मैं समझता हूँ कि विदेशी लोगों के लिए विभिन्न योग-मुद्राओं के संस्कृत नामों की आवश्यकता नहीं है! क्यों? 30 सितंबर 2015

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योग-शिक्षकों को अपने छात्रों की योग-मुद्राओं को सुधारना चाहिए या नहीं, इस विषय पर मैंने अपने कल के ब्लॉग में विस्तार से लिखा था। मैंने बताया था कि मैं, और मेरे साथ यशेंदु और रमोना भी इसी सिद्धान्त पर काम करते हैं कि ‘कम से कम और जितना आवश्यक हो’। सुधार के निर्देशों के अलावा एक और बात है, जो अधिकतर योग-शिक्षक करते हैं लेकिन हम अक्सर वैसा नहीं करते: विभिन्न योग-मुद्राओं के लिए संस्कृत नामों का उपयोग, जो सिखाने की पूरी प्रक्रिया को पहले से अधिक कठिन बना देता है।

प्रिय योग शिक्षकों, मैं जानता हूँ कि आपने अपने योग-प्रशिक्षण के दौरान ही आसनों, क्रियाओं और मुद्राओं के लिए प्रयुक्त इन संस्कृत शब्दावलियों को सीखा होगा। शायद आप देर रात तक इन अजीबोगरीब उच्चारण वाले शब्दों को रटते रहे होंगे। ज़बान के लिए उनका उच्चारण भी दूभर था मगर उनके सही-सही उच्चारण सीखने के लिए आपने कड़ी मेहनत की होगी। अब आप उनका उपयोग करना चाहते हैं, अपने ज्ञान को अपने छात्रों को सौंपना चाहते हैं और इसलिए आप उदारतापूर्वक अपनी कक्षाओं में इन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वास्तव में इसकी जरूरत नहीं है? बल्कि इससे आपके बहुत से छात्र असुविधा महसूस करते होंगे और बहुत ज़ोर देने पर उनमें खीज पैदा हो सकती है।

अपने जीवन में मैं बड़ी संख्या में योग-छात्रों से मिल चुका हूँ और उनमें से बहुत से लोगों से मेरी इस विषय में चर्चा भी हुई है। हमारे योग-प्रशिक्षण शिविरों में भी बहुत से प्रशिक्षुओं ने इस बारे में मुझसे सवाल पूछे हैं और विस्तृत चर्चा की है। कठिन उच्चारण वाले शब्दों का प्रयोग करके योग को जटिल और कष्टदायक न बनाएँ!

आप उनके लिए सहज-सरल अंग्रेज़ी के शब्दों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते या फिर उन भाषाओं के शब्दों का, जिनमें आप योग सिखा रहे हैं? अगर आपने संस्कृत नामों को सीख लिया है तो फिर उनके स्थानापन्न शब्दों को भी सीखा ही होगा।

अगर आपने अभी उन्हें नहीं सीखा है तो मैं आज आपको बताता हूँ: संस्कृत नाम ज़्यादातर उन मुद्राओं से बनने वाले शरीर के आकारों या उनकी गतिविधियों को व्यक्त करते हैं! जैसे ‘मत्स्यासन’ कहने में बड़ा अनोखा और सुंदर लगता है और उसका उच्चारण करने से पहले उसे कई बार ध्यान से सुनना पड़ता है लेकिन उसका अर्थ सिर्फ ‘मछली की मुद्रा’ भर है। क्यों? क्योंकि यह आसन करने पाए आप मछली का आकार ग्रहण कर लेते हैं। इन नामों में कोई गुप्त रहस्य या कोई विशेष मर्म नहीं है। ज़्यादातर मुद्राओं के ऐसे ही नाम हैं क्योंकि उनसे उन पशुओं या वस्तुओं का बोध होता है-या वे शब्द शब्दशः शरीर के उन हिस्सों को व्यक्त करते हैं, जैसे, शीर्सासन का अर्थ हुआ, सिर पर खड़े होना। शीर्ष का संस्कृत अर्थ है, सिर। इसमें कोई बड़ा वैज्ञानिक या आध्यात्मिक अर्थ नहीं छिपा है!

इसलिए प्रिय योग-शिक्षकों, कृपा करके इसे सहज-सामान्य बनाएँ रखें, जिससे वह समझने में आसान लगे और आपके छात्र आसानी के साथ उन्हें याद रख सकें।

नोट: यह अंग्रेजी से अनुवादित ब्लॉग मूल रूप से विदेशी योग शिक्षकों के लिए लिखा गया है, भारतीय पाठक कृपया अन्यथा न लें!

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