अप्रत्याशित क्रूरता: जब महिलाएं अपने बच्चों को मारती-पीटती हैं- 6 मार्च 2014

जब मैं बच्चों के विरुद्ध हिंसा के बारे में लिखता हूँ, जैसा कि मैं पिछले दो सप्ताह से लिख रहा हूँ, तो ज़्यादातर लोग पिता के हाथों पिटते बच्चों की कल्पना करते हैं, जोकि पुरातन काल से सामान्यतः बच्चों को शिक्षित करने का हिंसक तरीका रहा है. लेकिन, मैंने देखा है कि, बच्चों के विरुद्ध हिंसक व्यवहार करने के मामले में महिलाऐं भी, अगर ज्यादा नहीं तो पुरुषों के बराबर ही क्रूर और कठोर होती हैं. कम से कम भारत में तो मैंने यही पाया है.

जब आप एक साथ एक माँ और उसके बच्चों की कल्पना करते हैं तो आपके मन में लालन-पालन करने वाली संवेदनशील, दयालु और प्रेममय माँ की तस्वीर उभरती है, जो अपने बच्चों के लिए अपार स्नेह और करुणा से भरी हुई है. अगर आपने मेरे घर के सामने, सड़क पर या मित्रों के घरों में रोज़ाना दिखाई देने वाले दृश्यों को देखा होता तो आप भी मेरी तरह आश्चर्य में पड़ जाते! एक ऐसी महिला, जिसकी हम एक बेहद सौम्य और शांत व्यक्ति के रूप में कल्पना करते है, अपने बच्चों के प्रति इतनी हिंसक कैसे हो सकती है? वह अपने खुद के जाए बच्चों के साथ, जिन्हें उसने नौ माह अपने पेट में रखकर अपने रक्त से पैदा किया, ऐसा क्रूर और पशुवत व्यवहार कैसे कर सकती है?

अभी कुछ सप्ताह पहले ही मैंने मध्यभारत की एक महिला की गिरफ्तारी के बारे में पढ़ा: उसका चार साल का बच्चा उसे परेशान कर रहा था तो उसने उसे इतना मारा कि बच्चे की मौत हो गई. अपने बचपन में मैंने महिलाओं को अपने बच्चों को पीट-पीटकर अधमरा करते हुए देखा है. वे उन्हें इतना मारती थीं कि उनके चेहरे चोट से नीले पड़ जाते और हाँ मार के निशान उनके पूरे शरीर पर दिखाई देते थे!

मेरा विश्वास करें, बच्चों के विरुद्ध हिंसा के मामले में मैंने महिलाओं को पुरुषों से भी ज्यादा क्रूर और कठोर होते देखा है और मुझे लगता है कि मैं इसका कारण भी बता सकता हूँ कि भारत में ऐसा क्यों होता है!

मैंने आपको कई बार बताया है कि इस देश में पुरुष और महिलाएं बराबर नहीं मानी जातीं. समाज, संस्कृति, परम्पराओं और शिक्षा की दृष्टि से वे अपने पति, भाइयों और यहाँ तक कि अपने पुत्रों से भी कम आंकी जाती हैं. दैनिक जीवन में छोटी-बड़ी सभी बातों में महिलाओं का लैंगिक दमन सर्वव्यापी और स्पष्ट है और उसका एक पहलू है, उनका अक्सर पीटा जाना.

बचपन में लडके और लड़कियों का घर में पीटा जाना एक सामान्य बात है. पुरुष तो इस घरेलु हिंसा का लक्ष्य केवल उनके लड़कपन तक ही होते हैं परन्तु लड़कियां पहले तो बचपन में अभिभावकों से मार खाती हैं और शादीशुदा होने के बाद पतियों से! इस तरह महिलायें तो बालिग़ होने के बाद भी रोजमर्रा की होने वाली घरेलु हिंसा से बच नहीं पातीं!

नतीजतन, पुरुष समझते हैं कि उन्हें मारने-पीटने का जन्मजात अधिकार मिला हुआ है और वे अपना क्रोध अपने से कमज़ोर लोगों पर उतारते हैं: जैसे महिलाऐं और बच्चे. अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि तथाकथिक लैंगिक रूप से निर्बल, यानी महिलाएं अपने प्रति होने वाली इस हिंसा से कुंठाग्रस्त और हताश हो जाती हैं और मौक़ा पाने पर स्वयं अपने से निर्बल, यानी अपने बच्चों पर गुस्सा उतारती हैं, जो उनके प्रति हिंसा के रूप में प्रकट होता है.

एक बार उनका गुस्सा काबू से बाहर हुआ तो फिर मामला बच्चे द्वारा दूध गिराने के अपराध तक सीमित नहीं रह जाता. यह महज बेटी की चंचल शरारतें नहीं होतीं, जो माँ के द्वारा प्रयुक्त हिंसा में व्यक्त हो रही हैं. वह उनका क्रोध है, वह उनकी कुंठा है, उनके प्रति दुनिया के अन्याय की हिंसक प्रतिक्रिया है, जो बच्चों पर व्यक्त हो रही है.

यह कारण है जिसके चलते उनका व्यवहार बच्चों के प्रति इस कदर पाशविक और बर्बर हो जाता है. इसीलिए वे इतना क्रूर हो उठती हैं कि आप यह कहने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि वह माँ कहलाने के काबिल नहीं है. यह बच्चों के प्रति ममता या माँ के प्यार का इज़हार नहीं है, यह निराशा से उपजा दुस्साहस है. और इसे बदलना ही चाहिए!

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