‘मैं भगवान के अलावा और किसी से नहीं डरता’, अर्थात हर चीज से भय – 18 जनवरी 2013

भय

कल मैंने व्याख्या की कि कैसे धर्म भूत और जादू के भय को बच्चों के साथ-साथ वयस्को में भी बढ़ावा दे रहा है, कम से कम भारत में तो यह है ही। धर्म फंतासी कहानियों को ऐसे बताता है जैसे कि वो सत्य हों और उनमें बुरी ऊर्जा, भूतों और शापों से मुक्ति की भी बात कही गयी है। यह लोगों में केवल भूतों और पिशाचों के लिये ही भय उत्पन्न नही करता बल्कि ईश्वर के प्रति भी भय उत्पन्न करता है। यह बात सिर्फ हिन्दू धर्म की ही नही अपितु सभी धर्मो का यही हाल है। धार्मिक ग्रंथों में लिखी और पण्डे पुजारियों की कही गई बातों को लोगों से मनवाने के लिए भय और विशेष रूप से ईश्वर का भय, धर्म का प्रमुख उपकरण है। इसलिये एक कहावत भी बना दी कि ‘‘भले ही किसी का भय मत करना पर परमेश्वर का भय जरूर करना‘‘ , चलिये इस कहावत की गूढ़ता की बात करे, जिसमें एक सच्चा अर्थ छिपा है।

धार्मिक लोगों ने क्या सीखा है? मुझे पता है कि सभी धर्म यही कहते हैं कि हर वस्तु और हर व्यक्ति में ईश्वर का दर्शन करना चाहिये। ईश्वर आप में हैं और ईश्वर मुझमें भी है। किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिये वे भी उतने ही दिव्य है जितने कि आप स्वयं है। जीवन को सम्मान दें, चाहे कैसा भी जीवन हो क्योंकि उसमें भी परमेश्वर है।

इसके साथ ही धर्म स्पष्ट रूप से लोगों को यह भी बताता है कि परमेश्वर से डरें। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, उसने आपके लिये एक बड़ी योजना बनायी है, वह आपको सफल भी कर सकता है और असफल भी कर सकता है। अगर आप उससे प्रार्थना करते है, और उसके आदेशानुसार चलते है तो वह आपको पुरस्कृत करेगा। अगर आप पाप करते है तो आपको नर्क में भेजा जायेगा और आपके कर्मों के अनुसार ही आपको यातना में भेजा जायेगा और वहां पर भयंकर कयामत या कुछ कयामत जैसा ही सामना करना पड़ेगा। धर्म यह कहता है कि ‘‘परमेश्वर से डरे‘‘ और यह संदेश ही वह मुख्य कारण है जो लोगों से वह करवाता है जोकि धर्म उन्हें करने को कहता है| फिर वो जादा नहीं सोचते क्योंकि उनका मोक्ष खतरे में पड़ सकता है|

इन दो बातों का एक साथ क्या मतलब बनता है कि परमेश्वर से डरे और परमेश्वर के दर्शन प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति में करें। वास्तव में धार्मिक व्यक्ति हर चीज़ और हर इंसान से डरता है। वे अपना सम्पूर्ण जीवन भय में व्यतीत करते है। वो लोग जो यह कहते है उन्हें किसी का नहीं केवल ईश्वर का भय है असल में वह अत्यधिक भयभीत रहते हैं और हर चीज़ और प्रत्येक व्यक्ति से डरने हैं। इसमें कोई आश्चर्य वाली बात भी नहीं है! उन्होंने धर्म को भय की वजह से ही चुना कि धर्म सही हो सकता है और वो सचमुच नरक में जा सकते हैं| ये लोग शुरुआत से ही डरपोक हैं और धर्म का मार्ग इसलिए चुनते हैं क्योंकि धर्म इनके भय को और भी ईंधन देता है, यह बताकर कि वो किस तरह असहनीय दर्द और नर्क की भयंकर यातनाओं से बाल बाल बच सकता है|

वास्तव में मैं यह समझ नहीं पाता कि कितना भयानक होगा वह ईश्वर जो कि स्थायी भय की रचना करना चाहता है, जो लोगों को प्रसन्न रखने की जगह डरा धमका कर रखना चाहता है| हाँ मैं यह समझ सकता हूँ कि जो लोग इसे बढ़ावा देते हैं, उनके ऐसा करने के पीछे उनका व्यावसायिक लाभ छुपा होता है उनके जीवन का उद्देश्य और आधार ही दूसरों के भय का लाभ उठाना है|

यह सभी बातें यह स्पष्ट कर देती है कि क्यों लोग धर्म और ईश्वर से दूर हो गये। समय के साथ वो समझ जाते हैं कि उनके अन्दर भय स्थापित किया जा रहा है। वो अब हर चीज और हर किसी से डरना नहीं चाहते बल्कि वह स्वतंत्र रहना चाहते है, खुश रहना चाहते है और नयी परियोजनाओं को निर्भय होकर प्रारम्भ करना चाहते है, तो फिर वे ऐसी सलाहों को क्यों माने जो उन्हें डराती हैं, जो उन्हें एक संकीर्ण नियमावली बताती है कि क्या करे और क्या न करे, जो उनकी संभावनाओं को सीमित करती है और उनकी स्वतंत्रता को अवरूद्ध कर उन्हें उतना प्रसन्न और सफल नहीं होने देती जितना कि वो हो सकते थे|

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