शाकाहारी होने के कारण मांसाहारी मित्रों के साथ भोजन करते हुए संकोच महसूस न करें – 9 दिसंबर 2014

शाकाहार

कल मैंने ‘मांसाहारी खाद्यों के स्थानापन्न’, जैसे टोफू सॉसेजेज़ आदि के प्रति अपनी अरुचि प्रकट की थी। मैंने ज़िक्र किया था कि एक बार सोच-समझकर शाकाहार अपनाने का निर्णय ले लेने के बाद आपमें किसी तरह का अफसोस या मांसाहारी खाद्यों के प्रति लालसा नहीं होनी चाहिए। मैं इस बात पर दृढ़ हूँ और इसमें यह भी जोड़ना चाहता हूँ कि मांसाहारी मित्रों के साथ रेस्तराँ में बैठकर खाना खाते हुए, जब मेनू में आपके खाने लायक कोई विकल्प मौजूद नहीं होता, तब भी यही बात लागू होती है! अपने चयन और अपनी जीवन-पद्धति पर न तो अफसोस करें और न ही किसी तरह का अपराधबोध महसूस करें!

बहुत से शाकाहारियों को इस तरह का अनुभव होता है: आप किसी रेस्तराँ में दोस्तों के साथ खाना खाने जाते हैं। आप मेनू कार्ड खोलते हैं और पाते हैं कि टमाटर के सलाद के अलावा आपके खाने लायक वहाँ कुछ भी उपलब्ध नहीं है। अगर आप मेरी तरह प्याज़ नहीं खाते तो वह विकल्प भी आपके सामने नहीं होता। वहाँ मृत पशु के मांस से रहित एक भी व्यंजन मौजूद नहीं है।

आप क्या करेंगे? या तो आप थोड़ा सा टमाटर सलाद लेकर अपनी थोड़ी-बहुत भूख मिटाने की कोशिश करेंगे कि कुछ देर बाद घर चलकर खाना खा लेंगे या फिर वेटर से शाकाहारी खाना लाने के लिए कहेंगे। लंबी बातचीत के बाद भी आपको अपने लायक खाना मिल पाता है या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किसके साथ बैठे हैं और इस पर कि रेस्तराँ की रसोई में इतनी क्षमता है भी या नहीं! लोग आपकी तरफ अजीबोगरीब नज़रों से देखेंगे और हो सकता है, आपको मूर्खतापूर्ण ताने भी सुनने को मिलें। इस बीच उस वातावरण में आपकी असुविधा लगातार बढ़ती जा रही है और आप सोच रहे हैं कि कहीं आपके दोस्त यह न सोचें कि आप इस छोटी सी बात का बतंगड़ बना रहे हैं। आप बेचैन हैं कि आप अपने लिए खाना मंगाने जैसा छोटा सा काम नहीं कर पा रहे हैं।

नतीजा: आप बुरा महसूस करते हैं, अपराधबोध से ग्रसित हो जाते हैं। अगर आपका खाना आता भी है और आपको लगता है कि उन्होंने बेकन हटाकर वही व्यंजन फिर भेज दिया है तो और भी मुश्किल पेश आती है। अब आप सोचते हैं कि क्या इस धोखाधड़ी की शिकायत की जाए? लेकिन ऐसा न हो कि आपके मित्र और ज़्यादा परेशान न हो जाएँ! कुल मिलाकर अंत में आपकी शाम उतनी सुखद नहीं हो पाती, जितने की आपने आशा या अपेक्षा की थी।

मैं इस समस्या का एक हल बताता हूँ: आपको कुछ निर्णय लेने होंगे। जब आप मित्रों के साथ कहीं खाना खाने जाते हैं तो शुरू में ही स्पष्ट कर दें कि आप उसी रेस्तराँ में जाएँगे, जहाँ शाकाहारी विकल्प उपलब्ध हों अन्यथा आप खाना खाने साथ नहीं जाएँगे। इसमें उन्हें बुरा लगने की कोई बात नहीं है और न ही आपके लिए है। अगर आप मिलकर कोई काम करना चाहते हैं-और आपकी मित्रता को रेस्तराँ के चुनाव से अधिक महत्व मिलना ही चाहिए-तो आपके मित्रों को ऐसे किसी रेस्तराँ में भोजन करने में कोई एतराज़ नही होना चाहिए, जहाँ आपके लिए भी भोजन के विकल्प मौजूद हों! वैसे भी आजकल शाकाहार भी उतनी अजीबोगरीब और असामान्य बात नहीं रह गई है! रेस्तराओं को भी चाहिए कि ऐसे लोगो की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखे। और अगर वे ऐसा नहीं करते तो वे आप जैसे ग्राहकों से वंचित होंगे, आपको अपने निर्णय पर अपराध बोध क्यों हो!

दूसरा विकल्प है, अपने मित्रों को अपने घर आमन्त्रित करना! सब मिलकर कुछ पकाएँ या पहले से कुछ अपने मनपसंद व्यंजन पकाकर उन्हें बुलाइए। उन्हें एहसास दिलाइए कि शाकाहारी व्यंजन बहुत स्वादिष्ट होते हैं-सम्भव है, तब वे इस बात के कायल हो जाएँ कि अगली बार जब साथ खाने बाहर जाएँ तो ऐसा रेस्तराँ खोजें, जहाँ शाकाहारी भोजन भी उपलब्ध हो।

सौभाग्य से मैं ऐसे देश में रहता हूँ, जहाँ सामिष भोजन का सेवन सबसे कम होता है- अर्थात, यहाँ आसपास कोई न कोई रेस्तराँ हमेशा मौजूद होता है, जहाँ शाकाहारी भोजन उपलब्ध हो। लेकिन मुझे अक्सर एक और समस्या का सामना करना पड़ता है: मैं लहसुन और प्याज़ भी नहीं खाता। लेकिन भोजन के मामले में मुझे और भी बहुत से अनुभव प्राप्त हुए हैं-और शायद अपने व्यक्तिगत अनुभवों के विषय में मैं कल इसी ब्लॉग में लिखूँगा।

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