मेरा नाम स्वामी बालेन्दु क्यों है और मेरी वेबसाइट ‘जय-सियाराम’ क्यों कहलाती है? 7 अगस्त 2012

मेरे विचार

कल मैंने ज़िक्र किया था कि लोग इस तथ्य (बात) से भ्रमित हो सकते हैं कि मेरी पुरानी डायरियों में जो मैं लिखता रहा हूँ, उससे आजकल बहुत भिन्न लिख रहा हूँ। लेकिन सिर्फ यही बात नहीं है, जो उन्हें मेरे विषय में दिग्भ्रमित करती है। मेरे नाम के बारे में, मेरे पहनावे के बारे में और यहाँ तक कि हमारी वेबसाइट के नाम के बारे में मुझसे बार-बार पूछा जाता है और आज मैं इन प्रश्नों के क्रमवार उत्तर देना चाहता हूँ।

शायद सबसे आम सवाल है "आप अपने नाम के साथ स्वामी लगाना क्यों नहीं छोड़ देते?" इसी के साथ दूसरा प्रश्न कि "आप साधू-संतों (धार्मिक पुजारियों, धर्म-गुरुओं) जैसे कपड़े क्यों पहनते हैं?"

लोग समझते हैं, मेरे लिए तार्किक रूप से ऐसा करना उचित होगा। मैं गुरु था और अध्यात्म और धर्म में मेरी आस्था थी। वे 'स्वामी' शब्द को धर्म के साथ जोड़ते हैं और सोचते हैं कि जब मैंने धर्म छोड़ दिया तो अपने नाम के आगे लगे 'स्वामी' को भी छोड़ देना चाहिए और दूसरों की तरह साधारण और अ-धार्मिक कपड़े पहनना शुरू कर देना चाहिए। मैं इन प्रश्नों के उत्तर इस तरह देता हूँ: मैं जो हूँ, सो हूँ। मैं अपने व्यक्तित्व के किसी भी हिस्से को अपने से अलग नहीं करना चाहता और न ही मेरा कोई गुप्त इतिहास है। पहले मैं क्या था और अब क्या हूँ, यह मैं बहुत स्पष्ट रूप में और खुले आम सबको बताता हूँ। मुझे अपना नाम बदलने की क्या ज़रूरत है?

जो लोग मुझसे मेरे नाम के आगे लगे 'स्वामी' पद (शब्द) के बारे में पूछते हैं, वे उसे सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से देखते हैं। आप उसका मूल अर्थ क्यों नहीं देखते? मैंने एक बार पहले भी बताया है कि उसका मूल अर्थ है मालिक और मैं किसी धर्म या धर्मगुरु को अपना मालिक बनने का अधिकार नहीं देता। मैं खुद अपना मालिक हूँ और इसलिए मुझे लगता है कि अपने नाम के आगे 'स्वामी' लगाने से यही बात प्रमाणित होती है और अगर आपका कोई दूसरा 'स्वामी' नहीं है तो आप भी लगाएँ, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

मैं स्वामी बालेन्दु हूँ और पहले भी कई साल स्वामी बालेन्दु ही था। अगर मैं 'स्वामी' शब्द को हटा लूँ, तो बाद में लोग यह भी मांग करेंगे कि मैं अपना 'बालेन्दु' नाम भी बदल डालूँ। उसका शाब्दिक अर्थ तो 'बालचंद्र' होता है और मेरे धार्मिक पिताजी ने मेरे लिए यह नाम किसी धर्मग्रंथ से लिया था। दरअसल यह नाम हिंदुओं के एक देवता, 'शिव' से संबन्धित है। तो इस आधार पर वे इस नाम को भी बदलने का आग्रह कर सकते हैं क्योंकि अब मैं धार्मिक नहीं रह गया हूँ!

मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूँ, जिनके अभिभावकों ने उनके लिए देवताओं के नामों का चुनाव किया जैसे 'रामकुमार', 'लक्ष्मी' या 'गोपाल'। समय गुजरने के साथ वे नास्तिक हो गए तो क्या अब उन्हें अपना नाम बदल लेना चाहिए?

मैं मानता हूँ कि मेरे लिए 'स्वामी' शब्द को अपने नाम के आगे से हटाना आवश्यक नहीं है लेकिन मैं कोशिश करता हूँ कि लोग मुझे 'स्वामी' या 'स्वामी बालेन्दु' न कहें बल्कि सिर्फ 'बालेन्दु' नाम से पुकारें। कई मित्र ऐसा करते भी हैं और मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि इससे मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता, बल्कि खुशी होती है।

इसी तरह लोग हमारी वेबसाइट के नाम 'जयसियाराम' के बारे में भी पूछते हैं। उसमें भी 'राम'शब्द के रूप में भगवान का नाम है। हमने अपनी वेबसाइट तब शुरू की थी जब हम सब बहुत धार्मिक थे और स्वाभाविक ही हमें उस वक़्त यह नाम उपयुक्त लगा था। इन तेरह वर्षों में हमारे भीतर बहुत परिवर्तन आ चुका है मगर इन्हीं तेरह वर्षों के दौरान यह वेबसाइट और यह नाम हमारे लिए हमारे बच्चे जैसा हो गया है, जिसे हमने बड़े धीरज और मेहनत से धीरे-धीरे इतना बड़ा किया है। अब हमें इससे इतना लगाव हो चुका है कि न तो इस वेबसाइट को बंद करके कोई दूसरी वेबसाइट बनाने के विषय में सोच सकते हैं और न ही हम इसका नाम बदल सकते हैं।

हो सकता है कि आपको यह बुरा लगे लेकिन मैं यहाँ जींस और टीशर्ट पहनकर सामने नहीं आऊँगा और न ही 'बालेन्दु गोस्वामी' नाम अपनाकर किसी दूसरे नाम से कोई नई वेबसाइट शुरू करूंगा। अपने जीवन के उस हिस्से को पूरी तरह हटाकर मैं इतिहास को बदलने की कोशिश भी नहीं करूंगा। आप इतिहास की किताब के अप्रिय हिस्सों को फाड़कर यूं ही कूड़ेदान में नहीं फेंक सकते, यह पाखंड और झूठ ही नहीं गुनाह भी होगा। इसी तरह मैं अपने ब्लॉग की पुरानी प्रविष्टियों को भी नहीं हटाऊंगा, जैसा करने के लिए कुछ लोग मुझसे कहते रहते हैं।

अगर आप सिर्फ मुझे या मेरा नाम देखें या मेरी वेबसाइट का नाम पढ़ें तो मैं धार्मिक लग सकता हूँ। लेकिन जब आप कुछ नजदीक आएंगे तो आप पाएंगे कि मैं धार्मिक नहीं हूँ। मुझे खुशी है कि सिर्फ वही लोग मेरी तरफ आकर्षित होंगे, जिन्हें इस व्यतिरेक से कुतूहल होगा। वही लोग होंगे जो मेरे जीवन में आए परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया के बारे में जानेंगे और उससे प्रेरित होंगे कि कैसे मैं एक बेहद धार्मिक व्यक्ति से पूरी तरह अ-धार्मिक व्यक्ति बन गया।

मैं अपने अतीत को बदल नहीं सकता और मैं वैसा करना भी नहीं चाहता। मैं जो हूँ, हूँ और अपने जीवन के किसी हिस्से को नकारना नहीं चाहता। अपने व्यक्तिगत इतिहास को मैं सबके सामने खोलकर रखना चाहता हूँ। संभव है वह आपको भी धर्म और संप्रदायों से अलग होकर जीने का तरीका सिखा सके, झूठे और पाखंडी गुरुओं और अंधविश्वासों से आपको निजात दिला सके और अपने जीवन के प्रति स्वयं जिम्मेदार होने का विचार और भरोसा आपमें पैदा कर सके।

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