बच्चों के प्रति बुजुर्गों के हिंसक व्यवहार की आदत से कैसे निपटा जाए? 11 मार्च 2014

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जब मैंने आपको भारतीय घरों में बच्चों के विरुद्ध जारी हिंसक व्यवहार पर रमोना के अनुभवों के बारे में बताया था तब आपने नोटिस किया होगा कि दो बार बच्चों की दादी ने उनकी पिटाई की थी। उस वक़्त आपने सोचा होगा और ठीक ही सोचा होगा कि यहाँ अभिभावक तो किसी हिंसा में लिप्त नहीं हैं। लेकिन आपने देखा होगा कि उन अभिभावकों में से किसी ने भी उस बुजुर्ग महिला द्वारा बच्चों को पीटने का विरोध नहीं किया था। और आज मैं अपने ब्लॉग में इसी विषय पर लिखना चाहता हूँ: पुरानी पीढ़ी के बारे में, उनकी हिंसक शिक्षा के बारे में और अगर आप अपने बच्चों को शांतिपूर्ण, अहिंसक तरीके से शिक्षित करना चाहते हैं तो आपको उनके साथ किस तरह पेश आना चाहिए, इस बारे में।

सबसे पहले अपने अभिभावकों को या बच्चों के नाना-नानी या दादा-दादी को अपनी शिक्षा के तरीके के बारे में बताइये। उनसे साफ शब्दों में कह दीजिए कि आप बच्चों को मारना-पीटना पसंद नहीं करते और उसे बिल्कुल गलत मानते हैं। इसके लिए आपको थोड़ी हिम्मत जुटानी होगी, विशेषकर तब जबकि आप अपने बुज़ुर्गों की गलतियों को अनदेखा करने के आदी हैं, आदरवश उनकी गलतियों पर अक्सर उनसे कुछ कह नहीं पाते। लेकिन आपको समझना चाहिए कि दांव पर क्या लगा है: आपके बच्चों का जीवन! और वह कोई मामूली चीज़ नहीं है, जिसकी उपेक्षा की जाए!

हो सकता है कि आपकी बात ठीक हो और आपसे पुरानी पीढ़ी के लोग इतने बूढ़े हो चुके हों कि उन्हें समझाना असंभव हो। आपकी बात ठीक हो सकती है कि वे यह समझ ही नहीं सकते कि जब आप किसी को पीटने की धमकी देते हैं तो उन पर इसका कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लेकिन वह आपका बच्चा है और आप उस पीढ़ी के हैं, जिस पर अपने बच्चों का उत्तरदायित्व है। आप ही हैं जो सक्रिय रूप से अपने बच्चों की शिक्षा का दिशा-निर्धारण करेंगे। आप अपने बुज़ुर्गों को बच्चों को मारने-पीटने से मना कर सकते हैं। आप अपने घर में बच्चों को धमकाने पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। यह तो आपका अधिकार है।

यह सिर्फ आपका अधिकार ही नहीं, आपका कर्तव्य भी है! अगर वे आपके बच्चों को मारते-पीटते हैं और आप बैठे-बैठे नज़ारा देखते रहते हैं, कुछ कहते नहीं तो आप भी दोषी हैं! आपका बच्चा सुरक्षा के लिए आपकी तरफ ताकेगा, आपकी तरफ दौड़ पड़ेगा कि आप उसकी मदद करेंगे! अगर आप यह हिंसा बंद नहीं करेंगे तो वह यही मानेगा कि आप भी इस हिंसा में शामिल हैं। आप स्वयं ही हिंसक हैं। परोक्ष रूप से हैं, मगर उस हिंसक व्यवहार में सहभागी हैं!

मैं आपको एक और बात बताता हूँ: वह यह कि बुजुर्ग भी सीख सकते हैं। यह तो मैं मानता हूँ कि दशकों के व्यवहार को बदलना मुश्किल होता है लेकिन अगर आप गंभीरता के साथ कोशिश करें और उनके सामने यह प्रदर्शित करें कि आप इस मामले में गंभीर हैं तो फिर वे अवश्य सीखने की, अपने आपको बदलने की कोशिश करेंगे। वे प्रयास करेंगे, आप देखेंगे कि वे प्रयास कर रहे हैं और तब आपका दायित्व होगा कि आप उनके इस प्रयास में उनकी मदद करें। लेकिन किसी भी परिस्थिति में उन्हें इसकी इजाज़त न दें कि वे आपके बच्चों के विरुद्ध बलप्रयोग करें।

मैं जानता हूँ कि अब बहुत से लोग सोच रहे होंगे कि अगर वे अपने बड़े भाई-बहनों, अपने अभिभावकों, अपने दादा-दादियों या नाना-नानियों को बच्चों को मारने-पीटने से खुले आम मना करेंगे तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। यह डर होता है कि वे नाराज़ हो जाएंगे और भविष्य में उनकी कोई मदद नहीं करेंगे या यह कि बच्चे उनके प्यार से वंचित हो जाएंगे। लेकिन यदि वास्तव में यह सच्चा प्यार ही है तो फिर चिंता की कोई बात नहीं होनी चाहिए। किसी नानी या दादी का अहं कितना विशाल हो सकता है? क्या वह नाती-पोतों के प्रति उनके प्रेम से विशाल हो सकता है?

अगर वाकई मदद बंद करके वे आप पर दबाव डालने की कोशिश करते हैं तो ठीक है। आप उनकी मदद के बगैर अपना काम चलाने की आदत डालिए, समस्याओं से खुद निपटिए लेकिन इस बात को स्पष्ट कर दीजिए कि बच्चों को मारने-पीटने की इजाज़त इस समस्या का समाधान नहीं है।

मैं आपसे गुजारिश करूंगा कि इस मुद्दे पर दृढ़ता पूर्वक अड़े रहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है, यह आपके स्वाभिमान को सुदृढ़ करेगा और उस परिस्थिति को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर देगा, जिसमें आपको अपने ही बच्चो को अपने ही प्रियकरों के हाथों पिटता देखने को मजबूर होना पड़ता था। मैं इस बात की सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूँ कि उस स्थिति में आपको कितना गुस्सा आता होगा और इस मामले में कुछ न कर पाने पर कितना कष्ट उठाना पड़ता होगा। इसे बंद कीजिए, तुरंत आज ही!

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