कल मैंने आपको बताया था कि मेरे विचार में बुजुर्गों के लिए संयुक्त परिवार सबसे अच्छी व्यवस्था हैं। स्वाभाविक ही आपके दिल में अपने माता-पिता या दादा दादी के लिए अधिक प्रेम होगा उस अपरिचित बीमार व्यक्ति की तुलना में जोकि किसी वृद्धाश्रम के संचालक को वहां रहने खाने के पैसे देकर रह रहा है। यह सब सुनने में बड़ा अच्छा लगता है लेकिन ऐसे लोग भी हैं जिन्हें यह रास नहीं आता! ऐसे लोग भी मौजूद हैं, जो बुजुर्गों के लिए निर्मित इन वृद्धाश्रमों में ही रहना चाहते हैं- आइये उनके बारे में भी थोड़ी सी चर्चा कर ली जाए।
(भारतीय पाठकों से निवेदन है कि यह ब्लॉग पश्चिमी देशों के परिदृश्य को देखकर लिखा गया है अतः इसे उसी तरह पढ़ा और समझा जाए.)
मुझे इस बात का पूरा एहसास है कि कुछ लोग संयुक्त परिवार में रहने के लिए बने ही नहीं हैं। वे लोग बुजुर्गों के लिए बनाए गए वृद्धाश्रमों में ही रहना चाहते हैं, वे अपने आपको उस जीवन के लिए तैयार कर चुके होते हैं। उनका मस्तिष्क एक ख़ास तरीके से विकसित हो चुका है और उसने इस परिस्थिति को एक तथ्य के रूप में स्वीकार कर लिया है। उनके लिए इस बिंदु पर आकर परिवार के साथ जीवन बिताना मुश्किल हो सकता है।
पश्चिम में मैं यह बात अक्सर देखता हूँ क्योंकि वहाँ बच्चों का 18 वर्ष की उम्र होते ही घर से बाहर निकल जाना आम बात है। इस उम्र तक आते आते वे अपने लिए कोई जगह ढूँढ़ लेते हैं, अपना अलग जीवन जीते हैं और फिर बच्चे पैदा करके अगले 18 वर्ष उनके साथ बिताते हैं। उसके बाद वे पुनः अकेले हो जाते हैं या फिर उनके साथ उनका जीवन साथी होता है। बड़े परिवार में होने वाले बहुत से आयोजनों से वे अनभिज्ञ होते हैं। इसके विपरीत, वे अपने घर की नीरवता के अभ्यस्त होते हैं, एकांत और शान्ति के आदी होते हैं, कभी अकेले तो कभी किसी के साथ, सिर्फ दो व्यक्ति या फिर अकेले रहने के आदी।
सालों अपनी जीवन शैली को अपने आसपास मौजूद दूसरे लोगों की इच्छाओं या आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने की उन्हें ज़रुरत नहीं पड़ी है। अगर उनका कोई साथी या पति या पत्नी होते हैं तो वे एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह जानते हैं कि सालों कोई ऐसी बात नहीं हो पाती, जो उन्हें विस्मित कर सके। उनका दिमाग एक ख़ास दिनचर्या में बंधा होता है और जितना ही वे वृद्ध होते जाते हैं उतना ही किसी भी तरह का परिवर्तन उनके लिए मुश्किल होता जाता है।
नाती-पोतों के साथ एक भरपूर पारिवारिक ज़िन्दगी उनके लिए बहुत भारी पड़ती है। किसी नवजात शिशु का रोना उनकी नींद में खलल पैदा करता है और वे परेशान हो उठते हैं। छोटे स्कूली बच्चों की दिन भर की धमाचौकड़ी उनकी बर्दाश्त से बाहर होती है। बच्चों की तुलना में वयस्कों के साथ तालमेल बिठाना और भी ज़्यादा मुश्किल सिद्ध होता है! इतने साल अलग रहने के बाद दूसरों की छोटी-मोटी आदतों से वे वाकिफ नहीं होते! थोड़े समय में ही सबको एक-दूसरे की मामूली बातें भी नागवार गुज़रने लगती हैं-और फिर अलग-अलग जीवन शैलियों के साथ शान्ति और सुखपूर्वक एक छत के नीचे रहना नामुमकिन हो जाता है!
किसी भी व्यवस्था का लक्ष्य यही होता है कि सब खुश रहें, प्रेम और सुखचैन के साथ रहें। और इस मामले में मैं कहूँगा कि दुनिया में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी मौजूद हैं, जिनके लिए संयुक्त परिवार में रहना असंभव होगा! वे उसी व्यवस्था में प्रसन्न रहेंगे जहाँ पैसे देकर वे किसी को अपनी देखभाल के लिए रख लें, जहाँ एक नियमित और घड़ी के काँटे के साथ बंधा जीवन हो और अपनी मर्ज़ी के अनुसार कभी भी वे अपनी निजता में दुबककर मस्त रह सकें।
लेकिन उन्हें, जो भारतीय संस्कृति में और भारतीय माहौल में पैदा हुए हैं, इसका आदी होना मुश्किल होगा। मुझे लगता है कि वे हमेशा लोगों के बीच घिरे रहने को वरीयता देंगे। इसी तरह मेरे कुछ पश्चिमी मित्रों के बारे में कहा जा सकता है कि वे बहुत ज़्यादा भीड़-भाड़ और शोर-शराबे वाले भारतीय माहौल में प्रसन्न नहीं रह पाएँगे।
अंत में कहा जा सकता है कि अधिकतर यह इस बात पर निर्भर है कि आप किस माहौल में या किस संस्कृति में पले-बढ़े हैं और यह भी कि आपके मस्तिष्क की तैयारी किस तरह की है!
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