मैंने हिन्दू धर्म पर बहुत कुछ लिखा है और कई बार उसमें मौजूद मानव-पूजा (मानव-भक्ति) की निंदा की है। मेरे कुछ मित्र, जिनका लालन-पालन ईसाई सांस्कृतिक वातावरण में हुआ है, बताते हैं कि उन्हें बचपन से सिखाया जाता है कि किसी व्यक्ति या मूर्ति की पूजा न करें। उनके लिए सिर्फ एक ईश्वर का अस्तित्व है और उसका कोई आकार नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि उनके गिरजाघरों में किसी ईश्वर की मूर्ति नहीं होती। हालांकि मुझे कई बार ज़ोर देकर बताया जाता है कि हिन्दू धर्म और ईसाइयत में बहुत अंतर है, मैं उनमें बहुत सी समानताएँ भी देखता हूँ: मूर्ति पूजा के संदर्भ में भी।
मैं ईसाइयत के बारे में उतना नहीं जान सकता जितना कि हिन्दू धर्म के बारे में जानता हूँ लेकिन मैंने मोज़ेस के बारे में सुना है कि ईश्वर के कथित दूत के रूप में अवतरित होकर वे इजराइलियों को मिस्र से निकालकर लाए थे। जब लोग ठंड से बचने के लिए गाय की पूजा करने लगे तो वे बड़े नाराज़ हुए और ईश्वर ने लोगों को यह संदेश दिया कि उन्हें किसी भी मूर्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए। जब मोज़ेस ने दावा किया कि उन्होंने लोगों की मदद की है तो ईश्वर ने उन्हें बताया कि उनके पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है, यह भी कि वे ईश्वर नहीं हैं और लोगों के बीच ऐसा कोई भ्रम न फैलने दें कि वे ईश्वर हैं।
इन कहानियों को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है कि जिसने भी उन्हें लिखा था, चाहता था कि एक ऐसे धर्म की स्थापना की जाए, जो उस वक्त दुनिया में मौजूद रोमन, ग्रीक, केल्टिक और, अगर वे हिंदुओं के बारे में जानते थे तो, हिन्दू देवताओं वाले दूसरे धर्मों से बिल्कुल अलग हो। वे मूर्तियाँ नहीं चाहते थे और नहीं चाहते थे कि लोग ईश्वर का भेस बनाए किसी धोखेबाज़ मनुष्य की ईश्वर मानकर पूजा करें। लेकिन इसके बावजूद मैं आज के हिन्दू धर्म और ईसाइयत में, जितना भी मैंने उसे देखा-सुना है, कोई विशेष फर्क नहीं पाता।
पहली बात तो यह कि दोनों ही धर्मों का आधार धर्मग्रंथ हैं। बहुत से लोग इन धर्मग्रंथों पर अक्षरशः विश्वास रखते हैं भले ही वे महज अच्छी तरह, समझ में आने वाली भाषा में लिखी कहानियाँ ही हैं, जो धर्म के मूलभूत नियम समझाती हैं। और हालांकि ईसाई धर्म बाइबल के जरिये मूर्ति पूजा का पुरजोर विरोध करता है मगर मैं कई जगह क्रूसिफिक्स देखता हूँ, जहां क्रॉस पर जीज़स की मूर्ति लटकी हुई होती है और उनके बाजुओं से रक्त बहता हुआ दिखाई देता है। लोग उस मूर्ति के सामने खड़े हो जाते हैं और प्रार्थना करते हैं। यह क्या है? "लेकिन यह ईश्वर की मूर्ति नहीं है" मुझसे कहा जाता है। "यह ईश्वर-पुत्र की मूर्ति है।" लेकिन है तो वह मूर्ति ही! फिर मदर मेरी हैं, जीज़स को गोद में लिए हुए। वह आशा, करुणा, कोमलता और प्रेम का स्वरूप प्रस्तुत करती है। उनके सामने हाथ बांधे खड़े रहना क्या पार्वती, लक्ष्मी या सरस्वती की पूजा से किसी तरह भिन्न प्रतीत होता है? आखिर, वास्तव में फर्क कहाँ है? आप उससे याचना करते हैं, उसकी पूजा करते हैं और उसके सामने मन्नत मानते हैं। क्या यह मूर्ति की पूजा करना नहीं है? इसीलिए दक्षिण भारत के ईसाई धर्मप्रचारकों के लिए हिंदुओं को ईसाई बनाना आसान था। वे सिर्फ मूर्ति बदल देते हैं क्योंकि उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता! जब हम साल की शुरुआत में केरल गए थे तो हमने यह बात साफ नोटिस की। जब आप वहाँ की मूर्तियाँ देखेंगे तो वे आपको बहुत हद तक हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों की तरह ही लगेंगी: रंग-बिरंगी, सजी-संवरी, आभूषण और फूलों की मालाएँ धारण किए हुए। मूलतः दोनों एक ही हैं।
जो बात मैं मुख्य रूप से रखना चाहता था वह यह है कि कैथोलिक ईसाई कहते हैं कि वे किसी तरह की मानव-पूजा (मानव-भक्ति) नहीं करते लेकिन जब मैं मानव-पूजा के विरोध में कुछ कहता हूँ तो मैं उनके पुरोहित, पोप को भी किसी हिन्दू गुरु जैसा ही मानता हूँ। पोप की आप पूजा नहीं करते तो क्या करते हैं? क्या आपने कभी देखा है कि ईस्टर के दौरान कैसे बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने आते हैं और चाहते हैं कि जब पोप व्याख्यान देने आएँ तो किसी तरह उन्हें छू लें? या जब वे उनके शहर में या कहीं आसपास आते हैं तो लोग उन्हें देखने के लिए किस तरह इकट्ठा हो जाते हैं? कितने ही लोग उनके एक स्पर्श के लिए, एक शब्द सुनने या उनकी एक झलक पाने के लिए व्याकुल हो उठते हैं! यह भी बिलकुल वही है: व्यक्ति-पूजा! आप ही बताइए, यह मानव पूजा कैसे नहीं है? यहाँ तक कि उन्हें निष्पाप और दोष-रहित माना जाता है। जो वे कहते हैं या लिखते हैं उसे सत्य माना जाता है, उसी तरह जैसे एक हिन्दू गुरु के शब्दों को पत्थर की लकीर माना जाता है!
मैं फिर कहता हूँ कि इन धर्मों के बीच वास्तव में कोई बड़ा फर्क नहीं है। मैं यहाँ, भारत में पला-बढ़ा हूँ, हिन्दू धर्म के बीच, और इसलिए मैं स्वाभाविक रूप से इस धर्म के बारे में दूसरे धर्मों से ज़्यादा जानता हूँ। लेकिन, जब भी कोई व्यक्ति मुझे दूसरे धर्म के बारे में बताता है तो हमेशा कुछ बातें मुझे एक जैसी लगती हैं। इसलिए मैं जब भी धर्मों में मौजूद मानव-पूजा या मानव-भक्ति की आलोचना करता हूँ तब मैं सभी धर्मों के संदर्भ में वह बात कह रहा होता हूँ। वह व्यक्ति-पूजा हर तरह से, हर हाल में गलत है।
Related posts
जीवन आपका है, निर्णय भी आपके होने चाहिए-आपको क्या करना है, इस पर धर्म के दबाव का प्रतिरोध कीजिए – 17 सितंबर 2015
जब चुनाव, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को धर्म सीमित करता है – 16 सितंबर 2015
यह कहना कि इस्लाम शांति का धर्म नहीं है, क्यों इस्लाम के विरुद्ध पूर्वग्रह नहीं है – 15 सितंबर 2015
यूरोपियन सरकारों से अपील – शरणार्थियों की मदद करें लेकिन मजहब और मस्जिदों पर सख्त पाबंदी लगाएँ – 14 सितंबर 2015
संथारा की मूर्खतापूर्ण परंपरा की वजह से आत्महत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता! 26 अगस्त 2015
धर्म के कपटपूर्ण संसार में दो तरह के लोग रहते हैं – 11 जून 2015
"मैं ईश्वर की इच्छा से गरीब हूँ और इस बारे में कुछ नहीं किया जा सकता" – धर्म का बुरा प्रभाव – 26 मार्च 2015
गैर हिंदुओं को भारत के धार्मिक समारोहों में शामिल होने के लिए प्रेरित करने संबंधी एक मज़ेदार रिपोर्ट – 26 फ़रवरी 2015
क्या भगवान के लिंग की पूजा आपको अच्छा पति दिलवा सकता है? 19 फरवरी 2015
