आप अपने बच्चों के सबसे अच्छे विशेषज्ञ हैं – 19 अप्रैल 2013

‘परवरिश’ शीर्षक के अंतर्गत जब भी मैं कोई ब्लॉग लिखता हूँ तब मुझे हमेशा ख्याल रहता है कि मैं ‘लालन-पालन’ की कोई आम सलाह नहीं दे रहा हूँ जिसे आप कहीं दूसरी जगह भी पढ़ सकें। मैं सिर्फ अपने अनुभव और अपनी राय पेश करता हूँ और जो उसे पसंद करता है यह निर्णय खुद ले सकता है कि अपने जीवन में वह उन्हें लागू करना चाहेगा या नहीं। ईमानदारी वाली बात यह है कि मैं खुद लालन-पालन-परामर्श पढ़ने का शौकीन नहीं हूँ और इसका मुख्य कारण यह है कि इस बारे में दिये जाने वाले सभी परामर्श यह दावा करते हैं कि वही एकमात्र उचित परामर्श है। यह एक ऐसी बात है जिसे मैं इस रंगारंग और विविधता से भरपूर संसार में कतई स्वीकार नहीं कर सकता। दुर्भाग्य से आप सिर्फ किताबों में या ऑनलाइन ही नहीं वरन आपके आसपास के लोगों से भी लालन-पालन की शिक्षा मुफ्त प्राप्त कर सकते हैं-यार-दोस्तों से, करीबी रिश्तेदारों से या बिल्कुल अनजान लोगों से भी!

मैं जानता हूँ कि दुनिया भर में यही होता है इसलिए मेरा अनुमान है कि हर अभिभावक को इसे किसी न किसी रूप में, कभी न कभी अवश्य झेलना पड़ता है। आप बच्चों के साथ बाहर निकले है, माना सुपरमार्केट में घूम रहे हैं। यह एक चुनौती ही होता है कि आप पूरे वक़्त उन पर नज़र रखें और मनचाही खरीदी भी कर सकें। बीच-बीच में कहते हुए कि "यह मैं खरीद लूँ?" या "प्लीज़ मुझे ये चाहिए" बच्चे इधर-उधर दौड़ते-भागते रहते हैं। जबकि आपके दिमाग में यह चलता रहता है कि टूथपेस्ट खरीदना है या नहीं और तब आप सबको एक-एक लोलिपोप थमाते हैं और पेमेंट-काउंटर के सामने खड़े अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। तभी आपके सामने खड़ी महिला चश्मे के भीतर से घूरते हुए आपसे कहती है, "ये लोलिपोप दांतों के लिए ठीक नहीं! इससे अच्छा आप उन्हें कुछ फल खरीद देतीं!"

तब तक किसी माँ का दिमाग अगर पर्याप्त पक चुका है तो उस महिला की यह बात उसके मस्तिष्क पर अंतिम चोट होती है और वह उस परामर्श-दात्री को कुछ न कुछ ऐसा जबरदस्त कह बैठती है जैसा आम तौर पर किसी अनजान व्यक्ति से वह नहीं कहती। दरअसल किसी से भी नहीं, मगर कभी-कभी ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो बेवक्त मुफ्त की सलाह देकर ऐसी बातों को खुद ही आमंत्रित करते हैं! ये उक्त उदाहरण वाली अनजान महिला हो सकती है, आपके दोस्त हो सकते हैं, जान-पहचान वाले हो सकते हैं और वे आपके रिश्तेदार भी हो सकते हैं। आपने अपनी सास को अपने पति से यह कहते सुना होगा कि बच्चों को दूध-वूध पिलाओ, एकदम बीमार लग रहे हैं! दूसरी महिलाएं तुलना करती हैं, जोकि स्वाभाविक है, मगर फिर वे यह भी बताने लगती हैं कि अपनी इस सफलता के लिए अपने बच्चों के साथ वे क्या करती हैं और कि ऐसा न करने के कारण ही आपके बच्चे में वह कमी पैदा हो गई है!

परवरिश के हर विषय पर परामर्श मिल सकता है-स्तनपान, दूध छुड़ाना, भोजन, चड्डियाँ, घमोरियाँ, बुखार, नाक बहाना, कपड़े, जूते, दाँत निकलना, साफ-सफाई, सोने का समय, पढ़ाई और कौन से खिलौने आपके बच्चे के लिए अच्छे हैं और कौन से नहीं! जो महिलाएं पहली बार माँ बनी हैं वे ऐसी सलाहों से अभिभूत हो उठती हैं! बेहद प्रभावित और कभी-कभी अपने आपको कुछ तुच्छ और फूहड़ समझने लगती हैं क्योंकि परामर्शदात्री लालन-पालन संबंधी ज्ञान का ऐसा भंडार और समझदारी का ऐसा पिटारा उनके सामने खोलकर बैठी हुई होती हैं!

लेकिन कुछ समय बाद ही और अपने बच्चे के साथ हुए अपने अनुभव से उन्हें पता चल जाता है कि उनका सारा ज्ञान दरअसल उनके अपने अनुभवों से अर्जित ज्ञान था या किसी और से सुनी-सुनाई समझदारी थी। यहाँ तक कि बहुत सी बातें तो महज सामान्य ज्ञान की बातें थीं। वास्तविकता यह होती है कि उसमें से अधिकांश ज्ञान और समझदारी आपके बच्चे पर लागू नहीं होती-पूरी तरह तो नहीं ही। दरअसल थोड़ा सा अनुभव होते ही लोग अपने आपको उसका विशेषज्ञ समझने लगते हैं। मगर सच्चाई यही है कि भले ही आपने पाँच बच्चों को जन्म दिया हो और उन्हें सफलतापूर्वक बड़ा भी कर लिया हो, आप किसी दूसरे के बच्चे के विशेषज्ञ नहीं हो सकते! आप अनुभवी हो सकते हैं और मांगने पर आपको सलाह भी देनी चाहिए मगर आपको इतना संयम अवश्य रखना चाहिए कि आप अनावश्यक और बिनमांगी सलाह कभी न दें, जो पहली बार माँ बनी महिला को व्यर्थ परेशान कर दे!

माँओं, आप खुद ही बच्चे की और उसके लिए सबसे बड़ी विशेषज्ञ हैं। हर बच्चे का अपना एक खास चरित्र होता है और उसकी प्रतिक्रियाएँ उस परिवेश पर निर्भर होती हैं जिसके बीच रहकर वह बड़ा हो रहा है। कोई दूसरा व्यक्ति आपको नहीं बता सकता कि आपके बच्चे के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। यह सिर्फ आपको पता है जिसने बच्चे को अपने पेट में जगह दी, सालों उसे गोद में खिलाया, उसकी देखभाल की, दूध पिलाया, पुचकारा, नहलाया, धुलाया, सुलाया, रोने पर चुप कराया, हंसने पर खुद हंसीं…! अपने दिल की बात सुनें, जब ज़रूरत हो सलाह लें और कभी भी अनावश्यक सलाह पर ज़्यादा विचार करके अपने मन का चैन न खोएँ। उनकी भावना आपका भला करने की है-उन्हें शुक्रिया कहें, मुस्कुराएँ और करें वही जो आपका दिल कहे!

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