हाँ, मैं मांसाहार को लेकर असहिष्णु हूँ- और इस विषय में मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है – 10 दिसम्बर 2014

शाकाहार

कल ही मैंने आपको यह बताने का विचार कर लिया था कि विभिन्न रेस्तराँओं में कुछ विशिष्ट खाद्य पदार्थों को लेकर मेरे अनुभव किस तरह के रहे हैं-तो अब इसकी शुरुआत करते हैं!

मैं सारा जीवन शाकाहारी रहा हूँ। वास्तव में मेरे गृहनगर, वृन्दावन में आप एक भी ऐसा रेस्तराँ नहीं पाएँगे, जहाँ मांस (सामिष भोजन) मिलता हो। यह पूरी तरह निरामिष शहर है। बचपन से ही मैं बहुत घूमता-फिरता रहा हूँ मगर भारत में, और विशेष रूप से उन लोगों के बीच, जिनसे मेरा ज़्यादातर साबका पड़ता रहा है, शाकाहारी होना असामान्य बात नहीं है। बल्कि इसके विपरीत मेरे आसपास के लोग सामिष भोजन को घृणास्पद मानते हैं।

बाद में, जब मैं विदेश यात्राओं पर जाने लगा तो पहले से जानता था कि वहाँ मुझे खुद अपने हाथों से अपना खाना पकाना होगा। वैसे यहाँ, भारत में भी, जब मैं अकेले यात्रा करता था तो अपना खाना खुद बनाता था। मुझे पता चला कि विदेशों में निरामिष रेस्तराँ होते ही नहीं हैं। वहाँ मैं सिर्फ भारतीय रेस्तराओं में ही भोजन करता था, जहाँ मैं उन्हें अच्छी तरह समझा सकता था कि मैं मांस नहीं खाता और न ही लहसुन और प्याज ही खाता हूँ। और वे समझ जाते थे।

और बाद में मेरे पश्चिमी मित्र मुझे दूसरे रेस्तराओं में भी ले जाने लगे और मैंने भी मेरे संपर्क में आने वाले सभी लोगों के सामने यह स्पष्ट करना सीख लिया कि मैं क्या खाऊँगा और क्या नहीं और यह भी कि कैसे खाऊँगा।

पश्चिम में अधिकांश शाकाहारी एक शाकाहारी के रूप में अपने समाज में रहने के आदी हैं और आसपास दूसरे सभी मांस खा रहे हों, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं शाकाहारी हूँ और इसका कतई आदी नहीं था- और मुझे मेरे साथ भोजन करने वालों को यह बताना पड़ता था कि टेबल पर मांस रखा हो या परोसा जा रहा हो तो मैं साथ बैठकर भोजन नहीं कर सकता। मेरी भूख मर जाती है, बल्कि जी मितलाने लगता है और लगता है जैसे उल्टियाँ होने लगेंगी। आपकी प्लेट में मौजूद मृत पशु के अवयवों को बर्दाश्त करना मेरे लिए असंभव है!

अगर आप इसे असहिष्णुता कहना चाहते हैं तो मुझे वह भी मंजूर है। जी हाँ, मैं इस मामले में पूरी तरह असहिष्णु हूँ-और इसके लिए मेरे अंदर कोई अपराधबोध भी नहीं जागता। अगर हम बाहर खाना खाने निकलें और आपको लगे कि आप एक दिन के लिए भी शाकाहारी खाना खाकर नहीं गुज़ार सकते तो मुझे आपसे कहना पड़ेगा कि मैं आपके साथ उसी टेबल पर खाना नहीं खा सकता। और अगली बार मैं आपके साथ खाना खाने के लिए बाहर निकलने में भी हिचकिचाऊँगा। ऐसा करके ही मैं खाना खा पाऊँगा।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं चाहता हूँ कि सब लोग हर समय मेरे जैसा शाकाहारी भोजन ही करें। जो आप नहीं हैं, अपने आपको वैसा प्रदर्शित करें, यह मैं नहीं चाहता। स्वाभाविक ही मैं सराहना करूँगा अगर दूसरे भी शाकाहारी बन जाएँ-यह मेरा सामान्य रवैया है क्योंकि मुझे विश्वास है कि शाकाहार सबके लिए अच्छा है-लेकिन सिर्फ इसलिए कि मैं वेटर से प्याज़ और लहसुन रहित सॉस लाने के लिए कहता हूँ, आपको भी वैसा ही करने की ज़रूरत नहीं है। पश्चिमी लोगों का मेरे साथ बैठकर एकाध गिलास वाइन पीना मुझे बर्दाश्त हो जाता है-भले ही मैंने आज तक शराब किसी भी रूप में, कभी भी नहीं चखी है। और ऐसे हजारों शानदार सामूहिक भोजों में मैं शामिल हुआ हूँ।

मैं यह बताना चाहता हूँ कि भले ही दूसरों से आपकी आदतें अलग हों, उनकी कुछ आदतों को आप स्वीकार कर सकते हैं और कुछ को नहीं, इसके बावजूद अपनी आदतों को लेकर आपमें अपराधबोध या एहसासे कमतरी नहीं होना चाहिए। अपनी सीमाएँ समझिए और अपनी शर्तों को नम्रतापूर्वक और मित्रतापूर्वक सबके सामने रख दीजिए। उनके बारे में कोई जान भी ले तो उससे आपको बुरा नहीं लगना चाहिए।

अगर कोई व्यक्ति इस पर कोई मूर्खतापूर्ण टिप्पणी करता है-तो उसे करने दीजिए। भोजन के वक़्त वे आपकी सोहबत का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं तो यह उनका दोष है, आप इसकी चिंता न करें!

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