मैं पहले ही आपको अहिंसक शिक्षा के विषय में बता चुका हूँ। बिना हिंसा के शिक्षा प्रदान करने के काम को न सिर्फ हम बढ़ावा दे रहे हैं बल्कि अपने आश्रम में इसे अपने जीवन का हिस्सा बना चुके हैं। हालांकि बहुत से लोग दिल ही दिल में इस बात से सहमत हैं कि बच्चों को मारना-पीटना अच्छी बात नहीं है फिर भी हम बार-बार भारतीय अभिभावकों से सुनते रहते हैं कि: ‘बच्चों को मारना आवश्यक है अन्यथा वे आपकी बात बिल्कुल नहीं मानेंगे!’ मैं इस विचार के विलोम पर विश्वास रखता हूँ और आप मुझ पर भरोसा करें या न करें, मेरे पास अपने विचार के प्रमाण मौजूद हैं।
इसका सबसे मुख्य प्रमाण वह है, जिसे हम उन्हीं लोगों के यहाँ देख सकते हैं, जो यह बात कहते है। मैं अपने एक मित्र के साथ बैठा हुआ हूँ और हम चर्चा कर रहे हैं। उनका छह साल का बच्चा कमरे में कूद-फांद कर रहा है। उसके पिता उसे ऐसा करने से मना करते हैं क्योंकि वे मेरे साथ शांतिपूर्वक चर्चा करना चाहते हैं। बच्चा कहना नहीं मानता। इसके विपरीत वह इतने ऊंचे स्वर में टीवी चला देता है कि हमारे लिए एक दूसरे की बात को समझ पाना असंभव हो जाता है। मेरा मित्र मेरी बांह पकड़कर बगल वाले कमरे में ले जाता है। वह मेरी तरफ देखता है और कहता है ‘देखो, अगर बच्चों की पिटाई न करो तो वे आपका कहना नहीं मानते!’
आपने अभी-अभी जो कहा वह उससे बिल्कुल विपरीत है, जो वास्तव में हो रहा है। मैं जानता हूँ कि आप अपने बच्चे को मारते रहते हैं। मैंने अपनी आँखों से आपको ऐसा करते हुए देखा है और इसी से मुझे यह प्रमाण मिला है: अगर आप अपने बच्चों को मारते-पीटते हैं तो उन पर आपका नियंत्रण नहीं रह जाएगा। एक सीमा के बाद वे आपका कहना नहीं मानेंगे।
हमारे पास इसके और भी कई उदाहरण हैं, आश्रम के बच्चों को लेकर ही। हमारे कर्मचारी अपने बच्चों को लेकर काम पर आते हैं। वे आठ और दस साल के बीच की उम्र के बच्चे होते हैं और अक्सर वे ऐसे बच्चे होते हैं जिन पर उनके अभिभावकों का कोई नियंत्रण नहीं होता! सारा दिन वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं और हमारे यहाँ रहने वाले बच्चों के प्रति हिंसक भी हो जाते हैं! स्वाभाविक ही वे उसी हिंसा का प्रदर्शन कर रहे होते हैं, जिसे वे सारा जीवन रोज़ ब रोज भुगतते रहे होते हैं!
हम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और हमें कुछ अभिभावकों से कहना पड़ता है कि वे अपने बच्चों को घर छोड़कर आया करें क्योंकि हमारे बच्चों को उनसे नुकसान पहुंचता है!
जो बच्चे बिल्कुल बचपन से हमारे साथ रह रहे हैं, उनका व्यवहार बिल्कुल अलग होता है! वे यहाँ बहुत अच्छा महसूस करते हैं, वे हमारा कहना मानते हैं और हाँ, मैं सगर्व कह सकता हूँ कि कि लोगों के साथ और आपस में उनका बर्ताव बहुत अच्छा होता है!
ये बच्चे, जो यहाँ आश्रम में रच-बस गए हैं, जब सुनते हैं कि घर में उन दूसरे बच्चों के साथ मार-पीट होती है तो वे अपने मित्रों के प्रति दया से भर जाते हैं। वे ऐसी बातें हमें बताते हैं और वे इस अंतर को महसूस करते हैं! कक्षा के सबसे ऊधमी बच्चे ही अक्सर घर में होने वाले लड़ाई-झगड़ों और मार-पीट की कहानियाँ सुनाते हैं। वे घरेलू हिंसा में पगे हुए यहाँ आते हैं और उसे यहाँ आकर उगलते रहते हैं।
लेकिन हमारे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करते हुए उनका व्यवहार धीरे-धीरे बदल रहा है। क्योंकि यहाँ शिक्षक शिक्षा के वैकल्पिक तरीके प्रयोग में लाते हैं और किसी तरह की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक हिंसा यहाँ वर्जित है, हमारा स्कूल एक शांतिपूर्ण, अहिंसक स्कूल के रूप में जाना जाता है। यह वातावरण उनके घरों की अशांति से, जो वे यहाँ लेकर आते हैं, बहुत भिन्न होता है।
स्वाभाविक ही हर बच्चा कुछ न कुछ शैतानियाँ करता ही है, वह अपनी सीमा तलाश रहा होता है। सभी बच्चे थोड़ा बहुत तो आपस में झगड़ते ही हैं और कभी-कभी उन्हें चोट भी लगती रहती है। लेकिन अगर आप, जो एक वयस्क और उनके अभिभावक हैं, हिंसा के स्थान पर उन्हें इन समस्याओं से निपटने का शांतिपूर्ण और प्यार भरा रास्ता दिखा सकते हैं तो उनका सम्मान पाने में आपको कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी। और फिर वे भविष्य में कभी भी आपके विरुद्ध हिंसा का सहारा नहीं लेंगे।
क्या आपको और भी प्रमाण चाहिए?
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