अपनी ईमानदारी के साथ समझौता? – 27 अप्रैल 2009

शहर:
वीसबाडेन
देश:
जर्मनी

अपनी २३ अप्रैल की डायरी पर मुझे एक कमेंट प्राप्त हुआ। समझौते के संबंध में उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस दुनिया में समझौता करना पड़ता है, अन्यथा आपका मिलन नहीं हो सकता बल्कि आप एक-दूसरे से अलग हो जायेंगे। मैं पूर्णतः समझता हूं कि उनके कथन का अर्थ क्या है और उसका सम्मान करता हूं परन्तु जब मैं कहता हूं कि मैं समझौता नहीं करना चाहता तो उसका मतलब भिन्न है।

जब आप प्रेम में ऐसा करते हैं तो मेरे लिये वह समझौता नहीं है बल्कि प्रेम के प्रति सम्मान है। जब आप प्रेम में हैं आप सभी चीजों का आनंद लेते हैं। बेशक आपको कुछ चीजें करनी पड़ती हैं परन्तु यदि यह सम्मान और प्रेम के लिये है, मेरे लिये यह समझौता नहीं है। निःसंदेह हम इस दुनिया और समाज में रहते हैं और हमें लोगों के साथ – साथ चलना पड़ता है| हमें अन्य लोगों की भावनाओं का सम्मान करना पड़ता है|

जब मैं कहता हूं कि मैं समझौता नहीं करना चाहता, इसका कुछ और ही मतलब होता है। जब आप अपने दिल, अपने सिद्धांतों और मूल्यों जिनके साथ आप जीना चाहते हैं या जब आप स्वयं को और अपने मूल्यों को बेच देते हैं तब आप अपनी ईमानदारी के साथ समझौता करते हैं। अगर आप ऐसा करते हैं, यदि आप समझौता करते हैं, आपका अंतःकरण आपके पूरे जीवन भर दूषित रहेगा।

ईमानदार होने के बारे में मेरे कथन का यही अर्थ है। समझौते के कारण आप हमेशा स्वयं को दोषी महसूस करेंगे। अगर इस तरह से यदि आप समझौता नहीं करते हैं, और ईमानदार हैं, तो आपको भौतिक चीजों की कमी हो सकती है परन्तु आप गर्व के साथ जीयेंगे और जब आपकी मृत्यु होगी, आपको कोई पश्चाताप नहीं रहेगा।