शराब ग़रीबों को और गरीब बनाती है – हमारे स्कूल के बच्चे – 6 जून 2014

परोपकार

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल की एक लड़की, अंजलि से करवाना चाहता हूँ, जो 14 साल की है और हमारे स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ती है। वह एक बड़े परिवार के साथ रहती है, जो एक बड़ी समस्या से जूझ रहा है। यही समस्या उन्हें अपनी गरीबी से जान नहीं छुड़ाने देती और यह समस्या है: शराब!

चार बच्चों में अंजलि सबसे छोटी है। पिछले बरस उसकी सबसे बड़ी बहन का विवाह हुआ था और इसलिए अब उनके छोटे से कमरे में सोने के लिए पाँच लोग रह गए हैं। लेकिन उस इमारत में और भी बहुत से लोग रहते हैं: उसके पिता के सात भाई हैं और इन आठ भाइयों में से तीन अपनी पत्नियों और बच्चों सहित इसी इमारत में साथ-साथ रहते हैं।

जब परिवार के सारे सदस्य इकट्ठा हो गए तो हमने अंजलि के पिता से पूछा कि परिवार की आमदनी का ज़रिया क्या है। वह स्वयं एक राजगीर (मिस्त्री) है और अंजलि का सबसे बड़ा भाई देव-मूर्तियों के कपड़े सीता है। पिता ने बताया कि दोनों मिलकर 160 $ यानी लगभग 9000₹ कमा लेते हैं। इसी बिंदु पर उसकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए उलाहना दिया: काफी समय से यह बीमार है और काम पर गया ही नहीं है! बीमारी क्या है, हम पूछते हैं और जवाब मिलता है: लीवर ख़राब है।

स्वाभाविक ही, हमें इशारा मिल गया कि अवश्य ही इसे शराब की लत है। हमारे पूछने पर सीधा जवाब देने से वह कतराता रहा, इतना भर कहा कि बीच-बीच में वह पीना छोड़ देता है। इसलिए हमने आगे पूछा: यानी तुम पीते तो हो; कितना पीते हो? "माह में सात या आठ दिन" अंजलि के पिता के जवाब की प्रतिक्रिया में उसकी पत्नी फिर हँस देती है और दिनों को सुधारकर "पंद्रह से बीस दिन" कर देती है!

परिवार के लिए राहत की बात यह है कि वह शराब पीकर बहकता नहीं है और न ही हिंसक होता है- बस, शराब पीकर सो जाता है। लेकिन शराब के दूसरे नतीजे परिवार के लिए बहुत तकलीफदेह सिद्ध होते हैं: वह सिर्फ शराब पर पैसे बरबाद नहीं करता बल्कि दूसरे दिन सबेरे समय पर उठता नहीं है इसलिए काम पर नहीं जा पाता और घर में बैठा रहता है और स्वाभाविक ही कुछ कमाकर नहीं ला पाता। इसके अतिरिक्त अब उसे लीवर की बीमारी हो गई है और उसकी दवाइयों के लिए भी रुपयों की ज़रुरत पड़ती है। कुल मिलाकर, इस वक़्त बड़े बेटे की कमाई से ही घर का खर्च चल पा रहा है।

परिवार के लिए इसके अलावा दूसरा सहारा उनकी भैंस है, जो रोज़ चार से पांच लीटर दूध देती है, जिसके चलते न सर्फ बच्चों के लिए दूध उपलब्ध हो पाता है बल्कि दूध बेचकर थोड़ी-बहुत अतिरिक्त आय भी हो जाती है।

उनके खेत, जो कुछ साल पहले तक उनकी मिल्कियत थे और जिससे होने वाली आमदनी से उनके बहुत से खर्चे अदा किए जाते थे, सन 2010 में यमुना नदी में आई भयंकर बाढ़ में बह गए। अब यमुना ने अपना प्रवाह थोड़ा सा बदल दिया है और जो खेत पहले उनकी संपत्ति थे, अब यमुना का पाट बन गए हैं।

इसलिए अंजलि पिछले चार साल से हमारे स्कूल में पढ़ रही है। शिक्षिकाओं से बात करने पर आपको पता चलेगा कि वह पढ़ाई के प्रति पूर्ण समर्पित है। शिक्षिकाएँ यह भी बताती हैं कि स्वभाव से भी वह बड़ी हँसमुख है और बात-बात पर हँसती रहती है और हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तत्पर दिखाई देती है। और सबसे बड़ी बात यह कि पढ़ाई में पूरा मन लगाती है और किसी विषय को समझने में उसे देर नहीं लगती।

अगर आप हमारे स्कूल के ज़रिए अंजलि जैसे बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा और मुफ्त भोजन की हमारी इस परियोजना का हिस्सा बनना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित करके या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके ऐसा कर सकते हैं।

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