उपलब्धियां और सफलताएँ जब खुशियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं! 20 अगस्त 2013

कार्य

कल मैंने आपको अपनी नई परियोजना के विषय में बताते हुए ज़िक्र किया था कि कई खेल ऐसे हैं जो प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करते हैं जब कि आगे चलकर बच्चों को जीवन में प्रतिस्पर्धा का सामना करना ही है। वैसे स्पर्धायुक्त खेल मज़ेदार हो सकते हैं और उनसे दूर रहना हमेशा उचित नहीं कहा जा सकता लेकिन वह प्रतिस्पर्धा, जिसका उन्हें वास्तविक जीवन में, खासकर अपने कामकाजी जीवन में, सामना करना है, वह बहुत सा अनावश्यक और हानिकारक दबाव और तनाव पैदा कर देती है।

दरअसल, यह आजकल स्कूलों में शुरू हो चुका है। जब परीक्षाओं में प्राप्त अंकों की घोषणा होती है तब, स्वाभाविक ही, हमेशा माहौल प्रतिस्पर्धात्मक हो जाता है। हर विद्यार्थी यही देखता है कि उसकी कक्षा के दूसरे बच्चों ने क्या परिणाम हासिल किए हैं और फिर अपने अंकों की तुलना उनके अंकों से करता है और सोचता है कि उनसे कितना अच्छे या बुरे अंक उसे प्राप्त हुए हैं। वह शिक्षा प्रणाली नैसर्गिक प्रतिस्पर्धा को पोषित और पल्लवित करती है जो विभिन्न क्षेत्रों मे पुरस्कार देने की हामी है और हमेशा ‘सर्वप्रथम’ का सम्मान करती है। इससे दूसरे बच्चे भी प्रशंसा प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं और वही सफलता प्राप्त करने में जी-जान लगा देते हैं।

यह स्कूल है, अभी भी यहाँ सुरक्षित वातावरण में, नियमानुसार और स्पष्ट ढांचे में काम होता है। यह वास्तविक जीवन के बीहड़ में संभावित कटु अनुभवों का आधार तैयार करता है। अगर आपने इस मंज़िल तक आकर भी सफलता प्राप्त करने लायक कुछ नहीं सीखा, तो फिर आगे आने वाली ज़िंदगी में वही बातें सीखने के लिए बहुत कड़ा परिश्रम करना होगा।

आप एक बड़ी कंपनी में नौकरी करते हैं क्योंकि आपको लगता है कि उसमें आगे बढ़ने की ज़्यादा संभावनाएं हैं-अधिक से अधिक सफलता प्राप्त करने के अवसर। आप पूरी ताकत लगा देते हैं और कोई उपलब्धि प्राप्त करते हैं, अपने इलाके में सबसे अधिक विक्रय, साल में सबसे ज़्यादा लाभ। आपको ‘साल का नया चेहरा’ या ‘न्यूकमर ऑफ द ईयर’ नामक पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है, वेतन में संभावित बढ़ोत्तरी के साथ आपका सम्मान होता है। अगर आप दूसरे नंबर पर हैं तो आपको कुछ नहीं मिलता। कंपनी की कार्य-प्रदर्शन सूची के अनुसार अगर आप कहीं बीच में हैं या बिलकुल नीचे के कुछ लोगों में आपका नाम आता है तो आप समझिए कि आपका कोई मूल्य नहीं है। आप पर कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी और आपको नीची नज़र से देखा जाएगा। आप कंपनी की सूची में हैं, बस!

मुझे लगता है कि मुझे बहुत ज़्यादा विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह व्यवहार कंपनी में किस तरह का वातावरण निर्मित करता है, उन लोगों के दिलों में किस किस्म की भावनाएँ जन्म लेती हैं, जो जीत नहीं पाए और पीछे रह गए! आधुनिक समाज लोगों को यह सिखाता है: अगर आप उत्कृष्ट हैं तो आप अच्छे हैं। आप अच्छे हैं अगर आप ‘नंबर वन’ हैं। अगर आप ऊपरी लोगों में से एक हैं तो आपका अहं कृत्रिम रूप से बढ़ जाता है और आप और भी अधिक अच्छा काम करना चाहते हैं, जिससे आप कंपनी की बिक्री और लाभ बढ़ा सकें।

कुछ लोग प्रथम श्रेणी वाले, सबसे श्रेष्ठ समूह में दौड़े (काम किया), भरसक कठोर प्रयास किया और अंततः दबाव में आकर टूट गए। दूसरे कुछ वहाँ पहुँचने की बहुत कोशिश करते हैं लेकिन हमेशा मध्यम श्रेणी में बने रहते हैं और कभी भी वहाँ नहीं पहुंच पाते और अवसाद में घिर जाते हैं क्योंकि उन्हें कभी भी वह महत्व प्राप्त नहीं होता, जिसके लिए वे पूरे वक़्त लालायित रहे। फिर वे लोग भी हैं जिन्हें कभी मौका ही नहीं मिला, जो सदा निचली श्रेणी में ही रहे। वे हमेशा इस डर में रहते हैं कि उनकी जगह किसी और को रख लिया जाएगा और कंपनी में भी जड़वत काम करते रहते हैं-क्योंकि वे जानते हैं कि वे कभी भी ‘नंबर वन’ नहीं बन पाएंगे।

हम हमेशा इस तरह नहीं चल सकते! इसे बदलना होगा, थोड़ा सा बैठकर सोचना होगा और इस बात को समझना होगा कि सिर्फ आपकी सफलता ही आपकी पहचान नहीं है। यह हमारे लिए कोई खुशी नहीं लाएगा और न ही कोई आपको उस तरह से पसंद करेगा, जैसा कि वह किया करता था। अगर आप समझते हैं कि आपकी कंपनी आपसे इसलिए प्रेम करती है क्योंकि आप लाभ कमा रहे हैं तो इस बात को भी समझने की कोशिश कीजिए कि आप सिर्फ और सिर्फ इसलिए कंपनी के लिए महत्वपूर्ण हैं या उसके प्रेमपात्र हैं कि आप उनके लिए लाभ कमाते हैं।

यह आपके लिए कठिन होगा लेकिन मुझे लगता है कि अगर आप अपने आपको पूरी तरह टूटकर बिखरने से बचाना चाहते हैं तो आपको इस बात की गंभीरता को समझना ही होगा! आप इस प्रतिस्पर्धा में सफल हों या न हों, अपनी खुशी और आनंद को पूरी तरह इस खेल पर निर्भर न करें! भरपूर प्रयास करें मगर उसमें सम्मान या प्रशंसा की अपेक्षा न करें! आपको अपने परिवार और दोस्तों का एक तानाबाना विकसित करना चाहिए और अपने लिए एक आंतरिक स्वयोग्यता पैदा करनी चाहिए, जो ऐसी प्रतियोगिता से परे हो। अन्यथा आपका गिरना तय है और वह आपको तगड़ी चोट पहुंचाएगा। यह सुनिश्चित करें कि आपका स्व-सम्मान सिर्फ कार्यक्षेत्र में आपकी सफलता के चलते नहीं होना चाहिए। ध्यान से देखें कि आप कौन हैं, समझें कि आप आप हैं और सिर्फ यही बात, अपने आप में आपको प्रसन्न करने के लिए काफी है। यह आवश्यक नहीं है कि आप सर्वश्रेष्ठ ही हों। आप नंबर वन हों, यह ज़रूरी नहीं। अगर आपको मज़ा आ रहा है तो खेल में बने रहिए, जब तक मज़ा आ रहा है, खेलते रहिए। जब वह मज़ा, वह आनंद न मिले तो खेल से बाहर निकल आइये।

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