यमुना आरती – अन्धविश्वास, भोजन की बरबादी, प्रदूषण और मस्ती भरा माहौल – 3 दिसम्बर 2014

वृन्दावन

हम लोग इस समय खुशियाँ मना रहे हैं-दरअसल मेरे सबसे पहले जर्मन मित्र, माइकल और आंद्रिया यहाँ आए हुए हैं तो उनके साथ आश्रम में हम सब खूब मज़े कर रहे हैं! स्वाभाविक ही वे थोड़ा-बहुत बाहर भी घूमना चाहते हैं इसलिए रमोना उन्हें उन्हें लेकर केशी घाट गई थी और उन्हें यमुना आरती दिखाकर अभी-अभी लौटी है। निश्चित ही मेरी पत्नी के लिए यह कोई नई बात नहीं थी और उसे आरती के दौरान कुछ अधार्मिक अनुभव प्राप्त हुए।

हमारे मित्र, जो स्वयं भी धार्मिक नहीं हैं, रमोना और पूर्णेन्दु के साथ बैठे सारे अनुष्ठान को गौर से देखते रहे। सबसे पहले अनुष्ठान कराने वाले पुरोहित ने नदी में बहुत सारा दूध बहा दिया। उसके बाद उन्होंने देखा कि बहुत सारी मिठाइयाँ यमुना नदी में बहाई जा रही हैं और अंत में हज़ारों की संख्या में गुलाब की पंखुड़ियाँ भी बहाई गईं। नदी में बहती पंखुड़ियों को देखते हुए अचानक उन्हें खयाल आया कि इन पंखुड़ियों का क्या हुआ होगा: वास्तव में महज 100 मीटर आगे कुछ बच्चे इन्हीं पंखुड़ियों को नदी में से निकालकर इकठ्ठा कर रहे थे। फटे-पुराने गंदे कपड़ों में, नंगे पैर और शरीर पर धूल और गंदगी लिपटी हुई। और यही बच्चे कुछ देर पहले दोनों में कुछ गुलाब की पंखुड़ियाँ और एक रुई की बाती रखकर उन्हें हमारी टोली को बेचने की कोशिश कर रहे थे कि वे भी दिया जलाकर दोनों को यमुना में प्रवाहित करें।

उनके लिए यह किसी रहस्य के खुलने जैसा था: एक तरफ लोग सैकड़ों लीटर पौष्टिक दूध नदी के गन्दे पानी में विसर्जित कर रहे हैं और दूसरी तरफ गरीब बच्चे हैं, जो किसी तरह कुछ रुपए कमाकर घर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनका परिवार चावल, आटा, दाल और हाँ-दूध-खरीद सके। इतने परिश्रम के बाद भी दूध के साथ नदी में फेंकी जाने वाली मिठाइयों का आनंद वे नहीं ले पाएंगे क्योंकि वे बहुत महंगी हैं और उन्हें खरीद पाना उनके बूते के बाहर की बात है।

इसके अलावा अगर आप नदी को देखें तो सोच में पड़ जाएँगे कि क्या इसे वास्तव में नदी कहा भी जा सकता है! कम बारिश के कारण और दिल्ली शहर में नदी पर बड़े-बड़े बांध बन जाने के बाद आजकल उसमें बहुत कम पानी होता है। नदी के पाट का बड़ा हिस्सा साफ़ दिखाई देता है और जहाँ पहले नावें पर्यटकों को घुमाने ले जाती थीं वहाँ ऊँट इधर-उधर घूमते-फिरते हैं। इस अनुष्ठान के लिए भी उन्हें एक नहर खोदकर पानी को घाट की सीढ़ियों तक लेकर आना पड़ता है। अब इस छोटे से गंदे पानी के गढ़े में ही वे लोग फूल, दूध और मिठाइयाँ फेंकते हैं और पहले से अत्यधिक प्रदूषित पानी को और ज़्यादा प्रदूषित करते हैं।

ज़्यादा से ज़्यादा वह गटर के पानी और दिल्ली से आ रहे रासायनिक कचरे का मिश्रण भर रह गई है। उसमें कोई जीवन नहीं रह गया है। मछली नहीं, कछुए नहीं और न ही कोई दूसरे जीव जंतु, बचपन में जिनके साथ हम पानी में खेला करते थे! वे यहाँ बचे नहीं रह सकते थे-पानी में जान ही नहीं है।

इन सबके बावजूद और इसके बावजूद भी कि दो-दो भोपुओं पर पुरोहितों के कर्कश स्वर गुंजायमान थे और एक दूसरे से होड़ कर रहे थे, रमोना और हमारे मित्रों ने नदी किनारे घूमने का और वहाँ चल रहे अनुष्ठानों का भरपूर आनंद उठाया। कैसे? मेरी पत्नी ने इसे स्पष्ट करने की पूरी कोशिश की: उसे कोई धार्मिक आकर्षण या धर्म के प्रति कोई आदर या लगाव नहीं है। ऐसा कोई एहसास नहीं है कि वहाँ हो आने पर किसी देवी या देवता की कृपा उसे प्राप्त होगी। लेकिन डूबते सूरज की सुनहरी रौशनी में ऐतिहासिक इमारतों के सामने, घाट की शिलाओं पर बैठना, लोगों का गाना-बजाना सुनना और लोगों को एक साथ इतनी बड़ी संख्या में वहाँ से गुज़रते देखना अपने आप में बहुत सुखद एहसास करा रहा था। यह सब एक अनोखा माहौल पैदा करता है, जिसका हिस्सा बनना ही आपको भावविभोर कर देता है।

इसमें कोई दैवी या आध्यात्मिक बात नहीं है। वहाँ कोई भगवान आपको प्रसन्न नहीं कर रहा है। आप खुद प्रसन्न हैं। आप इतने सारे लोगों के बीच खुद को पाकर खुश हैं क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे लोगों के साथ, उनके साथ बैठकर, आपस में घुल-मिलकर अच्छा लगता है। आप नैसर्गिक सौंदर्य देखकर प्रसन्न होते हैं, हालाँकि वह इससे भी अधिक प्रभावशाली हो सकता था। और आप संगीत का आनंद लेते हैं, दूसरों का गाना-बजाना सुनकर प्रसन्न होते हैं।

क्या यह सब, यह सुखद और आनंददायक माहौल, हम बिना किसी अन्धविश्वास का सहारा लिए, खाने-पीने का सामान बरबाद किए बगैर, नदी को गंदा किए बगैर और बिना प्रदूषण फैलाए पैदा नहीं कर सकते?

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