भारत के बारे में पश्चिमवालों की एक सोच – वे गरीब हैं या आप? – 26 अक्टूबर 12

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

हमारे आर्युवेद योग कैंप में शामिल होने आए विदेशी मेहमानों में से एक ने भारत में हुए अनुभवों के बारे में रमोना को बताया और जब मैंने जाना कि कैसे उसने यहां के लोगों के बारे में बताया और उन्हें लेकर उसका खुद का रवैया कैसा था तो मैंने सोचा कि ये काफी मजेदार है और इस पर कुछ लिखना चाहिए।

जब आप एक पश्चिम देश के वासी हैं और भारत की गलियों में घूमेंगे तो आपको कई लोग दिखाई देंगे। इन्हें देखकर आप सोच सकते हैं कि वे गरीब हैं। उन्होंने पुराने कपड़े पहने होंगे, कुछ ने तो अपने कमर पर सिर्फ एक तौलिया लपेटा होगा. सड़क किनारे लगे हैंड पंप पर लोग कपड़े धोते हैं, यहीं का पानी पीते और घर ले जाते हैं। आप ऐसे घर देखेंगे जिनकी दीवारें तो ईंट की होगी लेकिन उन पर प्लास्टर नहीं होगा और कई घरों में तो ईंट भी नहीं होगी, सिर्फ खड़-पतवार, धातु की चादर या फिर प्लास्टिक लगी होगी। इनमें रहने वालों का जीवन घरों से बाहर सड़क पर ही बीतता है। वे लोग सड़क पर ही खाना बनाते हैं, खाते हैं, बैठकर बातचीत करते हैं और काम भी वहीं करते हैं। आप देखेंगे कि वहां काम करने वाले लोग किस तरह से पूरी गली को साधारण औजारों से पाट देते हैं। बाजार में भी आप राशन तोलने के लिए इलेक्ट्रॉनिक तराजू नहीं पायेंगे। दुकानदार हाथ वाले तराजू से ही दाम के बराबर सामान तौल कर दे देगा। सब कुछ सरल है, लोग गरीब हैं।

ऐसा लगता है कि चिकनी, साफ-सुथरी और तारकोल से बनी सड़कों वाले देश से आने वालों का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि भारत में उन्होंने जिन्हें देखा है उनमें से ज्यादातर लोग गरीब है। आपने चारों ओर गंदगी देखी और सोचा कि 'हम इन्हें कूड़े के निस्तारण का तरीका सिखा सकते हैं और बता सकते हैं कि पुनर्चक्रण कैसे होता है!'

आप बच्चों और वयस्कों को पेट खाली करने के लिए समान भाव से सड़क किनारे या खेतों में बैठे देखेंगे। और जब शहर के नुक्कड़ से गुजरते हुए इस दुर्गंध से आपका साबका होगा तब आप सोचेंगे कि 'हमारे यहां बहुत अच्छा सीवेज सिस्टम है, और हमें उसे यहां लाना चाहिए।'

हमारे मेहमान, इतना बताने के बाद मैं कहना चाहता हूं कि इन्हीं वजहों से विचारों का प्रवाह हुआ और इसके लिए मैं आपकी बहुत तारीफ करता हूं – 'लेकिन मैं महसूस करता हूं कि ये सारे विचार घमंड से भरे हैं! हकीकत में मैं इन लोगों को गरीब नहीं कह सकता। आखिरकार, मैं उनके देश में आया हूं, क्योंकि मैं कुछ खोज रहा हूं जो उनके पास है। वे मुझसे कुछ नहीं चाहते बल्कि मैं उनसे कुछ चाहता हूं।'

यह सच है। हजारों नहीं लाखों पर्यटक हर साल भारत आते हैं। उनमें से ज्यादातर सिर्फ समुद्री तटों पर लेटने या ताजमहल देखने नहीं आते। वे यहां किसी चीज की तलाश में आते हैं, उनकी एक आंतरिक इच्छा होती है, एक रिक्त स्थान होता है, शून्य की तरह, जिसके बारे में उन्हें विश्वास होता है कि उनका जो शून्य है भारत में उसका समाधान मिल जाएगा। खुशी के लिए, प्यार के लिए, शांत मन और स्थिर भाव के लिए शांति और संतुलन की तलाश में। यह आध्यात्मिक या धार्मिक हो सकता है।

वे इस देश और यहां के लोगों के बारे में जानने के लिए बिना किसी तय गंतव्य के लंबी यात्राओं पर निकल जाते हैं। ये मानकर कि जिस चीज की तलाश में वे यहां आये हैं, उसे पा लेंगे। वे आश्रमों में जाते हैं, वहां रूकते हैं, योग और ध्यान करते हैं। और जब भारत से जाते हैं तब खुद को समृद्ध और तनावमुक्त महसूस करते हैं, और उस देश से अपने साथ कुछ लेकर जाते हैं जहां शुरुआत में घूमते हुए उन्होंने सोचा था कि यहां के लोग बेहद गरीब हैं।

हो सकता है कि भारतीयों के पास आपको देने के लिए कुछ हो, नहीं तो आप यहां क्यों होते? बात चाहे संतुष्ट होने की हो या खुश रहने की, वे आपको दिखा सकते हैं कि जो आपके पास है उसे सबसे अच्छा कैसे बनाया जा सकता है। ये जानने के लिए कि आप वास्तव में कितने धनी हो, सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी, हर व्यक्ति से अपनी तुलना मत करो और इसे गलत समझो।

आपको छोटी चीजों का मूल्यांकन करना फिर से सीखना होगा और आप खुद को आंतरिक खुशी से सराबोर पायेंगे जो आसानी से आपसे दूर नहीं जा सकती। भारत आपको गरीब लग सकता है, इसके बाद भी आप यहां आये हैं क्योंकि आप भारतीयों की भावनात्मक संपन्नता में शरीक होना चाहते हैं।