्रेमपात्र हैं कि आप उनके लिए लाभ कमाते हैं।

यह आपके लिए कठिन होगा लेकिन मुझे लगता है कि अगर आप अपने आपको पूरी तरह टूटकर बिखरने से बचाना चाहते हैं तो आपको इस बात की गंभीरता को समझना ही होगा! आप इस प्रतिस्पर्धा में सफल हों या न हों, अपनी खुशी और आनंद को पूरी तरह इस खेल पर निर्भर न करें! भरपूर प्रयास करें मगर उसमें सम्मान या प्रशंसा की अपेक्षा न करें! आपको अपने परिवार और दोस्तों का एक तानाबाना विकसित करना चाहिए और अपने लिए एक आंतरिक स्वयोग्यता पैदा करनी चाहिए, जो ऐसी प्रतियोगिता से परे हो। अन्यथा आपका गिरना तय है और वह आपको तगड़ी चोट पहुंचाएगा। यह सुनिश्चित करें कि आपका स्व-सम्मान सिर्फ कार्यक्षेत्र में आपकी सफलता के चलते नहीं होना चाहिए। ध्यान से देखें कि आप कौन हैं, समझें कि आप आप हैं और सिर्फ यही बात, अपने आप में आपको प्रसन्न करने के लिए काफी है। यह आवश्यक नहीं है कि आप सर्वश्रेष्ठ ही हों। आप नंबर वन हों, यह ज़रूरी नहीं। अगर आपको मज़ा आ रहा है तो खेल में बने रहिए, जब तक मज़ा आ रहा है, खेलते रहिए। जब वह मज़ा, वह आनंद न मिले तो खेल से बाहर निकल आइये।