मैंने पहले कई बार खुले संबंधों के बारे में लिखा है और उन पर विस्तार से अपना मत भी रखा है। हालांकि अब भी इस विषय में मेरा मत काफी हद तक वही है जो पहले था, मैं आज अपने ब्लॉग का उपयोग इसी स्वच्छंद जीवन शैली पर लिखने के लिए करना चाहता हूँ-क्योंकि मुझे अब भी लगता है कि यह किसी भी हालत में ज़्यादा समय तक सुचारू रूप से नहीं चल सकता!
मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जिन्हें स्वच्छंद और खुले संबंध पूरी तरह स्वीकार्य हैं, कुछ दूसरे हैं जो किसी के साथ इसे शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और कुछ और हैं जो पहले ही इसमें लिप्त हो चुके हैं। और एक वर्ग उनका भी है जो पहले इसमें मुब्तिला रह चुके हैं। ज़्यादातर लोगों को शुरू में बहुत रोमांच होता है लेकिन समय के साथ अंततः उन्हें पता चलता है कि वे भ्रमित थे। अब वे उससे निराश हो चुके हैं क्योंकि अब उन्हें लगता है कि उसके बारे में जैसा उन्होंने सोचा था, उनका अनुभव वैसा नहीं रहा है।
जो लोग इस तरह जीवन बिताना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, शुरू में उन्हें इसमें बड़ी उत्तेजक सम्भावनाएँ दिखाई देती हैं। बिना अपने मुख्य पार्टनर की सुरक्षा खोए स्वच्छंद रूप से किसी भी पुरुष या महिला के साथ सोने की आज़ादी। तीसरे या चौथे व्यक्ति को भी बिस्तर पर लाकर सेक्स के ज़ायके को और चटपटा बनाने की संभावना भी। ईर्ष्या या ऐसे ही दूसरे अप्रिय एहसासों से निपटने का कोई झंझट नहीं क्योंकि समझौते के मुताबिक आखिर हर कोई दूसरे यौन साथियों का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र है!
दुर्भाग्य से, मैंने देखा है कि यही तथ्य लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्याएँ खड़ी करता है! वे समझते हैं कि यह बड़ा मज़ेदार है, वे किसी दूसरे के साथ संभोग करते रहेंगे और उनके पार्टनर को इस बात से ईर्ष्या नहीं होगी-लेकिन पार्टनर के प्रति अपने अनुराग को और अपनी ईर्ष्या को वे खुद ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं, उसे कम आँक रहे हैं! वे नहीं समझते कि उनका पार्टनर भी यही कर सकता है-वह भी दूसरों के साथ यौन संबंध बना सकता है!
वास्तव में मैंने पाया है कि बिस्तर पर प्रवीणता के संदर्भ में यह समस्या अतिशय अहं से संबंधित है। जैसे हर महिला समझती है कि बिस्तर पर वह सबसे प्रवीण स्त्री है वैसे ही हर पुरुष अपने आपको सेक्स का सबसे शक्तिशाली, प्रवीण और उत्तेजक खिलाड़ी समझता है! एक तरफ महिला पार्टनर समझती है कि पुरुष पार्टनर को मिलने वाली कोई भी स्त्री सेक्स के मामले में मेरे जितनी प्रवीण हो ही नहीं सकती तो दूसरी तरफ पुरुष सोचते हैं कि मेरे अंदर सेक्स की इतनी दक्षता और क्षमता है कि कोई स्त्री एक बार मेरे साथ सो ले तो किसी दूसरे के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती!
एक बार जब आप इस संभावना को अपने लिए खोल देते हैं तो आपको जल्द ही पता चलता है कि वास्तविकता कुछ अलग है! अचानक आप नोटिस करते हैं कि सिर्फ आप ही माह में तीन या चार अलग-अलग लोगों के साथ मौज नहीं ले रहे हैं या एक रात के साथियों के साथ संभोगरत नहीं हो रहे हैं बल्कि आपका पार्टनर भी उसी राह पर चल पड़ा है। स्वाभाविक ही, उस पर भी दूसरे विपरीतलिंगियों की नज़रें हैं और वह भी इस स्वच्छंदता का भरपूर आनंद ले रहा है या ले रही है!
मेरे प्रिय मित्रों, यहीं से असली समस्या की शुरुआत होती है। ईर्ष्या, हर वक़्त दबा हुआ गुस्सा-क्योंकि जो आप स्वयं कर रहे हैं, उसी बात पर आप अपने पार्टनर पर नाराज़ नहीं हो सकते- आपको सामान्य नहीं रहने देता। ईर्ष्या के कारण उपजे इसी दुःख और कथित अपमान के चलते छोटी-छोटी बातों पर आपस में झगड़े शुरू हो जाते हैं!
मैंने कई खुले संबंधों को इसी तरह असफल होते हुए देखा है, जिसका कारण यही होता है कि दोनों पार्टनर पर्याप्त खुले और लचीले नहीं थे और अपने मुख्य पार्टनर से उतने अलिप्त नहीं हो सके थे, जितना वे समझते थे कि हो गए हैं!
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