कम औपचारिकताएँ जीवन आसान बनाती हैं! 28 जनवरी 2015

कल मैंने कृतज्ञता के बारे में चर्चा करते हुए लिखा था कि एक तरफ कई मामलों में भारतीय बहुत औपचारिक होते हैं वहीँ कृतज्ञता व्यक्त करने के मामले में कतई औपचारिकता प्रदर्शित नहीं करते। यह बात मैंने अकसर नोट की है और जहाँ यूरोप में लोग बहुत सी बातों में शिष्टाचार का बड़ा ध्यान रखते हैं-जोकि निश्चय ही, भारत की तुलना में बहुत अलग है-आजकल मुझे महसूस होने लगा है कि पश्चिमी देशों में इन औपचारिकताओं का प्रदर्शन दिनोदिन घटता जा रहा है।

जहाँ तक भारतीय औपचारिकताओं की बात है, मैंने आपको बताया था कि यहाँ लोग सिर्फ इसलिए लोगों को आमंत्रित कर लेते हैं कि 'ऐसा ही किया जाता है'। जब आप अपने किसी परिचित से मिलते हैं तो वह अकसर आपसे शिकायती लहजे में कहे बिना नहीं रहता कि आप बहुत दिनों से उसके घर नहीं पधारे हैं। यह भारतीय औपचारिकता है और जवाब में आपको कहना चाहिए कि आप जल्द ही उनके यहाँ आएँगे। इतना सब कुछ तब जबकि न तो उन्हें अपेक्षा है कि आप आएँगे और न ही आप निकट भविष्य में उनके यहाँ जाने का कोई कार्यक्रम बना रहे हैं। यह भारतीय औपचारिकता का एक उदाहरण है। औपचारिकताओं की यह ड्रामेबाज़ी अकसर आप वहाँ देख सकते हैं जहाँ कोई पारिवारिक समारोह चल रहा है-औपचारिकताओं का अनंत प्रदर्शन!

मुझे लगता है कि पश्चिम में अधिक से अधिक लोग अब इन औपचारिकताओं से पीछा छुड़ा रहे हैं। यहाँ तक कि मेरे मित्र बताते हैं कि आजकल परिवार वाले यह कहते हुए देखे जाते हैं: 'हम क्रिसमस/शादी/जन्मदिन पर अपने चचेरे भाई-बहनों को क्यों न्योता दें? हमारा उनसे अब क्या मतलब रह गया है, बात तक नहीं होती उनसे आजकल। हम दोनों ही बोर होंगे फिर उन्हें बुलाकर हम क्यों परेशान हों?'

सिर्फ व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं, नौकरी, कार्यालयीन या व्यापारिक जीवन में भी कम औपचारिकता वाला यह रवैया आम होता जा रहा है। बहुत सी कम्पनियाँ कार्यालय में अधिक से अधिक आरामदेह माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। वे उन अध्ययनों और रिपोर्टों का उल्लेख करते हैं, जिनमें कार्यालयों में ज़्यादा से ज़्यादा 'घरेलू' वातावरण निर्माण करने की अनुशंसा की जाती है, जिनमें विभिन्न स्तरों के अधिकारियों के बीच दूरी कम करने की और पूरी कंपनी को एक टीम की तरह काम करने की सलाह दी जाती है। उनमें यह भी कहा जाता है कि कार्यालय में बॉस, ब्रेनस्टॉर्मिंग और बड़े-छोटे सभी कर्मचारी 'टीम वर्क' की तरह ही कार्य करें तो बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं। कुछ स्कूलों में शिक्षक सामान्य घरेलू जूते या चप्पल पहनकर आते हैं और कई कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों के लिए कोई ड्रेस-कोड निर्धारित नहीं करतीं।

निश्चय ही, सभी कंपनियों, स्कूलों और मित्रों, परिवारों में ऐसा नहीं होता लेकिन मैंने देखा है कि बहुत से देशों में यह एक सामान्य चलन होता जा रहा है।

मैं भी इस अनौपचारिक तरीके का कायल हूँ। उदाहरण के लिए पश्चिम में मुझे यह अनुभव होता रहा है कि कोई इस बात का बुरा नहीं मानता कि वह आपके यहाँ आना चाहता है और आप उनसे कहें कि आप आज अपने परिवार के साथ अकेले समय गुज़ारना चाहते हैं। ऐसे माहौल में आप ज़्यादा से ज़्यादा 'अपने में' या 'अपने तरीके से' रह सकते हैं, और आपको बहुत सी औपचारिकताओं का ध्यान नहीं रखना पड़ता!

और यही तरीका है, जिसे जीवन में उतारने के लिए मैं हमेशा लोगों को प्रेरित करता रहूँगा। यदि इससे कुछ 'मैनर्स' (शिष्टाचारों) की, जो वैसे भी खोखली औपचारिकताएँ ही हैं, अवहेलना होती हो तो वह भी मुझे मंज़ूर है। क्या इससे आसपास के कुछ लोग आश्चर्यचकित होंगे? क्या वे स्तब्ध रह जाएँगे या उससे बढ़कर, आपको रूखा, सनकी या बदमिजाज समझेंगे? छोड़िए, इतनी सी बात को बर्दाश्त कर लेना बेहतर है, बनिस्बत इसके कि वह करें, जो आप नहीं करना चाहते!

Related posts

पश्चिम में बसने जा रहे भारतीयों के लिए कुछ और टिप्स - 9 जुलाई 2015

पश्चिम में बसने जा रहे भारतीयों के लिए कुछ और टिप्स – 9 जुलाई 2015

स्वामी बालेन्दु पश्चिम में बसने जा रहे भारतीयों के लिए उनके पास उपलब्ध कुछ और विचार लिख रहे हैं। पढ़िए ...
जब भारतीय पश्चिमी मुल्कों में खरीदारी करना सीखते हैं - 8 जुलाई 2015

जब भारतीय पश्चिमी मुल्कों में खरीदारी करना सीखते हैं – 8 जुलाई 2015

स्वामी बालेन्दु अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड के साथ पश्चिम में रहने वाले भारतीय मर्दों को बता रहे हैं कि कैसे ...
पश्चिम में वृद्धों का कठिन जीवन - 25 सितम्बर 2014

पश्चिम में वृद्धों का कठिन जीवन – 25 सितम्बर 2014

बहुत से लोगों को वृद्धावस्था में बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। स्वामी बालेन्दु उनकी इस हालत का ...
संयुक्त परिवार बहुत अच्छे होते हैं मगर हर बुज़ुर्ग को ऐसी जीवन पद्धति रास नहीं आती - 24 सितम्बर 2014

संयुक्त परिवार बहुत अच्छे होते हैं मगर हर बुज़ुर्ग को ऐसी जीवन पद्धति रास नहीं आती – 24 सितम्बर 2014

स्वामी बालेन्दु ऐसे बुजुर्गों के बारे में लिख रहे हैं जो संयुक्त परिवार में रहकर खुश नहीं होंगे बल्कि वृद्धों ...
जानना तो नहीं चाहते, फिर भी पूछते हैं, 'आप कैसे हैं'? यह कैसी संस्कृति है, भई? 18 जुलाई 2013

जानना तो नहीं चाहते, फिर भी पूछते हैं, ‘आप कैसे हैं’? यह कैसी संस्कृति है, भई? 18 जुलाई 2013

स्वामी बालेंदु 'आप कैसे हैं' पूछने की अमरीकी आदत के बारे में बता रहे हैं जो सिर्फ अभिवादन का एक ...
'रौंग नंबर, हनी!' जब अमरीकी और जर्मन संस्कृतियाँ टकराती हैं तो यही होता है 17 जुलाई 2013

‘रौंग नंबर, हनी!’ जब अमरीकी और जर्मन संस्कृतियाँ टकराती हैं तो यही होता है 17 जुलाई 2013

स्वामी बालेंदु उदाहरण देकर बता रहे हैं कि जब अमरीकी और जर्मन्स मिलते हैं और अपनी-अपनी संस्कृतियों की चर्चा करते ...

Leave a Reply