बलात्कार, यौन-उत्पीड़न और रोज़मर्रा की घटनाएं – 7 जनवरी 13

भारतीय संस्कृति

अगर आप मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक हैं तो आप निस्संदेह इस बात पर अचरज में होंगे कि भारत की समसामयिक घटनाओं में से एक जो अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैल चुका है, पर अब तक मैंने कुछ लिखा क्यूं नहीं। 23 वर्ष की मेडिकल की युवा छात्रा ज्योति सिंह के साथ दिल्ली में छह लोगों ने मिलकर निर्मम बलात्कार किया और अधमरी हालत में सड़क पर छोड़ दिया। दिल्ली के बेहतरीन डॉक्टरों के प्रयास और फिर सिंगापुर के अस्पताल में भेजे जाने के बाद भी उसकी ज़िंदगी बचाई नहीं जा सकी। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया, लाखों की संख्या में लोग बदलाव की मांग के साथ, महिलाओं की सुरक्षा की मांग के साथ विरोध जताने सड़क पर उतर आए। इस मुद्दे पर मैं भी विचलित रहा, सोचता रहा, आज आपसे वही बातें यहां बांट रहा हूं।

सबसे पहले, मेरे विचार में यह एक अच्छी बात है कि इस केस की वजह से एक बड़ी समस्या पर सबका ध्यान केंद्रित हो पाया है। यह सिर्फ़ इस एक केस की बात नहीं है, बल्कि देश भर में फैले ऐसे तमाम केसों की बात है। यह सिर्फ़ एक बलात्कार की बात भी नहीं है, यह उनसे छोटे और अधिक मज़बूती से समाज में बैठे उन अपराधों, उन अपमानों की बात भी है जिनका सामना इस देश की हर स्त्री को करना पड़ता है। इस समय लोग सिर्फ़ महिलाओं की सुरक्षा में व्याप्त कमी की बातें ना करके जागरुकता और पुरुषों के व्यवहार पर बातें भी कर रहे हैं। ये माहौल एक उम्मीद जगाता है कि हालात में बदलाव होंगे, स्थितियां सुधरेंगी।

बड़े पैमाने पर बहसे हुई हैं। अलग-अलग प्रांत की सरकारों और नेताओं से जवाब तलब किया गया है। जब हमारे प्रधानमंत्री, हमारे गृहमंत्री और कई दूसरे महत्वपूर्ण लोग बयान देते हैं और कहते हैं “हमारी भी बेटियां हैं और हम भी उनको लेकर चिंतित होते हैं”, तो मैं यह सोचे बिना नहीं रह पाता – क्या ये खुद को आम लोगों से जोड़ सकते हैं? मुझे लगता है कि हमें उनसे पूछना चाहिए कि क्या उनकी बेटियों ने कभी दिल्ली की बसों को अंदर से देखा भी है। मैं नहीं मानता! बेशक वे अपनी बेटियों को लेकर चिंतित होंगे लेकिन उनके चिंता का कारण ये कभी नहीं होगा। मुझे संदेह है कि उन्हें भारत में हर दिन स्त्रियों को जिन दिक़्क़तों से दो-चार होना पड़ता है, उसका रत्ती भर भी अंदाज़ा है।

बलात्कार हर दिन हर स्त्री के साथ हर समय नहीं होता रहता, हम इससे भयभीत हो सकते हैं लेकिन हम ये ख़तरा रोज़ नहीं देखते। लेकिन जब भी एक लड़की किसी भीड़ में खड़ी होती है- मेट्रो में, बस में, एक भीड़-भाड़ वाली दुकान में या एक मंदिर में – वो जानती है कि मैं किस बारे में कह रहा हूं…उसकी बाईं ओर खड़ा एक वृद्ध व्यक्ति झुककर उसके बिल्कुल नज़दीक आ जाता है, सामने खड़ा एक ’जवान’ लड़का अपनी बांहों के लिए जगह कम होने का स्वांग दिखाते हुए उसकी छाती को छूता रहता है, एक हाथ अभी जाने कहां से आया और उसके नितम्ब को छूकर निकल गया, अधिक समय के लिए नहीं लेकिन ज़ाहिर है समझ में आता है कि जान-बूझकर किया गया। ऐसी भीड़-भाड़ में भारत की प्रत्येक स्त्री ऐसे यौन-उत्पीड़न का शिकार होती है. इस देश के लिए यह शर्मनाक है!

यह सच है, ये घटनाएं हमारे यहां रोज़मर्रा की चीज़ है और कभी-कभी दुर्भाग्य से यह उत्पीड़न तक सीमित न रहकर बलात्कार का रूप धर लेती हैं। इस देश में हर दिन बलात्कार के कई मामले सामने आते हैं, बड़े शहरों से लेकर छोटे गांवों में भी। इसके क्या कारण हैं और क्या बदलना चाहिए? ये सवाल बड़े हैं और मैं अगली बार इस पर अपनी राय रखूंगा।

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