भारत में वापस घर आने का अकल्पनीय अद्भुत अनुभव – 13 अगस्त 2014

यात्रा

तो अब मैं आपको यहाँ, भारत से लिख रहा हूँ! हम लोग सकुशल आश्रम पहुँच गए हैं और हालाँकि थोड़ा थक गए हैं, हम वापस भारत आकर बहुत खुश हैं!

कल ब्लॉग लिखने के बाद हमने उसे अपलोड किया और एक बार फिर ब्रेड रोल और कोसान्स सहित एक और ज़ोरदार जर्मन नाश्ता लिया। थॉमस ने हमें रेलवे स्टेशन तक छोड़ दिया, जहाँ से हमने सीधे विमानतल के लिए ट्रेन पकड़ी। फ्रैंकफर्ट विमानतल के लिए यह बड़ी सुविधाजनक सेवा है!

वैसे तो यशेंदु शुक्रवार को यहाँ से वापसी की उड़ान भरेगा मगर वह वह हमें विमानतल तक छोड़ने आया, जिससे सामान उठाने-धरने में कुछ मदद हो सके। इस तरह चेक-इन और फिर सुरक्षा जाँच होने तक हमें व्यवस्थित रूप से सामान रखने-ले जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई और यहीं हमने गुडबाय कहकर यशेंदु से विदा ली। हम दरवाज़े की ओर बढ़े और हालाँकि अपरा थकान महसूस कर रही थी मगर जगी हुई थी और इतनी चैतन्य कि विमानतल को एक बार फिर पूरी दिलचस्पी के साथ देख सके!

हम हवाई जहाज़ तक आए और अपनी सीटों पर बैठे ही थे कि मिनट भर में अपरा लुढ़क गई-पहले कान में हेडफोन लगवाया, बच्चों का कार्यक्रम शुरू करवाया और फिर नींद में डूब गई। उसके बाद दो घंटे तक वह हवाई जहाज़ और आश्रम के सपनों में खोई रही!

पायलेट ने हमारा स्वागत किया और बताया कि यह वही जहाज़ है, जिसमें कुछ दिन पहले ही जर्मन फुटबाल टीम ब्राजील में विश्वकप जीतने के बाद वापस लौटी थी और यह सुनकर रमोना रोमांचित हो उठी!

बाकी के सफ़र में अपरा खेलती, खाती-पीती रही, खिड़की से बाहर झाँक-झाँककर देखती रही-कुल मिलाकर जहाज़ के सफ़र का पूरा मज़ा लेती रही। हम तो उसका संयम देखकर दंग थे! एक बार भी वह रोई नहीं, चिड़चिड़ाई नहीं कि जहाज़ से बाहर निकलना है और उसके बहुत से ‘आपातकाल’ के लिए खरीदे गए खिलौने अनछुए पड़े रहे। मैंने उससे कहा था कि जब जहाज़ रुकने को होगा तो उसे एक बार फिर टॉयलेट जाना होगा इसलिए जैसे ही मैंने उससे टॉयलेट चलने के लिए कहा, घर पहुँचने की ख़ुशी में उसने नाचना-गाना शुरू कर दिया!

विमानतल पर जैसे ही उसने हमारे बाहर निकलने का इंतज़ार करते पूर्णेंदु चाचा को देखा, ख़ुशी से उछल पड़ी! कार में वह फिर सो गई लेकिन जैसे ही घर पहुँचे, फिर जाग गई। हालाँकि बहुत थक गई थी मगर जैसे ही उसने नानीजी और बब्बाजी को देखा, उसका चेहरा एक चौड़ी मुस्कान से खिल उठा! और अब पिछले कई घंटे से मैंने उसे नहीं देखा है-वह अपने घर और आश्रम को फिर से जाँचने-परखने में, नानी, पिताजी और भाई के साथ मौज-मस्ती करने में व्यस्त हो चुकी है। कुछ देर में ही स्कूल के बच्चे आने लगेंगे और हम यह देखने के लिए उतावले हो रहे हैं कि उनसे मिलकर वह किस तरह खुशी के मारे झूम उठेगी!

भारत ने हमें फिर वापस बुला लिया है और हालाँकि जब से हम आए हैं, यहाँ बिजली नहीं है और ऊपर से मौसम भी काफी गर्म और नम है, वापस भारत आना एक अद्भुत अनुभव है। पता नहीं कितनी बार मैं इसी तरह दिल्ली विमान तल पर उतरा हूँ लेकिन मैं आज भी वापस लौटने के इस एहसास को, हर बार होने वाले खुशी और रोमांच के अनुभव को और वापस आश्रम लौटकर आने के उल्लास को ठीक तरह से व्यक्त करने में असमर्थ हूँ।

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