जब भारतीय पश्चिमी मुल्कों में खरीदारी करना सीखते हैं – 8 जुलाई 2015

पश्चिमी संस्कृति

परसों मैंने बताया था कि एक भारतीय पुरुष को, जो अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड के साथ पश्चिमी देश में रह रहा है, जल्द से जल्द पश्चिमी व्यक्तिवाद का आदी हो जाना चाहिए। कल मैंने बताया कि पश्चिम में कैसे उन्हें अपने काम खुद करने की आदत भी डालनी होगी और एक प्रकार से आज़ाद होना होगा। आज़ादी की इसी कल्पना को और विस्तार देते हुए आज मैं एक और पहलू पर विस्तृत चर्चा करना चाहता हूँ: खरीदारी का अनुभव!

हर वह व्यक्ति जो भारत और पश्चिम, दोनों जगह रह चुका है, तुरंत समझ जाएगा कि मैं क्या कहना चाहता हूँ। जबकि बड़ी-बड़ी दुकानों और बड़ी-बड़ी कंपनियों के नामचीन ब्रांडों के शोरूमों वाले माल भारत के हर भाग में बड़े पैमाने पर धावा बोल चुके हैं मगर वे सिर्फ बड़े शहरों तक ही महदूद हैं और देश के अधिकांश ग्रामीण और कस्बाई इलाके माल संस्कृति से अभी अछूते ही हैं। भारत में सब्ज़ियाँ हाटों में बिकती हैं और दूसरी ज़रुरत की चीजें तुलनात्मक रूप से छोटी दुकानों से खरीदी जाती हैं, जहाँ ज़्यादातर एक ही तरह की कुछ चीजें ही प्राप्त की जा सकती हैं। आप उन्हीं दुकानों का रुख करते हैं, जहाँ आपकी इच्छित वस्तु बेची जाती है।

और अब आप पश्चिम में हैं और आपको पता चलता है कि आपके शहर में कोई दैनिक हाट नहीं लगता! हफ्ते में एक या दो बार आप हाट और उसमें बिकने आई ताज़ा सब्जियों को देख पाते हैं। बाकी दिन? ज़्यादातर लोग उन्हें सुपरमार्केट से खरीदते हैं! सुपरमार्केट, जहाँ हर चीज़, उसके आकार-प्रकार की सीमा में, एक ही छत के नीचे मिल जाती है! किराने का सामान या साफ-सफाई का सामान ही नहीं बल्कि कपड़े, बरतन, और यहाँ तक कि कई बार वाशिंग मशीन और मोटर साइकल तक!

इसलिए अब आप एक ऐसी जगह खड़े हैं जो दुनिया भर के साज़ो सामान से अटी पड़ी एक बहुत विशाल जगह है और आपको सूझ नहीं पड़ता कि कहाँ से शुरू किया जाए। आप सूखे चने ढूँढ़ रहे हैं। डिब्बाबंद चने नहीं बल्कि वे चने, जिन्हें घर जाकर आप खुद खूब नरम होने तक पकाएँगे। प्रश्न है, वे कहाँ मिलेंगे? क्या आपको याद आया, मैंने किस शब्द का प्रयोग किया था: आज़ादी! वही शब्द फिर सामने है: काफी हद तक स्वयं आपको कुछ करना होगा। मैंने आपको बताया था कि पश्चिमी देशों में श्रम बहुत महंगा है और यहाँ यही बात पुनः एक बार प्रकट है। भारत के विपरीत, जहाँ किसी भी सामान्य दुकान में एक ग्राहक पर तीन-तीन सेल्समैन होते हैं, यहाँ आप पचास ग्राहकों पर एक कर्मचारी की कल्पना कर सकते हैं! तो इस तरह आपके सामने यह सारा सरंजाम खड़ा किया गया है कि आपको वहाँ चने खरीदना है तो खुद ढूँढ़कर ले जाएँ-तो जाइए, आज़ादी के साथ घूमिए और चने कहाँ हैं, खोज निकालिए!

निर्देश-पटलों को पढ़िए, गलियारों में घूमिए और सूखे अनाजों, दालों और चावल के पैकेट्स वाले खंड की तलाश कीजिए। आँखें खुली रखिए, लेबलों को पढ़िए, कीमतों की जाँच कीजिए, दूसरी कंपनियों के उत्पादों से तुलना कीजिए और फिर उनमें से अपने पसंद की इच्छित वस्तु चुनिए। सामान को शॉपिंग कार्ट पर रखिए और स्वयं उसे धकियाते हुए कैश काउंटर तक ले जाइए, पैकेट खोलकर बेल्ट पर रखिए, पैसे चुकाइए- सब कुछ खुद, अपने हाथों से! कोई मोलभाव नहीं, कुछ नहीं, सिर्फ पूर्वघोषित डिस्काउंट! इसके अलावा, अधिकतर देशों में स्कैनिंग के बाद सामान भी आपको खुद पैक करना पड़ता है। और अगर आप कार से आए हैं तो कार तक सामान भी आपको ही ढोकर ले जाना होगा!

आज़ादी!

लगभग कुछ भी आप खरीदें, आपको यही सब करना है। दुकानों पर उनके यहाँ बिकने वाली वस्तुओं के बड़े-बड़े सूचना पट्ट लगे होते हैं, जिनमें से आप मनचाही वस्तु चुन सकते हैं, चाहे वे कपड़े या जूतों जैसी कोई चीज़ ही क्यों न हों। निश्चय ही कर्मचारी होते हैं, जिनसे आप, अगर आपको अपने नाप की चीज़ न मिल रही हो तो किसी दूसरे नाप का कपड़ा या जूता मांग सकते हैं लेकिन कभी-कभी आपको कर्मचारी ढूँढ़ने में भी काफी वक़्त लग सकता है!

जी हाँ, मैंने आपको यह तो बताया ही नहीं कि फर्नीचर, रसोई और बाथरूम के बड़े और टेढ़े-मेढ़े, उल्टे-सीधे सामानों के साथ भी आपको यही स्वतंत्रता प्राप्त है! वाकई आप ये सभी वस्तुएँ विशाल फर्नीचर की दुकानों में खरीद सकते हैं, जैसे एक है IKEA, और उन्हें ढोकर घर ला सकते हैं और खुद ही मज़े में बैठकर और जोड़-जाड़कर उन्हें घर की शोभा बना सकते हैं! क्यों, है न मज़ा! अधिक से अधिक काम खुद अपने दो हाथों से करने की स्वतंत्रता का सुख! अब उस आनंद का अनुमान लगाइए जब आपको खुद ही आरी, हथौड़ा और स्क्रू ड्राईवर लेकर उन्हें जोड़ना होगा और आपको याद आएगा कि भारत में आपने इन्हें हाथ तक नहीं लगाया क्योंकि बढ़ई आकर सब कुछ सस्ते में कर देता था!

तो जब भी आप इन दुकानों के गलियारों में विदेशी भाषाओं में लिखे अक्षरों को बाँचने और सोचने में गुम होने लगें कि इनका क्या अर्थ है या जब आपको अपने 'D' नाप के छेद के लिए 'C' नाप का स्क्रू न मिल रहा हो तो अपनी नई नवेली पत्नी को या अपने साथी को तुरंत मदद के लिए पुकारिए क्योंकि वही एकमात्र विश्वसनीय मददगार आपको वहाँ तत्पर मिलेगा!

एक छोटी सी टिप और! जब आपको लगे कि यह आपकी कूवत से कुछ ज़्यादा हो रहा है तो घबराइए नहीं, पश्चिम में भी भारत की तरह छोटी दुकानें भी होती हैं। ये दुकानें आम तौर पर शहर के बीचोंबीच या बस्तियों में होती हैं और कुछ महंगी होती हैं। लेकिन वहाँ आपको बेहतर सेवा उपलब्ध हो जाती है और वस्तुओं की गुणवत्ता भी बेहतर होती है! ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों पर कुछ ज़्यादा पैसे खर्चिए, मज़े में दुकानदार से बातचीत कीजिए क्योंकि उसे अक्सर अपने सामान की बेहतर जानकारी होती है और जान लीजिए कि निश्चित ही इन दुकानों से सामान खरीदकर स्वास्थ्य के लिहाज़ से आप बेहतर दुकान का चुनाव कर रहे होंगे! अगर आप आर्थिक रूप इतना सक्षम हैं तो आपको यही करना चाहिए-यह विशाल कॉर्पोरेशनों के मुकाबले एक तरह से स्थानीय छोटे दुकानदारों का समर्थन और सहयोग होगा!

आइए, अकस्मात् मिली इस स्वतंत्रता का भरपूर आस्वाद लें!

Leave a Comment