क्या करें जब आपके मेहमान अपने पेशाब से स्नान करना शुरू कर दें? – 22 मई 2013

आश्रम

मैंने आश्रम में आने वाले मेहमानों के साथ हुए विचित्र और मज़ेदार अनुभवों को आपके साथ साझा करना शुरू किया था और आज एक ऐसे ही अनुभव के बारे में आपको बताता हूँ। यह एक तरह की चिकित्सा के बारे में है जिसे मूत्र चिकित्सा कहा जाता है। दरअसल यह एक बहुत ही खास तरह की चिकित्सा है, मूत्र चिकित्सा की एक और बहुत ही खास पद्धति। लेकिन मुझे शुरू से बताने दीजिये।

कुछ साल पहले वसंत के मौसम की बात है, भारतीय वसंत, जब हम अक्सर विश्रांति सत्र आयोजित करते हैं। एक आयुर्वेदिक कुकिंग-विश्रांति-सत्र कुछ हफ्तों से चल रहा था और यशेंदु दिन में दो बार बनाना सिखाते हुए विभिन्न वस्तुएं पकाता था। उस दिन वह जब रसोई में था तब सहभागी के रूप में एक अधेड़ फ्रांसीसी महिला भी थी। वह बहुत घूमी-फिरी महिला थी, जो खाना बनाने की शौकीन थी, मगर खुद फल और कच्ची सब्जियां खाना पसंद करती थी। लेकिन आयुर्वेदिक भोजन बनाना सीखने में उसे बड़ा आनंद आ रहा था और वह हर व्यंजन को बनाने के बाद चखती अवश्य थी। उसने हमसे कुछ खाली पानी की बोतलें और थोड़ा सा कपड़ा लाने को कहा था और वह चाहती थी कि अपने कमरे में वह अनाज को अंकुरित करे। बिना किसी हीलो-हुज्जत के हमने उसे सारी चीजे मुहैया करवाईं। लेकिन जब उसके कमरे से एक अजीबोगरीब सी गंध आने लगी तो हमें लगा कि शायद उसके अंकुरण में कोई गड़बड़ी हो गई है। लेकिन बात यह नहीं थी और धीरे-धीरे उसके कमरे के सामने से बहुत दुर्गंध आने लगी, इतनी बदबूदार कि हमें लगा कि ड्रेनेज पाइप शायद टूट गया है या आसपास कोई चूहा मर गया है। हमने जब पूछा कि उसके बाथरूम में कुछ गड़बड़ तो नहीं है संडास जाम तो नहीं हो गया है तो उसने कहा ऐसा कुछ भी नहीं है, सब बढ़िया है! हमने जब उससे कहा कि किसी को भेजकर उसके बाथरूम या संडास की सफाई करा देते हैं तो उसने कहा कि वह खुद यह काम कर लेगी।

हमारी बातचीत सुनकर आश्रम के एक दूसरे मेहमान को लगा कि हम उस महिला को लेकर थोड़े परेशान हैं, तो वह हममें से एक को एक तरफ ले गयी और उसका राज़ जाहिर किया। असल में वह महिला मूत्र-चिकित्सा कर रही थी और इस बात को सबसे छिपाकर रखना चाहती थी कि हम इस बात को शायद अच्छा न समझें। आप कहेंगे, तो क्या हुआ, हम भी करते हैं। मैं अपना पेशाब किसी भी कीमत पर पी नहीं सकता मगर कोई ऐसा करता है तो मुझे उससे कोई एतराज़ भी नहीं है। लेकिन वह सिर्फ अपना पेशाब पी ही नहीं रही थी, उससे नहा रही थी!

(हम अब एक छोटा सा विराम लेते हैं जिससे आप इस मज़ेदार जानकारी का पूरा लुत्फ उठा सकें।)

इन कई हफ्तों में जब से वह हमारे साथ थी, वह एक भी दिन साबुन-पानी से नहाई नहीं थी। वह तेल मालिश करवाती थी लेकिन मालिश के बाद पानी से नहाती नहीं थी। पानी की जगह नहाने के लिए वह अपने पेशाब का इस्तेमाल करती थी और बाहर बैठ कर धूप में सुखाती थी।

वह अपना पेशाब इकट्ठा करती थी, स्वाभाविक ही एक-दो बार में वह पर्याप्त नहीं हो सकता था। और जब नहाने के लिए पर्याप्त पेशाब जमा हो जाता था वह उससे नहाती थी। यह पेशाब इकट्ठा करना ही समस्या थी, क्योंकि वह बदबू छोडता होगा और अब वह बदबू बाहर भी फैल रही थी!

आप उस खयाल की कल्पना नहीं कर सकते जब आपको पता चलता है कि आप हफ्तों एक ऐसी महिला के साथ उसके इतना नजदीक रह रहे हैं जो न सिर्फ यह कि नहाती नहीं है बल्कि अपना पेशाब अपने शरीर पर उँड़ेलती है और उसे धूप में सुखाती है! आप सोचते हैं कि पता नहीं उसने कभी पानी से हाथ भी धोए हैं या नहीं और पता नहीं किन-किन चीजों को उसने छुआ होगा या आपका उससे स्पर्श हुआ होगा! यशेंदु ने याद किया कि एक दिन ज़रा देर के लिए वह उसके कमरे में गया था और किसी द्रव से भरे एक मग पर उसका हाथ पड़ गया था; पता नहीं उसमें पानी था या और कुछ!

अच्छा हुआ, उसका वापसी का समय भी नजदीक ही था। निस्संदेह, वह हमारी कुछ सबसे यादगार मेहमानों में से एक थी। मगर अच्छी यादगार नहीं।

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