मिथ्याभिमान के चलते अभिभावक घरेलू हिंसा के दुष्परिणामों को देख नहीं पाते! 10 मार्च 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

पिछले सप्ताह मैंने बच्चों को मारने-पीटने के विरोध में बहुत कुछ लिखा था। सीमाबद्ध तरीके से बिना हिंसा के और प्रेम के साथ बच्चों का लालन-पालन किस तरह किया जाए, इस संबंध में अपने कुछ सुझाव देते हुए मैंने आशा प्रकट की थी कि ये सुझाव बच्चों के प्रति हिंसा का परित्याग करने की दिशा में अभिभावकों के लिए सहायक होंगे। आखिर वे स्वयं भी अहिंसक शिक्षा के हामी हैं। लेकिन मैं जानता हूँ कि भारत में वह समय आने में अभी काफी वक़्त लगेगा जब सही मानों में बच्चे घरेलू हिंसा का शिकार नहीं होंगे। क्यों? इसलिए कि अभिभावकों के मन में इस बात का मिथ्याभिमान होता है कि उन्होंने भी बचपन में मार खाई है और अब वे अपने बच्चों के प्रति हिंसक हैं तो कोई गलत बात नहीं कर रहे हैं।

उन देशों के लोग, जो अपने यहाँ अपवाद-स्वरूप ही घरेलू हिंसा देख पाते हैं, यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि यहाँ, भारत में इतने विशाल पैमाने पर घरेलू हिंसा पाई जाती है और यह हिंसक व्यवहार अभिभावकों के लिए सहज-स्वाभाविक बात होती है: बल्कि वे इस बात पर गर्व करते हैं कि बचपन में घर पर उनकी पिटाई हुआ करती थी। वे हँसते हुए बताते हैं कि उनके पिता कितने क्रूर थे, कैसे वे उनके बेल्ट या उनकी छड़ी या जिस चीज़ से भी उनकी पिटाई होती, उससे घृणा करते थे या पिता के क्रोधित होने पर पिटाई के डर से वे थरथर कांपते थे। और यह बताते हुए उनके चेहरे पर गर्व का तेज छलछलाता रहता है। वे अपनी माँ की याद करते हैं और कहते हैं: "वह बहुत सख्त महिला थी और और उसका हाथ बहुत तेज़ चलता था। मेरे गालों पर आज भी उसकी उँगलियों के निशान मिल जाएंगे!"- और यह बताते हुए उनके चेहरे पर पुलकित मुस्कान होती है।

वे वास्तव में मानते हैं कि इस क्रूर पिटाई ने उन्हें बेहतर इंसान बनाया। वे ईमानदारी के साथ विश्वास करते हैं उनके माता-पिता की पिटाई की बदौलत ही आज वे इतने अच्छे, उत्कृष्ट या महान इंसान बन सके। जितना ज़्यादा वे बचपन में पिटे होते हैं उतना ही वे उसके बारे में ज़ोर-शोर से बताते हैं और उतना ही अच्छा महसूस करते हैं। इसका परिणाम यह होता है वे स्वयं भी अपने बच्चों की पिटाई करना उचित समझते हैं और पिटाई करते हुए अच्छे और कर्तव्यपरायण पिता होने के गर्व से भर उठते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि जितना ज़्यादा वे उसकी पिटाई करेंगे उतना ही उनका बच्चा बेहतर इंसान बनेगा।

हमारी एक कर्मचारी बड़े गर्व के साथ बताती रहती थी कि कितनी बुरी तरह वह अपने बच्चों को पीटती है और यह कि बच्चे अपने पिता से ज़्यादा उससे डरते हैं। फिर एक दिन उसे पता चला कि हम लोग बच्चों के प्रति हिंसा के सख्त खिलाफ हैं! अपने बच्चों की पिटाई करके वे उसके साथ बड़ा अच्छा व्यवहार कर रहे हैं, उसके भले के लिए ही पिटाई कर रहे हैं, इस मूर्खतापूर्ण समझ के चलते ही बच्चों को इतना कष्ट भुगतना पड़ता है।

यह महज़ शिक्षा का मामला भी नहीं है: उनके विचारों पर इस बात से कोई फर्क नहीं नहीं पड़ता कि उनके पास कितनी डिग्रियाँ हैं और इसलिए मैं कहता हूँ कि उनके दिमाग उस सीमा तक विकसित नहीं हो पाए, भले ही पता नहीं कितनी बार उन्होंने अहिंसक शिक्षा के बारे में पढ़ा और सुना होगा। उनके भीतर बच्चों की पिटाई के पक्ष में दुराग्रह जड़ जमाकर बैठा हुआ होता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे यह मानने के लिए तैयार ही नहीं हो पाते कि उनके अभिभावकों ने उनके साथ गलत किया था। वे पुराने और कबाड़ तरीकों को गलत मानने से हिचकिचाते हैं क्योंकि वे लोग उन सभी पुरानी बातों और अतीत से चली आ रही परम्पराओं के प्रति अनुरक्त होते हैं। उसी तरह जैसे एक समय लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि धरती सपाट और समतल नहीं बल्कि गोल है…

आप अपने बुज़ुर्गों को गलत नहीं कह पाते और इसलिए यह दावा करते हैं कि: "वे मेरी पिटाई करते थे और देखिये, मैं अच्छा आदमी बना!" मैं इस रवैये का विरोधी हूँ। आप अच्छे व्यक्ति नहीं बने। उनकी पिटाई ने आपके अंदर कई तरह की मानसिक व्याधियाँ पैदा कर दीं, जिन्हें आप देख भी नहीं पा रहे हैं: भय, असुरक्षा, आत्म-सम्मान संबंधी समस्याएँ और सबसे ज़्यादा बुरी बात यह कि आपको हिंसा के लिए तत्पर कर दिया।

अगर आप अपने बच्चों के प्रति हिंसा का त्याग नहीं करते तो एक दिन आपके बच्चे भी इसी समस्या से ग्रस्त होंगे। ऐसा न करें। गलत परम्पराओं का त्याग करने में आपको एतराज़ क्यों हो? नई मगर उचित बातों को अपनाने में यह हिचकिचाहट क्यों? शुरू में अपनी पुरानी आदतों को छोड़ना कठिन प्रतीत होगा मगर आप ऐसा कर सकते हैं और ऐसा करके आप अपने जीवन में और बच्चों के भावी जीवन में एक नए परिवर्तन का सूत्रपात कर सकते हैं!