भारतीय और पश्चिमी संस्कृतियाँ एक दूसरे को प्रभावित करती हैं – 11 मार्च 2008

भारतीय संस्कृति

कल मैंने कहा था कि आपको अच्छी बातें, अच्छे गुण देखने चाहिए। और यह बात सिर्फ व्यक्तियों और आपसी संबंधों पर ही लागू नहीं होती बल्कि सामान्य जीवन में, सामान्य परिस्थितियों में और यहाँ तककि राष्ट्रों पर भी लागू होती हैं। भारत और उसकी संस्कृति के मामले में कई ऐसी बाते हैं जिन्हें मैं नापसंद करता हूँ मगर उसकी कई बाते मुझे बहुत प्रिय भी हैं। और यही बात यूरोप के बारे में भी कह सकता हूँ जहां मैं अक्सर सफर करता रहता हूँ। आप कोई भी ऐसी जगह नहीं बता सकते जहां हर बात बिल्कुल पूर्ण और निर्दोष हो या जिनकी आप आलोचना न कर सकें या जिन्हें देखकर आप व्यग्र न हो जाएँ। लेकिन अगर आप सिर्फ गुणों पर ही अपने विचारों को केंद्रित करें तो देखेंगे कि उसे देखने का आपका नज़रिया ही यह तय करता है कि आप उस राष्ट्र को पसंद या नापसंद करें।

दुर्भाग्य से हम अकसर बुरी बातों से ही आकर्षित होते हैं। यह आसान होता है। यही कारण है कि बहुत सी बुरी बातें पश्चिम से भारत की ओर रुख करती हैं और यहाँ से पश्चिम की तरफ भी। भारत में बहुत से युवा पश्चिम की नकल में शराब पीना, सिगरेट पीना यहाँ तक कि नशीले पदार्थों का सेवन शुरू कर देते हैं। परिवार टूट रहे हैं और पहले की तरह अब एक ही परिवार के सदस्यों का आपस में कोई सहयोग नहीं होता। पश्चिमी समस्याएं इधर का रुख कर चुकी हैं जैसे बूढ़ों की देखभाल कौन करेगा क्योंकि सब अलग हो चुके हैं और उनकी ज़िम्मेदारी उठाने वाला कोई नहीं रह गया है। यह पागलपन है। हम प्रगति कर रहे हैं मगर प्रगति करते हुए हमें सिर्फ अच्छी बातों को स्वीकार करना चाहिए, बुराइयों को नहीं।

कई बातों में मुझे पश्चिमी दुनिया पर तरस आता है। वहाँ मैं कई लोगों से मिलता हूँ जो गुरु बनना चाहते हैं जिसके बहुत से अनुयायी हों। वे एक तरह के अहं में जीना चाहते हैं और चाहते हैं दूसरे उनके सामने झुकें, उनके पैर छुएँ। वे भारतीय गुरुओं की सारी नाटकबाजियाँ वहाँ दोहराना चाहते हैं। यह असुरक्षा की भावना की समस्या है। जिनके जीवन में अवरोध आ गया है और जो असुरक्षित महसूस करते हैं वे इस तरह के काम करते हैं। वे चाहते हैं कि लोग उनकी बात सुनें, उन्हें देखें और इज्ज़त करें, उनके शिष्य बनें। वे भारतीय गुरुओं जैसा व्यवहार करने लगते हैं।

मैं अपने उपचार सत्रों में कई ऐसे लोगों से मिलता हूँ जिन्होंने यह बेहूदी नाटकबाजी भारत से सीखी है। मैं खुद गुरु के ऐसे जीवन का अनुभव ले चुका हूँ, गुफा में काफी वक्त गुजारने से पहले और वह बीती बात हो चुकी है। मैं अब वैसा जीवन पुनः जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। इसलिए जब मैं ऐसे लोगों को देखता हूँ तो सोच में पड़ जाता हूँ कि वे क्यों अपनी मौलिकता खोना चाहते हैं और दूसरों का नकली जीवन जीना चाहते हैं। मैं इस बात का कायल हूँ कि आप जो हैं, जैसे भी हैं वैसे रहें, सहज और स्वाभाविक। हर व्यक्ति अलग है, अनूठा है। और इस तरह मैं भारत की अच्छी बातों का पश्चिम में और पश्चिम की अच्छी बातों का यहाँ प्रसार करते हुए प्रसन्न होता हूँ।

Leave a Comment