परस्पर विश्वास की कमी जीवन को मुश्किल बना देती है – 5 जून 2014

विश्वास

कल मैंने बताया था कि आजकल परिवारों को किस तरह बहुत कम पारिवारिक जीवन प्राप्त हो पाता है और इसलिए वे एक-दूसरे के जीवनों में भी कम से कमतर शामिल हो पाते हैं। इसका परिणाम एक और समस्या के रूप में सामने आता है, जिसके बारे में आज मैं चर्चा करने जा रहा हूँ: परिवार के सदस्यों के बीच विश्वास कम नहीं बल्कि लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है!

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विश्वास पैदा करने के लिए एक-दूसरे को जानना ज़रूरी है। एक-दूसरे को जानने के लिए एक-दूसरे के साथ रहना, एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत करना ज़रूरी है। दूसरे के साथ जितना ज़्यादा समय आप गुज़ारेंगे उतना ही बेहतर तरीके से आप उसे जान पाएँगे और उतना ही अधिक आप उस पर विश्वास भी कर सकेंगे। लेकिन आजकल लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ समय नहीं बिताते। उन्हें जानने-समझने का उनके पास वक़्त ही नहीं होता। इसका नतीजा यह होता है कि उनके बीच आपसी विश्वास, जिसकी बात मैं कर रहा हूँ, विकसित नहीं हो पाता!

यह स्थिति वाकई बड़ी दुखद है क्योंकि इस दुनिया में पहले ही ऐसी हालत है कि किसी पर विश्वास करना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है! आपके परिवार के सदस्य ही सबसे भरोसेमंद हो सकते हैं, जिन पर विश्वास करना सबसे आसान हो सकता है। लेकिन भारत में, और उससे ज़्यादा पश्चिम में, लोगों ने आजकल वास्तव में एक परिवार की तरह रहना ही छोड़ दिया है। कारण कुछ भी हो, अब लोग आपस में एक-दूसरे के करीब नहीं हैं। वर्तमान में दुनिया भर में पाई जाने वाली बहुत सी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण भी, मेरे विचार से, यही है।

जब आप किसी पर विश्वास करते हैं तो आप सुकून के साथ रह सकते हैं। वह आपको दैनिक जीवन में शांति प्रदान करता है और मुश्किल परिस्थितियों में आपको मानसिक सहारा भी देता है। भले ही आर्थिक स्थिति इतनी बुरी न हो कि भाई से पैसे मांगने की ज़रुरत पड़े, फिर भी आपको पता होता है कि वह आपके पीछे खड़ा है और ज़रुरत होगी तो उससे उधार लिया जा सकता है। आपको पता होता है कि अपने पुरुष-मित्र के साथ बिगाड़ होने पर अपना साझा फ़्लैट छोड़कर आप कुछ दिनों के लिए अपने माता-पिता के पास जाकर रह सकती हैं। आप जानती हैं कि आप, मौका पड़ने पर, अपनी बहन के पास उसकी व्यावसायिक सलाह लेने जा सकती हैं, जो वकील, डॉक्टर, खाना बनाने वाली या माँ, कुछ भी हो सकती है। लेकिन आप नहीं जा सकतीं- क्योंकि दोनों के बीच परस्पर विश्वास नहीं है!

विषय के विस्तार में न जाकर मैं विश्वास में कमी से उद्भूत एक नतीजे की तरफ इंगित करना चाहता हूँ: बैंक इसके चलते अतिरिक्त लाभ कमा लेते हैं! पहले की तरह एक-दूसरे से पैसा उधार लेने में आजकल सहोदर भी हिचकिचाने लगे हैं, चाहे दो-चार सौ की बात ही क्यों न हो। उसकी जगह वे बैंक से ओवरड्राफ्ट लेना और उस पर अनाप-शनाप ब्याज देना ज़्यादा पसंद करते हैं। लोग अपने ही अभिभावकों का मकान खरीदने के लिए बैंक से क़र्ज़ लेते हैं- यह नहीं कि हर माह किश्तों में चुका दें, जैसा कि अब उन्हें बैंक में करना ही पड़ेगा। जो इससे पैसा कमाता है वह कोई और नहीं, बैंक होता है। परस्पर विश्वास की कमी का नतीजा है, बैंक का लाभ!

हमारे समाज में यह समस्या गहराई तक जड़ जमाए बैठी है। यह इतनी गहरी है कि ज़्यादातर लोग इसके नतीजों को वास्तविक समस्या मानने के लिए ही तैयार नहीं होंगे। वे समझते हैं कि जो स्थिति पैदा हुई है वह क्यों पैदा हुई है। क्योंकि वे खुद भी विश्वास नहीं करते।

मैं जानता हूँ कि वे नहीं कर सकते लेकिन अगर कर पाते हैं तो यह बहुत अच्छी बात होगी। मैं समझ रहा हूँ कि क्यों यह संभव नहीं है मगर काश, ऐसा संभव हो पाता!

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