जब एक नाई लड़का पैदा करने के चक्कर में पाँच-पाँच बच्चे पैदा कर देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 15 जनवरी 2016

Mohini with her father

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल की एक लड़की, मोहिनी से करवाना चाहता हूँ, जिसने लगभग चार साल पहले हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया था। दस साल की मोहिनी पाँच सहोदर बहनों में सबसे बड़ी है।

मोहिनी के घर हम पहले भी आ चुके हैं: जब हम शशि, कृष्ण और जानकी के घर आए थे, जो उसी घर में रहते हैं जहाँ मोहिनी का परिवार रहता है, तब उसके यहाँ भी गए थे। इस घर में सात कमरे हैं जो पाँच भिन्न-भिन्न परिवारों को किराए पर दिए गए हैं। उन्हीं में से एक परिवार मोहिनी का है। जबकि हमारे स्कूल कीदूसरी तीन लड़कियाँ ऊपर, छत पर रहती हैं, मोहिनी के पिता और चाचा ने निचली मंज़िल पर किराए के कमरे लिए हैं। यहाँ थोड़ा अंधेरा रहता है लेकिन इससे लाभ यह है कि गर्मियों में ये कमरे कुछ ठंडे होते हैं!

उसके घर के पिछले दौरे के समय न तो मोहिनी की माँ और न पिता घर पर थे। इस बार भी माँ घर पर नहीं मिली और हमें पहले जाकर उसके पिता को लेकर आना पड़ा। हालांकि यह मुश्किल नहीं था: वह नाई है और आश्रम से 300 मीटर दूर सड़क पर स्थित अपनी दूकान पर दाढ़ी बनाता है और बाल काटता है। मेरे ख़याल से हमारे आश्रम के कुछ पुरुष मेहमान भी निश्चित ही उसके यहाँ दाढ़ी बनवाने का आनंद ले चुके होंगे!

मोहिनी का पिता और चाचा साझे में अपनी नाई की दुकान चलाते हैं, जो सड़क के किनारे महज एक कुर्सी भर है, जिसके सामने एक टेबल पर उनका सारा सामान करीने से रखा रहता है, जिसके पीछे एक आइना है। थोड़ा गौर से देखने पर पता चलता है कि कोई भी सामान नया नहीं है- कहीं-कहीं जंग लगा है और कंघों के कुछ दाँत टूटे हुए हैं।

यह एक सीधा-सादा ईमानदार सा धंधा है लेकिन इसमें ज़्यादा कमाई नहीं हो पाती! हमें बताया गया कि मोहिनी का चाचा अस्थमा (दमे) का मरीज़ है और अक्सर बीमार पड़ा रहता है, जिसके कारण अक्सर परिवार के लिए पैसे कमाने का पूरा भार मोहिनी के पिता पर आ पड़ता है। परिवार में दो पुरुष, मोहिनी की माँ और मोहिनी की चार सहोदर बहने हैं! 4000 रुपए अर्थात 60 डॉलर की मासिक आमदनी में, जिसका चौथाई हिस्सा मकान किराए में चला जाता है, परिवार का खर्च चलाना अक्सर बहुत कठिन होता है!

शायद इसी कारण मोहिनी की माँ से घर पर मुलाक़ात हो पाना मुश्किल होता है: वह अक्सर बच्चों को लेकर अपनी माँ या अपने सास-ससुर के यहाँ चली जाती है। बच्चों के दादा-दादी सारे बच्चों को खिला-पिलाकर और अपने यहाँ रखकर उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं! दस वर्ग मीटर के उस छोटे से कमरे में, स्वाभाविक ही, उनके गाँव की खुली सड़कों के मुकाबले खेलने-कूदने की जगह बहुत कम मिल पाती है!

इस तरह मोहिनी अक्सर अपने पिता के साथ अकेली ही रहती है या फिर, जब पिता काम पर चला जाता है और वह उसके साथ सड़क किनारे बैठना नहीं चाहती तो घर में पूरी तरह अकेली! दरअसल ऐसे समय में ही उसे अच्छा लगता है क्योंकि तब ठीक उनके ऊपर रहने वाली सहेलियाँ उससे खेलने नीचे आ जाती हैं!

हम जानते हैं कि अगले कुछ सालों में हम मोहिनी की दूसरी बहनों के बारे में जान सकेंगे, जब वे एक के बाद एक हमारे स्कूल आना शुरू करेंगी। वास्तव में मोहिनी जैसी दो और लड़कियाँ भी इसी कारण इस दुनिया में आ गईं क्योंकि उनके अभिभावक लड़कों की तमन्ना (आशा) कर रहे थे। ये सबसे अंत में आईं और जब हमने उनकी उम्र पूछी तो वे बगलें झाँकने लगीं क्योंकि उन्हें उत्तर पता नहीं था-क्योंकि उनके पिता भी सिर्फ अंदाज़ा लगा रहे थे!

हमें आशा है कि अच्छी पढ़ाई का आधार पाकर मोहिनी अपने जीवन में और अपने परिवार के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन लाने में कामयाब होगी!