क्या सिर्फ डांट फटकार आपकी कार्य-क्षमता में इज़ाफा कर सकता है? 7 मई 2014

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक महिला मेहमान आईं, जिनकी कहानी ने एक बार फिर वह बात सिद्ध की, जिसे बहुत से लोग पहले से जानते हैं: जब कि प्रबंधन के हल्कों में कर्मचारियों से सख्ती करना, क्रोधित होना और यह ज़ाहिर करना कि ‘बॉस कौन है’ एक आम कार्यप्रणाली है, थोड़ा सा स्नेह, विनम्र मार्गदर्शन और सकारात्मकता भी वही परिणाम दिलाती है!

हमारी मेहमान एक यूरोपियन सुपरमार्केट चेन के उच्च प्रबंधकीय पद पर नियुक्त थीं। बहुत से सुपरमार्केट्स के कर्मचारियों का प्रबंधन उनकी ज़िम्मेदारी थी। कार्यालय में उनका काम बहुत कम होता था और एक सुपरमार्केट से दूसरे के बीच उन्हें लगातार भाग-दौड़ करनी पड़ती थी, जहाँ वे कर्मचारियों की निगरानी करती थीं, वहाँ की व्यवस्था की जाँच करती थीं, कोई कमी पाई जाने पर उन्हें दूर करने का प्रयास करती थीं और कर्मचारियों को सलाह-मशविरा दिया करती थीं कि काम और सारी व्यवस्था को बेहतर कैसे किया जा सकता है।

बावजूद इसके कि उन्हें अपना काम पसंद था उन्होंने बताया कि वह यह नौकरी छोड़कर किसी दूसरी कंपनी के साथ काम करना चाहती हैं। हमने पूछा, क्यों, आप तो अपना काम पसंद करती हैं? पता चला, कारण उनका बॉस और दूसरे सहकर्मी हैं। वे उनसे कहते थे कि वह सुपरमार्केट के कर्मचारियों के प्रति बहुत सौम्य और नरमदिल हैं। कर्मचारियों से अधिक से अधिक काम लेने के लिए उन्हें उनके साथ बातचीत करने की जगह डांटने-डपटने का तरीका अपनाना चाहिए। उनका विचार था, शांति से कोई काम नहीं निकलता, उन पर गुस्सा होना पड़ता है और अपने क्रोध का प्रदर्शन करना पड़ता है तभी वे आपकी मर्ज़ी से काम करते हैं। और तभी ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाया जा सकता है।

उसने हमें बताया कि वह इस बात से आजिज़ आ गई है कि उसे किसी दबंग गुंडे की तरह अपने मातहतों के साथ धौंस-डपट करने के लिए कहा जाता है जैसे वे कोई तुच्छ लोग हों! और फिर, लोगों के साथ नम्र और मृदु व्यवहार करते हुए भी वह अपना काम अच्छे तरीके से करती ही रही थी: परिणामों के आंकड़े बेहतर हुए थे, पिछले सालों के मुक़ाबले आय में लगातार इजाफा हुआ था और यह सिद्ध करते थे कि काम लेने का उसका तरीका ही बेहतर है!

इस तथ्य के बावजूद सराहना की जगह उसे ताने मिलते रहे।

आज के जमाने में ऐसा होना वाकई दुखद है।? प्रबंधन के क्षेत्र में उपलब्ध तमाम ज्ञान और समझदारी यही दर्शाती है कि मालिक, नियोक्ता या उच्च प्रबंधन के लिए लोगों को साथ लेकर काम करना, उनके प्रतिकूल होकर काम करने से बेहतर सिद्ध होता है! मैं समझता हूँ कि मेरी तरह सभी लोगों ने यह पढ़ रखा होगा कि प्रसन्न व्यक्ति की उत्पादकता एक दमित, दुखी और नाखुश व्यक्ति की उत्पादकता से ज़्यादा होती है! यह भी कि कार्यक्षेत्र में, चाहे वह कोई ऑफिस हो, खेत-खलिहान हों, फैक्ट्री हो या कोई और जगह, ऐसा माहौल होना चाहिए जिसमें कर्मचारी स्वतन्त्रतापूर्वक काम करते हुए अपनी रचनात्मकता में वृद्धि कर सकें, न कि पूरे समय किसी की निगरानी में या तनाव और दबाव में काम करें। इसके अलावा अपने मातहत काम करने वालों का आदर करना, उनके भीतर आपके प्रति और आपकी संस्था के प्रति सम्मान का भाव ही पैदा करेगा।

तो जब इतनी जानकारियाँ सबको सुलभ हैं और इस विषय पर अनेकानेक कार्यशालाएं, प्रशिक्षण-सत्र और दूसरे कार्यक्रम होते रहते हैं, तब भी हमारे मेहमान द्वारा वर्णित और बहुत से और लोगों के मुख से सुनी ऐसी ही परिस्थितियाँ क्यों सामने आती रहती हैं? दरअसल, वह महिला यूरोप से आई थी मगर वहाँ के देशों से भारत की तुलना करने में पूर्णतया सक्षम होने के कारण मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस सम्बन्ध में भारत में हालत और बुरी है। जहाँ पश्चिम में लोग समझते हैं कि यह स्थिति ठीक नहीं है और उस पर शर्मिंदा होते हैं, भारत में उच्च पदासीन लोग दूसरों पर अपनी ज़ोर-ज़बरदस्ती चलाना और उनके साथ डांट-डपट करना वाकई आवश्यक मानते हैं!

दूसरों से काम कराने के लिए अपने आपको एक गुस्सैल मिजाज में ढाल लेना क्या आपकी आदत बन चुका है? क्या यह समझ उचित है कि अपने मातहतों पर लगातार धौंस-डपट करना लाभकारी हो सकता है? या क्या यह उच्चासीनों की तरफ से आया हुआ या इस आधुनिक युग का दबाव है, जो आपसे अपेक्षा रखता है कि आप ज़्यादा से ज़्यादा लाभ, कम से कम समय में कमाकर दें?

कुछ भी हो, जो भी मेरा यह ब्लॉग पढ़ रहे हैं, उनसे मैं यही गुजारिश करना चाहूँगा कि दूसरों से संवाद के इस तरीके पर पुनर्विचार करें, विशेष रूप से उनके साथ, जिनसे आपकी बात सुनने की और उस पर अमल करने की अपेक्षा की जाती है। उनके ऊपर नहीं, उनके साथ खड़े रहें। उनके साथ काम करें, ऊंचाई पर बैठकर सिर्फ आदेश न दें। अपनी बात पर स्थिर रहें मगर शांत और विनम्र बने रहें। इसके विपरीत दूसरी सभी बातें उन्हें और आपको भी दुखी करेंगी, अवसाद और अक्रियाशीलता के प्रकरणों में इजाफा होगा और इससे किसी का कोई लाभ नहीं होने वाला।

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